भूमिहार ब्राह्मण

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

भूमिहार या बाभन एक ऐसी जाति है जो बिहार, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में निवास करते है। भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है।

भूमिहार ब्राह्मण समाज में उपाधिय है भूमिहार, पाण्डेय, तिवारी/त्रिपाठी, मिश्र, शुक्ल, उपाध्यय, शर्मा,पाठक, ओझा, झा,दुबे\द्विवेदी इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारन एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय, शाही, सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही, सिंह (सिन्हा), चौधरी, ठाकुर बिहार में लिखने लगा ज्ञात रहे पाण्डेय, तिवारी/त्रिपाठी, पाठक, मिश्र, शुक्ल, उपाध्यय, शर्मा, ओझा, दुबे\द्विवेदी इत्यादि सरजूपारियो में भी है और ठाकुर.झा, मिश्र, पाठक, राय, सिंह, चौधरी मैथिलों में भी है परन्तु भूमिहार ब्राह्मण अपना अलग अस्तित्व रखते है

बनारस राज्य[संपादित करें]

Left: The Maharaja's Fort (Ramnagar Fort), front view, 1869. Right: Entrance gate to the fort, 1905. Left: The Maharaja's Fort (Ramnagar Fort), front view, 1869. Right: Entrance gate to the fort, 1905.
Left: The Maharaja's Fort (Ramnagar Fort), front view, 1869. Right: Entrance gate to the fort, 1905.

बनारस राज्य भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में 1725-1947 तक रहा | इसके अलावा कुछ अन्य बड़े राज्य बेतिया,हथुवा,टिकारी,तमकुही,लालगोला इत्यादि भी भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में रहे | बनारस के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेज वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना की ईट से ईट बजा दी थी | 1857 में हथुवा के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेजो के खिलाफ सर्वप्रथम बगावत की (यह दावा अभी विवादस्पद है)।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

भूमिहार व्यक्तित्व[संपादित करें]

चाणक्य मगध बाभन।

इनका जन्म अनुमानत: ईसापूर्व ३७५ - ईसापूर्व २२५ में हुआ था तथा यह अर्थशास्त्र के रचयिता थे।यह मगध के बाभन थे ये चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे जिन्होंने नंदवंश का सर्वनाश करके चन्द्रगुप्त को राजा बनाया। विष्णुपुराण, भागवत आदि कई हिन्दू तथा बौद्ध ग्रंथों में इनका उल्लेख है। ये उस समय के एक प्रसिद्ध विद्वान थे, इसमें कोई संदेह नहीं। कहते हैं कि चाणक्य राजसी ठाट-बाट से दूर एक छोटी सी कुटिया में रहते थे।

दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती (जुझौतिया ब्राह्मण,भूमिहार ब्राह्मण,किसान आंदोलन के जनक),बैकुन्ठ शुक्ल (१४ मई १९३४ को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा फासी),स्वतन्त्रता सेनानी पंडित बटुकदेव शर्मा, यमुना कर्जी,शील भद्र याजी, मंगल पांडे १८५७ के क्रांति वीर,कर्यनन्द शर्मा,योगेन्द्र शुक्ल,चंद्रमा सिंह,पंडित राम बिनोद सिंह,राम नंदन मिश्र,यमुना प्रसाद त्रिपाठी, महावीर त्यागी,राज नरायण,रामवृक्ष बेनीपुरी,पं अलगू राय,राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर,राहुल सांस्कृत्यायन,बनारस के राजा चैत सिंह ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह किया वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना को धूल चटाई, देवीपद चौधरी,राज कुमार शुक्ल (चम्पारण आंदोलन कि शुरुवात की),फ़तेह बहादुर शाही हथुवा के राजा १८५७ में अंग्रेजो के खिलाफ सर्व प्रथम विद्रोह किया,काशी नरेश द्वारा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए कई हज़ार एक्कड़ का भूमि दान, योगेंद्र नारायण राय लालगोला (मुर्शिदाबाद) के राजा अपने दान व परोपकारी कार्यो के लिए प्रसिद्ध, इत्यादि महान व्यक्तित्व भूमिहार ब्राह्मण से थे। हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार कुबेरनाथ राय और हिंदी तथा भोजपूरी के वयोवृद्ध लेखक विवेकी राय का अबंध भूमिहार ब्राह्मण समुदाय से हैं।

भूमिहार ब्राह्मण की उत्पति[संपादित करें]

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है। प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया,उसके बाद सारस्वत,महियल,सरयूपारी,मैथिल,चितपावन,कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए।मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए।

भूमिहार ब्राह्मण के कुछ मूलों (कूरी) के लोगो का भूमिहार ब्राह्मण में संगठित होने की एक सूची यहाँ दी जा रही है :

१. कान्यकुब्ज शाखा से :- दोनवार, सकरवार,किन्वार, ततिहा, ननहुलिया, वंशवार के तिवारी, कुढ़ानिया, दसिकर, आदि.

२. सरयू नदी के तट पर बसने वाले से : - गौतम, कोल्हा (कश्यप), नैनीजोर के तिवारी, पूसारोड (दरभंगा) खीरी से आये पराशर गोत्री पांडे, मुजफ्फरपुर में मथुरापुर के गर्ग गोत्री शुक्ल, गाजीपुर के भारद्वाजी, मचियाओं और खोर के पांडे, म्लाओं के सांकृत गोत्री पांडे, इलाहबाद के वत्स गोत्री गाना मिश्र, आदि.

३. मैथिल शाखा से : - मैथिल शाखा से बिहार में बसने वाले कई मूल के भूमिहार ब्राह्मण आये हैं।इनमे सवर्ण गोत्री बेमुवार और शांडिल्य गोत्री दिघवय - दिघ्वैत और दिघ्वय संदलपुर, बहादुरपुर के चौधरी प्रमुख है। (चौधरी, राय, ठाकुर, सिंह मुख्यतः मैथिल ही प्रयोग करते है)

४. महियालो से : - महियालो की बाली शाखा के पराशर गोत्री ब्राह्मण पंडित जगनाथ दीक्षित छपरा (बिहार) में एकसार स्थान पर बस गए। एकसार में प्रथम वास करने से वैशाली, मुजफ्फरपुर, चैनपुर, समस्तीपुर, छपरा, परसगढ़, सुरसंड, गौरैया कोठी, गमिरार, बहलालपुर, आदि गाँव में बसे हुए पराशर गोत्री एक्सरिया मूल के भूमिहार ब्राह्मण हो गए।

५. चित्पावन से : - न्याय भट्ट नामक चितपावन ब्राह्मण सपरिवार श्राध हेतु गया कभी पूर्व काल में आये थे।अयाचक ब्रह्मण होने से इन्होने अपनी पोती का विवाह मगध के इक्किल परगने में वत्स गोत्री दोनवार के पुत्र उदय भान पांडे से कर दिया और भूमिहार ब्राह्मण हो गए।पटना डाल्टनगंज रोड पर धरहरा,भरतपुर आदि कई गाँव में तथा दुमका,भोजपुर,रोहतास के कई गाँव में ये चित्पवानिया मूल के कौन्डिल्य गोत्री अथर्व भूमिहार ब्राह्मण रहते हैं

१. सर्वप्रथम १८८५ में ऋषिकुल भूषण काशी नरेश महाराज श्री इश्वरी प्रसाद सिंह जी ने वाराणसी में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना की.

२. १८८५ में अखिल भारतीय त्यागी महासभा की स्थापना मेरठ में हुई.

३. १८९० में मोहियल सभा की स्थापना हुई.

४. १९१३ में स्वामी सहजानंद जी ने बलिया में आयोजित

५. १९२६ में पटना में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा का अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी ने की.

६. १९२७ में प्रथम याचक ब्राह्मण सम्मलेन की अध्यक्षता सर गणेश दत्त ने की.

७. १९२७ में मेरठ में ही अखिल भारतीय त्यागी महासभा की अध्यक्षता राय बहादुर जगदेव राय ने की.

८. १९२६-२७ में अपने अधिवेशन में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने प्रस्ताव पारित कर भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग घोषित करते हुए अपने समाज के गठन में सम्मलित होने का निमंत्रण दिया.

९. १९२९ में सारस्वत ब्राह्मण महासभा ने भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग मानते हुए अनेक प्रतिनिधियों को अपने संगठन का सदस्य बनाया.

१०. १९४५ में बेतिया (बिहार) में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता डॉ॰बी.एस.पूंजे (चित्पावन ब्राह्मण) ने की.

११. १९६८ में श्री सूर्य नारायण सिंह (बनारस) के प्रयास से ब्रहामर्शी सेवा समिति का गठन हुआ।और इश वर्ष रोहनिया में एक अधिवेशन पंडित अनंत शास्त्री फडके (चित्पावन) की अध्यक्षता में हुआ।

१२. १९७५ में लक्नाऊ में भूमेश्वर समाज तथा कानपूर में भूमिहार ब्राह्मण समाज की स्थापना हुई.

१३. १९७९ में अखिल भारतीय ब्रह्मर्षि परिषद् का गठन हुआ।

१४. ८ मार्च १९८१ गोरखपुर में भूमिहार ब्राह्मण समाज का गठन

१५. २३ अक्टूबर १९८४ में गाजीपुर में प्रांतीय भुमेश्वर समाज का अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता श्री मथुरा राय ने की.डॉ॰रघुनाथ सिंह जी ने इस सम्मलेन का उदघाटन किया।

१६. १८८९ में अल्लाहाबाद में भूमेश्वर समाज की स्थापना हुई.

" भूमिहार " शब्द कहा और कबसे अस्तित्व में आया ?

भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था।.याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं,फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा.काफी विचार विमर्श के बाद " भूमिहार " शब्द अस्तित्व में आया।" भूमिहार ब्राह्मण " शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक है।

बनारस के महाराज ईश्वरी प्रसाद सिंह ने १८८५ में बिहार और उत्तर प्रदेश के जमींदार ब्राह्मणों की एक सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा की हमारी एक जातीय सभा होनी चाहिए.सभा बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे।परन्तु सभा का नाम क्या हो इस पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया।मगध के बाभनो ने जिनके नेता स्व.कालीचरण सिंह जी थे, सभा का नाम " बाभन सभा " करने का प्रस्ताव रखा.स्वयं महराज "भूमिहार ब्राह्मण सभा " के पक्ष में थे।बैठक मैं आम राय नहीं बन पाई,अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति गठित की गई।सात वर्षो के बाद समिति की सिफारिश पर " भूमिहार ब्राह्मण " शब्द को स्वीकृत किया गया और साथ ही साथ इस शब्द के प्रचार व् प्रसार का काम भी हाथ में लिया गया।इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्व.लंगट सिंह जी के सहयोग से मुजफ्फरपुर में एक कालेज खोला गया।बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. कालेज के नाम से पुकारा गया।आज वही कालेज लंगट सिंह कालेज के नाम से प्रसिद्द है।

भूमिहार ब्राह्मणों के इतिहास को पढने से पता चलता है की अधिकांश समाजशास्त्रियों ने भूमिहार ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज की शाखा माना है।भूमिहार ब्राह्मन का मूलस्थान मदारपुर है जो कानपुर - फरूखाबाद की सीमा पर बिल्हौर स्टेशन के पास है।.१५२८ में बाबर ने मदारपुर पर अचानक आक्रमण कर दिया.इस भीषण युद्ध में वहा के ब्राह्मणों सहित सबलोग मार डाले गए।इस हत्याकांड से किसी प्रकार अनंतराम ब्राह्मण की पत्नी बच निकली थी जो बाद में एक बालक को जन्म दे कर इस लोक से चली गई।इस बालक का नाम गर्भू तेवारी रखा गया।गर्भू तेवारी के खानदान के लोग कान्यकुब्ज प्रदेश के अनेक गाँव में बसते है।कालांतर में इनके वंशज उत्तर प्रदेश तथा बिहार के विभिन्न गाँव में बस गए।गर्भू तेवारी के वंशज भूमिहार ब्रह्मण कहलाये .इनसे वैवाहिक संपर्क रखने वाले समस्त ब्राह्मण कालांतर में भूमिहार ब्राह्मण कहलाये

अंग्रेजो ने यहाँ के सामाजिक स्तर का गहन अध्ययन कर अपने गजेतिअरों एवं अन्य पुस्तकों में भूमिहारो के उपवर्गों का उल्लेख किया है गढ़वाल काल के बाद मुसलमानों से त्रस्त भूमिहार ब्राह्मन ने जब कान्यकुब्ज क्षेत्र से पूर्व की ओर पलायन प्रारंभ किया और अपनी सुविधानुसार यत्र तत्र बस गए तो अनेक उपवर्गों के नाम से संबोधित होने लगे,यथा - ड्रोनवार, गौतम,कान्यकुब्ज,जेथारिया आदि.अनेक कारणों,अनेक रीतियों से उपवर्गों का नामकरण किया गया।कुछ लोगो ने अपने आदि पुरुष से अपना नामकरण किया और कुछ लोगो ने गोत्र से.कुछ का नामकरण उनके स्थान से हुवा जैसे - सोनभद्र नदी के किनारे रहने वालो का नाम सोन भरिया, सरस्वती नदी के किनारे वाले सर्वारिया,,सरयू नदी के पार वाले सरयूपारी,आदि.मूलडीह के नाम पर भी कुछ लोगो का नामकरण हुआ जैसे,जेथारिया,हीरापुर पण्डे,वेलौचे,मचैया पाण्डे,कुसुमि तेवरी,ब्र्हम्पुरिये, दीक्षित, जुझौतिया, आदि


भूमिहार ब्राह्मण (सरयू नदी के तट पर बसने वाले)

पिपरा के मिसिर, सोहगौरा के तिवारी, हिरापुरी पांडे, घोर्नर के तिवारी, माम्खोर के शुक्ल,भरसी मिश्र,हस्त्गामे के पांडे,नैनीजोर के तिवारी, गाना के मिश्र, मचैया के पांडे,दुमतिकार तिवारी, आदि.भूमिहार ब्राह्मन में हैं। " वे ही ब्राह्मण भूमि का मालिक होने से भूमिहार कहलाने लगे और भूमिहारों को अपने में लेते हुए भूमिहार लोग पूर्व में कनौजिया से मिल जाते हैं

सामाजिक जीवन[संपादित करें]

पहले वर्ष के अंत में माता काली की पूजा करना, गरीबों और शरणागतों को भोजन करना और वस्त्र बाटना भूमिहारो के बहुत से गावों में एक प्रथा थी। भूमिहार को भूमि दान में मिलती थी। और स्वयं भी तलवार के दम पर भूमिहारो ने भूमि अर्जित की है।कृषि कर्म भूमिहारो का पेशा था। आज भूमिहार हर क्षेत्र में अग्रणीय है। ब्राह्मण होने के कारण भूमिहार स्वयं हल नहीं जोतते है। ध्यान देवे यहां पृष्ठ पर दिये गये ब्राहणो के विवरणों मे भले ही प्राचीन विवरण बताते समय पूर्व पूरूषो के लिये भूमिहार नाम का प्रयोग कर लिया गया हो पर य़े दूसरेेे भारतीय ब्राहण भी हो सकते है अब वंशज भले ही भूमिहार हो वसतुतः सभी भारतीय ब्राहण (जम्बूद्वीप के ब्राहण) एक कुल के ही है सिर्फ सूर्य पूजक सकलदीपी ब्राहण (कृष्ण पुत्र सांब के द्वारा सक दीप से लाये गये है सकलदीपी परंमपरा व भविष्य पूराण के अनुसार) व चितपावन ब्राहण (मुल ग्यात नही परंतु स्कंध पुराण के अनुसार परशूराम के द्वारा मृत देह मे प्राण के संचार के बाद ब्राहण बने) अन्य सभी ब्राहण जम्बूद्विप के एक ही कुल के ब्राहण है भूमिहारो में आपसी भाईचारा और एकता होती है। भूमिहार अंतर्विवाही है और जात में ही विवाह करते है आज कल बहुत से लोग भूमिहार (भूईहार ब्राहण) होते नही पर बनते है ईन से दूर रहे ब्राहण (भूमिहार -भूइँहार-बाभन) के अलावा कोई अन्य जाती मात्र एक संयोग हो सकती है ईसके अलावा भूमियार (पूरानां पहचान कोली, सूत कातने वाले जोलाहा जाती) ब्राहण नही है ब्राहण (भूइंहार या भूमिहार) का मूल स्थान ईस समय के कानपूर जिले मे मदारपूर है मदारपूर भूमिहार ब्राहणो का प्रथम व सबसे प्राचीन व एक छोटा राज्य जो परशुराम जी के सहयोग से स्थापित हुआ था और यही पर ब्राहण (भूइँहार) सेना और मुगल बाबर की मल्लेछ सेना से युद्ध हुवा था भूमिहार ब्राहण को चाहिये की वो दुरव्यसनी दूराचारी आसुरी प्रवती के भूमिहारो का भी विवाह अपने समाज की कन्या से न होने द और ईनका प्रतिरोध करके ईनहे बाहर फेके अपने समाज से

ब्राहण (भूमिहार) समाज के लोग भूइंहार, भूमिहार ब्राहण नाम काे पेटेंट करा के सुरछित करा ले व सावधान रहे

ये भी देखें[संपादित करें]