मुद्रा स्फीति

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मुद्रा स्फीति (en:inflation) एक गणितीय युक्ति (तरकीब) है जिससे बाज़ार में मुद्रा का फैलाव व चीजों की कीमतों में वृद्धि को नापा जाता है। उदाहरण के लिएः १९९० में एक सौ रुपए में जितना सामान आता था, अगर २००० में उसे ख़रीदने के लिए दो सौ रुपए की ज़रूरत पड़ती है तो ये कहा जाएगा कि मुद्रा स्फीति में शत-प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

चीज़ों की क़ीमतों में बढ़ोतरी और मुद्रा की क़ीमत में कमी को वैज्ञानिक ढंग से सूचीबद्ध करना मुद्रा स्फीति का काम होता है। इससे ब्याज दरें भी तय होती हैं।

मुद्रा स्फीति समस्त अर्थशास्त्रीय शब्दों में संभवतः सर्वाधिक लोकप्रिय है। किंतु इसे पारिभाषित करना एक कठिन कार्य है। विभिन्न विद्वानों ने इसकी भिन्न-भिन्न परीभाषा दी है :

  1. बहुत कम माल के लिए बहुत अधिक धन की आपूर्ति हो जाने से इसका जन्म हो जाता है
  2. माल या सेवा की आपूर्ति की तुलना में मांग अधिक हो जाने पर भी इसका जन्म ही जाता हैं
  3. आपूर्ति में दोष, गत्यावरोध तथा ढांचागत असंतुलन के चलते भी मुद्रा स्फीति पनपती हैं

सामान्य रूप से इसका अर्थ ये होगा की ये बिना रुके बढ़ती दर से किसी दिए गए काल खंड में मूल्य स्तर की वृद्धि हैं जो भविष्य में और अधिक वृद्धि की संभावना को बढ़ाती है।

मुद्रा स्फीति के कारण[संपादित करें]

कारणात्मक रूप से मुद्रा स्फीति के कई कारण हो सकते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो भागो में बाँट सकते हैं:

  1. मांग कारक (demand pull)
  2. मूल्य वृद्धि कारक (cost push)

मांग कारक माल सेवा की मांग में वृद्धि से पैदा होते हैं जबकि मूल्य वृद्धि कारक स्पष्टतः मूल्य वृद्धि अथवा माल सेवा की आपूर्ति में कमी से उत्पन्न होते हैं।

मांग कारक[संपादित करें]

  1. बढ़ता सरकारी व्यय - जो की विगत कई सालों से बढ़ रहा हो जिस से सामान्य जनता के हाथों में अधिक धन आ जाता हैं जो उनकी खरीद क्षमता को बढाता है। यह मुख्य रूप से गैर योजना व्यय (Unplanned expenditure) है जो की अनुत्पादक प्रकृति का होता है तथा केवल क्रय क्षमता में तथा मांग में वृद्धि करता है।
  2. घाटे की पूर्ति तथा मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि से बढ़ते सरकारी व्यय की पूर्ति, घाटे के बजट (Deficit Budget) से तथा नई मुद्रा छाप कर की जाती हैं जो मुद्रा स्फीति तथा आपूर्ति दोनों में वृद्धि कर देते हैं।

मूल्य वृद्धि कारक[संपादित करें]

  1. उत्पादन-आपूर्ति में उतार चढ़ाव: जब कभी उत्पादन में अत्याधिक उतार चढ़ाव आता हैं या प्राप्त उत्पादन को मुनाफाखोर जमा कर लेते हैं।
  2. उत्पादकता से अधिक वेतन वृद्धि लागत मूल्य को बढ़ाते हैं जो नतीजतन मूल्य में वृद्धि कर देते हैं, साथ ही मांग तथा क्रय क्षमता में भी वृद्धि होती हैं जो पहले वाले शीर्षक के अंतर्गत वृद्धि कर देती हैं।
  3. अप्रत्यक्ष कर भी लागत मूल्य बढ़ा कर सामग्री के मूल्य में वृद्धि के कारक बनते हैं।
  4. ढांचागत विकास में कमी या दोष से प्रति इकाई लागत मूल्य बढ़ता हैं जो कि सामान्य कीमत में वृद्धि कर देता हैं।
  5. प्रशासित मूल्य में वृद्धि जैसे खाद्यान्न के न्यूनतम समर्थन मूल्य या पेट्रोल तथा अन्य उत्पादों के मूल्य जिन्हें सरकार स्वेच्छा से निर्धारित करती हैं क्योंकि वे आम आदमी के बजट का एक बड़ा भाग होते हैं।

विपिन

मुद्रा स्फीति के प्रभाव[संपादित करें]

  1. उत्पादन में अनिश्चितता के परिणामस्वरूप उत्पाद की माँग अनिश्चित हो जाती है व संसाधनों का वितरण असंगत हो जाता है। पूँजी संसाधन दीर्घ कालीन रुप में नहीं वरन् लघु कालीन प्रयोग में आने लगते हैं तथा उत्पादकों का झुकाव ज़रूरी से गैर जरूरी उत्पाद की ओर हो जाता है क्योंकि गैर ज़रूरी उत्पाद की कीमत बढ़ जाने पर उनमें निवेश लाभप्रद हो जाता है।
  2. मुद्रा स्फीती से अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में मंदी आ जाती है जैसे भारत में कपड़ा उत्पाद मूल्य बढ़ जाने पर इन उत्पादों की मांग में गिरावट आ जाती है, लोग केवल बेहद ज़रूरी माल ही खरीदते हैं। इससे उद्योग ठप्प पड़ जाते हैं।
  3. देश में आयवितरण गड़बड़ा जाता है। मुनाफाखोरों को लाभ होने लगता है और नौकरीपेशा संकट में पड़ जाते हैं। भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और सट्टेबाजी बढ़ती है। कठोर श्रम की इच्छा शक्ति में भी कमी आ जाती है।

भारत में मुद्रा स्फीती का नापन थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) तथा औद्योगिक श्रमिक हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (en:Consumer Price Index) से होता है।