भारत के धर्म

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


                                        ओ३म्

अखिल विश्व का प्रथम धर्म-

       भारत का सर्वप्रमुख धर्म 'सत्य' अथवा 'सनातन' धर्म है,जिसमे न्याय को सर्वप्रमुख स्थान प्रदान किया गया है। प्रो० भारत भूषण विद्यालंकार के निर्देशन में अनुसंधान कर्त्ता डॉ० अशोक कुमार शर्मा [ जन्म- एकादश दिसम्बर सन् १९६० ई०,जन्म स्थान - हरद्वार सुपुत्र श्री हर प्रसाद शर्मा तथा श्रीमती बैकुण्ठी देवी शर्मा] सहित्यरत्न एवम् आयुर्वेदरत्न, हिन्दी, वैदिक सहित्य तथा सन्स्कृत में पी० जी० त्रय, पी-एच० डी० वेद - सन् १९९२ ई०, शोध शीर्षक- "वैदिक सन्हिताओं की वनस्पतियां (आयुर्वेद के परिप्रेक्ष्य में)" वेद-विभाग, प्राच्य विद्या सन्काय, गुरुकुल कांगडी विश्व-विद्यालय हरद्वार पिन-२४९४०४, की मान्यता है कि- 
      "सनातनधर्म इस भारत वर्ष का एकमात्र धर्म रहा है। इसी को लोगों ने वेदों से अनुप्राणित होने के कारण 'वैदिक धर्म' का नाम भी दिया, आज भी इस धर्म पर किसी को कोई भी आपत्ति  नहीं है। और यदि किसी को है भी, तो वह न्यायसन्गत नहीं है। सत्य और सनातन का अभिप्राय ही है - निरन्तर समान रूप से परिचक्रित एकमात्र धार्मिक व्यवस्था अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान में सदैव एक सा होना या बने रहना अर्थात्  यह सदैव अपरिवर्तनशील बना रहने वाला एक ऐसा धर्म है, जिसे सत्य या सनातन धर्म का नाम दिया जाना ही भारत की श्रेष्ट परम्परा का परिचायक है।
       'धर्म' धारण करने योग्य एक सत्य का ऐसा सन्कल्प या व्रत है, जो इस जगत मे न्याय और रचनात्मक कर्म की व्यवस्थापक शक्ति की व्यवस्था करते हुए उस व्यवस्था से इस जगत् को अनुप्राणित करता आया है,जिस सत्य से अनुप्राणित होनेपर इस समाज की व्यवस्थाएं कभी विकृत नहीं होती। इसी से भारतीय सत्य के प्रति पूर्ण निष्ठावान् आज भी बने हुए हैं। अन्य जितने भी मतावलम्बी अपने मत को 'धर्म' घोषित करते हुए स्वयम् को धर्म की श्रेणी मे लाने प्रयत्न करते आ रहे है, उनका यह एक निन्दनीय प्रयास है, क्योंकि धर्म तो केवल मात्र एक ही है। वे सभी मत जिनको धर्म की श्रेणी मे लाने का प्रयास किया गया है, वे सभी इसी सत्य धर्म की प्रेरणा से प्रादुर्भूत हैं और इसी धर्म के आधार के ऋणी ठहरते हैं, क्योंकि धर्म निर्धारण की प्रेरणा उनको इसी धर्म से मिली है।
       वेदवाक् अर्थात् सत्य वाक् अथवा सनातन वाक्, जिससे सत्य और सनातन धर्म का स्वरूप स्पष्टतः व्यक्त होता है, वह यही वाणी अर्थात् वेदवाणी है, जिसको सब लोग या सारा सन्सार वेद के रूप मे जानता आया है। आदि धर्म के स्रोत  के रूप में -  चारो वेद - ऋग्वेद, यजुर्वेद्, सामवेद तथा अथर्ववेद, सत्य और सनातन धर्म को अनुप्राणित करनेवाले इसके न्यायिक प्रमाण है, लोगो ने तो केवल ऋग्वेद मात्र को प्राचीन ठहराया है, परन्तु यहां तो यह सम्पूर्ण साहित्य परम पवित्र ही नही पूरी तरह प्राचीन और समकालीन साहित्य है। अथर्ववेद चारों वेदों में सर्वाधिक अर्थात् सबसे ज्यादा प्रचलित रहा है, जिसके कारण उसकी भाषा को तथा उसे नवीन ठहरने का प्रयास किया गया, जो युक्तिसन्गत नहीं है। उक्त भाषा वेदवाक् के नाम से जानी जाती है। जिसे हम वेदवाणी भी कहते आ रहे हैं। 
       इस प्राचीन 'वेदवाणी'या भाषा की वर्णमाला भी पूर्ण सार्थक वर्णमाला रही है, जो मात्रा,स्वर और सन्हिता के सार्थक अनुशासन से अनुप्राणित रही है, जिसकी सार्थकता को भारत खो चुका है। इसकी खोज के लिये नये अध्ययन की तत्काल आवश्यकता है।" 

मेरा फोन- ९१-९४१०३२२५०२, ९१-१३३४-२४०५५४, नोट- यदि आप चाह्ते हैं हिन्दी मे और काम हो तो सुविधाएं प्रदान करें--- धन्यवाद