भोजपत्र

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
भोजपत्र का वृक्ष

भोजपत्र (संस्कृत : भुर्ज ; वैज्ञानिक नाम : Betula utilis ; अंग्रेजी : Himalayan Birch) हिमालय क्षेत्र में उगने वाला एक वृक्ष है जो 4,500 m की ऊँचाई तक उगता है। यह बहूपयोगी वृक्ष है - इसका छाल सफेद रंग की होती है जो प्राचीन काल से ग्रंथों की रचना के लिये उपयोग में आती थी।

परिचय[संपादित करें]

भोजपत्र का ख्याल आते ही उन प्राचीन पांडुलिपियों का विचार आता है, जिन्हे भोजपत्रों पर लिखा गया है। दरअसल, कागज की खोज के पूर्व हमारे देश में लिखने का काम भोजपत्र पर किया जाता था। भोजपत्र पर लिखा हुआ सैकड़ों वर्षो तक वैसा ही रहता है, लेकिन अफसोस कि वर्तमान में इस भोज वृक्ष गिनती के ही बचे हैं। हमारे देश के कई पुरातत्व संग्रहालयों में भोजपत्र पर लिखी गई सैकड़ों पांडुलिपियां सुरक्षित रखी है। जैसे हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय का संग्रहालय। कालीदास ने भी अपनी कृतियों में भोज-पत्र का उल्लेख कई स्थानों पर किया है। उनकी कृति कुमारसंभवम् में तो भोजपत्र को वस्त्र के रूप में उपयोग करने का जिक्र भी है। भोजपत्र का उपयोग प्राचीन रूस में कागज की मुद्रा 'बेरेस्ता' के रूप में भी किया जाता था। इसका उपयोग सजावटी वस्तुओं और चरण पादुकाओं-जिन्हे 'लाप्ती' कहते थे, के निर्माण में भी किया जाता था। सुश्रुत एवं वराद मिहिर ने भी भोजपत्र का जिक्र किया है। भोजपत्र का उपयोग काश्मीर में पार्सल लपेटने में और हुक्कों के लचीले पाइप बनाने में भी किया जाता था। वर्तमान में भोजपत्रों पर कई यंत्र लिखे जाते है।

दरअसल, भोजपत्र भोज नाम के वृक्ष की छाल का नाम है, पत्ते का नहीं। इस वृक्ष की छाल ही सर्दियों में पतली-पतली परतों के रूप में निकलती हैं, जिन्हे मुख्य रूप से कागज की तरह इस्तेमाल किया जाता था। भोज वृक्ष हिमालय में 4,500 मीटर तक की ऊंचाई पर पाया जाता है। यह एक ठंडे वातावरण में उगने वाला पतझड़ी वृक्ष है, जो लगभग 20 मीटर तक ऊंचा हो सकता है। भोज को संस्कृत में भूर्ज या बहुवल्कल कहा गया है। दूसरा नाम बहुवल्कल ज्यादा सार्थक है। बहुवल्कल यानी बहुत सारे वस्त्रों/छाल वाला वृक्ष। भोज को अंग्रेजी में हिमालयन सिल्वर बर्च और विज्ञान की भाषा में बेटूला यूटिलिस कहा जाता है। यह वृक्ष बहुउपयोगी है। इसके पत्ते छोटे और किनारे दांतेदार होते है। वृक्ष पर शहतूत जैसी नर और मादा रचनाएं लगती है, जिन्हे मंजरी कहा जाता है। छाल पतली, कागजनुमा होती है, जिस पर आड़ी धारियों के रूप में तने पर मिलने वाले वायुरंध्र बहुत ही साफ गहरे रंग में नजर आते है। यह लगभग खराब न होने वाली होती है, क्योंकि इसमें रेजिनयुक्त तेल पाया जाता है। छाल के रंग से ही इसके विभिन्न नाम [लाल, सफेद, सिल्वर और पीला] बर्च पड़े है।

भोज पत्र की बाहरी छाल चिकनी होती है, जबकि आम, नीम, इमली, पीपल, बरगद आदि अधिकतर वृक्षों की छाल काली भूरी, मोटी, खुरदरी और दरार युक्त होती है। यूकेलिप्टस और जाम की छाल मोटी परतों के रूप में अनियमित आकार के टुकड़ों में निकलती है। भोजपत्र की छाल कागजी परत की तरह पतले-पतले छिलकों के रूप में निकलती है।

भोज के पेड़ हल्की, अच्छी पानी की निकासी वाली अम्लीय मिट्टी में अच्छी तरह पनपते है। इकालाजी के लिहाज से इन्हे शुरुआती माना जाता है। आग या अन्य दखलंदाजी से ये बड़ी तेजी से फैलते है। भोज से कागज के अलावा इसके अच्छे दाने वाली, हल्के पीले रंग की साटिन चमक वाली लकड़ी भी मिलती है। इससे वेनीर और प्लायवुड भी बनाई जाती है।

बेटूला वेरुकोसा (मैसूर बर्च) से उम्दा किस्म की लकड़ी प्राप्त होती है। छोटे रेशों के कारण उसकी लुगदी से टिकाऊ कागज भी बनता है। बर्च की लकड़ी का उपयोग ड्रम, सितार, गिटार आदि बनाने में भी किया जाता है। बेलारूस, रूस, फिनलैंड, स्वीडन और डेनमार्क तथा उत्तरी चीन के कुछ हिस्सों में बर्च के रस का उपयोग उम्दा बीयर के रूप में होता है। इससे जाइलिटाल नामक मीठा एल्कोहल भी मिलता है जिसका उपयोग मिठास के लिए होता है। बर्च के पराग कण एलर्जिक होते है। पित्त ज्वर से प्रभावित कुछ लोग इसके परागकणों के प्रति संवेदी पाए गए है।

सफेद बर्च पर उगने वाला मशरूम कैंसर के उपचार में उपयोग में लाया जाता है। बर्च की छाल में बेटूलिन और बेटुलिनिक एसिड और अन्य रसायन मिले है, जो दवा उद्योग में उपयोगी पाए गए है। आचार्य भाव मिश्र [1500-1600] रचित भाव प्रकाश निघंटु के अनुसार इसकी छाल का उपयोग वातानुलोमक एवं प्रतिदूषक होता है। इसे कामला, पित्त ज्वर में दिया जाता है। कर्ण स्त्राव एवं विषाक्त व्रण प्रक्षालना में भी इसका उपयोग होता है। इसके पत्ते उत्तेजक एवं स्तंभक माने जाते है।

भारतीय वन अनुसंधान केंद्र देहरादून के वैज्ञानिक कहते है कि भोजपत्र का उपयोग दमा और मिर्गी जैसे रोगों के इलाज में किया जाता है। उसकी छाल बहुत बढि़या एस्ट्रिंजेट यानी कसावट लाने वाली मानी जाती है। इस कारण बहते खून और घावों को साफ करने में इसका प्रयोग होता है।

उत्तराखंड में गंगोत्री के रास्ते में 14 किलोमीटर पहले भोजवासा आता है। भोजपत्र के पेड़ों की अधिकता के कारण ही इस स्थान का नाम भोजवासा पड़ा था, लेकिन वर्तमान में इस जगह भोज वृक्ष गिनती के ही बचे है। यही हाल गंगोत्री केडनास दर्रे का भी है।

2007 में डेक्कन हेराल्ड में छपी रिपोर्ट के अनुसार यह पेड़ विलुप्ति की कगार पर है। इसे सबसे ज्यादा खतरा कांवडियों और पर्यटकों से है, जो गंगोत्री का पानी लेने आते है और भोज वृक्ष को नुकसान पहुंचाते है। दरअसल, यात्री और पर्यटक भोजपत्र को अपने साथ ले जाना शुभ मानते हैं और यही एक बड़ी वजह भी रही कि भोज वृक्ष सिमट गए हैं। भोजवृक्षों को दोबारा उगाने के वन विभाग लगातार प्रयास कर रहा है, लेकिन प्रयास सफल नहीं हो पा रहे हैं। पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह उच्च हिमालय क्षेत्र में मानवीय हस्तक्षेप है।

गोमुख जाने वाले यात्री व पर्यटक भोजपत्रों को लगातार नुकसान पहुंचा रहे है। उनका मानना है कि गोमुख से भोजपत्र व भोज छड़ी अति शुभ होती है। इसे शुभ मानते हुए यात्री व पर्यटक लगातार वृक्षों को नुकसान पहुंचाते रहे हैं। वर्तमान में प्रति दिन इस उच्च हिमालय क्षेत्र में 150 यात्रियों व पर्यटकों की आवाजाही हो रही है यानी माह में चार हजार पांच सौ यात्री भोजवासा से गुजर रहे हैं। वन विभाग हालाकि दावा कर रहा है कि हर यात्री व पर्यटक पर उनकी नजर है, लेकिन यह इस क्षेत्र में संभव ही नहीं है।

इस बहुउपयोगी वृक्ष के अति दोहन से उसके विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। भोज वृक्ष के संरक्षण से जुड़ी हर्षवंती विष्ट का कहना है कि ईधन के लिए इनका दोहन इस खतरे को बढ़ा रहा है। उन्होंने उसे बचाने के लिए 'सेव भोजपत्र' आंदोलन चलाया है। उत्तराखंड में भोजवासा में 5.5 हैक्टर क्षेत्र को कंटीले तारों की बागड़ लगाकर स्थानीय स्तर पर संरक्षण के प्रयास किए जा रहे है। भोज हमारी प्राचीन संस्कृति का परिचायक वृक्ष है। यह हिमालयीन वनस्पतियों का एक प्रतिनिधि पेड़ है। अति महत्वपूर्ण औषधि गुणों से भरपूर इस वृक्ष को बचाना जरूरी है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]