माचू पिच्चू
| माचू पिच्चू का ऐतिहासिक देवालय* | |
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| युनेस्को विश्व धरोहर स्थल | |
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हुआयना पिच्चू चोटी माचू पिच्चू के भग्नावशेषों के ऊपर |
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| राष्ट्र पार्टी | |
| प्रकार | मिश्रित |
| मानदंड | i, iii, vii, ix |
| सन्दर्भ | 274 |
| क्षेत्र† | दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन |
| शिलालेखित इतिहास | |
| शिलालेख | 1983 (सातवां सत्र) |
| * नाम, जो कि विश्व धरोहर सूची में अंकित है † यूनेस्को द्वारा वर्गीकृत क्षेत्र |
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}} 1430 ई. के आसपास इंकाओं ने इसका निर्माण अपने शासकों के आधिकारिक स्थल के रूप में शुरू किया था, लेकिन इसके लगभग सौ साल बाद, जब इंकाओं पर स्पेनियों ने विजय प्राप्त कर ली तो इसे यूँ ही छोड़ दिया गया। हालांकि स्थानीय लोग इसे शुरु से जानते थे पर सारे विश्व को इससे परिचित कराने का श्रेय हीरम बिंघम को जाता है जो एक अमेरिकी इतिहासकार थे और उन्होने इसकी खोज 1911 में की थी, तब से, माचू पिच्चू एक महत्वपूर्ण पर्यटन आकर्षण बन गया है।
माचू पिच्चू को 1981 में पेरू का एक ऐतिहासिक देवालय घोषित किया गया, और 1983 में इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल की दर्जा दिया गया। क्योंकि इसे स्पेनियों ने इंकाओं पर विजय प्राप्त करने के बाद भी नहीं लूटा था, इसलिए इस स्थल का एक सांस्कृतिक स्थल के रूप में विशेष महत्व है और इसे एक पवित्र स्थान भी माना जाता है।
माचू पिच्चू को इंकाओं की पुरातन शैली में बनाया था जिसमें पॉलिश किये हुए पत्थरों का प्रयोग हुआ था। इसके प्राथमिक भवनों में इंतीहुआताना (सूर्य का मंदिर) और तीन खिड़कियों वाला कक्ष प्रमुख हैं। पुरातत्वविदों के अनुसार यह भवन माचू पिच्चू के पवित्र जिले में स्थित हैं। सितम्बर 2007, पेरू और येल विश्वविद्यालय के बीच एक सहमति बनी की वो सभी शिल्प जो हीरम बिंघम माचू पिच्चू की खोज के बाद अपने साथ ले गये थे वो पेरू को लौटा दिये जायेंगे।