महाराव शेखा

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महाराव शेखा
शेखावाटी के संस्थापक
Rao Shekha.jpg
शासन 1445-1488 ईसवी सन्
राज तिलक 1445 ईसवी सन्, वि. सं. १५०२
जन्म 1433 ईसवी सन्, आसोज सुदी विजयादशमी वि. सं १४९०
जन्म स्थान 1433 ईसवी सन्
मृत्यु 1488 ईसवी सन्, अक्षय तृतीया वि.स.१५४५
मृत्यु स्थान रलावता
उत्तराधिकारी रायमल
जीवन संगी टांक जी गंगा कंवर, चौहान जी गंगा कंवर, तंवर जी, तंवर जी द्वितीय, गौर जी भाग कंवर, गौर जी द्वितीय सहज कँवर, तंवर जी III
राज घराना कछवाहा वंश
पिता ठाकुर मोकल सिंह जी कछवाहा
माता निरबाण जी
धर्म हिन्दू

महाराव शेखा का जन्म आसोज सुदी विजयादशमी वि. सं. १४९० में बरवाडा व नाण के स्वामी मोकल सिंहजी कछवाहा की रानी निरबाण जी के गर्भ से हुआ। १२ वर्ष की छोटी आयु में इनके पिता का स्वर्गवास होने के उपरांत महाराव शेखा वि. सं. १५०२ में बरवाडा व नाण के २४ गावों की जागीर के उतराधिकारी हुए। आमेर नरेश इनके पाटवी राजा थे राव शेखा अपनी युवावस्था में ही आस पास के पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण कर अपनी सीमा विस्तार करने में लग गए और अपने पैत्रिक राज्य आमेर के बराबर ३६० गावों पर अधिकार कर एक नए स्वतंत्र कछवाह राज्य की स्थापना की।

वक्तित्व[संपादित करें]

अपनी स्वतंत्रता के लिए महाराव शेखा को आमेर नरेश रजा चंद्रसेन जी से जो महाराव शेखा से अधिक शक्तिशाली थे। छः लड़ाईयां लड़नी पड़ी और अंत में विजय शेखाजी की ही हुई,अन्तिम लड़ाई मै समझोता कर आमेर नरेश चंद्रसेन ने महाराव शेखा को स्वतंत्र शासक मान ही लिया। महाराव शेखा ने अमरसर नगर बसाया , शिखरगढ़ , नाण का किला,अमरगढ़,जगन्नाथ जी का मन्दिर आदि का निर्माण कराया जो आज भी उस वीर पुरूष की याद दिलाते है। राव शेखा जहाँ वीर,साहसी व पराक्रमी थे, वहीं वे धार्मिक सहिष्णुता के पुजारी थे। उन्होंने १२०० पन्नी पठानों को आजीविका के लिए जागिरें व अपनी सेना मै भरती करके हिन्दूस्थान में सर्वप्रथम धर्मनिरपेक्ष का परिचय दिया। उनके राज्य में सूअर का शिकार व खाने पर पाबंदी थी तो वहीं पठानों के लिए गाय,मोर आदि मारने व खाने के लिए पाबन्दी थी। राव शेखा दुष्टों व उदंडों के तो काल थे, एक स्त्री की मान रक्षा के लिए अपने निकट सम्बन्धी गौड़ वाटी के गौड़ क्षत्रियों से उन्होंने ग्यारह लड़ाइयाँ लड़ी और पांच वर्ष के खुनी संघर्ष के बाद युद्ध भूमि में विजय के साथ ही एक वीर क्षत्रिय की भांति प्राण त्याग दिए। राव शेखा की मृत्यु रलावता गाँव के दक्षिण में कुछ दूर पहाडी की तलहटी में अक्षय तृतीया वि.स.१५४५ में हुई, जहाँ उनके स्मारक के रूप में एक छतरी बनी हुई है। जो आज भी उस महान वीर की गौरव गाथा स्मरण कराती है। राव शेखा अपने समय के प्रसिद्ध वीर.साहसी योद्धा व कुशल राजनिग्य शासक थे। युवा होने के पश्चात उनका सारा जीवन लड़ाइयाँ लड़ने में बीता,और अंत भी युद्ध के मैदान में ही एक सच्चे वीर की भांति हुआ। अपने वंशजों के लिए विरासत में वे एक शक्तिशाली राजपूत-पठान सेना व विस्तृत स्वतंत्र राज्य छोड़ गए जिससे प्रेरणा व शक्ति ग्रहण करके उनके वीर वंशजों ने नए राज्यों की स्थापना की विजय परम्परा को अठारवीं शताब्दी तक जारी रखा। राव शेख ने अपना राज्य झाँसी दादरी,भिवानी तक बढ़ा दिया था। उनके नाम पर उनके वंशज शेखावत कहलाने लगे और शेखावातो द्वारा शासित भू-भाग शेखावाटी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार सूर्यवंशी कछवाहा क्षत्रियों में एक नई शाखा "शेखावत वंश "का आविर्भाव हुआ। राव शेखा जी की मृत्यु के बाद उनके सबसे छोटे पुत्र राव रायमल जी अमरसर की राजगद्दी पर बैठे जो पिता की भाँती ही वीर योद्धा व निपूण शासक थे।

राणियां और पुत्र[संपादित करें]

१-टांक गंगा कुँवरी : नगरगढ़ के किल्हण टांक की पुत्री व हम्मीर की पुत्री थी। इस राणी से दुर्गा जी नामक पुत्र पैदा हुए।
२-तंवर जी : पाटन के राव कंवल के पुत्र भीमराज की पुत्री थी। इनके गर्भ से रत्ना जी का जन्म हुआ था।
३- तंवर जी द्वितीय : बायल के पिच्यांण जी तंवर की पुत्री। आभाजी,अचलाजी,तिलोक जी इसी राणी के पुत्र थे।
४- गौड़ भागकंवर : जालपजी गौड़ की पुत्री। भरतजी ,रिडमलजी इन्ही के पुत्र थे।
५- गौड़ सहजा : जालण जी गौड़ खरकड़ा की पुत्री थी। इनके गर्भ से कुम्भाजी व भारमल जी का जन्म हुआ।
६- चौहान गंग कँवर : चौबारा के स्योब्रहम चौहान की पुत्री थी। इनके गर्भ से रायमल जी का जन्म हुआ था जो बाद में शेखाजी के उतराधिकारी बने।
पूरणमल व प्रताप नामक दो पुत्र और थे, जो शेखाजी के जीवनकाल में ही चल बसे थे। उनकी माताओं का कोई रिकोर्ड नहीं मिल रहा। शेखाजी के तीन पुत्रियाँ भी थी। राघवकँवर, पर्वतकँवर व मायाकँवर।

अमरसर नगर बसाना[संपादित करें]

नांण जैसे छोटे से ठिकाने को उन्होंने अपनी शक्ति से एक राज्य में बदल दिया था। अब वे नई राजधानी बनाने का चिंतन करने लगे और वि.स.१५१७ में उन्होंने अमरा के नाम से अमरसर बसाया और उसको अपने राज्य की राजधानी बनाया।

राव शेखा जी का आमेर से युद्ध और विजय[संपादित करें]

राव शेखा के दादा बालाजी आमेर से अलग हुए थे। अतः अधीनता स्वरूप कर के रूप में प्रतिवर्ष आमेर को बछेरे देते थे। शेखा के समय तक यह परम्परा चल रही थी। राव शेखा ने गुलामी की श्रंखला को तोड़ना चाहा। अतः उन्होंने आमेर राजा उद्धरण जी को बछेरे देने बंद कर दिए थे पर चंद्रसेन वि.सं.१५२५ मै जब आमेर के शासक हुए तब महाराव शेखा के पास संदेश भेजा कि वे आमेर को कर के रूप में बछेरे क्यों नही भेजते है ? शेखा ने कहा कि मै अधीनता के प्रतीक चिन्ह को समाप्त कर देना चाहता हूँ और इसी कारण मेने बछेरे भेजने बंद कर दिए। केसरी समर में इसका सूचक दोहा इस प्रकार है –

किये प्रधानन अरज यक , सुनहु भूप बनराज।
एक अमरसर राव बिन , सकल समापे बाज।

इस समाचार को जानकर चंद्र सेन को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने राव शेखा पर चढाई करने की आज्ञा दी। इसी समय पन्नी पठानों का एक काफिला जिसमे ५०० पन्नी पठान] थे। गुजरात से मुलतान जाते समय अमरसर रुका। राव शेखा ने इन पन्नी पठानों को अपना मित्र बना लिया , उनके साथ एक विशेष समझौता किया और अपनी सेना में रखकर अपनी शक्ति बढाई। चंद्रसेन की सेना को पराजित किया और आमेर के कई घोड़ो को छीन कर ले आए। अब चंद्र सेन स्वयं सेना लेकर आगे बढे और राव शेखा पर आक्रमण किया। नाण के पास राव शेखा ने चंद्रसेन का मुकाबला किया। राव शेखा ने अपनी सेना के तीन विभाग किए और मोर्चाबद्ध युद्ध शुरू किया। शेखा स्वयं एक विभाग के साथ रहकर कमान संभाले हुए थे। स्वयं ने चंद्रसेन से युद्ध किया। शेखा की तलवार के सम्मुख चंद्रसेन टिक भी न सके भाग खड़े हुए और आमेर चले गए। इस युद्ध में दोनों और से ६०० घुड़सवार ६०० पैदल खेत रहे। अनुमानतः वि.सं.१५२६ में आमेर के चंद्रसेन पुनः शेखा को पराजित करने एक बड़ी सेना के साथ बरवाडा नाके पर स्तिथ धोली गाँव के पास पहुँच गए। इधर शेखाजी अपनी सशक्त सेना के साथ युद्ध करने पहुँच गए। राव शेखा ने पहुंचते ही फुर्ती के साथ चंद्रसेन की सेना पर अकस्मात आक्रमण किया। काफ़ी संघर्ष के बाद चन्द्रसेन की सेना भाग खड़ी हुई और रावशेखा की विजय हुई। यहाँ से शेखा आगे बढे ओए कुकस नदी के क्षेत्र पर अधिकार लिया। वि.सं.१५२८ में चंद्रसेन ने राव शेखा को अधीन करने का फ़िर प्रयास किया और कुकस नदी के दक्षिण तट पर अपनी सेना को शेखा से युद्ध करने को तैनात किया। राव शेखा जी अपनी सेना सहित आ डेट। चंद्रसेन ने इस युद्ध को जीतने के लिए समस्त कछवाहों को निमंत्रित किया ऐसा माना जाता है। नारुजी पहले आमेर के पक्ष में थे परन्तु युद्ध शुरू होते ही राव शेखा के पक्ष में आ गए | यह जानकर चंद्रसेन बहुत चिंतित हुए और अपनी हार स्वीकार करते हुए संधि का प्रस्ताव रखा। नारुजी की मध्यस्ता में संधि हुई , वह इस प्रकार थी।

१.आज तक जिन ग्रामों पर राव शेखाजी का अधिकार हुआ हैं ,उन पर राव शेखा जी का अधिकार रहेगा।
२.आज से राव शेखा जी आमेर की भूमि पर आक्रमण नही करेंगे। वे आमेर राज्य को किसी प्रकार का कर नही देंगे।
३.शेखा जी अपना स्वतंत्र राज्य कायम रखेंगे। उसमे आमेराधीश कोई हस्तक्षेप नही करेगा।
इस संधि को दोनों पक्षों ने स्वीकार किया। सम्भवतः इसी समय बरवाडा पर चंद्रसेन का अधिकार हो गया। इस समय से राव शेखा जी का ३६० गांवों पर अधिकार हो चुका था।

राव शेखा जी घाटवा युद्ध[संपादित करें]

एक [स्त्री]] की मान रक्षा के लिए शेखाजी ने झुन्थर के कोलराज गौड़ का सर काट कर अपने अमरसर के गढ़ के सदर द्वार पर टंगवा दिया,ऐसा करने का उनका उद्देश्य उदंड व आततायी लोगों में भय पैदा करना था। हालांकि यह कृत्य वीर धर्म के खिलाफ था शेखा जी के उक्त कार्य की गौड़ा वाटी में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और गौड़ राजपूतों ने इसे अपना जातीय अपमान समझा। अनेक गौड़ योद्धाओ ने अपने सरदार का कटा सर लाने का साहसिक प्रयत्न किया। लेकिन वे सफल नही हुए और गौंडो व शेखाजी के बीच इसी बात पर ५ साल तक खूनी संघर्ष चलता रहा। आख़िर जातीय अपमान से क्षुब्ध गौड़ राजपूतों ने अपनी समस्त शक्ति इक्कट्ठी कर घाटवा नामक स्थान पर युद्ध के लिए राव शेखा जी को सीधे शब्दों में रण निमंत्रण भेजा।

गौड़ बुलावे घाटवे,चढ़ आवो शेखा।
लस्कर थारा मारणा,देखण का अभलेखा।

रण निमंत्रण पाकर शेखा जी जेसा वीर चुप केसे रह सकता था। और बिखरी सेना को एकत्रित करने की प्रतीक्षा किए बिना ही शेखा जी अपनी थोडी सी सेना के साथ घाटवा पर चढाई के लिए चल दिए। और जीण माता के ओरण में अपने युद्ध सञ्चालन का केन्द्र बना घाटवा की और बढे। घाटवा सेव कुछ दूर खुटिया तालाब (खोरंडी के पास )शेखा जी का गौडों से सामना हुवा। मारोठ के राव रिडमल जी ने गौडों का नेत्रत्व करते हुए शेखा जी पर तीरों की वर्षा कर भयंकर युद्ध किया उनके तीन घटक तीर राव शेखा जी के लगे व शेखा जी के हाथों उनका घोड़ा मारा गया। इस युद्ध में शेखा जी के ज्येष्ठ पुत्र दुर्गा जी कोलराज के पुत्र मूलराज गौड़ के हाथों मारे गए और इसके तुंरत बाद मूलराज शेखा जी के एक ही प्रहार से मारा गया। घोड़ा बदल कर रिडमल जी पुनः राव शेखा जी के समक्ष युद्ध के लिए खड़े हो गए ,गौड़ वीरों में जोश की कोई कमी नही थी लेकिन उनके नामी सरदारों व वीरों के मारे जाने से सूर्यास्त से पहले ही उनके पैर उखड़ गए और वे घाटवा के तरफ भागे जो उनकी रणनीति का हिस्सा था। वे घाटवा में मोर्चा बाँध कर लड़ना चाहते थे ,लेकिन उनसे पहले शेखा जी पुत्र पूरण जी कुछ सैनिकों के साथ घाटवा पर कब्जा कर चुके थे। खुटिया तालाब के युद्ध से भाग कर घाटवा में मोर्चा लेने वाले गौडों ने जब घाटवा के पास पहुँच कर घाटवा से धुंवा उठता देखा तो उनके हौसले पस्त हो गए और वे घाटवा के दक्षिण में स्थित पहाडों में भाग कर छिप गए। शेखा जी के पुत्र पूरण जी घाटवा में हुए युद्ध के दौरान अधिक घायल होने के कारण वीर गति को प्राप्त हो गए।| घायल शेखा जी ने शत्रु से घिरे पहाडों के बीच रात्रि विश्राम लेना बुधिसम्मत नही समझा। अपने जीण माता के ओरण में स्तिथ सैनिक शिविर में लोट आए इसी समय उनके छोटे पुत्र रायमल जी भी नए सेन्यबल के साथ जीण माता स्थित सेन्य शिविर में पहुँच चुके थे। गौड़ शेखा जी की थकी सेना पर रात्रि आक्रमण के बारे में सोच रहे थे लेकिन नए सेन्य बल के साथ रायमल जी पहुँचने की खबर के बाद वे हमला करने का साहस नही जुटा सके। युद्ध में लगे घावों से घायल शेखा जी को अपनी मर्त्यु का आभास हो चुका था सो अपने छोटे पुत्र रायमल जी को अपनी ढाल व तलवार सोंप कर उन्होंने अपने उपस्थित राजपूत व पठान सरदारों के सामने रायमल जी को अपना उतराधिकारी घोषित कर अपनी कमर खोली ,और उसी क्षण घावों से क्षत विक्षत उस सिंह पुरूष ने नर देह त्याग वीरों के धाम स्वर्गलोक को प्रयाण किया। जीण माता के पास रलावता गावं से दक्षिण में आधा मील दूर उनका दाह संस्कार किया गया। जहाँ उनके स्मारक के रूप में खड़ी छतरी उनकी गर्वीली कहानी की याद दिलाती है।

वीर गति (मृत्यु)[संपादित करें]

घाटवा का युद्ध सं.१५४५ बैशाख शुक्ला त्रतीय के दिन लड़ा गया था और उसी दिन विजय के बाद शेखा जी वीर गति को प्राप्त हुए। शेखा जी की म्रत्यु का संयुक्त कछवाह शक्ति द्वारा बदला लेने के डर से मारोठ के राव रिडमल जी गोड़ ने रायमल जी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर और 51 गावं झुन्थर सहित रायमल जी को देकर पिछले पॉँच साल से हो रहे खुनी संघर्ष को रिश्तेदारी में बदल कर विवाद समाप्त किया।

चित्र दीर्घा[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

शेखावाटी प्रदेश का राजनैतिक इतिहास
राव शेखा
गिरधरवंश प्रकाश