भूमिहार

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भूमिहार ब्राह्मण या भूइंहार या बाभन एक ऐसी जाति है जो उत्तर प्रदेश,बिहार एवं बहुत थोड़ी संख्या में अन्य प्रदेशो मे निवास करते है। भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना गुरु मानते है। भूूमिहार ब्राह्मण सगुण निर्गुण भगवत भक्ति राम कृष्ण शिव नारायण विष्णु दुर्गा शक्ति सूर्य इंद्र अग्नि आदि के उपासक होते है तुलसी ,पीपल, गाय ,गंगा नदी ,यज्ञ भूमिहार ब्राह्मण के लिये पवित्र है

भूमिहार ब्राह्मण समाज में उपाधिय है पाण्डेय, तिवारी,त्रिपाठी, मिश्र, शुक्ल, उपाध्यय, शर्मा, पाठक दूबे,द्विवेदी इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारन एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय, शाही, सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही, सिंह (सिन्हा), चौधरी, ठाकुर बिहार में होते है त्यागी दिल्ली व आसपास के भूभाग मे होते है ब्राहण (भूइंहार ) के अलावा अन्य भी ये उपनाम प्रयोग करते है

जम्बू द्विपे भारतवर्षे ब्राह्मण परिचय

पंचगौड और पंचद्रविण़ में पाँच-पाँच मुख्य ब्राह्मण दलो को सम्मिलित किया गया है। पंचगौण हैं- गौड़,सारस्वत,कान्यकुब्ज,मैथिल,उत्कल पंचद्रविण हैं-नर्मदा के दक्षिणस्थ आन्ध्र, द्रविड़, कर्नाटक,महाराष्ट्र और गौड़गुर्जर-प्रदेश, इन्हें 'पंच द्रविड'कहा गया है। वहाँ के ब्राह्मण इन्हीं पाँचनामों से प्रसिद्ध हैं। भूमिहार ब्राहण या भूइंहार या बाभन पंचगौण प्रदेश के अन्तर्गत आते है

भूमिहार ब्राह्मण पुरोहित

भूमिहार ब्राह्मण कुछ जगह प्राचीन समय से पुरोहिती करते चले आ रहे है अनुसंधान करने पर पता लगा कि प्रयाग की त्रिवेणी के सभी पंडे भूमिहार ही तो हैं।हजारीबाग के इटखोरी और चतरा थाने के 8-10 कोस में बहुत से भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत,बंदौत , कायस्थ और माहुरी आदि की पुरोहिती सैकड़ों वर्ष से करते चले आ रहे हैं और गजरौला, ताँसीपुर के त्यागी लोग राजपूतों की यही इनका पेशा है।गया के देव के सूर्यमंदिर के पुजारी भूमिहार ब्राह्मण ही मिले। इसी प्रकार और जगह भी कुछ न कुछ यह बात किसी न किसी रूप में पाई गई। हलाकि गया के देव के सूर्यमंदिर का बड़ा हिसा सकद्विपियो को बेचा जा चूका है भूमिहार कुछ जगह मृतक संस्कार करने वाले भी होते है नेपाल और डुमरांव महाराज के दरबार मे ब्राहण (भूइंहार) प्रतिष्ठित थे

बनारस राज्य

Left: The Maharaja's Fort (Ramnagar Fort), front view, 1869. Right: Entrance gate to the fort, 1905. Left: The Maharaja's Fort (Ramnagar Fort), front view, 1869. Right: Entrance gate to the fort, 1905.
Left: The Maharaja's Fort (Ramnagar Fort), front view, 1869. Right: Entrance gate to the fort, 1905.

बनारस राज्य भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में 1725-1947 तक रहा | इसके अलावा कुछ अन्य बड़े राज्य बेतिया, हथुवा, टिकारी, तमकुही, लालगोला इत्यादि भी भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में रहे | बनारस के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेज वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना की ईट से ईट बजा दी थी | 1857 में हथुवा के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेजो के खिलाफ सर्वप्रथम बगावत की (यह दावा अभी विवादस्पद है)।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

भूमिहार व्यक्तित्व

दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती (जुझौतिया ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण, किसान आंदोलन के जनक), बैकुन्ठ शुक्ल (१४ मई १९३४ को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा फासी), स्वतन्त्रता सेनानी पंडित बटुकदेव शर्मा, शील भद्र, कर्यनन्द शर्मा, योगेन्द्र शुक्ल, चंद्रमा सिंह, पंडित राम बिनोद सिंह, राम नंदन मिश्र, यमुना प्रसाद त्रिपाठी, महावीर त्यागी, राज नरायण,रामवृक्ष बेनीपुरी, पं अलगू राय, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, बनारस के राजा चैत सिंह ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह किया वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना को धूल चटाई, देवीपद चौधरी, राज कुमार शुक्ल (चम्पारण आंदोलन कि शुरुवात की), फ़तेह बहादुर शाही हथुवा के राजा १८५७ में अंग्रेजो के खिलाफ सर्व प्रथम विद्रोह किया, काशी नरेश द्वारा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए कई हज़ार एक्कड़ का भूमि दान, योगेंद्र नारायण राय लालगोला (मुर्शिदाबाद) के राजा अपने दान व परोपकारी कार्यो के लिए प्रसिद्ध, इत्यादि महान व्यक्तित्व भूमिहार ब्राह्मण से थे। हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार कुबेरनाथ राय और हिंदी तथा भोजपूरी के वयोवृद्ध लेखक विवेकी राय का संबंध भूमिहार ब्राह्मण समुदाय से हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

भूमिहार ब्राह्मण का कूरी

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है। प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, महियाल, मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण, गौड़ शाखा के अयाचक त्यागी भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए।

भूमिहार ब्राह्मण के कुछ मूलों (कूरी) के लोगो का भूमिहार ब्राह्मण में संगठित होने की एक सूची यहाँ दी जा रही है :

कान्यकुब्ज ,सारस्वत,आदि गौड़ और मगध शाखा से :- दोनवार, सकरवार, किन्वार, ततिहा, ननहुलिया, वंशवार के तिवारी, कुढ़ानिया, दसिकर,गौतम, कोल्हा (कश्यप), गाजीपुर के काश्यप गोत्र के राय, काशी-बनारस के गौतम गोत्र के सिंह, मगध के शर्मा,नैनीजोर के तिवारी, पूसारोड (दरभंगा) खीरी से आये पराशर गोत्री पांडे, मुजफ्फरपुर में मथुरापुर के गर्ग गोत्री शुक्ल, गाजीपुर के भारद्वाजी, मचियाओं और खोर के पांडे, म्लाओं के सांकृत गोत्री पांडे, इलाहबाद के वत्स गोत्री गाना मिश्र,सवर्ण गोत्री बेमुवार और शांडिल्य गोत्री दिघवय - दिघ्वैत और दिघ्वय संदलपुर, मिथिला प्रदेश -बहादुरपुर के चौधरी प्रमुख है। महियालो से : - महियालो की बाली शाखा के पराशर गोत्री ब्राह्मण छपरा (बिहार) में एकसार स्थान पर बस गए। एकसार में प्रथम वास करने से वैशाली, मुजफ्फरपुर, चैनपुर, समस्तीपुर, छपरा, परसगढ़, सुरसंड, गौरैया कोठी, गमिरार, बहलालपुर, आदि गाँव में बसे हुए पराशर गोत्री एक्सरिया मूल के भूमिहार ब्राह्मण हो गए। पटना डाल्टनगंज रोड पर धरहरा, भरतपुर आदि कई गाँव में तथा दुमका, भोजपुर, रोहतास के कई गाँव में कौन्डिल्य गोत्री अथर्व भूमिहार ब्राह्मण रहते हैं

१. सर्वप्रथम १८८५ में ऋषिकुल भूषण काशी नरेश महाराज श्री इश्वरी प्रसाद सिंह जी ने वाराणसी में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना की.

२. १८८५ में अखिल भारतीय त्यागी महासभा की स्थापना मेरठ में हुई.

३. १८९० में मोहियल सभा की स्थापना हुई.

४. १९१३ में स्वामी सहजानंद जी ने बलिया में आयोजित

५. १९२६ में पटना में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा का अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी ने की.

६. १९२७ में प्रथम याचक ब्राह्मण सम्मलेन की अध्यक्षता सर गणेश दत्त ने की.

७. १९२७ में मेरठ में ही अखिल भारतीय त्यागी महासभा की अध्यक्षता राय बहादुर जगदेव राय ने की.

८. १९२६-२७ में अपने अधिवेशन में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने प्रस्ताव ६पारित कर भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग घोषित करते हुए अपने समाज के गठन में सम्मलित होने का निमंत्रण दिया.

९. १९२९ में सारस्वत ब्राह्मण महासभा ने भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग मानते हुए अनेक प्रतिनिधियों को अपने संगठन का सदस्य बनाया.

१०. १९४५ में बेतिया (बिहार) में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासम्मेलन हुआ

११. १९६८ में श्री सूर्य नारायण सिंह (बनारस) के प्रयास से ब्रहामर्शी सेवा समिति का गठन हुआ। और इश वर्ष रोहनिया में एक अधिवेशन हुआ।

१२. १९७५ कानपूर में भूमिहार ब्राह्मण समाज की स्थापना द्वाराका राय ने की

१३. १९७९ में अखिल भारतीय ब्रह्मर्षि परिषद् का गठन हुआ।

१४. ८ मार्च १९८१ गोरखपुर में भूमिहार ब्राह्मण समाज का गठन


" भूमिहार " शब्द कहा और कबसे अस्तित्व में आया ? भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था।.याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं, फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा.काफी विचार विमर्श के बाद " भूमिहार " शब्द अस्तित्व में आया।" भूमिहार ब्राह्मण " शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक है।

बनारस के महाराज ईश्वरी प्रसाद सिंह ने १८८५ में बिहार और उत्तर प्रदेश के जमींदार ब्राह्मणों की एक सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा की हमारी एक जातीय सभा होनी चाहिए.सभा बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे। परन्तु सभा का नाम क्या हो इस पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया। मगध के बाभनो ने जिनके नेता स्व.कालीचरण सिंह जी थे, सभा का नाम " बाभन सभा " करने का प्रस्ताव रखा.स्वयं महराज "भूमिहार ब्राह्मण सभा " के पक्ष में थे। बैठक मैं आम राय नहीं बन पाई, अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति गठित की गई। सात वर्षो के बाद समिति की सिफारिश पर " भूमिहार ब्राह्मण " शब्द को स्वीकृत किया गया और साथ ही साथ इस शब्द के प्रचार व् प्रसार का काम भी हाथ में लिया गया। इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्व.लंगट सिंह जी के सहयोग से मुजफ्फरपुर में एक कालेज खोला गया। बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. कालेज के नाम से पुकारा गया। आज वही कालेज लंगट सिंह कालेज के नाम से प्रसिद्द है।


अंग्रेजो ने यहाँ के सामाजिक स्तर का गहन अध्ययन कर अपने गजेतिअरों एवं अन्य पुस्तकों में भूमिहारो के उपवर्गों का उल्लेख किया है गढ़वाल काल के बाद मुसलमानों से त्रस्त भूमिहार ब्राह्मन ने जब कान्यकुब्ज क्षेत्र से पूर्व की ओर पलायन प्रारंभ किया और अपनी सुविधानुसार यत्र तत्र बस गए तो अनेक उपवर्गों के नाम से संबोधित होने लगे, यथा - ड्रोनवार, गौतम, कान्यकुब्ज, जेथारिया आदि.अनेक कारणों, अनेक रीतियों से उपवर्गों का नामकरण किया गया। कुछ लोगो ने अपने आदि पुरुष से अपना नामकरण किया और कुछ लोगो ने गोत्र से.कुछ का नामकरण उनके स्थान से हुवा जैसे - सोनभद्र नदी के किनारे रहने वालो का नाम सोन भरिया, आदि.मूलडीह के नाम पर भी कुछ लोगो का नामकरण हुआ जैसे, जेथारिया, हीरापुर पण्डे, वेलौचे, मचैया पाण्डे, कुसुमि तेवरी, ब्र्हम्पुरिये, दीक्षित, बनारस के सिंह गौतम गोत्र वाले ,गाजीपुर के राय काश्यप गोत्र वाले,बहादुरपुर-मिथिला के चौधरी,जुझौतिया,पिपरा के मिसिर, सोहगौरा के तिवारी, मगध के शर्मा ,हिरापुरी पांडे, घोर्नर के तिवारी, माम्खोर के शुक्ल, भरसी मिश्र, हस्त्गामे के पांडे, नैनीजोर के तिवारी, गाना के मिश्र, मचैया के पांडे, दुमतिकार तिवारी, आदि.भूमिहार ब्राह्मन में हैं। " वे ही ब्राह्मण भूमि का मालिक होने से भूमिहार कहलाने लगे और भूमिहारों को अपने में लेते हुए भूमिहार लोग पूर्व में कनौजिया से मिल जाते हैं[कृपया उद्धरण जोड़ें]

सामाजिक जीवन

पहले वर्ष के अंत में माता काली की पूजा करना, गरीबों और शरणागतों को भोजन करना और वस्त्र बाटना भूमिहारो के बहुत से गावों में एक प्रथा थी। भूमिहार को भूमि दान में मिलती थी। कृषि और पुरोहिती कर्म भूमिहारो का पेशा है। आज भूमिहार हर क्षेत्र में अग्रणीय है।

ये भी देखें

स्त्रोत References

Notes

साँचा:Princely states of India

Erioll world.svgनिर्देशांक: 25°16′55″N 82°57′23″E / 25.282°N 82.9563°E / 25.282; 82.9563

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