महाराजा सूरज मल

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महाराजा सूरज मल
भरतपुर के महाराजा
Surajmal jat.jpg
शासन 1756 - 1763 ई.
पूर्वाधिकारी महाराजा बदन सिंह
उत्तराधिकारी महाराजा जवाहर सिंह
राज घराना सिनसिनवार जाट राजवंश

महाराजा सूरज मल (१७०७-१७६३) भरतपुर राज्य के महाराजा थे । वे जाट समाज के प्लेटो माने जाते थे।[कृपया उद्धरण जोड़ें] वे सुन्दर, सुडौल और स्वस्थ शरीर के धनी थे। वह राजनीतिज्ञ एवं दूरदर्शी महाराजा थे। सूरजमल ने सन् १७३३ में खेमकरण सोगरिया की फतहगढी पर आक्रमण किया और विजय प्राप्तकी। यहाँ पर १७४३ में भरतपुर नगर की नींव रखी। सन् १७५३ में वे यहाँ आकर रहने लगे।

जाट-शक्ति का उदय[संपादित करें]

महाराजा सूरजमल ने जयपुर के महाराजा जयसिंह से भी दोस्ती बना ली थी । २१ सितम्बर १७४३ को जयसिंह की मौत हो गई और उसके तुरन्त बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधो सिंह में गद्दी के लिये झगड़ा हुआ । महाराजा सूरजमल बड़े बेटे ईश्वरी सिंह के पक्ष में थे जबकि उदयपुर के महाराणा जगत सिंह माधो सिंह के पक्ष में थे । बाद में जहाजपुर में दोनों भाईयों में युद्ध हुआ और मार्च १७४७ में ईश्वरी सिंह की जीत हुई । एक साल बाद मई १७४८ में पेशवाओं ने ईश्वरी सिंह पर दबाव डाला कि वो माधो सिंह को चार परगना सौंप दे । फिर मराठे, सिसोदिया, राठौड़ वगैरा सात राजाओं की फौजें माधोसिंह के साथ हो गई और ईश्वरीसिंह अकेला पड़ गया । महाराजा सूरजमल दस हजार सैनिकों के साथ ईश्वरी सिंह की मदद के लिये जयपुर पहुंचे और अगस्त १७४८ में सातों फौजों को हरा दिया । इसी के साथ सूरजमल की तूती सारे भारत में बोलने लगी थी ।

मई १७५३ में महाराजा सूरजमल ने फिरोजशाह कोटला पर कब्जा कर लिया । दिल्ली के नवाब गाजी-उद-दीन ने फिर मराठों को सूरजमल के खिलाफ भड़काया और फिर मराठों ने जनवरी १७५४ से मई १७५४ तक भरतपुर जिले में सूरजमल के कुम्हेर किले को घेरे रखा । मराठे किले पर कब्जा नहीं पर पाए और उस लड़ाई में मल्हार राव का बेटा खांडे राव होल्कर मारा गया । मराठों ने सूरजमल की जान लेने की ठान ली थी पर महारानी किशोरी ने सिंधियाओं की मदद से मराठाओं और सूरजमल में संधि करवा दी ।

वेंदेल के अनुसार जर्जर मुगल-सत्ता की इसी कालावधि में जाट-शक्ति उत्तरी भारत में प्रबल शक्ति के रूप में उभरकर सामने आई । सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद सन् १७४८ के उत्तराधिकार युद्ध में मराठों और राजपूतों सहित सात राजाओं की शक्ति के विरुद्ध कमजोर परन्तु सही पक्ष को विजयश्री दिलाकर सूरजमल ने जाट-शक्ति की श्रेष्ठता सिद्ध की । उसी समय मुगलों का कोई भी अभियान ऐसा नहीं था जिसमें जाट-शक्ति को सहयोग के लिए आमंत्रित न किया गया हो । वजीर सफदरजंग तो पूर्णरूप से अपने मित्र सूरजमल की शक्ति पर अवलम्बित था । अपदस्थ वजीर सफदरजंग के शत्रु मीरबख्शी गाजीउद्दीन खां के नेतृत्व में मराठा-मुगल-राजपूतों की सम्मिलित शक्ति सन् 1754 में सूरजमल के छोटे किले कुम्हेर तक को भी नहीं जीत पाई । सन् 1757 में नजीबुद्दौला द्वारा आमंत्रित अब्दाली भी अपने अमानवीय नरसंहार से सूरजमल की शक्ति को ध्वस्त नहीं कर सका । देशद्रोही नजीब ने उस समय वजीर गाजीउद्दीन खां और मराठों के कोप से बचने के लिए अब्दाली को हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने के लिए सन् 1759 में पुनः आमंत्रित किया था । पानीपत के अंतिम युद्ध से पूर्व बरारी घाट के युद्ध में मराठों की प्रथम पराजय के बाद सूरजमल के कट्टर शत्रु वजीर गाजीउद्दीनखां ने भी भागकर जाटों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था । वेंदेल के अनुसार 'मुगल अहंकार की इतनी कठोर और इतनी सटीक पराजय इससे पहले कभी नहीं हुई थी' । वस्तुतः मुगल सत्ता का गर्वीला और भयावह दैत्य धराशायी हो चुका था जिसके अवशेषों पर महाराजा सूरजमल के नेतृत्व में विलास और आडंबर से दूर, कर्मण्य, शौर्यपरायण, निर्बल की सहायक, शरणागत की रक्षक, प्रजावत्सल, हिन्दू-मुस्लिम एकता की प्रतीक, राष्ट्रवादी जाट-सत्ता की स्थापना हुई । [1]

मराठा और सूरजमल में मतभेद[संपादित करें]

बाद में 1760 में सदाशिव राव भाऊ और सूरजमल में कुछ बातों पर आनाकानी हुई थी । मथुरा की नबी मस्जिद को देखकर भाऊ ने गुस्से में कहा - सूरजमल जी, मथुरा इतने दिन से आपके कब्जे में है, फिर इस मस्जिद को आपने कैसे छोड़ दिया ? सूरजमल ने जवाब दिया - अगर मुझे यकीन होता कि मैं सारी उम्र इस इलाके का बादशाह रहूंगा तो शायद मैं इस मस्जिद को गिरवा देता, पर क्या फायदा ? कल मुसलमान आकर हमारे मंदिरों को गिरवायें और वहीं पर मस्जिदें बनवा दें तो आपको अच्छा लगेगा? बाद में फिर भाऊ ने लाल किले के दीवाने-खास की छत को गिरवाने का हुक्म दिया था, यह सोच कर कि इस सोने को बेचकर अपने सैनिकों की तनख्वाह दे दूंगा । इस पर भी सूरजमल ने उसे मना किया, यहां तक कहा कि मेरे से पांच लाख रुपये ले लो, पर इसे मत तोड़ो, आखिर नादिरशाह ने भी इस छत को बख्श दिया था । पर भाऊ नहीं माना - जब छत का सोना तोड़ा गया तो वह मुश्किल से तीन लाख रुपये का निकला । सूरजमल की कई बातों को भाऊ ने नहीं माना और यह भी कहा बताते हैं - मैं इतनी दूर दक्षिण से आपकी ताकत के भरोसे पर यहां नहीं आया हूं।

महाराजा सूरज मल की उदारता[संपादित करें]

14 जनवरी 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच हुई । मराठों के एक लाख सैनिकों में से आधे से ज्यादा मारे गए । मराठों के पास न तो पूरा राशन था और न ही इस इलाके का उन्हें भेद था, कई-कई दिन के भूखे सैनिक क्या युद्ध करते ? अगर सदाशिव राव महाराजा सूरजमल से छोटी-सी बात पर तकरार न करके उसे भी इस जंग में साझीदार बनाता, तो आज भारत की तस्वीर और ही होती । पर उसने यह बेवकूफी की और उस जंग में अपनी जान भी गंवा बैठा । महाराजा सूरजमल ने फिर भी दोस्ती का हक अदा किया । तीस-चालीस हजार मराठे जंग के बाद जब वापस जाने लगे तो सूरजमल के इलाके में पहुंचते-पहुंचते उनका बुरा हाल हो गया था । जख्मी हालत में, भूखे-प्यासे वे सब मरने के कगार पर थे और ऊपर से भयंकर सर्दी में भी मरे, आधों के पास तो ऊनी कपड़े भी नहीं थे । दस दिन तक सूरजमल नें उन्हें भरतपुर में रक्खा, उनकी दवा-दारू करवाई और भोजन और कपड़े का इंतजाम किया । महारानी किशोरी ने भी जनता से अपील करके अनाज आदि इक्ट्ठा किया । सुना है कि कोई बीस लाख रुपये उनकी सेवा-पानी में खर्च हुए । जाते हुए हर आदमी को एक रुपया, एक सेर अनाज और कुछ कपड़े आदि भी दिये ताकि रास्ते का खर्च निकाल सकें । कुछ मराठे सैनिक लड़ाई से पहले अपने परिवार को भी लाए थे और उन्हें हरयाणा के गांवों में छोड़ गए थे । उनकी मौत के बात उनकी विधवाएं वापस नहीं गईं । बाद में वे परिवार हरयाणा की संस्कृति में रम गए । महाराष्ट्र में 'डांगे' भी जाटवंश के ही बताये जाते हैं और हरयाणा में 'दांगी' भी उन्हीं की शाखा है ।

मराठों के पतन के बाद महाराजा सूरजमल ने गाजियाबाद, रोहतक, झज्जर के इलाके भी जीते । 1763 में फरुखनगर पर भी कब्जा किया । वीरों की सेज युद्धभूमि ही है । 25 दिसंबर 1763 को नवाब नजीबुदौला के साथ युद्ध में महाराज सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए ।

महाराजा सूरज मल के युद्धों का वर्णन सूदन कवि ने सुजान चरित्र नामक रचना में किया है। यहाँ दो कविताएं दी जा रही हैं-

देषि देस को चाल ईसरी सिंह भुवाल नैं ।
पत्र लिख्यौ तिहिकाल बदनसिंह ब्रजपाल कौ ।।
करी काज जैसी करी गुरुडध्वज महाराज ।
पत्र पुष्प के लेते ही थे आज्यौ ब्रजराज ।।
आयौ पत्र उताल सौं ताहि बांचि ब्रजयेस ।
सुत सरज सौं तब कहौ थामि ढुढाहर देस ।।

महाराजा सूरज मल की सेना का जयपुर अभियान[संपादित करें]

ईश्वरी सिंह की सहायता के लिए मुगल, मराठा एवं राजपूत सेना और से युद्ध करने हेतू जाट सेना का जयपुर अभियान का वर्णन-

संग चढे सिनसिनवार हैं, बहु जंग के जितवार हैं
खंड खंड ने खुंटैल हैं, कबहु न भय मन में लहैं
चढि चाहि चाहर जोर दै, दल देसवार दरेरेदै
असवार होत अवारिया, जिन कितै वैर वादारिया
डर डारि डागुरि धाइयो, बहु भैनवार सु आइयौ
गुनवंत गूदर चट्ठियौ, सर सेल सांगन मट्ठियौ
सजियौ प्रचन्ड सुभोंगरे, जितवार जंगन के खरे
खिनवार गोधे बंक हैं, जिन किए राजा रंक हैं
सिरदार सोगरवार हैं, रन भुमि मांझ पहांर हैं
सिरदार सोरहते सजे, रन काज ते रन लै गज
सजि नौहवार निसंक हैं, रुतवार रावत बंक हैं
मुहिनाम याद इतेक हैं, बहु जाट जाति कितेक हैं
सबहि चढे भट आगरे, सबहि प्रताप उजागरे

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Excerpts from book "Hindustan mein Jat-Satta" (page 65) - edited by Dr. Jean Deloche (French) and Dr. Vir Singh (Hindi). Published by Radhakrishan Prakashan Pvt. Ltd. G-17, Jagatpuri, Delhi-110051. Copyright: Soorajmal Samarak Shiksha Sanstha, New Delhi. First Edition: 2001. Price: Rs. 300/-