यस आर रंगनाथन
यस आर रंगनाथन भारत के पुस्तकालय जगत के जनक जिन्होने कोलन वर्गीकरण तथा क्लासिफाइड केटलाग कोड बनाया । पुस्तकालय विज्ञान को महत्व प्रदान करने तथा भारत मे इसका प्रचार प्रसार करने मे इनका सक्रिय योगदान था ।
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[संपादित करें] डाँ रंगनाथन की भूमिका
सन् १९२४ के पूर्व भारत में ग्रन्थालय व्यवसाय, लिपिक कार्य (बाबूगिरी) और घरों में ग्रन्थों तथा ग्रन्थ जैसी वस्तुओं को रखने का धन्धा मात्र ही समझा जाता था. यह सन् १९२४ का समय था जब भारत के ग्रन्थालयी दृश्य पर डॉ. रंगनाथन का आगमन हुआ, वे प्रथम विश्वविद्यालयीय पुस्तकालयाध्यक्ष थे, जो मद्रास विश्वविद्यालय में नियुक्त किये गये. वे अपने जीवन के प्रथम २५ वर्षों के दौरान अपने को एकल-अनुसंधान में तल्लीन करके तथा शेष २५ वर्षों में दलअनुसंधान का संगठन करके भारत में ग्रन्थालयी दृश्य को पहले परिवर्तित किया. अपने पुस्तकालयी व्यवसाय के ४८ वर्षों के दौरान, उन्होंने भारत में ग्रन्थालय व्यवसाय की उन्नति के लिए एक महान् भूमिका निभाई. भारत के प्रथम राष्ट्रपति [[डॉ. राजेन्द्रप्रसाद]] ने डॉ. रंगनाथन के ७१ वें जन्म वर्षगाँठ के अवसर पर बधाई देते हुये लिखा, "डॉ. रंगनाथन ने न केवल मद्रास विश्व-विद्यालय ग्रन्थालय को संगठित और अपने को एक मौलिक विचारक की तरह प्रसिद्ध किया अपितु सम्पूर्ण रूप से देश में ग्रन्थालय चेतना उत्पन्न करने में साधक रहे. विगत ४० वर्षों के दौरान उसके कार्य और शिक्षा का ही परिणाम है कि भारत में ग्रन्थालय विज्ञान तथा ग्रन्थालय व्यवसाय उचित प्रतिष्ठा प्राप्त कर सका."
डॉ. रंगनाथन ने अत्यधिक सृजनात्मक उत्साह के साथ कार्य किया. उन्होंने स्वयं के विचारों को विकसित किया. उन्होंने बार-बार पुस्तकें व शोध-पत्र लिखे. उन्होंने जन-ग्रन्थालय विधेयकों का मसौदा (प्रारूप) तैयार किया और राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्रिया-कलापों को प्रोत्साहित किया तथा सहयोग दिया. निम्नलिखित विभिन्न व्यक्तिगत विशेषताएँ हैं जिससे डॉ. रंगनाथन ने भारत में पुस्तकालय व्यवसाय को प्रोत्साहित किया, जैसे: प्रजनक लेखक , वर्गीकरणाचार्य और वर्गीकरणकर्त्ता , सूचीकरणकर्त्ता , संगठनकर्त्ता , अध्यापक-शिक्षक-गुरू , दाता , सभापति , अध्यक्ष , सलाहकार , सदस्य , प्रलेखनाज्ञाता इत्यादि.
[संपादित करें] प्रजनक लेखक
भारतीय ग्रन्थालय विज्ञान के छात्र डॉ. रंगनाथन के सम्पर्क में सर्व-प्रथम उसकी पुस्तकों तथा शोध-पत्रों द्वारा आते हैं. ग्रन्थालय विज्ञान की कोई भी ऐसी शाखा नहीं रही, जिस पर उन्होंने नहीं लिखा ३१,३९. उन्होंने ५० से अधिक ग्रन्थों तथा लगभग २,००० शोध लेख, सूचना लेख, टिप्पणियां लिखी हैं. डॉ. रंगनाथन के ७१ वें जन्म वर्षगाँठ पर उसकी रचनाओं की एक वा गमय सूची (भिब्लिओग्रप्ह्य्) ए.के. दास गुप्ता द्वारा तैयार की गयी.
[संपादित करें] वर्गीकरण
२.२१ आधुनिकतम् प्रचलित प्रवृत्तियाँ ग्रन्थालय वर्गीकरण का इतिहास प्रदर्शित करता है कि वर्गीकरण की योजनाओं का विकास पूर्ण आंकिक (फुरेल्य् ऐनुमेरटिवे), जैसे--लाईब्रेरी फ काँग्रेस और राईडर इन्टरनेशनल वर्गीकरण, से स्वतंत्र मुख, विश्लेषणात्मक-संश्लेषणीय (ञ्रेएल्य् ञचेटेड्, आनल्य्टिचो-श्य्न्ट्हेटिच्), जैसे--द्विबिन्दु वर्गीकरण का तीसरा रूपान्तर तक तक हूआ. वर्गीकरण की आधुनिकतम् प्रचलित प्रवृत्तियाँ: मानकीकरण( श्टन्डर्डि-~ॅअटिओन्), सिद्धान्तों पर आधारित अतिथ्य योजना (ठ्हेओर्य् भसेड् ःओस्पिटब्ले श्च्हेमे) और संगणकीकरण (छोम्पुटेरिसटिओन्) हैं.
[संपादित करें] मानकीकरण
पिछले कुछ वर्षों के दौरान वर्गीकरण की एकरूपता (सारूप्य) अर्थात् `अन्तर्राष्ट्रीय वर्गीकरण योजना' की तरफ प्रयत्न किये जा रहे हैं. यह बुद्धिजीवी पाठकों, विशेषकर विद्वानों की अन्त:शक्ति की आवश्यक बचत प्रदान करेगा.
[संपादित करें] सिद्धान्तों पर आधारित आतिथ्य योजना
यह अनुभव किया गया है कि ऐसी विधि का विकास किया जाय जो सिद्धान्तों पर आधारित हो. ज्ञान समष्टि ............बहुत ही तीव्रगति से हो रहा है. नये-नये अन्तर संयम तथा बाह्रा सयंम विषय उत्पन्न हो रहे हैं. इस विस्तार से प्रभावपूर्वक तथा उत्पादक रूप से निपटने के लिए एक वर्गीकरण योजना ऐसी होनी चाहिए जो अपनी मूल संरचना को बिना बदले, नये विचारों को एक सराहनीय स्तर तक, सुविधापूर्वक समायोजित कर सके. वर्गीकरण योजना के विकास, उसका ढाँचा (रूपरेखा) तैयार करने के लिए विधि-तन्त्र और प्रलेखनों के वर्गीकरण, के मार्ग-दर्शन हेतु वर्गीकरण के प्रगतिशील सिद्धान्तों की आवश्यकता का अनुभव किया जाता रहा है. यह कार्य रंगनाथन द्वारा प्रदत्त वर्गीकरण के सिद्धान्तों पर आधारित आतिथ्य योजना द्वारा सम्भव हो सका और वर्गीकरण योजना को आधुनिकतम बनाने में सहायक सिद्ध हुआ.
[संपादित करें] संगणकीकरण
आज के युग में सूचना के रख-रखाव व उसको पुन: प्राप्ति के लिए संगणकी-~करण (छोम्पुटेरिसटिओन्) का प्रचलन है. हमें सूचना के पुन: प्रापण तथा उसके संगठन हेतु शक्तिशाली तकनीकों तथा उपकरणों की आवश्यकता है. सूचना-तन्त्रों के संगणकीकृत सूचना पुन: प्रापण में वर्गीकरण की आवश्यकता का अनुभव किया जा चुका है, इसके वर्गीकरण का महत्त्व और बढ़ जाता है.
[संपादित करें] सामान्य बनाम विशेष वर्गीकरण
एक दूसरी प्रवृत्ति-सामान्य बनाम विशेष वर्गीकरण की है. क्योंकि सब प्रकार के ग्रन्थालयों, सूचना-केन्द्रों, प्रलेखन केन्द्रों से यह अपेक्षा की जाती है कि उसके पास सभी प्रकार (सामान्य रुचि विशिष्ट तथा विषय रुचि) के प्रलेखों, का संग्रह होगा, परन्तु विशेष महत्व ने उन प्रलेखों, जिनसे कि वे सम्बन्धित हैं, उनका अति सूक्ष्म-स्तर पर वर्गीकरण आवश्यक होता है. इस प्रकार सभी प्रकार के प्रलेखों का वर्गीकरण हेतु सामान्य बनाल वर्गीकरण का होना परमावश्यक है.
[संपादित करें] वर्गीकरण और डॉ. रंगानाथन
यह डॉ. रंगनाथ थे जिन्होंने वर्गीकरण की एक नवीन किस्म--`स्वतन्त्रन्मुख, विश्लेषणात्मक-संश्लेषणीय वर्गीकरण' का निर्माण किया, जो न केवल फलक व्यवस्थापन (श्हेल्ङ् आर्र-~न्गेमेन्ट्) के लिए ही अपितु अनुक्रमणिका तैयार करने, आदि के लिए भी मुक्त-कंठ रूप से स्वीकार की गयी. वर्गीकरण के लिए `स्वतन्त्र-मुख, विश्लेषणात्मक, संश्लेषणीय योजना' अन्य योजनाएँ जैसे--प्राय: गणनात्मक (आल्मोस्ट् ऐनुमेरटिवे) उदाहरणत: ड्यूई दशमलव वर्गीकरण, प्राय: फलकित (आल्मोस्ट् ञचेटेड्) उदाहरणत: सर्वव्यापक दशमलव वर्गीकरण और दृढ़ फलकित (षिगिड्ल्य् ञचेटेड्) उदाहरणत: द्विबिन्दु-~वर्गीकरण का प्रथम व द्वितीय रूपान्तर, की तुलना में अत्यधिक आधुनिकता प्रदान करती है. जो वर्गीकरण के आधुनिकतम प्रचलन तथा समस्याओं (जैसे नये उत्पन्न विचारों को सारणी में उचित स्थान देना), के हल करने का मात्र उपाय है. वर्गीकरण के क्षेत्र में डॉ. रंगनाथन का सर्वाधिक अंशदान (योगदान) द्विबिन्दु वर्गीकरण (छ् छ्) है, जो सर्व-प्रथम सन् १९३३ में प्रकाशित हुआ. द्वितीय संस्करण १९३९ में, तृतीय १९५० में, चतुर्थ १९५२ तथा पंचम १९५७ व षष्ठम १९६० में प्रकाशित हुए और सप्तम संस्करण अभी भी अनिश्चितता के मोड़ पर है. डॉ. रंगनाथन केवल वर्गीकरणाचार्य (छ्लस्सिङिचटिओनिस्ट्) के रूप में ही नहीं, अपितु एक वर्गकार (छ्ल-~स्सिङिएर्) के रूप में भी जाने जाते हैं. सन् १९४६-४७ के दौरान जब वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ग्रन्थालय विज्ञान के प्रोफेसर तथा पुस्तकालयाध्यक्ष थे, उन्होंने अपनी वर्गीकरण योजना के अनुसार विश्वविद्यालय ग्रन्थालय के लगभग एक लाख (१,००,०००) ग्रन्थों का फिर से वर्गीकरण लगभग १८ महिनों के अल्प समय में किया. इस कार्य के लिये उन्होंने अपने ही दिये गये नियम (उपसूत्र) परासरण का नियम (छनोन् ओङ् औस्मोसिस्) की सहायता ली. महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि यह सब कुछ उन्होंने अपने उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यों जैसे-पाठन कार्य, प्रशासनिक कार्यों आदि का पालन करते हुये अपनी ५६ वर्ष की अवस्था में किया. डॉ. रंगनाथन ने सर्व-प्रथम `वर्गीकरण सिद्धान्त' का सूत्रपात किया. यह सिद्धान्त वर्गीकरण तन्त्रों का ढाँचा तैयार करने तथा अन्य शब्द-भंडार नियन्त्रक उपायों के लिए तारतम्यता, एकरूपता और ठोसपन प्रदान करते हैं. आधुनिकतम प्रवृत्तियों में इसकी उपयोगित निम्नांकित हैं:
[संपादित करें] कार्य फलकें
`वर्गीकरण कार्य को तीन फलकों में विभाजित होना चाहिए', ऐसा अनुभव किया जा चुका है. यह विचार सर्व-प्रथम डॉ. रंगनाथन ने १९४४ में स्वीकार किया. सन् १९५२ तक, वे इस लक्ष्य को अच्छी तरह समझने में सक्षम रहे तथा वर्गीकरण कार्य को तीन फलकों अर्थात् कल्पना फलक (ईडेअ फ्लने), मौखिक (वाचिक) फलक (एर्बल् प्लने), और अं कन्न फलक (णोटटिओनल् फ्लने) में विभाजित किया. उन्होंने पाया कि `विचार फलक' संयुक्त एवं मिश्रित विषयों को उनके मुखों (ञचेट्स्) उपमुखों (शुब्-ञचेट्स्), तथा आश्लेषों (फ्हसेस्) में विश्लेषित तथा संश्लेषित करने तथा सहायक अनुक्रम प्रदान करने से सम्भवत: सम्बन्धित है. `वाचिक फलक' में कार्य परिभाषित शब्दावली के लिए उपसूत्रों (छनोन्स्) से केन्द्रित होता है तथा मानक परिभाषिक-शब्दावली से शब्दों के नवीनतम प्रचलित स्वरूप को व्यक्त करता है. अगर अन्तर्राष्ट्रीय परिभाषिक-शब्दावली का स्थापना हो जाय और प्रयोग हेतु अपनाया जाय तो यह बहुत ही सहायक सिद्ध होगी. `अ नन्न फलक' में सामान्य विचारों को अड्को द्वारा प्रस्तुत किया जाता है. डॉ. रंगनाथन ने मिश्रित अ नन तन्त्र की रूपरेखा अत्याधिक आतिथ्य प्रदा न करने हेतु प्रयुक्त की.
[संपादित करें] युक्तियाँ
उन्होंने नवीन विचारों को अत्यधिक आतिथ्य प्रदान करने के लिए तथा अ कन की दृढ़ता को तोड़ने हेतु अनेक युक्तियों को सम्मिलित किया. ये `खण्ड युक्ति (शेच्टोर् ढेविचे)',` रिक्ति युक्ति (घप् ढेविचे)', `रिक्त (शून्य) अं क (ऐम्प्ट्य् ढिगिट्)', `शून्यकारण-अ क ', तथा `शून्य-शून्य कारक अ क', नये-नये विचारों का बहिर्वेशित तथा अन्तर्वेशित करने के लिए प्रयुक्त किया.
इन सबके बावजूद उन्होंने और भी युक्तियाँ बहुतायत रूप से आतिथ्य प्राप्त करने के लिये दी, वे हैं: पुंजित युक्ति, वर्णमालीय युक्ति , कालक्रम युक्ति , उत्कृष्ट युक्ति , सामान्य उपमुख युक्ति , दशमलव अंश युक्ति, गणनात्मक युक्ति , वातावरण (परिसर) युक्ति , मुखित युक्ति , भौगोलिक युक्ति , समूह अ कन युक्ति , मिश्रित आधार युक्ति , संख्यात्मक युक्ति , अश्लेष युक्ति , स्मृति-सहायक तालिका युक्ति
विषय युक्त , इत्यादि.
[संपादित करें] संकेतन अंक
उन्होंने अ नन के लिए परिवर्तनशील शक्ति प्रदत्त संयोजक चिन्हों (छोन्-~नेच्टिन्ग् श्य्म्बोल्स्) का प्रयोग किया, जो बाद में संकेतक अंक (ईन्डिचटोर् ढिगिट्स्) के नाम से जाने गये. यह संगणक के प्रयोग को भी आसान बनाते हैं. संकेतक अंक, विभिन्न तालिकाओं से लिये गये उपमुखों (ईसोलटेस्), को जोड़कर अनेक प्रकार के संयुक्त एवं मिश्रित विषयों का निर्माण करने में बोल्ट व नट की तरह कार्य करते हैं.
[संपादित करें] अभिधारणा, उपसूत्र तथा सिद्धान्त
डॉ. रंगनाथन ने वर्गीकरण आचार्यों तथा वर्गीकारों को एक दिशा प्रदान करने के लिये अभिधारणओं, उपसूत्रों तथा सिद्धान्तों का एक संगठित समूह (सेट) समावेशित किया. ये सिद्धान्त, अभिधारणा व उपसूत्र, प्रलेखन शोध एवं प्रशिक्षण केन्द्रों भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों के ग्रन्थालयों एवं ग्रन्थालय विज्ञान के विभागों में पठन पाठन वास्तविक ग्रन्थालय वर्गीकरण के दौरान परखे जा चुके हैं. डॉ. रंगनाथन के `प्रोलेगोमेना टू लाईब्रेरी क्लासीफिकेशन' के तीसरे संस्करण (१९६७) में, ११ मानकीय सिद्धान्त (णोर्मटिवे फ्रिन्चिप्लेस्), ४० उपसूत्र (विचार फलक-१५, वाचिक फलक-४ तथा अं कनन फलक-२१), १३ अभिधारणायें, ४ सिद्धान्त मुख-अनुक्रम के लिये तथा १८ सिद्धान्त सहायक-अनुक्रम के लिये दिये गये हैं.
[संपादित करें] मौलिक श्रेणियाँ
उन्होंने मूलमुख, उपमुख (ईसोलटे), तथा स्पेसीयटरस् (श्पेचिअटोर्स्), का विचार दिया. ये उपमुख, पाँच मौलिक श्रेणियों: व्यक्तित्व (फेर्सोनलिट्य्), तत्व (ंअट्टेर्), ऊर्जा (ऐनेर्ग्य्), स्थान (श्पचे), तथा समय (ठिमे) में विभक्त हैं सामुहिक रूप से इन्हें {फ्ंऐश्ठ्} पी. एम. ई. एस. टी. के नाम से जाना जाता है. ये एक या एक-दूसरे--और मात्र एक की अभिव्यक्ति (प्रकटीकरण) हैं, ऐसा अभिधारित किया गया है. उसके मुख-अनुक्रम (ञचेट्-शेर्उएन्चे) के सिद्धान्त: दिवाल-चित्र सिद्धान्त (थल्ल्-फिच्टुरे फ्रिन्चिप्ले), सम्पूर्ण अंग सिद्धान्त (थ्होले-और्गन् फ्रिन्चिप्ले), गाय-बछड़ा सिद्धान्त (छोत्-छल्ङ् फ्रिन्चिप्ले), क्रियावस्तु-क्रिया-क्रियाकारक सिद्धान्त (आच्टन्ट्-आच्टिओन् आच्टोर्-ठोओल् फ्रिन्चिप्ले), वर्गीकरण तन्त्र का ढाँचा तैयार करने में ही नहीं बल्कि अन्य शब्दावली नियन्त्रक युक्तियों में भी सहायक हैं.
डॉ. रंगनाथन ने सैद्धान्तिक विकास पर आधारित, बहुत से विषयों के लिए वर्गीकरण तन्त्र का ढाँचा तैयार किया था. लगभग १५० ऐसे विषय हैं, जिनके लिए द्विबिन्दु वर्गीकरण के आधार पर गहन तालिकाएँ (छ्छ् ढेप्ट्ह् शेहेडुलेस्) तैयार किये जा चुके हैं. `एनल्स फ लाईब्रेरी साइन्स तथा `डाकुमेन्टेशन एण्ड लाइब्रेरी साइन्स' में वर्गीकरण पर प्रकाशित उनके लेख, गहन वर्गीकरण से सम्बन्धित कठिन समस्याओं को हल करने में पर्याप्त रूप से सहायक है. हमारे विचार से डॉ. रंगनाथन को भविष्य में द्वि-बिन्दु वर्गीकरण के लिए नहीं, अपितु इसके आधारभूत सिद्धान्तों के लिये याद किया जावेगा.
[संपादित करें] सूचीकरण
सूचीकरण ग्रन्थालय विज्ञान की वह शाखा है, जो अनेक क्रांतिकारी परिवर्तनों तथा विकासों का हाल ही का साक्षी है. डॉ. रंगनाथन द्वारा सूचीकरण के लिए किए गये कार्यों की आधुनिकतम सूचीकरण प्रवृत्तियों की समानताओं को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है.