मेलकर्ता

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मेलकर्ता राग कर्नाटक संगीत के मूल रागों का समूह है। मेलकर्ता राग, 'जनक राग' कहलाते हैं जिनसे अन्य राग उत्पन्न किये जा सकते हैं। मेलकर्ता रागों की संख्या बहत्तर (७२) मानी जाती है। मेलकर्ता को 'मेल', 'कर्ता' या 'सम्पूर्ण' भी कहते हैं। राग व्यवस्था राममात्य ने "स्वरमेलकलानिधि" में १५५० में प्रस्तुत की।

हिन्दुस्तानी संगीत का ठाट या पाश्चात्य संगीत का 'स्केल' इसके तुल्य समझे जा सकते हैं। हिन्दुस्तानी संगीत में दस ठाट हैं।

पल्लवि (रागं - श्री)

प्रणतार्तिहर प्रभो पुरारे प्रणव रूप संपदे पदे प्रणमामि श्री प्रकृति प्रेरक प्रमथ गणपते पदे पदे

अनुपल्लवि/चरणं) --- (७२ मेळ राग मालिका)
शुद्ध मध्यमं (१ - ३६)

कनकाङ्ग्या रमया पूजित

सनकादि प्रिय कृपालय

रत्नाङ्ग्या धर्मसंवर्धन्या

रमण मां परिपालय

गानमूर्ति रिति धनशास्त्र

मानमूर्धन्यैर-गदितोऽसि

श्रीवनस्पति दळ समर्चनेन

पावन भक्तैर विदितोऽसि

मानव्ती भिः स्मृतिभिरुक्त कर्म

कृन- मानव पापं वारयसि

तानरूपि णं त्वां भजन्ति ये

तारमुपदिशं स्तारयसि

देवसेनापति जनक नील-

ग्रीव सेवक जन पोष्हण

हनुमतोडि ण्डिमभवं स्तुवथह

सुतनुमतो ददा-भूति भूषण

भानु कोटि संकाश महेश

धेनुका सुर मारक वाहन

अनन्दनाटकप्रिया मर वर

श्रीनन्दनाटवी-हव्यवाहन

कोकिलप्रिया म्र किसलयाङ्ग

गोकुलपालन पटु भय भञ्जन

बहुरूपवती ह भवन मां मुहुर-

मुहुरूर्जित भक्त जन रञ्जन

धीरभद्राख्य गायक प्रिय

वीरभद्रादि पालित शरण

देवकुळाभरणो द्धारक श्री-

वसुदेव कुलाभरण नत चरण

जितमाया मळव गौळा न्तर-

गत माहेशाः त्वां विन्दन्ति

चक्रवाक कुचार्धाङ्ग त्वत्कृपया

शुक्र वाक्पति सुराः नन्दन्ति

तेजसा जितसूर्यकन्त्या गौर्या

ओजसातुल प्रताप

शुभकर हातकाम्बरि शर

अब्ज निभ कर हत भक्त परिताप

झंकारध्वनि युत माला धर

टं कार ध्वनि युत चाप

महानटभैरवी मारुति

भारती सहाय देवैर-नत कोप

शिव नतकीरवणी वशग

भवन इव वस मे मनसि

खरहरप्रिय ं आलोक्य परात्पर

हर दयया पालितवानसि

गौरीमनॉ हरि दम्बर सततं

गौरिव वत्से रमते भवति

योसौ-(व) अरुणप्रिया दित्यः तं

त्वा सा श्रुतिरानता भवति

मार रञ्जनी वरद निरहंकार

जना मुक्तैस-त्वां स्तुवन्ति

चरु के शिव लिङ्गं अनार्च्य

मेरु धन्वन सुखमाप्नुवन्ति

सरसां गी तिं कीर्तिं दिश मे

तरसा अङ्गीकृत हत मदन

हरिकाम्भोधि संभवामर

दुरित निवारक स्मित वदन

धीर शण्कराभरण समं त्वां

घोर शङ्कया नो जाने

ज्ञानगानं कृतवतां वरद

श्रीनगानन्दिनी जाने

यागप्रिया मर त्यागप्रियं विधिं

द्रागप्रियेण शिक्षितवानसि

सदानन्दे त्वयि रागवर्धनी

मुदा पुनितवतीं रक्षितवानसि

श्रित गज वदनगाङ्गेय भूषणी -

कृत भुजण्ग नत सुर कदम्ब

वागदीश्वरी -श्रियौ यदङ्ग संभवे

भोग मोक्षदा जगदम्बा

शूलिनी तया धर्म वर्धन्या

खेलसि दयया सुर वरिष्ठ

कैलासाचल नात कृद-भुज

शैल दण\d दक चरणाङ्गुष्ठ

(प्रणतार्तिहर प्रभो पुरारे)

प्रति मध्यमं (३७ - ७२)

प्रतिबिंब रसालग फलसमा विषया

इति बिम्बाधराः संत्यजन्ति

ये भवझलार्णवं संतरितुं ते

भवदङ्घ्रि नौकां भजन्ति

झलं झल वराळि गीतमाला

धर झलंधरासुर मारक

सुरदानव नीता मृत विमुख

वर दान निरत तारक

भोः पावनी पिष्टास्वदन रसिक-

भूप अव नी पवन सुन्दर

रघुप्रिया र्चित राजीव चरण

मघ प्रणाशन भुज मन्दर

गवाम्भोदिह तीर्ण इव मया

भवाम्भोधिः तव दयया

ईह प्रसन्नो भव प्रिय तमया

सह प्रमथप द्रागुमया

सर्वशुभापन्तु वराळि कताक्षं

जुर्वनुग्रहं त्वां वन्देहं

सदय षद्विध मार्गिणि मनुजे

हृदयग न कुर्वे संदेहं

सुवर्णां गीति ं समुपदिश

प्रथम वर्णाङ्गीकृत वैकुन्ठ

सुबलारि मुखामर प्रपूजित

धवळाम्बरी पतेर-दुर्दर्श

सुरूपनाम नारायणी सह चर

स्वरूप भासकादर्श

धर्म कामवर्धनी विलसित

निर्मलाङ्ग शुभ दायक

णितरां अप्रिय वादिनी विमुख

नत राम अग्नि सायक

चिदंबरगमन श्रमा पहरणं

कदंब रमण प्रदीयतां

विश्वम भरि तं त्वयाऽष्तमूर्त्या

शश्वद-धनमाधीयतां

श्यामळाङ्गी कृत वामभाग

कोमळाङ्गज शर भङ्ग

षन्मुख प्रिया ङ्गु प्रिय जनक

हिरण्याङ्ग नत शरभङ्ग

ईह सिम्हेन्द्र मध्यमा ङ्ग

नरसिम्ह अजिनाम्बर

पुरहर हैमवती मनोहर

हर रक्षित सुर निकर

विदितधर्मौ- अति कायजिद-रामौ

मुदित मनाः त्वं रक्षितवान

णीतिमति इह जनोऽतिप्रियोऽसि

प्रीतिमति रहितान शिक्षितवान

श्रियोऽधिकां तां अणिमाधिकां

पयोधि कान्तामणि सेवितां

धर्म वर्धनीम सुर-ऋषभ प्रिया

निर्मल भक्तैर-भावितां

मनन शीलतां गी र्वाणपतेह

जनन वर्जितामुक्तवतीं

भूमिषु वाचस्पति संबन्ध

स्वामिने ज्ञानं दत्तवतीं

मे च कल्याणी ं वाचं दिशतीं

मोचक दायिनीं रमसे

विचित्राम्बरी ष वरद भाग

स चित्रगुप्त यमागः क्षमसे

सुचरित्र मुख सङ्गीत

सुचरित्र मुखरित वाद्य

ज्योति स्वरूपिणि त्वयि प्रसन्ने

भाति स्वरूपं किं नाद्य

धातुवर्धनी ं तवाभिधासुधां

पातु कामिनी मम रसना

सुखेनासिका भूषणं हि सतां

मुखे नासिकेव विवसन

कोसल पः त्वऽऽ पूज्याघं हित्वा

सभापते मुमुदे हि

भक्तापदान रसिक प्रिय

त्यक्तापदानन्दं मम देहि

(प्रणतार्तिहर प्रभो पुरारे)

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