मोटरगाड़ी चालन

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मोटरगाड़ी चालन (Driving) से तात्पर्य जमीन पर चलने वाली किसी गाड़ी (जैसे कार, बस, ट्रक, बाइल, स्कूटर आदि) को नियंत्रित ढंग से चलाना।

परिचय[संपादित करें]

जब कोई व्यक्ति नई गाड़ी खरीद कर चलता है तब उसकी यही देखने की इच्छा रहती है वह गाड़ी अधिक से अधिक कितनी रफ्तार पकड़ती है। लेकिन ऐसा करना खतरे से खाली नहीं होता। आरंभिक प्रथम १००० किमी की यात्रा में उसे ३० किमी प्रति घंटा से अधिक चलाना ही नहीं चाहिए। वैसे तो कारखानों में निर्माण के बाद प्रत्येक मोटर गाड़ी के इंजन को ठीये पर बैठा कर और चलाकर भली भाँति जाँच लिया जाता हैं, लेकिन यह अल्पकालिक ही होता है। अत: गाड़ी में लगाने के बाद भी आरंभ में कुछ समय तक उसे धीरे चलाने से उसके सब बेयरिंग और पुर्जे रवाँ हो जाते हैं। ऐसा न करने से कई बार, इंजन के सिलिंडर, बेयरिंग और शक्ति प्रेषण यंत्र बहुत गरम होने से जल और ऐंठ कर इतने खराब हो सकते हैं कि उनी मरम्मत करना असंभव हो जाय। इस समय उनमें खूब तेल भी दिया जाना चाहिए। सिलिंडरों में बहुत अधिक तेल देने से यही हानि होती है कि वह फालतू तेल जलकर, सिलिंडरों में कार्बन के रूप में जम जाता है, जिसे प्रथम १,००० किमी की यात्रा के बाद ही साफ करना आवश्यक हो जाता है। फिर बाद में ४,००० किमी की यात्रा के बाद साफ करना आवश्यक हो जाता है। गाड़ी की सुरक्षा के लिये उपर्युक्त सावधानी बरतनी ही चाहिए।

संचालन विधि[संपादित करें]

सफल मोटर ड्राइवर बनने के लिये उसके नियंत्रक उपकरणों का उपयोग और बाजार की भीड़ भाड़ में से, बिना टकराए गाड़ी चलाना ही काफी नहीं होता। प्रथम योग्यता तो एक आध घंटे में ही प्राप्त की जा सकती है। एक दक्ष ड्राइवर क यही पहचान है कि वह सब प्रकार के मार्गो पर औसत उच्चतम रफ्तार से, अपनी और जनता की सुरक्षा का पूर्णतया ध्यान रखते हुए गाड़ी को चलाते हुए उसे इस प्रकार से सँभाले कि उसमें घिसाई, टूट फूट और पेट्रोल आदि का खर्चा न्यूनतम हो। यह गुण निरंतर अभ्यास से ही प्राप्त होता है।

ड्राइवर को अपनी गाड़ी की चौड़ाई का सही ज्ञान होना आवश्यक है जिससे वह गाड़ी को बिना किसी चीज से टकराए न्यूनतम स्थान में से निकाल कर ले जा सके। उसे अपनी गाड़ी और दूसरे वाहनों की रफ्तार की सही अटकल लगाने की योग्यता होनी चाहए। गाड़ी को चालू करते समय नियंत्रक उपकरणों का संचालन इस प्रकार करना चाहिए कि उनकी क्रिया पूर्णतया व्यवस्थित हो। ड्राइवर की निगाहें आगे के रास्ते पर लगभग १०० मी की दूरी तक फैली रहनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उसका हाथ, बिना मार्ग से दृष्टि हटाए, सही नियंत्रक उपकरण पर पड़ना चाहिए। नए ड्राइवर की निगाहें आगे के रास्ते पर लगभग १०० मी की दूरी तक फैली रहनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उसका हाथ, बिना मार्ग से दृष्टि हटाए, सही नियंत्रक उपकरण पर पड़ना चाहिए। नए ड्राइवरों के साथ दुर्घटनाएँ प्राय: इसलिये होती है कि वे उपकरणों को देखकर पकड़ने के लिये अपनी दृष्टि मार्ग से हटा लेते हैं। यह योग्यता कई सौ किमी की यात्रा कर चुकने के बाद ही प्राप्त होती है। ड्राइवरों को पैर से चलाए जानेवाले उपकरणों की स्थिति का भी सही ज्ञान होना आवश्यक है। प्राय: गाड़ी को एक दम रोकने की इच्छा से पैरचालित ब्रेक दबाने के प्रयास में नौसिखियों का पैर भूल से फिसल कर त्वरित्र फलक पर पड़ता है, जिससे भारी दुर्घटना हो जाती है। कई ड्राइवर भीड़ भाड़ की जगह पर पैरचलित ब्रेक का ही अधिक उपयोग किया करते हैं, लेकिन उन्हें बगली में लगे हाथ ब्रेक का भी उपयोग करना चाहिए। कई बार आठ दस फुट की दूरी में ही गाड़ी रोकनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में अंदाजा न रहने पर यदि ड्राइवर हाथ ब्रेक को टटोलता ही रह जाए तो दुर्घटना होना निश्चित है।

ड्राइवर के लिये राजमार्गीय नियमों का जानना भी आवश्यक है। याद रखना चाहिए कि सड़क की बाई तरफ का भाग अपनी गाड़ी और दाहनी तरफ का भाग सामने से आनेको वाहनों मे लिए निश्चित है। अपनी ही दिशा में आगे चलनेवाले वाहनों का अभिलंघन करने के लिये उन्हें अपनी बाईं तरफ छोड़कर उनकी दाहनी तरफ से निकल जाना चाहिए। किसी घोड़ा, या बैलगाड़ी के चालक, अथवा पुलिस के सिपाही के कहने पर ड्राइवर को मोटर एकदम रोकनी चाहिए, सँभव है कि घोड़ा, या बैल चालक के वश में न हो; या चलने में असमर्थ हो। चौराहों पर खड़े सिपाहियों के संकेतों का तत्क्षण पालन करना चाहिए। साथ ही ड्राइवरों को चाहिए कि वे स्वयं किधर को जाना चाहते हैं, यह बात इशारे से पुलिसवालों को भी बता दें। अपने आस पास चलनेवाले अन्य ड्राइवरों को भी बता दें कि वे रूकना चाहते हैं अथवा किधर को मुड़ना चाहते हैं। आधुनिक राजमार्गो के चौराहों आदि पर यातायात के नियंत्रण के लिये सिपाही तैनात न कर बिजली के स्वचालित संकेत भी लगा दिए जाते हैं, अत: उन्हें भी समझकर तनुदसार कार्य करना चाहिए।

गाड़ी के इंजन को चालू करना[संपादित करें]

भिन्न कारखानों की बनी गाड़ियों की रचना में भिन्नता रहने के कारण उनको चालू करने की विधि में भी कुछ भिन्नता होती है। विशेष कर शरद् ऋतु में कई गाड़ियाँ चालू होते समय कठिनाई उत्पन्न कर देती हैं, अत: पहले से ही उनके नियंत्रक उपकरणों का समंजन उचित प्रकार से कर लेना चाहिए। उदाहरणत:, गाड़ी में स्वप्रवर्तक यंत्र लगा हो अथवा न लगा हो, प्रत्येक गाड़ी के उपरोधी (thhrottle) और ज्वालक लीवर को पहले से ही सही समंजित कर रखना चाहिए। यदि गाड़ी में परिवर्तनशील ज्वालक युक्ति लगी हो, जिससे बिजली की चिनगारी पहले से अथवा विलंबित कर छोड़ी जा सकती हो, तो गाड़ी को चालू करते समय उसे कुछ लंबित कर देना चाहिए। यदि चिनगारी पहले से छोड़ दी जायगी, तो संपीडित गैस समय से पहले ही जल उठेगी जिससे इंजन की गजेन-पिन आदि पर बहुत जोर पड़ेगा। चालू करते ही गिअर बॉक्स के लीवर को तटस्थ स्थिति में रखना चाहिए और बगली के हाथ ब्रेक को बँधा हुआ। फिर पेट्रोल को खोलकर ज्वालक स्विच लगा देनी चाहए, जिससे कि उसका भी परिपथ पूरा हो जाए। यदि आवश्यक हो तो कार्बूरेटर को हलके से ठकठका देना चाहिए, जिससे उसके प्रकोष्ठ में पेट्रोल भर जाए। अब यदि स्वप्रवर्तक (self-starter) यंत्र लगा हो, तो उसे चालू कर देना चाहिए, अन्यथा केवल हाथ से घुमाने का ही प्रबंध हो, तो पहले उसके हैंडिल को पूरे दो चक्कर घुमाना चाहिए, जिससे एक सिलिंडर में ते पेट्रोल की गैस संपीडित होकर भर जाए, जो ज्वालन के लिये तैयारी होगी और दूसरे सिलिंडर में चूषण क्रिया होगी। फिर जब हैंडिल नीचे की तरफ हो, तब उसे एकदम झटके के साथ ऊपर की तरफ घुमाना चाहिए, इस प्रकर ज्वालन होकर इंजन चल पड़ेगा। खाली इंजन के कुछ मिनट तक चलने के बद, जब उसके प्रत्येक भाग में गर्मी आ जाए तभी उसपर गाड़ी के प्रेषण यंत्र का बोझा डालना चाहिए। यदि रेडिएटर के साथ जल परिवाहक शटर भी लगा हो, तो सर्दियों में उसे भी एक दो मिनट तक बंद रखना चाहिए, जिससे जैकेट के पानी में हलकी सी उष्णता आ जाए।

खड़ी गाड़ी को चालू करना[संपादित करें]

उपर्युक्त क्रियाओं द्वारा जब इंजन भली भाँति चलने लगे तब क्लच के फलक को दो चार सेकंड तक दबाकर गाड़ के प्रेषण यंत्र को निम्न गिअर में लगाना चाहिए। इस समय बगली का ब्रेक लगा रहना चाहिए और एक पैर को त्वरित्र फलक पर रखकर क्लच को धीरे से लगा देना चाहिए। फिर इंजन के त्वरा पकड़ते ही ब्रेक को छुडा देना चाहिए। इस प्रकार गाड़ी धीमी रफ्तार से आगे बढ़ने लगेगी। कई आधुनिक गाड़ियों में उसके चालू होने के तुरंत बाद ही दूसरा गिअर लगा दिया जाता है।

गिअर बदलना[संपादित करें]

निम्न गिअर से दूसरे गिअर पर बदली करने के लिये क्लच फलक को थोड़ा ही दबाना चाहिए, पूरा नहीं। इस समय त्वरित्र फलक को आजाद छोड़ देना चाहिए, गिअर लीवर को एक क्षण के लिये तटस्थ स्थिति में रखकर उसे ऊँची स्थिति में सरकार देना चाहिए। इसके बाद क्लच को धीरे से लगा देना चाहिए। फिर त्वरित्र फलक को दबा देना चाहिए, जिससे इंजन पहले जितने ही चक्कर लगाने लगे। गाड़ी को और अधिक ऊँचे गिअर पर लगाने के लिये उसे उचित रफ्तार पर चलने देते हुए उपर्युक्त सभी प्रक्रियाएँ दोहरानी चाहिए। इसमें अंतर केवल यही होगा कि गिअर लीवर को तटस्थ स्थिति में कुछ अधिक क्षणों तक रखना होता है। गिअर को ऊँची अथवा नीची स्थिति में बदलते समय उक्त तटस्थता की अवधि प्रत्येक गाड़ी के लिये भिन्न हुआ करती है। एक बार जब गाड़ी ऊँचे गिअर पर लग दी जाए तब उसकी रफ्तार में कमीबेशी उपरोधी द्वारा की जाती है।

गाड़ी को धीमे करना और रोकना[संपादित करें]

जैसा पहले बाताया गया है कि यदि ड्राइवर, अपनी निगाह मार्ग पर गाड़ी से लगभग १०० मीटर आगे तक फैलाए रखे, तो सामने से आनेवालों से बचने, भोपू बजाने, मोड़ पर घूमने, या चढ़ाई पर चढ़ने के लिये गिअर बदलने अथवा चाल को धीमी करने आदि के लिये काफी समय मिल जाता है और गाड़ी को दोनों ब्रेक लगाकर झटके से रोकने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

यदि गाड़ी को कहीं ठहराना अभीष्ट हो, तो पहले उपरोधी (throttle) को बंद कर देना और त्वरित्र फलक से पैर हटा लेना चाहिए, लेकिन क्लच को लगे रहने देना चाहिए। इस प्रकार गाड़ी की सहज गति के कारण जब इंजन शक्तिरहित होकर खाली चलेगा तो वह एक प्रकार के ब्रेक का काम करेगा, जिससे गाड़ी स्वत: ही धीमी पड़ती जाएगी। फिर अंत में क्लच को भी छुड़ाकर हाथ अथवा पैर का ब्रेक यथा अवसर लगा देना चाहिए। गाड़ी के ठहरते ही गिअर लीवर को तटस्थ कर देना चाहिए और हाथ ब्रेक बाँध देना चाहए। यदि गाड़ी को किसी ढाल पर खड़ा करना पड़े, तो बाई तरफ के अगले या पिछले पहिए को कर्ब पत्थर से अटका देना चाहिए, इस प्रकार गाड़ी लुढ़केगी भी नहीं और ब्रेक पर भी अधिक जोर नहीं देना होगा।

गाड़ी को ठहराने के संबंध में दो बातें याद रखनी चाहिए:

  • (१) गाड़ी को सड़क के मोड़ या कोने पर कभी नहीं खड़ा करना चाहिए। ऐसा करने से अन्य आने जानेवाली गाड़ियों से टक्कर हो सकती है।
  • (२) किसी गली या सीधी चौड़ी सड़क पर भी गाड़ी को किसी दूसरी खड़ी हुई गाड़ी के मुँह के सामने नहीं खड़ा करना चाहिए। ऐसा करना सबको असुविधाजनक होता है।

चढ़ाई के मार्ग पर चलना[संपादित करें]

ड्राइवर लोग प्राय: यह गलती किया करते हैं कि चढ़ाई पर चढ़ते समय जब गाड़ी मंद पड़ने लगती है, तब बहुत देर बाद गिअर बदलने का प्रयत्न करते हैं। वैसे तो आधुनिक गाड़ियों की क्रियात्मकता में काफी लचीलापन होता है और छोटी तथा हलकी चढ़ाइयाँ तो वे वैसे ही उच्च गिअर पर अनायास पार कर सकती है, लेकिन उच्च गिअर पर अधिक ऊँची चढ़ाई चढ़ने से इंजन और शक्ति प्रेषण यंत्रों पर अनुचित जोर पड़ता है। यही तरीका तो है कि ज्यों ही चढ़ाई आरंभ होनेवाली हो, आवश्यक निम्न गिअर पर प्रेषण यंत्र को डाल दिया जाए, जिससे गाड़ी अपने में कुछ अधिक शक्ति संचित कर ले और यह चढ़ाई पर काम आए।

मोड़ पर घूमना[संपादित करें]

सड़क की मोड़ों पर आगे का रास्ता नहीं दिखाई देने के करण वहाँ खतरे की संभावना रहती है। अत: अच्छा तरीका यही है कि किसी भी तेज मोड़ अथवा साधारण घुमाव के आने के १०० या १५० मी पहले से ही गाड़ी की रफ्तार क्रमश: कुछ मंद कर दी जानी चाहिए, जिससे आवश्यकता पड़ने पर गाड़ी को सरलता से जल्दी ही रोका जा सके और घुमाते समय स्टियरिंग पर अधिक जोर न पड़े। यहाँ पर गाड़ी को सड़क के मध्य से जरा सा बाएँ कर लिया जाए, क्योंकि मध्य के निकट से, रास्ते के कोने से आगे का भाग कुछ अधिक दूरी तक देखा जा सकता है। इस प्रकार स्टियरिंग चक्र धीरे धीरे घुमाने से मोड़ आने पर स्वत: ही गाड़ी बाईं तरफ सही चली जाती है।

भीड़ भाड़ में गाड़ी चलाते समय बहुत ही सावधानी की आवश्यकता होती है। हमारे आसपास चलनेवाले व्यक्ति क्या करना चाहते हैं, इस बात का सही अंदाजा लगाना सदैव संभव नही होता। अत: ऐसे स्थलों में धीमी रफ्तार से चलना और हमेशा चौकन्ना रहना तथा भोंपू आदि स्पष्ट बजाना चाहिए। आगे चलते हुए दो वाहनों के बीच में से हाकर आगे निकलने क कोशिश नही करनी चाहिए। धीमे चलनेवाले वाहनों का अभिलंघन केवल उसी समय करना चाहिए जब सामने से कोई दूसरा वाहन न आ रहा हो। किसी मोड़ पर घूमते समय तो ऐसा कभी भी नहीं करना चाहिए। किसी खड़े हुए वाहन का लंघन करने के पहले सदैव भोंपू बजाना चाहिए।

राजकीय नियम[संपादित करें]

प्रत्येक मोटर ड्राइवर को राजपथ पर गाड़ी चलाते समय, यदि वह अपनी कुशल चाहता है तो, जनहित को दृष्टि में रखते हुए कुछ नियमों का पालन करना अत्यावश्यक है, जिनका यहाँ संकेत मात्र किया जाता है:

(१) मोटर गाड़ी की अश्वशक्ति के हिसाब से वार्षिक अथवा त्रैमासिक शुल्क लेकर लाइसेंस दिया जाता है, जिसे मोटर चालक को गाड़ी चलाते समय सदैव अपने पास रखना और पुलिसवालों के माँगने पर उसे दिखाना चाहिए।

(2) प्रत्येक गाड़ी के आगे और पीछे, आयताकार आकृति का नंबर प्लेट लगा रहना चाहिए, जिसकी जमीन काली या सफेद और अक्षर निर्धारित नाप के तथा सफेद या काले रंग में लिखे होने चाहिए।

(3) प्रत्येक गाड़ी पर दो सफेद लैंप आगे की तरफ इस प्रकार लगे होने चाहिए कि आनेवाली गाड़ी की चौड़ाई का अनुमान दूर से ही हो जाए। एक छोटा सफेद लैंप पीछे की तरफ नंबर प्लेट को प्रकाशित करते हुए लगा रहना चाहिए और साथ ही एक लाल बत्ती भी होनी चाहिए। पिछला लैंप सूर्यास्त के आधे घंटे बाद अवश्य जला देना चाहिए तथा सूर्योदय के आधे घंटे पहले तक जलता रहना चाहिए। आगे के अग्रदीप सूर्यास्त के एक घंटे बाद जला देने चाहिए और सूर्योदय के एक घंटे पहले बुझा देने चाहिए।

(४) चाल प्रतिबंध - आबादी की निकटवर्ती सड़कों पर मोटर गाड़ियाँ ३० किमी प्रति घंटा से अधिक तेज नहीं चलानी चाहिए। आबादी के क्षत्रों में १५ किमी प्रति घंटा से तेज न चलाने का प्राय: नियम होता है। इस प्रकार की सूचनाएँ सड़कों के सहारे लगे सूचनापटों पर लिख दी जाती हैं। चाल नियंत्रण और अन्य प्रकार की चेतावनियाँ तथा अन्य भी कई प्रकार की सूचनाएँ प्राय: यथास्थान लगाई जाती है, जिन्हें समझकर गाड़ी को सदैव सावधानीपूर्वक इतनी रफ्तार से चलाना चाहिए कि किसी प्रकार की दुर्घटना न हो।

(५) दुर्घटना होने पर, चाहे कोई मोटर चालक किसी दुर्घाटना से प्रत्यक्षतया संबंधित हो, या न हो, उसे एकदम ठहर जाना चाहिए। यदि पुलिसवाले उससे कोई पूछताछ करें, तो उसका सच्चाई से उत्तर देकर, अपना नाम और पता भी दे देना चाहिए। स्वयं से दुर्घटना का पूर्ण विवरण लिखकर तथा दो गवाहों के बयान भी लिखकर, उनके नाम और पते सहित हस्ताक्षर भी ले लेने चाहिए। गाड़ियों की टक्कर हो जाने पर उस स्थान को नापकर अपनी गाड़ी की सही स्थिति तथा अन्य संबंधित गाडियों की स्थिति अंकित कर उनकी रफ्तार भी लिख लेनी चाहिए। दुर्घटना में यदि कोई व्यक्ति घायल हो गया हो, तो उस स्थल पर मौजूद सभी ड्राईवरों का कर्तव्य है कि वे उस घायल की प्राथमिक चिकित्सा कर निकटस्थ अस्पताल में पहुँचा दें, तथा पुलिस को भी आवश्यक सूचना दे दें। यदि गाड़ी का बीमा करवाया हुआ हो, तो उक्त सब सूचनाएँ बीमा कंपनी को भी भेज देनी चाहिए।

(6) गाड़ी ठहराना- यात्रियों की सुविधा के लिये राजमार्ग और गलियों में भी गाड़ी कुछ देर ठहराई जा सकती है, यदि वहाँ ठहराने से यातायात को बाधा न पहुँचे। ऐसे समय में गाड़ी के इंजन को बंद कर ब्रेक लगा देने चाहिए। लेकिन याद रहे कि आम रास्तों पर गाड़ियाँ अधिक देर तक नही रोकी जा सकतीं। बड़े शहरों में, खास खास जगहों पर गाड़ी ठहराने के पड़ाव बनाए जाते हैं। यहाँ चाहे जितनी भी देर गाड़ी रोक जा सकती है। जहाँ ऐसा स्थान निकट हो गाड़ी को वहीं रोकना चाहिए।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]