भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी

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भारतीय विज्ञान की परंपरा विश्व की प्राचीनतम वैज्ञानिक परंपराओं में एक है। भारत में विज्ञान का उद्भव ईसा से 3000 वर्ष पूर्व हुआ है। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त सिंध घाटी के प्रमाणों से वहाँ के लोगों की वैज्ञानिक दृष्टि तथा वैज्ञानिक उपकरणों के प्रयोगों का पता चलता है। प्राचीन काल में चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में चरक और सुश्रुत, खगोल विज्ञानगणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और आर्यभट्ट द्वितीय और रसायन विज्ञान में नागार्जुन की खोजों का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है। इनकी खोजों का प्रयोग आज भी किसी-न-किसी रूप में हो रहा है।

आज विज्ञान का स्वरूप काफी विकसित हो चुका है। पूरी दुनिया में तेजी से वैज्ञानिक खोजें हो रही हैं। इन आधुनिक वैज्ञानिक खोजों की दौड़ में भारत के जगदीश चंद्र बसु, प्रफुल्ल चंद्र राय, सी. वी. रमन, सत्येंद्रनाथ बोस, मेघनाथ साहा, प्रशांतचंद्र महाललोबिस, श्रीनिवास रामानुजम, हरगोविंद खुराना आदि का वनस्पति, भौतिकी, गणित, रसायन, यांत्रिकी, चिकित्सा विज्ञान, खगोल विज्ञान आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान है।

भारतीय विज्ञान : विकास के विभिन्न चरण तथा उपलब्धियाँ[संपादित करें]

भारतीय विज्ञान का विकास प्राचीन समय में ही हो गया था। अगर यह कहा जाए कि भारतीय विज्ञान की परंपरा दुनिया की प्राचीनतम परंपरा है, तो अतिशयोक्ति न होगी। जिस समय यूरोप में घुमक्कड़ जातियाँ अभी अपनी बस्तियाँ बसाना सीख रही थीं, उस समय भारत में सिंध घाटी के लोग सुनियोजित ढंग से नगर बसा कर रहने लगे थे। उस समय तक भवन-निर्माण, धातु-विज्ञान, वस्त्र-निर्माण, परिवहन-व्यवस्था आदि उन्नत दशा में विकसित हो चुके थे। फिर आर्यों के साथ भारत में विज्ञान की परंपरा और भी विकसित हो गई। इस काल में गणित, ज्योतिष, रसायन, खगोल, चिकित्सा, धातु आदि क्षेत्रों में विज्ञान ने खूब उन्नति की। विज्ञान की यह परंपरा ईसा के जन्म से लगभग 200वर्ष पूर्व से शुरू होकर ईसा के जन्म के बाद लगभग 11वीं सदी तक काफी उन्नत अवस्था में थी। इस बीच आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, बोधयन, चरक, सुश्रुत, नागार्जुन, कणाद से लेकर सवाई जयसिंह तक वैज्ञानिकों की एक लंबी परंपरा विकसित हुई।

मधयकाल यानी मुगलों के आने के बाद देश में लगातार लड़ाइयाँ चलती रहने के कारण भारतीय वैज्ञानिक परंपरा का विकास थोड़ा रुका अवश्य, किंतु प्राचीन भारतीय विज्ञान पर आधरित ग्रंथों के अरबी-फारसी में खूब अनुवाद हुए। यह एक महत्त्वपूर्ण चरण था, जिसका परिणाम हुआ कि भारतीय वैज्ञानिक परंपरा दूर देशों तक पहुँची जिसने सभी को प्रभावित किया। भारतीय वैज्ञानिक परंपरा के विकास का यह एक नया आयाम था। दूसरे देशों की वैज्ञानिक परंपराओं के साथ मिलकर इसने नया रूप ग्रहण किया।

मुगल शासन के बाद जब अंग्रेजी शासन स्थापित हुआ तो भारत में एक बार फिर से विज्ञान की परंपरा तेजी से विकास की ओर उन्मुख हुई। अब तक विभिन्न संस्कृतियों के साथ मिलकर भारतीय वैज्ञानिक परंपरा काफी प्रौढ़ हो चुकी थी। अंग्रेजी शासन के दौरान ज्ञान-विज्ञान के विविध स्रोत और संसाधन विकसित हुए, जिस कारण यहाँ की वैज्ञानिक परंपरा को विकसित होने के लिए खूब उर्वर भूमि प्राप्त हुई और इसने विविध क्षेत्रों में उपलब्धियाँ हासिल की।

समग्र भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को निम्नलिखित दो चरणों में बाँटकर विस्तार से अधययन किया जा सकता है -

1. प्राचीन भारतीय विज्ञान और

2. मधयकालीन तथा आधुनिक भारतीय विज्ञान

भारत में वैज्ञानिक अनुसंधानों और अविष्कारों की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। जिस समय यूरोप में घुमक्कड़ जनजातियाँ बस रही थीं उस समय सिंध घाटी के लोग सुनियोजित नगर बसाकर रहते थे। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा, काली बंगा, लोथल, चंहुदड़ों बनवाली, सुरकोटड़ा आदि स्थानों पर हुई खुदाई में मिले नगरों के खंडहर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इन नगरों के भवन, सड़कें, नालियाँ, स्नानागार, कोठार आदि पक्की ईंटों से बने थे। यहाँ के निवासी जहाजों द्वारा विदेश से व्यापार करते थे। माप-तौल का ज्ञान उन्हें था। परिवहन के लिए बैलगाड़ी का उपयोग होता था। कृषि उन्नत अवस्था में थी। वे काँसे का उपयोग करते थे। काँसे के बने हथियार और औजार इसका प्रमाण है। सुनार सोने, चाँदी और बहुमूल्य रत्नों के आभूषण बनाते थे। इसका अर्थ यह हुआ कि ये लोग खनन विद्या में पारंगत थे। कठोर रत्नों को काटने, गढ़ने, छेद करने के लिए उनके पास उन्नत कोटि के उपकरण थे। ये लोग ऊनी और सूती वस्त्र बनाना जानते थे। इन लोगों की संस्कृति को इतिहासकार हड़प्पा संस्कृति के नाम से जानते थे।

वैदिक काल के लोग खगोल विज्ञान का अच्छा ज्ञान रखते थे। वैदिक भारतीयों को 27नक्षत्रों का ज्ञान था। वे वर्ष, महीनों और दिनों के रूप में समय के विभाजन से परिचित थे। ‘लगध’ नाम के ऋषि ने ‘ज्योतिष वेदांग’ में तत्कालीन खगोलीय ज्ञान को व्यवस्थित कर दिया था।

गणित और ज्यामिति का वैदिक युग में पर्याप्त विकास हुआ था। वैदिककालीन भारतीय तक गणना कर सकते थे।

वैदिक युग की विशिष्ट उपलब्धि चिकित्सा के क्षेत्र में थी। मानव शरीर के सूक्ष्म अधययन के लिए वे शव विच्छेदन (पोस्ट मार्टम) प्रक्रिया का कुशलता से उपयोग करते थे। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और उनके औषधय गुणों के बारे में लोगों को विशद ज्ञान था। तत्कालीन चिकित्सक स्नायुतंत्र और सुषुम्ना (रीढ़ की हड्डी) के महत्त्व से भली-भाँति परिचित थे।

मौसम-परिवर्तन शरीर, में सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति तथा रोग पैदा करने वाले आनुवांशिक कारकों आदि के सिद्धंतों को वहाँ से मान्यता प्राप्त थी। आयुर्वेद चिकित्सा-पद्धति का बहुतायत में उपयोग होता था। आवश्यकता पड़ने पर शल्य-चिकित्सा भी की जाती थी। बाद में तो अरबों तथा यूनानियों ने भी शल्य-चिकित्सा को अपनाया। फिर तो रोम साम्राज्य में भारतीय जड़ी-बूटियों की भी माँग चिकित्सा के क्षेत्र में होने लगी। उसी समय वनस्पतियों और जंतुओं के बाह्य तथा आंतरिक संरचनाओं के अधययन भी किए गए। कृषि के क्षेत्र में मिट्टी की उवर्रता बढ़ाने के लिए फसल चक्र की पद्धति तब भी अपनाई जाती थी। भारत में वैज्ञानिक प्रगति का स्वर्ण काल ईसा से पूर्व चौथी शताब्दी से लेकर ईसा के बाद छठी या सातवीं शताब्दी तक रहा। धातु-कर्म, भौतिकी, रसायन-शास्त्र जैसे विज्ञानों का विकास भी इस युग में हुआ था। मौर्यकाल में युद्ध के लिए अस्त्रों और शस्त्रों का विकास किया गया था। कुछ यांत्रिक अस्त्रों, जैसे - प्रक्षेपकों का विकास तथा सिंचाई में अभियांत्रिकी का उपयोग उल्लेखनीय है। इस काल में भू-सर्वेक्षण की तकनीक अत्यंत विकसित थी। विशालकाय प्रस्तर स्तंभों के निर्माण में अनेक प्रकार के वैज्ञानिक कौशलों का उपयोग इस युग की एक अन्य विशेषता है।

इसके बाद गुप्तकाल में विज्ञान की सभी शाखाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई। बीज गणित, ज्यामिति, रसायन शास्त्र, भौतिकी, धातुशिल्प, चिकित्सा, खगोल विज्ञान का विकास चरम सीमा पर था। इस युग में अनेक ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक हुए जिनके अनुसंधानों और आविष्कारों का लोहा तत्कालीन सभ्य समाज के लोग मानते थे।

प्राचीन भारतीय विज्ञान की उपलब्धियाँ[संपादित करें]

खगोल विज्ञान[संपादित करें]

यह विज्ञान भारत में ही विकसित हुआ। प्रसिद्ध जर्मन खगोलविज्ञानी कॉपरनिकस से लगभग 1000 वर्ष पूर्व आर्यभट्ट ने पृथ्वी की गोल आकृति और इसके अपनी धरी पर घूमने की पुष्टि कर दी थी। इसी तरह आइजक न्यूटन से 1000 वर्ष पूर्व ही ब्रह्मगुप्त ने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण सिद्धंत की पुष्टि कर दी थी। यह एक अलग बात है कि किन्हीं कारणों से इनका श्रेय पाश्चात्य वैज्ञानिकों को मिला।

भारतीय खगोल विज्ञान का उद्भव वेदों से माना जाता है। वैदिककालीन भारतीय धर्मप्राण व्यक्ति थे। वे अपने यज्ञ तथा अन्य धर्मिक अनुष्ठान ग्रहों की स्थिति के अनुसार शुभ लग्न देखकर किया करते थे। शुभ लग्न जानने के लिए उन्होंने खगोल विज्ञान का विकास किया था। वैदिक आर्य सूर्य की उत्तरायण और दक्षिणायन गति से परिचित थे। वैदिककालीन खगोल विज्ञान का एक मात्र ग्रंथ ‘वेदांग ज्योतिष’ है। इसकी रचना ‘लगध’ नामक ऋषि ने ईसा से लगभग 100 वर्ष पूर्व की थी। महाभारत में भी खगोल विज्ञान से संबंधित जानकारी मिलती है। महाभारत में चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण की चर्चा है। इस काल के लोगों को ज्ञात था कि ग्रहण केवल अमावस्या और पूर्णिमा को ही लग सकते हैं। इस काल के लोगों का ग्रहों के विषय में भी अच्छा ज्ञान था। ‘वेदांग ज्योतिष’ के बाद लगभग एक हजार वर्षों तक खगोल विज्ञान का कोई ग्रंथ नहीं मिलता।

पाँचवीं शताब्दी में आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम लोगों को बताया कि पृथ्वी गोल है और यह अपनी धरी पर चक्कर लगाती है। उन्होंने पृथ्वी के आकार, गति और परिधि का अनुमान भी लगाया था। आर्यभट्ट ने सूर्य और चंद्र ग्रहण के सही कारणों का पता लगाया। उनके अनुसार चंद्रमा और पृथ्वी की परछाई पड़ने से ग्रहण लगता है। चंद्रमा में अपना प्रकाश नहीं है, वह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित है। इसी प्रकार आर्यभट्ट ने राहु-केतु द्वारा सूर्य और चंद्र को ग्रस लेने के सिद्धंत का खंडन किया और ग्रहण का सही वैज्ञानिक सिद्धंत प्रतिपादित किया। आर्यभट्ट ने ‘आर्यभटीय’ तथा ‘आर्य सिद्धंत’ नामक ग्रंथों की रचना की थी।

आर्यभट्ट के बाद छठी शताब्दी में वराहमिहिर नाम के खगोल वैज्ञानिक हुए। विज्ञान के इतिहास में वे प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने कहा कि कोई ऐसी शक्ति है, जो वस्तुओं को धरातल से बाँधो रखती है। आज इसी शक्ति को गुरुत्वाकर्षण कहते हैं। वराहमिहिर का कहना था कि पृथ्वी गोल है, जिसके धरातल पर पहाड़, नदियाँ, पेड़-पौधो, नगर आदि फैले हुए हैं। ‘पंचसिद्धंतिका’ और ‘सूर्यसिद्धंत’ उनकी खगोल विज्ञान संबंधी पुस्तकें हैं। इनके अतिरिक्त वराहमिहिर ने ‘वृहत्संहिता’ और ‘वृहज्जातक’ नाम की पुस्तकें भी लिखी हैं।

इसके बाद भारतीय खगोल विज्ञान में ब्रह्मगुप्त का भी काफ़ी महत्त्वपूर्ण योगदान है। इनका कार्यकाल सातवीं शताब्दी से माना जाता है। वे खगोल विज्ञान संबंध गणनाओं में संभवतः बीजगणित का प्रयोग करने वाले भारत के सबसे पहले महान गणितज्ञ थे। ‘ब्रह्मगुप्त सिद्धंत’ इनका प्रमुख ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त जीवन के अंतिम वर्षों में ब्रह्मगुप्त ने ‘खंड खाद्यक’ नामक ग्रंथ भी लिखा था। इन्होंने विभिन्न ग्रहों की गति और स्थिति, उनके उदय और अस्त, युति तथा सूर्य ग्रहण की गणना करने की विधियों का वर्णन किया है। ब्रह्मगुप्त का ग्रहों का ज्ञान प्रत्यक्ष वेध (अवलोकन) पर आधरित था। इनका मानना था कि जब कभी गणना और वेध में अंतर पड़ने लगे तो वेध के द्वारा गणना शुद्ध कर लेनी चाहिए। ये पृथ्वी को गोल मानते थे तथा पुराणों में पृथ्वी को चपटी मानने के विचार की इन्होंने कड़ी आलोचना की है। ब्रह्मगुप्त आर्यभट्ट के अनेक सिद्धंतों के साथ पृथ्वी के अपनी धरी पर घूमने के सिद्धंत के भी आलोचक थे। ब्रह्मगुप्त पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के सिद्धंत से सहमत थे। उनके अनुसार ‘वस्तुएँ पृथ्वी की ओर गिरती हैं क्योंकि पृथ्वी की प्रकृति है कि वह उन्हें अपनी ओर आकर्षित करे।’

ब्रह्मगुप्त के बाद खगोल विज्ञान में भास्कराचार्य का विशिष्ट योगदान है। इनका समय बारहवीं शताब्दी था। वे गणित के प्रकांड पंडित थे। इन्होंने ‘सिद्धन्तशिरोमणि’ और ‘करण कुतुहल’ नामक दो ग्रंथों की रचना की थी। खगोलविद् के रूप में भास्कराचार्य अपनी ‘तात्कालिक गति’ की अवधरणा के लिए प्रसिद्ध हैं। इससे खगोल वैज्ञानिकों को ग्रहों की गति का सही ज्ञान प्राप्त करने में मदद मिलती है।

भास्कर ने एक तो गोले की सतह और उसके घनफल को निकालने के जर्मन ज्योतिर्विद केपलर के नियम का पूर्वाभ्यास कर लिया था। दूसरे उन्होंने सत्रहवीं शताब्दी में जन्मे आइजैक न्यूटन से लगभग 500 वर्ष पूर्व गुरुत्वाकर्षण सिद्धंत का प्रतिपादन किया था।

गणित[संपादित करें]

अधिकतर खोज और अविष्कार जिन पर आज यूरोप को इतना गर्व है, एक विकसित गणितीय पद्धति के बिना असंभव थे। यह पद्धति भी संभव नहीं हो पाती यदि यूरोप भारी-भरकम रोमन अंकों के बंधन में जकड़ा रहता। नई पद्धति को खोज निकालने वाला वह अज्ञात व्यक्ति भारत का पुत्र था। मधययुगीन भारतीय गणितज्ञों, जैसे ब्रह्मगुप्त (सातवीं शताब्दी), महावीर (नवीं शताब्दी) और भास्कर (बारहवीं शताब्दी) ने ऐसी कई खोजे कीं, जिनसे पुनर्जागरण काल या उसके बाद तक भी यूरोप अपरिचित था। इसमें कोई मतभेद नहीं कि भारत में गणित की उच्चकोटि की परंपरा थी।

अंकगणित[संपादित करें]

हड़प्पाकालीन संस्कृति के लोग अवश्य ही अंकों और संख्याओं से परिचित रहे होंगे। इस युग की लिपि के अब तक न पढ़े जा सकने के कारण निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन भवन, सड़कों, नालियों, स्नानागारों आदि के निर्माण में अंकों और संख्याओं का निश्चित रूप से उपयोग हुआ होगा। माप-तौल और व्यापार क्या बिना अंकों और संख्याओं के संभव था? हड़प्पाकालीन संस्कृति की लिपि के पढ़े जाने के बाद निश्चित ही अनेक नए तथ्य उद्घाटित होंगे। इसके बाद वैदिककालीन भारतीय अंकों और संख्याओं का उपयोग करते थे। वैदिक युग के एक ऋषि मेधतिथि 1012 तक की बड़ी संख्याओं से परिचित थे। वे अपनी गणनाओं में दस और इसके गुणकों का उपयोग करते थे। ‘यजुर्वेद संहिता’ अधयाय 17, मंत्र 2 में 10,00,00,00,00,000 (एक पर बारह शून्य, दस खरब) तक की संख्या का उल्लेख है। ईसा से 100 वर्ष पूर्व का जैन ग्रंथ ‘अनुयोग द्वार सूत्र’ है। इसमें असंख्य तक गणना की गई है, जिसका परिमाण 10140 के बराबर है। उस समय यूनान में बड़ी-से-बड़ी संख्या का नाम 'मिरियड' था, जो 10,000 (दस सहस्र) थे और रोम के लोगों की बड़ी-से-बड़ी संख्या का नाम मिल्ली था, जो 1000 (सहस्र) थी। शून्य का उपयोग पिंगल ने अपने छन्दसूत्र में ईसा के 200 वर्ष पूर्व किया था। इसके बाद तो शून्य का उपयोग अनेक ग्रंथों में किया गया है। लेकिन ब्रह्मगुप्त (छठी शताब्दी) पहले भारतीय गणितज्ञ थे जिन्होंने शून्य को प्रयोग में लाने के नियम बनाए। इनके अनुसार-

  • शून्य को किसी संख्या से घटाने या उसमें जोड़ने पर उस संख्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • शून्य से किसी संख्या का गुणनफल भी शून्य होता है।
  • किसी संख्या को शून्य से विभाजित करने पर उसका परिणाम अनंत होता है।

उन्होंने यह गलत कहा कि शून्य से विभाजित करो तो परिणाम शून्य होता है क्योंकि आज हम जानते हैं कि यह अनन्त की संख्या होती है। अब यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गया है कि संसार को संख्याएँ लिखने की आधुनिक प्रणाली भारत ने ही दी है।

ज्यामिति[संपादित करें]

ज्यामिति का ज्ञान हड़प्पाकालीन संस्कृति के लोगों को भी था। ईंटों की आकृति, भवनों की आकृति, सड़कों का समकोण पर काटना इस बात का द्योतक है कि उस काल के लोगों को ज्यामिति का ज्ञान था। वैदिक काल में आर्य यज्ञ की वेदियों को बनाने के लिए ज्यामिति के ज्ञान का उपयोग करते थे। ‘शुल्बसूत्र’ में वर्ग और आयत बनाने की विधि दी हुई है। भुजा के संबंध को लेकर वर्ग के समान आयत, वर्ग के समान वृत्त आदि प्रश्नों पर इस ग्रंथ में विचार किया गया है। किसी त्रिकोण के बराबर वर्ग खींच ऐसा वर्ग बनाना जो किसी वर्ग का दो गुणा, तीन गुणा अथवा एक तिहाई हो, ऐसा वर्ग बनाना, जिसका क्षेत्रफल उपस्थित वर्ग के क्षेत्र के बराबर हो, इत्यादि की रीतियाँ भी ‘शुल्ब सूत्र’ में दी गई हैं।

आर्यभट्ट ने वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात (पाई π) का मान 3.1416 स्थापित किया है। उन्होंने पहली बार कहा कि यह पाई का सन्निकट मान है।

त्रिकोणमिति[संपादित करें]

त्रिकोणमिति के क्षेत्र में भारतीयों ने जो काम किया, वह अनुपमेय और मौलिक है। इन्होंने ज्या, कोटिज्या और उत्क्रमज्या का आविष्कार किया। वराहमिहिर कृत ‘सूर्य सिद्धंत’ (छठी शताब्दी) में त्रिकोणमिति का जो विवरण है, उसका ज्ञान यूरोप को ब्रिग्स के द्वारा सोलहवीं शताब्दी में मिला। ब्रह्मगुप्त (सातवीं शताब्दी) ने भी त्रिकोणमिति पर लिखा है और एक ज्या सारणी भी दी है।

बीजगणित[संपादित करें]

भारतीयों ने बीजगणित में भी बड़ी दक्षता प्राप्त की थी। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, श्रीधराचार्य आदि प्रसिद्ध गणितज्ञ थे। बीजगणित के क्षेत्र में सबसे बड़ी उपलब्धि है - 'अनिवार्य वर्ग समीकरण का हल प्रस्तुत करना'। पाश्चात्य गणित के इतिहास में इस समीकरण के हल का श्रेय ‘जॉन पेल’ (1688 ई.) को दिया जाता है और इसे ‘पेल समीकरण’ के नाम से ही जाना जाता है, परंतु वास्तविकता यह है कि पेल से एक हजार वर्ष पूर्व ब्रह्मगुप्त ने इस समीकरण का हल प्रस्तुत कर दिया था। इसके लिए ब्रह्मगुप्त ने दो प्रमेयकाओं की खोज की थी। अनिवार्य वर्ग समीकरण के लिए भारतीय नाम वर्ग-प्रकृति है।

चिकित्सा[संपादित करें]

भारत में चिकित्सा विज्ञान की सुदीर्घ परंपरा है। चिकित्सा शास्त्र को वेद तुल्य सम्मान दिया गया है। यही कारण है कि भारतीय चिकित्सा पद्धति को आयुर्वेद की संज्ञा से अभिनिहित किया जाता है। भारतीय चिकित्सा पद्धति के विषय में सर्वप्रथम लिखित ज्ञान ‘अथर्ववेद’ में मिलता है। अथर्ववेद में विविध रोगों के उपचारार्थ प्रयोग किए जाने संबंध भैषज्य सूत्र संकलित हैं। इन सूत्रों में विभिन्न रोगों के नाम तथा उनके निराकरण के लिए विभिन्न प्रकार की औषधियों के नाम भी दिए गए हैं। जल चिकित्सा, सूर्य किरण चिकित्सा और मानसिक चिकित्सा के विषयों पर इसमें विस्तृत विवरण मिलता है। अथर्ववेद के बाद ईसा से लगभग 600 वर्ष पूर्व काय चिकित्सा पर ‘चरकसंहिता’ और शल्य चिकित्सा पर ‘सुश्रुत संहिता’ मिलती हैं। ये चिकित्सा शास्त्र के प्रामाणिक और विश्वविख्यात ग्रंथ हैं।

चरक संहिता[संपादित करें]

महर्षि चरक को काय चिकित्सा का प्रथम ग्रंथ लिखने का श्रेय दिया जाता है। ‘चरक संहिता’ को औषधय शास्त्र में आयुर्वेद पद्धति का आधर माना जाता है। आयुर्वेद का अर्थ है ‘जीवन का शास्त्र’।

चरक संभवतः इस बात को जानते थे कि शरीर में हृदय एक मुख्य अवयव है। उन्हें शरीर में रक्त संचार क्रिया का भी ज्ञान था। वे यह भी जानते थे कि कुछ बीमारियाँ ऐसे कीटाणुओं के कारण होती हैं जिन्हें हम अपनी आँखों से सीध नहीं देख सकते। ‘चरक संहिता’ तत्कालीन प्रशिक्षित चिकित्सकों और चिकित्सालयों का भी विवरण मिलता है। चरक पहले चिकित्सक थे, जिन्होंने चयापचय, पाचन और शरीर प्रतिरक्षा के बारे में बताया। ‘चरक संहिता’ में शरीर विज्ञान, निदान शास्त्र और भ्रूण विज्ञान के विषय में जानकारी मिलती है। चरक को आनुवांशिकी के मूल सिद्धंतों का भी ज्ञान था। उन्हें उन कारणों का पता था जिससे बच्चे का लिंग निश्चित होता है। ‘चरक संहिता’ का अनुवाद अनेक विदेशी भाषाओं में हुआ है।

सुश्रुत संहिता[संपादित करें]

सुश्रुत रचित यह ग्रंथ भारतीय शल्य चिकित्सा पद्धति का विश्वविख्यात ग्रंथ है। इस संहिता में सुश्रुत ने अपने से पहले के शल्य चिकित्सकों के ज्ञान और अनुभवों को संकलित कर एक व्यवस्थित रूप दिया है। अपनी संहिता में उन्होंने लिखा है कि चिकित्सा विज्ञान के विद्धर्थी मृत शरीर के विच्छेदन से अपने कार्य में कुशल बनते हैं। सुश्रुत के अनुसार शव विच्छेदन एक प्रक्रिया है। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा के लिए 101 उपकरणों की सूची भी दी है। उनका कहना था कि इनके अतिरिक्त आवश्यकतानुसार स्वयं भी उपकरण तैयार करने चाहिए। उनकी सूची में चिमटियाँ, चाकू, सूइयाँ, सलाइयाँ तथा नलिका आकृति के वे सब उपकरण हैं जिनका प्रयोग आज का शल्य चिकित्सक करता है। शल्य चिकित्सा से पहले उपकरणों को गर्म करके कीटाणु रहित करने की बात भी उन्होंने कही है। सुश्रुत भूज नलिका में पाए जाने वाले पत्थर निकालने में, टूटी हड्डियों को जोड़ने और मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा में बहुत दक्ष थे। सुश्रुत को पूरे संसार में आज प्लास्टिक सर्जरी का जनक कहा जाता है। सुश्रुत संहिता में नाक, कान और ओंठ की प्लास्टिक सर्जरी का पूरा विवरण दिया गया है। चरक और सुश्रुत की ही परंपराओं को अनेक सुप्रसिद्ध चिकित्सकों ने आगे बढ़ाया। महर्षि अजेय ने नाड़ी और श्वास की गति पर प्रकाश डाला। महर्षि पतंजलि ने योग से शरीर को निरोग रखने के उपाय बताए। आधुनिक चिकित्सक भी अब हृदय के रोगों के लिए योग का सहारा लेते हैं। आचार्य जीवक भगवान बुद्ध के चिकित्सक थे। उन्होंने अनेक असाधय रोगों की चिकित्सा की विधियाँ बताई हैं। वृद्धजय में गिने जाने वाले वाग्भट्ट ने ‘अष्टांग संग्रह’ और ‘अष्टांगहृदय संहिता’ की रचना की थी। इनमें आयुर्वेद का संपूर्ण ज्ञान समाहित हो गया है। माधवाकर रोग निदान और रोग लक्षणों पर प्रकाश डालने वाले पहले आचार्य थे। ‘चरक संहिता’ के संपादक दृढ़बल तथा ‘भावप्रकाश’ के लेखक भावमिश्र चिकित्सा जगत के महान आचार्य थे।

पशु चिकित्सा[संपादित करें]

भारत में पशुचिकित्सा विज्ञान भी काफ़ी विकसित था। घोड़ों, हाथियों, गाय-बैलों की चिकित्सा से संबंधित अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं। 'शालिहोत्र' नामक पशु चिकित्सक के ‘हय आयुर्वेद’, ‘अश्व लक्षण शास्त्र’ तथा ‘अश्व प्रशंसा’ नाम के तीन ग्रंथ उपलब्ध हैं। इनमें घोड़ों के रोगों और उनके उपचार के लिए औषधियों का विवरण है। इन ग्रंथों के अनुवाद अनेक विदेशी भाषाओं में हुए। पालकप्य के ‘हास्ते-आयुर्वेद’ में हाथियों की शरीर रचना तथा उनके रोगों का विवरण, उनके रोगों की शल्य क्रिया और औषधियों द्वारा चिकित्सा, देखभाल और आहार का विवरण चरक और सुश्रुत की संहिताओं में भी मिलता है।

भौतिकी[संपादित करें]

प्राचीन काल में भारत में अन्य विज्ञानों के साथ-साथ भौतिकी का भी प्रचलन था। कणाद ऋषि ने छठी शताब्दी ईसा पूर्व ही इस बात को सिद्ध कर दिया था कि विश्व का हर पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बना है। उन्होंने परमाणुओं की संरचना, प्रवृत्ति तथा प्रकारों की चर्चा की है।

रसायन विज्ञान[संपादित करें]

भारत में रसायन विज्ञान की भी बहुत पुरानी परंपरा है। प्राचीन तथा मधय काल में संस्कृत भाषा में लिखित रसायन विज्ञान के 44 ग्रंथ उपलब्ध हैं। नागार्जुन (दसवीं शताब्दी) ने रसायन विज्ञान पर ‘रसरत्नाकर’ नामक ग्रंथ लिखा है। इस ग्रंथ में पारे के यौगिक बनाने के प्रयोग दिए गए हैं। चाँदी, सोना, टिन और ताँबे के अयस्क भूगर्भ से निकालने और उन्हें शुद्ध करने की विधियों का विवरण भी दिया गया है। नागार्जुन पारे से संजीवनी बनाने के लिए पशुओं और वनस्पति के तत्त्वों तथा अम्ल और खनिजों का उपयोग करते थे। वनस्पति निर्मित तेजाबों में वे हीरे, धातु और मोती गला लेते थे। नागार्जुन ने रसायन विज्ञान में काम आने वाले उपकरणों का विवरण भी दिया है। इस ग्रंथ में आसवन, द्रवण, उधर्वपातन और भूनने का भी वर्णन है। नागार्जुन के अतिरिक्त भारत के महान रसायन शास्त्र वृंद का नाम भी उल्लेखनीय है। इन्होंने औषधि रसायन पर ‘सिद्ध योग’ नामक ग्रंथ की रचना की है। इसमें विभिन्न रोगों के उपचार के लिए धातुओं के मिश्रण का विवरण दिया गया है। भारत में रसायन शास्त्रियों ने पहली और दूसरी शताब्दी तक ही कई रासायनिक फॉर्मूले खोज लिए थे। पारद (पारा) के यौगिक, अकार्बनिक लवण तथा मिश्र धातुओं का प्रयोग और मसालों से कई प्रकार के इत्र बनाए जाते थे।

धातु विज्ञान[संपादित करें]

भारत में हड़प्पा कालीन संस्कृति के समय से ही अनेक धातुओं का उपयोग होता आ रहा है। धातुओं को प्राप्त करने के लिए कई विज्ञानों का सहारा लेना पड़ता है। धातुओं के अयस्कों की खोज के लिए भूविज्ञान में दक्षता अनिवार्य है। अयस्कों से धातु निकालने तथा उन्हें मिश्रित धातु बनाने के लिए रसायन विज्ञान और धातु विज्ञान की दक्षता अपेक्षित है। भारत को प्राचीन काल से ही इन सभी विज्ञानों में दक्षता प्राप्त है। धातु विज्ञान में भारत की दक्षता उच्च कोटि की थी। ईसा पूर्व 326 ई. में पोरस ने 30पौंड वजन का भारतीय इस्पात सिकंदर को भेंट में दिया। एक राजा दूसरे राजा को अनुपमेय, दुर्लभ और अतिविशिष्ट वस्तुएँ ही भेंट किया करते थे। भारतीय इस्पात ऐसी ही अति विशिष्ट वस्तु थी। उस काल में भारतीय इस्पात इतनी उच्चकोटि का होता था कि विशेष प्रकार के औजार और अस्त्र-शस्त्र बनाने के लिए तत्कालीन सभ्य देशों में उसकी बहुत माँग थी।

दिल्ली के महरौली इलाके में कुतुबमीनार के निकट खड़ा लौह स्तंभ (चौथी शताब्दी) 1700 वर्षों की सर्दी गर्मी और बरसात सहकर भी जंगविहीन बना हुआ है। यह भारत के उत्कृष्ट लौह कर्म का नमूना है। महरौली के लौह स्तंभ जैसा ही लगभग 7.5 मीटर ऊँचा एक प्राचीन लौह स्तंभ कर्नाटक की पर्वत शृंखलाओं में खड़ा है। इस पर भी जंग का कोई प्रभाव नहीं हुआ है। यही नहीं उड़ीसा के कोणार्क मंदिर (तेरहवीं शताब्दी) में लगभग 10.5 मीटर लंबा तथा 90 टन के भार वाला लोहे का स्तंभ भी आज तक जंगविहीन है। यही नहीं इतने भारी स्तंभ को ढालकर बनाना ही भारत की मध्यकालीन प्रणाली की विस्मयकारी उपलब्धि है। लोहा ही नहीं सोना, चांदी, ताँबा, टिन, जस्ता जैसी अनेक धातुओं के अयस्क खोजने तथा उन्हें गलाकर शुद्ध धातु प्राप्त करने में भारतीय वैज्ञानिकों को महारत हासिल थी। अनेक धातुओं की तो वे भस्म बनाकर औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं।

रत्न विज्ञान[संपादित करें]

भारत का रत्न विज्ञान भी उच्चकोटि का था। भारतीयों को वज्र (हीरा), मरफत, पद्मराग, मुक्ता, महानील, इंद्रनील, वैदर्य, ग्रंथशस्य, चंद्रकांत, सूर्यकांत, स्फटिक, पुलक, कर्केंतन, पुष्पराग, ज्योतिरस, राज पट्ट, राजमय, सौगंधिक, जंज, शंख, गोमेद, रुधिराक्ष, भल्लातक धली, तथक, सीस, पीलू, प्रवाल, गिरिवज्र, भुजंगमणि, वज्रमणि, हिट्टिभ, पिंड़, भ्रामर, उत्पल आदि रत्नों का ज्ञान था। इन रत्नों को भूमि या जल से निकालना, उन्हें आभूषणों में जड़े जाने योग्य बनाना, हमारे विज्ञान और अभियंत्रिकी दोनों का ही कमाल था। हीरा संसार में कठोरतम पदार्थ है। इसे काटने के लिए उपकरण भी प्राचीन काल में भारतीयों ने विकसित किए थे।

विविध[संपादित करें]

इनके अतिरिक्त जलयान निर्माण में मधयकाल तक भारत यूरोप से आगे था। वस्त्र निर्माण में भारत ने असाधारण दक्षता प्राप्त की थी। शताब्दियों पहले भारत में कपड़े रंगने के लिए 100 से अधिक वनस्पति और खनिजों से प्राप्त रंगों का उपयोग होता था। विज्ञान की अन्य अनेक शाखाओं में भारत की उच्चकोटि की उपलब्धियाँ थीं। दसवीं शताब्दी के बाद विदेशी आक्रमणकारियों ने समस्त उत्तर भारत को पदाक्रांत कर दिया था। चारों ओर अव्यवस्था और अराजकता थी। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक अनुसंधान करने का किसे होश था। केवल दक्षिण भारत के कुछ भागों में वैज्ञानिक गतिविधियाँ चलती रहीं। अंग्रेजों के आगमन के बाद काफ़ी समय तक छिटपुट लड़ाइयाँ चलती रहीं। अंग्रेजों का लगभग पूरे भारत पर आधिपत्य हो जाने के बाद विज्ञान के क्षेत्र में कुछ भारतीयों ने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं।

आधुनिक भारतीय विज्ञान की परम्परा का विकास[संपादित करें]

भारत में आधुनिक वैज्ञानिक परंपरा का विकास मुख्य रूप से ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के बाद से शुरू हुआ। यहाँ एक बात मुख्य रूप से धयान देने की है। वह यह कि आधुनिक वैज्ञानिक परंपरा प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा से बहुत भिन्न नहीं है। बल्कि उसी को आगे बढ़ाने वाली एक कड़ी के रूप में विकसित हुई है। दोनों परंपराओं के विकास में एक मूलभूत अंतर है, वह है यांत्रिकी का विकास। प्राचीन भारतीय परंपरा ने विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में तो काफ़ी तेजी से विकास कर लिया था, किंतु यांत्रिकी यानी मशीनी स्तर पर कोई महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल नहीं की। आधुनिक वैज्ञानिक परंपरा यहीं से प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा से खुद को अलग कर लेती है। पूरे आधुनिक परिदृश्य को देखें तो आधुनिक वैज्ञानिक परंपरा की सबसे बड़ी उपलब्धि रही है, यांत्रिकी का विकास। अब तक जो भी प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियाँ थीं उन्हीं को आधर बनाते हुए यांत्रिकी का विकास किया गया और यह परंपरा पूरी दुनिया में प्रचलित हो गई। फिर यांत्रिकी के विकास से विज्ञान में नए अनुसंधानों के अनेक रास्ते खुले, जैसे - कंप्यूटर के विकास से रसायन, भौतिक, जीव विज्ञान आदि हर क्षेत्र में नए-नए प्रयोगों में आसानी हो गई। आधुनिक वैज्ञानिक परंपरा के एक-साथ पूरी दूनिया में प्रसार के पीछे मुख्य कारण था - दुनिया के ज़्यादातर देशों में अंग्रेजों का राज। इसी प्रकार जिस भी यांत्रिक अथवा वैज्ञानिक परंपरा का विकास हुआ वह थोड़े-से अंतर पर अथवा एक-साथ पूरी दुनिया में प्रचलित हो गई। अतः आधुनिक वैज्ञानिक परंपरा ने देश और काल की सीमाएँ भी तोड़ी। इसी तरह अलग-अलग देशों के वैज्ञानिकों ने तो अपने स्तर पर वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हासिल की ही, दूसरे वैज्ञानिकों की खोजों से प्रेरणा लेकर कई नई खोजें भी कीं और साथ ही दूसरों की खोजों को भी आगे बढ़ाया। इस तरह भारतीय आधुनिक वैज्ञानिक परंपरा के विकास का अधययन करते समय हमें मुख्य रूप से दो पक्षों पर धयान रखना आवश्यक होगा-

1. आधुनिक भारत की मौलिक वैज्ञानिक परंपरा और

2. आधुनिक भारत की मिश्रित वैज्ञानिक परंपरा

आधुनिक भारत की मौलिक वैज्ञानिक परंपरा[संपादित करें]

इस परंपरा के अंतर्गत उन वैज्ञानिक खोजों को रखा जा सकता है, जो भारत में जन्मे और भारत में ही रहकर, यहीं के संसाधनों से यहीं वैज्ञानिक खोजें कीं और दुनिया के सामने मिसाल कायम की। वैसे तो अंग्रेजों के आने के बाद ज़्यादातर वैज्ञानिक खोज अंग्रेजों के द्वारा ही की गई, किंतु उनके साथ-साथ भारतीय वैज्ञानिकों ने भी अनेक प्रयोग किए और उपलब्धियाँ हासिल कीं। 14 नवम्बर 1941 को केंद्रीय एसेम्बली में पारित प्रस्ताव सी. एस. आई. आर. की स्थापना इस दिशा में पहला कदम था। फिर 26 सितंबर 1942 को सर ए. रामास्वामी मुदालियर और डॉ॰शांतिस्वरूप भटनागर के प्रयासों के फलस्वरूप वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (कौंसिल ऑफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्ट्रियल रिसर्च / सी. एस. आई. आर.) यानीकी स्थापना, नई दिल्ली में एक स्वायत्त संस्था के रूप में हुई। हालाँकि इसकी नींव अंग्रेजों के कार्यकाल में ही पड़ गई थी परंतु काम-काज के सारे नियंत्रण अंग्रेजों के पास होने के कारण विकास कार्य नगण्य ही था। इसलिए हमारा देश लगभग हर वस्तु, सुई, टूथपेस्ट जैसी रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुओं के लिए भी दूसरे देशों पर निर्भर था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभाजन के कारण तो और भी नुकसान पहुँचा। इससे सर्वाधिक क्षति सूत और जूट उद्योग को हुई, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भारत का वैज्ञानिक विकास देश के प्रथम प्रधनमंत्र पं॰ जवाहरलाल नेहरू के समय में हुआ। उन्होंने देश के वैज्ञानिक विकास के लिए लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण यानी साइंटिफिक टेम्पर जगाने का संकल्प लिया। अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण ही उन्होंने इस कार्य को डॉ॰ शांतिस्वरूप भटनागर को सौंप दिया, जिसे डॉ॰ भटनागर ने सहर्ष स्वीकारा। परिणामस्वरूप उन्हें औद्योगिक अनुसंधान का प्रणेता होने का गौरव प्राप्त हुआ। वैज्ञानिक अनुसंधान और आविष्कारों के लिए दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार इन्हीं के नाम पर वैज्ञानिकों को दिया जाता है। देश के समुचित वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के लिए डॉ॰ भटनागर ने अथक परिश्रम किया और इसके लिए उन्हें पं॰ नेहरू का भरपूर सहयोग मिला जिसके परिणामस्वरूप भारत में राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की कड़ी स्थापित होती चली गई। इस कड़ी की पहली प्रयोगशाला पुणे स्थित राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला थी, जिसका उद्घाटन 3 जनवरी 1950 को पं॰ नेहरू ने किया। इसके बाद दिल्ली में राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला तथा जमशेदपुर में राष्ट्रीय धत्विक प्रयोगशाला की स्थापना हुई। 10 जनवरी 1953 को नई दिल्ली में सी. एस. आई. आर. मुख्यालय का उद्घाटन हुआ। 1 जनवरी 1955 को जब डॉ॰ भटनागर की मृत्यु हुई थी तब तक देश में विभिन्न स्थानों पर लगभग 15 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की स्थापना हो चुकी थी और ये सभी प्रयोगशालाएँ किसी-न-किसी उद्योग से जुड़ी थीं। इन सभी प्रयोगशालाओं का उद्घाटन और शिलान्यास पं॰ नेहरू द्वारा ही संपन्न हुआ। प्रयोगशालाओं की बढ़ती कड़ी को ‘नेहरू-भटनागर प्रभाव’ कहा गया है।

भारत की तृतीय प्रधनमंत्र श्रीमती इंदिरा गांधी के अथक प्रयासों से आज स्थिति यह है कि भारत विज्ञान के किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है। विकास की इस कड़ी में द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्र के ‘अधिक अन्न उपजाओ’ अभियान ने जहाँ हरित क्रांति के द्वारा खोले, वहीं अन्य क्षेत्रों में भी वैज्ञानिक प्रगति हुई। परिणामस्वरूप आजादी के बाद के इन वर्षों में कृषि, चिकित्सा, परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिकी, संचार, अंतरिक्ष, परिवहन और रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति के कारण आज भारत देश विकासशील देशों की श्रेणी में अग्रणी है। कृषि से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान तक की कठिन यात्र भारतीय वैज्ञानिकों ने सुविधओं के अभाव में भी कितनी सफलतापूर्वक तय की है इसका प्रमाण हर क्षेत्र में हुई वे अद्भुत खोज और उपलब्धियाँ हैं, जिन्होंने संपूर्ण विश्व के वैज्ञानिक क्षेत्रों में हलचल मचा दी है।

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य अंग रही है। देश की कुल आबादी के लगभग 70 प्रतिशत व्यक्ति कृषि व्यवसाय से जुड़े हैं। भारतीय कृषि के व्यवसाय में बीसवीं सदी के छठवें दशक को मील का पत्थर कहा जाता है। डॉ॰ बी. पी. पाल, डॉ॰ एस.एम. स्वामीनाथन और डॉ॰ नॉरमन बोरलॉग के प्रयासों से भारत में आई हरित क्रांति के फलस्वरूप हम खाद्यान्न उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर हैं। कूरियन ने श्वेत क्रांति द्वारा हमें दुग्ध उत्पादन में भी शीर्ष स्थान पर पहुँचा दिया है, तो पशु-पालन, मछली-पालन, कुक्कुट पालन में हम स्वावलंबी बन चुके हैं। वर्ष 1905 में पूसा, बिहार में इम्पीरियल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना से लेकर वर्तमान 'भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तक हमने लंबा सफर तय करके कम समय में अधिक उपज देने वाली नई-किस्में और संकर जातियाँ विकसित कर ली हैं। कपास की पहली संकर जाति भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने विकसित की है। कृषि वैज्ञानिकों ने अनुमानित खाद्य आवश्यकता पूर्ति तक पहुँचाने के लिए अनुसंधान कार्य तेज कर दिए हैं।

10 अगस्त 1948 को परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए डॉ॰ होमी जहाँगीर भाभा के प्रयासों से परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन हुआ था। तब से लेकर आज तक हुए विकास के फलस्वरूप हम खनिज अनुसंधान के लिए ईंधन निर्माण, व्यर्थ पदार्थों से ऊर्जा उत्पादन, कृषि चिकित्सा उद्योग एवं अनुसंधान में आत्मनिर्भर हो गए हैं। परमाणु ऊर्जा के अंतर्गत नाभिकीय अनुसंधान के क्षेत्र में मुंबई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की भूमिका सराहनीय है। यहाँ हो रहे नित नए अनुसंधानों के कारण हम पोखरण-2 का सफल परीक्षण कर विश्व की परमाणु शक्ति वाले देशों की पंक्ति में आ खड़े हुए हैं।

विश्व के चौथे सबसे बड़े उद्योग इलेक्ट्रॉनिकी ने समूचे भारत में क्रांति ला दी है। इसके उत्पादन में तेजी लाने के लिए सन् 1970 में भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिकी विभाग की स्थापना की। यह विभाग इलेक्ट्रॉनिकी उद्योग के प्रत्येक क्षेत्र में नीतियाँ तैयार करता है। सूचना प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से कंप्यूटर तथा संचार की दिशा में हो रहे विकास ने दूरसंचार तथा कंप्यूटर उद्योग में क्रांति ला दी है। डिजीटल प्रौद्योगिकी पर आधरित मोबाइल, सेलुलर, रेडियो, पेजिंग, इंटरनेट के आगमन ने सूचना और संचार के क्षेत्र में काफ़ी परिवर्तन ला दिया है। प्रत्यक्ष प्रमाण आज हमारे सामने हैं। इलेक्ट्रॉनिक विभाग का संकल्प इसका लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पहुँचाना और प्रत्येक भारतीय के जीवन को बेहतर बनाना है। सी-डेक द्वारा परम सुपर कंप्यूटर का निर्माण हमारी एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

परिवहन के क्षेत्र में हुई व्यापक प्रगति से लगभग सुदूर क्षेत्रों में बसे ग्रामीण क्षेत्रों को सुविध हुई है। यही कारण है कि महीनों में पूरी होने वाली यात्र आज चंद घंटों में पूरी हो जाती है। पर्याप्त अनुसंधान और विकास के फलस्वरूप आज भारत नई तकनीकों और सुविधओं के साथ प्रगति की ओर बढ़ रहा है। रेल, सड़क, जल और वायु परिवहन के क्षेत्र में यद्यपि विकास तेजी से हुआ है, परंतु विश्व की अग्रणी पंक्ति में पहुँचने के लिए इस क्षेत्र में अभी भी बहुत कार्य करने की आवश्यकता है।

आधुनिक भारत की मिश्रित वैज्ञानिक परंपरा तथा उपलब्धियाँ[संपादित करें]

आधुनिक विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग स्तर पर वैज्ञानिक प्रयोग होते रहे हैं, जिनमें से अधिकांश प्रयोग और अनुसंधान ऐसे हैं, जिन पर एक साथ कई देश काम कर रहे थे। ऐसी दशा में कई खोजें मिश्रित रूप में हुईं और उनका अलग-अलग स्तरों पर विकास हुआ। जैसे कंप्यूटर को ही ले लें। कंप्यूटर की खोज किसी एक वैज्ञानिक अथवा देश ने अकेले नहीं की, बल्कि इस पर एक साथ कई देशों में अलग-अलग स्तरों पर काम चलता रहा और आज कंप्यूटर का जो वर्तमान रूप हैं, वह विभिन्न देशों की मिश्रित वैज्ञानिक उपलब्धियों का विकसित रूप है। कंप्यूटर के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ सराहनीय हैं। आज भारत कंप्यूटर सॉफ्टवेयर बनाने वाले दुनिया के कुछ गिने हुए अग्रणी देशों में से एक है। कंप्यूटर आधुनिक विश्व की एक ऐसी उपलब्धि है, जो समाज के हर क्षेत्र के लिए क्रांति साबित हुआ है चाहे वह कृषि का क्षेत्र हो, उद्योग जगत हो, शिक्षा-जगत हो, वैज्ञानिक अनुसंधानों का काम हो अथवा घरेलू कामकाज। हर जगह कंप्यूटर सहायक सिद्ध हो रहा है। इसकी खोज से हर क्षेत्र में सुविधएँ बढ़ी हैं। पलक झपकते ही तमाम सूचनाएँ दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचने लगी हैं और सूचनाओं के आधर पर नित नए प्रयोगों के नए रास्ते भी खुलने लगे हैं।

इसी तरह चिकित्सा के क्षेत्र में कैट-स्कैनर, रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में मिसाइलें, राडार और परमाणु अस्त्र, सूचना जगत में उपग्रहों, परिवहन के क्षेत्र में मोटर कारों व वायुयानों तथा कृषि के क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों और कृषि उपकरणों का विकास भी मिश्रित वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हैं। भारत इन सभी क्षेत्रों में सहभागी है। आज भारत न सिर्फ दूसरे देशों से तकनीक लेकर अद्भुत कार्य कर रहा है बल्कि मौलिक स्तर पर भी अपना योगदान कर रहा है। भारत हर प्रकार से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में वैज्ञानिक विकास में अग्रणी है।

प्रसिद्ध आधुनिक भारतीय वैज्ञानिक और उनकी उपलब्धियाँ[संपादित करें]

आधुनिक युग में भारत में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए प्रयोग लगातार होते रहे, किंतु कुछ भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों के कारण पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन हुआ। प्रमुख वैज्ञानिकों में जगदीश चंद्र बोस, सी.वी. रमण, होमी जहाँगीर भाभा, शांतिस्वरूप भटनागर, एम. एन. साहा, प्रफुल्लचंद्र राय, हरगोविंद खुराना आदि नाम उल्लेखनीय हैं। जगदीश चंद्र बोस ने उचित साधनों और उपकरणों के अभाव में भी अपना कार्य जारी रखा। उन्होंने लघु रेडियो तरंगों का निर्माण किया। विद्युत चुंबकीय तरंगों के प्रयोग उन्होंने मारकोनी से पहले ही पूरे कर लिए थे। पौधं में जीवन के लक्षणों की खोज उनकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

सी.वी. रमण एक प्रतिभावान वैज्ञानिक थे। उन्होंने प्रकाश किरणों की गुणधर्मिता तथा आकाश और समुद्र के रंगों की व्याख्या पर विशेष शोध किया। अपने शोध के लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार भी मिला। एस. रामानुजम असाधरण प्रतिभावान गणितज्ञ थे। गणितीय सिद्धंतों के क्षेत्र में उनके अनुसंधान के कारण उन्हें बहुत यश और ख्याति मिली। इसी विद्वत-शृंखला में एक प्रसिद्ध वनस्पति और भूभर्ग शास्त्र बीरबल साहनी भी थे।

बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का शिखर छूने वाले वैज्ञानिकों में एम. एन. साहा, एस.एन. बोस, डी. एन. वीजिया और प्रफुल्लचंद्र राय के नाम उल्लेखनीय हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियाँ[संपादित करें]

आजादी के बाद जहाँ भारत ने समाज के हर क्षेत्र में तेजी से विकास किया वहीं विज्ञान के क्षेत्र में भी अनेक उपलब्धियाँ हासिल कीं। स्वतंत्र भारत की प्रथम सरकार में विज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों का एक पृथक मंत्रलय बनाया गया। यह मंत्रलय प्रधनमंत्र पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने अधन रखा था। नेहरू जी भारत के बहुमुखी विकास के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सब तरह के साधन और सुविधएँ जुटाईं।

उपलब्ध क्षमता और प्रोत्साहन के कारण 59 वर्षों में ही भारत ने विश्व की वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी की महानतम शक्तियों में तीसरा स्थान प्राप्त कर लिया है। परिणामस्वरूप भारत कच्चे माल के निर्यात से अब विश्व की सर्वाधिक मजबूत औद्योगिक अर्थव्यवस्था में से एक बन गया है।

भारत ने विज्ञान के अन्य विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है। खगोल विज्ञान में प्राचीन अधययनों के आधर पर ही भारत के वैज्ञानिक अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यों में लगे हैं। आज भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपने बलबूते पर उपग्रह बनाकर और अपने ही शक्तिशाली राकेटों से उन्हें अंतरिक्ष में स्थापित करने में समर्थ हैं। पूर्णतः स्वदेश में निर्मित ध्रवीय प्रक्षेपण यान पी.एस.एल.वी.सी. 2 ने 26 मई 1999 को 11 बजकर 52 मिनट पर श्रीहरिकोटा से एक सफल उड़ान भरी और एक भारतीय उपग्रह तथा दो विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में निर्धरित कक्षा में स्थापित कर दिया। अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भारत काफ़ी आगे पहुँच चुका है। इसके साथ ही भारत के दूर संवेदी नेटवर्क में 634 ग्रह शामिल हो गए हैं। हमारा यह दूर संवेदी नेटवर्क संसार का सबसे बड़ा दूरसंवेदी नेटवर्क है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों का विकास संचार माधयमों तथा रक्षा मामले संबंध सफलताओं में काफ़ी सहायक सिद्ध हुआ है। आज भारत विभिन्न दूरियों तक मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र बनाने में समर्थ है। प्रतिरक्षा के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय सफलताएँ मिली हैं।

भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी आश्चर्यजनक प्रगति की है। परमाणु ऊर्जा का मुख्यतः उपयोग कृषि और चिकित्सा जैसे शांतिपूर्ण कार्यों के लिए किया जा रहा है। परमाणु और अंतरिक्ष से जुड़ा विषय इलैक्ट्रॉनिकी है। भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति की है। परम 10000 सुपर कंप्यूटर बनाकर हम इस क्षेत्र में अग्रणी देशों की पंक्ति में आ गए हैं। हम अब सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित उपकरणों का निर्यात विकसित देशों को भी कर रहे हैं। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षित इंजीनियरों की अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों में भारी माँग है।

वैज्ञानिक अनुसंधानों के बलबूते पर भारत ने जलयान निर्माण, रेलवे उपकरण, मोटर उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि में आशातीत सफलता प्राप्त की है। आज हम भारत की उद्योगशालाओं में बनी अनेक वस्तुओं का निर्यात करते हैं।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]