भारत-पाकिस्तान के बीच प्रथम युद्ध

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भारत और पाकिस्तान के बीच प्रथम युद्ध सन् १९४७ में हुआ था। यह कश्मीर को लेकर हुआ था जो १९४७-४८ के दौरान चला।

पृष्ठभूमि[संपादित करें]

1815 से पहले आज "कश्मीर" के नाम से जाने जाने वाले क्षेत्र को "पंजाब पहाड़ी राज्यों" के रूप में जाना जाता था और इसमे 22 छोटे स्वतंत्र राज्यों शामिल थे। इन छोटे राज्यों मे राजपूत राजाओं के द्वारा जो (मुगल साम्राज्य के प्रति निष्ठावान थे) द्वारा शासन किया जाता था। वास्तव में पंजाब के पहाड़ी राज्यों के राजपूत मुगल साम्राज्य का एक प्रमुख शक्ति थे और उन्होने सिखों के खिलाफ मुगलों के समर्थन में कई लड़ाइयां लड़ी थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के उदय और मुगल साम्राज्य के बाद के पतन के बाद सिख पहाड़ी राज्यों की सत्ता को अस्वीकार करने लगे. इसलिए सिख गुरू महराजा रणजीत सिंह इन छोटे राज्यों पर जीत के लिए रवाना हो गये . अंततः एक के बाद एक सभी पहाड़ी राज्यों महराजा रणजीत सिंह ने विजय प्राप्त करी थी और इनको एक राज्य में विलय करके जम्मू का राज्य कहा जाने लगा .

जे हचिंसंन और जे पी वोगेल द्वारा लिखित पंजाब जातियों का इतिहास मे दिये वर्णन के अनुसार 22 राज्यो मे 16 राज्यों हिंदु और 6 मुस्लिम थे। इनमे 6 मुस्लिम राज्यो मे दो राज्यों (कोटली और पुंछ) मंग्रालो दो (भीमबेर और खारी-खैरियाला) छिब्ब के द्वारा राजौरी जरालो द्वारा और किश्तवाड़ियों के द्वारा किश्तवाड़ पर शासन किया जाता था |

प्रथम ब्रिटिश सिख युद्ध के सिख साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 1845 और 1846 के बीच में लड़ा गया था, के बाद् 1846 में लाहौर की संधि में, सिखों को 12 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति भुगतान करने की आवश्यकता थी।

क्योंकि वे इस् राशि का भुगतान नही कर सके ईस्ट इंडिया कंपनी ने डोगरा शासक गुलाब सिंह को 750,000 रुपये का भुगतान करने के बदले में सिख राज्य से कश्मीर प्राप्त करने की अनुमति दी. गुलाब सिंह जम्मू और कश्मीर राज्य के संस्थापक बन नव गठित राजसी राज्य के प्रथम महाराजा बन गये। जम्मू और कश्मीर की रियासत भारत के 1947 में अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने तक ब्रिटिश राज के दौरान की दूसरी सबसे बड़ी रियासत थी |

भारत का बटवारा[संपादित करें]

१९४७ मे अंग्रेजो के भारत छोड़ने के पहले और बाद मे जम्मू एवं कश्मीर की रियासत पर नये बने दोनो राष्ट्रों मे से एक मे विलय का भारी दबाव था। भारत के बटवारे पर हुए समझौते के दस्तावेज के अनुसार रियासतो के राजाओं को दोनो मे से एक राष्ट्र को चुनने का अधिकार था परंतु कश्मीर के महाराजा हरी सिंग अपनी रियासत को स्वतंत्र रखना चाहते थे और उन्होने किसी भी राष्ट्र से जुड़ने से बचना चाहा। अंग्रेजो के भारत छोड़ने के बाद रियासत पर रियासत पर पाकिस्तानी सैनिको और पश्तूनो के कबीलाई लड़ाको (जो कि उत्तर पश्चिमी सीमांत राज्य के थे) ने हमला कर दिया।

इस भय से कि रियासत की फ़ौज इनका सामना नही कर पायेगी महाराजा ने भारत से सैनिक सहायता मांगी। भारत ने सैनिक सहायता के एवज मे कशमीर के भारत मे विलय की शर्त रख दी। महाराजा के हामी भरने पर भारत ने इस विलय को मान्यता दे दी और रियासत को जम्मु कश्मीर के नाम से नया राज्य बना दिया। भारतीय सेना की टुकड़ियां तुरंत राज्य की रक्षा के लिये तैनात कर दी गयी। किंतु इस विलय की वैधता पर पाकिस्तान असहमत था। चूंकि जाति आधारित आंकड़े उपलब्ध नही थे इसलिये महाराज के भारत से विलय के पीछे क्या कारण थे यह तय पाना कठिन था।

पाकिस्तान की यह दलील थी कि महाराजा को भारतीय सेना बुलाने का अधिकार नही था क्योंकि अंग्रेजो के आने के पहले कशमीर के महाराजा का कोई पद नही था और यह पद केवल अंग्रेजो की नियुक्ती थी। इसलिये पाकिस्तान ने युद्ध करने का निर्णय लिया पर उसके सेना प्रमुख डगलस ग्रेसी ने इस आशय के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का आदेश मानने से इंकार कर दिया। उनका तर्क यह था कि कश्मीर पर कब्जा कर रही भारतीय सेनाएं ब्रिटिश राजसत्ता का प्रतिनिधित्व कर रही हैं अतः वह उससे युद्ध नही कर सकते। हालांकि बाद मे पाकिस्तान ने सेनाएं भेज दी पर तब तक भारत करीब करीब दो तिहायी कश्मीर पर कब्जा कर चुका था

युद्ध का सारांश[संपादित करें]

यह युद्ध पूर्व जम्मू और कश्मीर रियासत की सीमाओं के भीतर मारतीय सेना अर्धसैनिक बल और पूर्व जम्मू और कश्मीर रियासत की सेनाओं और पाकिस्तानी सेना अर्धसैनिक बल और पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमांत राज्य के कबीलाई लड़ाको जो खुद को आजाद कश्मीर की सेना के नाम से पुकारते थे के बीच लड़ा गया था। प्रारंभ मे पूर्व जम्मू और कश्मीर रियासत की सेना आजाद कश्मीर के कबीलाई लड़ाको के शुरुवाती हमलो के लिये तैयार नही थी उसे केवल सीमा की रखवाली के लिये बहुत कम संख्या मे तैनात किया गया था इसलिये उनकी रक्षा प्रणाली आक्रमण के सामने तुरंत ढह गयी और उनकी कुछ टुकड़िया दुश्मनो से जा मिली।

आजाद कश्मीर के कबीलाई लड़ाके शुरूवाती आसान सफ़लताओं के बाद लूटपाट मे व्यस्त हॊ गये और उन्होने आगे बढ़ आसानी से कब्जे में आ सकने वाले नये इलाको पर हमला करने मे देर कर दी और महाराजा कए भारत मे विलय मे सहमती देते ही भारतीय सेना को विमानो की मदद से सैनिक पहुचाने का मौका दे दिया। १९४७ के अंत तक कश्मीर मे कब्जा करने के पकिस्तानी अभियान की हवा निकल गयी। केवल हिमालय के उपरी हिस्सो मे आजाद कश्मीर नाम की पाकिस्तानी सेना को कुछ सफ़लतायें मिली पर आखिर मे उन्हे लेह के बाहरी हिस्से से जून उन्नीस सौ अड़तालीस मे वापस खदेड़ दिया गया। पूरे १९४८ के दौरान दोनो पक्षो के बीच अनेक छोटी लड़ाइयां हुई पर किसी को भी कोई मह्त्वपूर्ण सामरिक सफ़लता नही मिली और धीरे धीरे एक सीमा जिसे आज नियंत्रण रेखा के नाम से जाना जाता है स्थापित हो गई। ३१ दिसम्बर १९४८ मे औपचारिक युद्ध विराम की घोषणा हो गयी।

युद्ध के भाग[संपादित करें]

इस युद्ध को दस भागो मे बाटा जा सकता है। यह भाग इस प्रकार से हैं।

शुरूवाती हमला (गुलमर्ग का अभियान)[संपादित करें]

शुरूवाती हमले का मुख्य उद्देश्य कश्मीर घाटी और इसके प्रमुख शहर श्रीनगर के नियंत्रण को अपने हाथ मे लेना था। जम्मू और कश्मीर रियासत (अब राज्य) की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर और शीतकालीन राजधानी जम्मू थी। मुज्जफ़राबाद और डोमेल मे तैनात रियासत की सेना तुरंत ही आजाद कश्मीर सेना नाम की पाकिस्तानी सेना से हार गयी (रियासत की सेना का एक धड़ा आजाद कश्मीर सेना से जा मिला था) और श्रीनगर का रास्ता खुल गया था। रियासत की सेना के पुनः संगठित होने के पहले श्रीनगर पर कब्जा करने के बजाय आजाद कश्मीर सेना सीमांत शहरो पर कब्जा करने और उसके निवासियों (गैर मुस्लिम) से लूटपाट एवं अन्य अत्याचार करने मे जुट गयी। पुंछ की घाटी मे रियासत की सेना पीछे हट कर शहरो मे केंद्रित हो गयीं और उनको कई महिनो के बाद भारतीय सेना घेरा बंदी से मुक्त कराया।

कश्मीर घाटी का भारतीय सुरक्षातंत्र[संपादित करें]

Indian soldiers fighting in 1947 war

जम्मू और कश्मीर रियासत के भारत से विलय के बाद भारत ने विमान के द्वारा सैनिक और उपकरण श्रीनगर पहुंचाये। वहां पहुंच कर उन्होने रियासत की सेना को मजबूत किया और श्रीनगर के चारो ओर र्क सुरक्षा घेरा बनाया और आजाद कश्मीर सेना को हरा दिया। इस सुरक्षा घेरे मे भारतीय सेना के बख्तरबंद वाहनो के द्वारा विरोधियो को पीछे से घेरना भी शामिल था। हारकर पीछे हटती हुई पाकिस्तानी सेना का बारामुला और उरी तक पीछा करके इन दोनो शहरो को मुक्त करा लिया गया हालांकि पुंछ घाटी मे पाकिस्तानी सेना के द्वारा शहरो की घेरा बंदी जारी रही।

गिलगित मे आजाद कश्मीर की कबीलाई सेना मे गिलगित राज्य के अर्ध सैनिक बल शामिल हो गये और चित्राल के मेहतर जागीरदार की सेना भी अपने जागीरदार के पकिस्तान मे विलय की घोषणा के बाद उसमे शामिल हो गयी

पुंछ मे फसी सेनाओं तक पहुचने का प्रयास्[संपादित करें]

भारतीय सेना ने आजाद कश्मीर की सेना का उरी और बारामुला पर कब्जे के बाद पीछा करना बंद कर दिया और एक सहायता टुकड़ी को दक्षिण दिशा मे पुंछ की घेरा बंदी तोड़ने के प्रयास मे भेजा। हालांकि सहायता टुकड़ी पुंछ पहुच गयी पर वह घेराबंदी नही तोड़ पायी और वह भी फंस गयी। एक दूसरी सहायता टुकड़ी कोटली तक पहुच गयी पर उसे अपना कोटली की मोर्चाबंदी को छोड़कर पीछे हटना पड़ा इसी बीच मीरपुर पर आजाद कश्मीर की सेना का कब्जा हो गया।

झांगेर पर आजाद कश्मीर की सेना का कब्जा होना और नौशेरा और उरी पर हमला25 November 1947 - 6 February 1948

झांगेर पर आजाद कश्मीर की सेना का कब्जा होना और नौशेरा और उरी पर हमला[संपादित करें]

पाकिस्तान/आजाद कश्मीर की सेना ने झांगेर पर कब्जा कर लिया तत्पश्चात उसने नौशेरा पर नकाम हमला किया। पाकिस्तान/आजाद कश्मीर की सेना की दूसरी टुकड़ीयों ने लगातार उरी पर नाकाम हमले किये। दूसरी ओर भारत ने एक छोटे से आक्रमण से छ्म्ब पर कब्जा बना लिया। इस समय तक भारतीय सेना के पास अतिरिक्त सैन्य बल उपलब्ध हो गये ऐसे मे नियंत्रण रेखा पर स्थितियां स्थिर होने लगी।

अभियान विजय -- झांगेर पर प्रतिआक्रमण7 फरवरी 1948 - 1 मई 1948

अभियान विजय -- झांगेर पर प्रतिआक्रमण[संपादित करें]

भारतीय सेना बलों ने झांगेर और रजौरी पर प्रतिआक्रमण कर के उन्हे कब्जे मे ले लिया। कश्मीर घाटी मे आजाद कश्मीर सेना ने उरी के सुरक्षा तंत्र पर आक्रमण जारी रखा। आजाद कश्मीर सेना ने उत्तर मे स्कार्दू की घेरा बंदी कर दी।

भारतीय सेना का बसंत अभियान 1 मई 1948 - 19 मई 1948

भारतीय सेना का बसंत अभियान[संपादित करें]

आजाद कश्मीर की सेना के अनेक प्रतिआक्रमणो के बावजूद भारतीयो ने झांगेर पर नियंत्रण बनाये रखा हालांकि अब आजाद कश्मीर की सेना को नियमित पाकिस्तानी सैनिको की मदद अधिकाधिक मिलने लगी थी। कश्मीर घाटी मे भारतीयो ने आक्रमण कर तिथवाल पर कब्जा कर लिया। उंचे हिमालय के क्षेत्रो मे आजाद कश्मीर की सेना को अच्छी बढत मिल रही थी। उन्होने टुकड़ियो की घुसपैठ कर के कारगिल पर घेराबंदी कर दी तथा स्कार्दू की मदद के लिये जा रहे भारतीय सैन्य दस्तों को हरा दिया।

भारतीय सेना का बसंत अभियान1 मई 1948 - 19 मई 1948

अभियान गुलाब एवं इरेस (मिटाना)[संपादित करें]

भारतीय सेना बलो ने कश्मीर घाटी मे हमला जारी रखा और उत्तर की ओर आगे बढ कर केरान और गुराऐस पर कब्जा कर लिया। उन्होने तिथवाल पर किये गये एक प्रतिआकर्मण को वापस खदेड़ दिया। पुंछ घाटी मे पुंछ मे फसी भारतीय टुकड़ी घेराबंदी तोड़कर कुछ समय के लिये बाहरी दुनिया से वापस जुड़ गयी। लंबे समय से फसी कश्मीर रियासत की टुकड़ी गिलगित स्काउट (पाकिस्तान) से स्कार्दू की रक्षा करने मे अब तक सफल थी इस लिये पाकिस्तानी सेना लेह की ओर नही बढ पा रही थी। अगस्त मे चित्राल (पाकिस्तान) की सेना ने माता-उल-मुल्क के नेत्रुत्व मे स्कार्दू पर हमला कर दिया और तोपखाने की मदद से स्कार्दू पर कब्जा कर लिया। इससे गिलगित स्काउट लद्दाख की ओर आगे जाने का मौका मिल गया।

अभियान डक (बत्तख) 15 अगस्त 1948 - 1 नवम्बर् 1948

अभियान डक (बत्तख)[संपादित करें]

इस समय के दौरान नियंत्रण रेखा स्थापित होने लगी थी और दोनो पक्षो मे अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रो की रक्षा का ज्यादा महत्व था बनिस्बत की हमला करने के |इस दौरान केवल एक महत्वपूर्ण अभियान चलाया गया यह था अभियान डक जो कि भारतीय बलो द्वारा द्रास के कब्जे के लिये था इस दौरान पुंछ पर घेराबंदी जारी रही।

अभियान ईजी (आसान) पुंछ तक पहुचना 1 November 1948 - 26 November 1948

अभियान ईजी (आसान) पुंछ तक पहुचना[संपादित करें]

अब भारतीय सेना सभी क्षेत्रो पर पाकिस्तानी सेना और उससे समर्थित आजाद कश्मीर सेना पर भारी होने लगी थी। पुंछ को एक साल लंबी घेराबंदी से आजाद करा लिया गया था और गिलगित स्काउट जो कि अब तक अच्छी कामयाबी हासिल कर रही थी उसे उसे आखिरकार हराकर उसका पीछा करते हुए भारतीय सेना ने कारगिल को आजाद करा लिया पर आगे हमला करने के लिये भारतीय सेना को रसद की आपूर्ती की समस्या आ सकती थी अतः उन्हे रुकना पड़ा जोजिला दर्रे को टैंक की मदद से (इससे पहले इतनी उंचाई पर पूरे विश्व मे कभी भी टैंक का इस्तेमाल नही हुआ था) कब्जे मे ले लिया गया पाकिस्तानी सेना टैंक की अपेक्षा नही कर रही थी और उनके तुरंत पांव उखड़ गये। टैंक का इस्तेमाल बर्मा युद्ध से मिले अनुभव के कारण ही संभव हो पाया था। इस दर्रे पर कब्जे के बाद द्रास पर आसानी से कब्जा हो गया।

युद्ध विराम की ओर कदम 27 November 1948 - 31 December 1948

युद्ध विराम की ओर कदम[संपादित करें]

लड़ाई के इस दौर मे पहुंचने पर भारतीय प्रधानमंत्री ने मामले को संयुक्त राष्ट्र महासभा मे ले जा कर उनके द्वारा मामले का समाधान करवाने का मन बना लिया। 31दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र के द्वारा युद्ध विराम की घोषणा की गई। युद्ध विराम होने से कुछ दिनो पहले पाकिस्तानी सेना ने एक प्रतिआक्रमण करके उरी और पुंछ के बीच के रास्ते पर कब्जा करके दोनो के बीच सड़क संपर्क तोड़ दिया। एक लंबे मोलभाव के बाद दोनो पक्ष युद्धविराम पर राजी हो गये। इस युद्धविराम की शर्तें देखे UNCIP resolution.[1] of अगस्त 13 1948 इसे संयुक्त राष्ट्र ने अपनाया जनवरी 5 1949.इसमे पाकिस्तान को अपने नियमित और अनियमित सनिको को पूरी तरह से हटाने और भारत को राज्य मे कानून व्यवस्था लागू करने के लिये आवश्यक सैनिक रखने का प्रस्ताव था। इस शर्त के पूरा होने पर plebiscite राज्य के भविष्य और मालिकाना हक तय करने के लिये रखी जाती। इस युद्ध मे दोनो पक्षो के १५०० १५०० सैनिक मारे जाने का अनुमान है[2] और इस युद्ध के बाद भारत का रियासत के साठ प्रतिशत और पाकिस्तान का ४० प्रतिशत भूभाग पर कब्जा रहा।

इस युद्ध से सीखी गयी सैन्य नीतियां[संपादित करें]

बख्तरबंद वाहन का प्रयोग[संपादित करें]

इस युद्ध के दो चरणो मे बख्तरबंद वाहन और हल्के टैंको का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण था इन दोनो मे ही बहुत ही कम संख्या मे इनका प्रयोग हुआ था | ये चरण थे

  • श्रीनगर पर प्रारंभिक हमले को नाकाम करना जिसमे २ बख्तरबंद वाहनो ने पाकिस्तान के अनियमित सैनिको के दस्ते पर पीछे से हमला किया
  • जोजिला दर्रे पर ११ हल्के टैंको की मदद से कब्जा Stuart M5 light tanks

यह घटनाएं यह बताती हैं कि असंभावित जगहो पर बख्तरबंद वाहनो के हमले का दुश्मन पर मानसिक दबाव पड़ता है | ऐसा भी हो सकता है की हमलावरों ने टैकरोधी हथियारो का प्रयोग नही किया शायद उन्होने आवश्यक न जानकर उन्हे पीछे ही छोड़ दिया | बख्तरबंद वाहनो के प्रयोग की सफलता ने भारत की युद्ध नीति पर गहरी छाप छोड़ी चीन के साथ युद्ध के वक्त भारतीयो ने बड़ी मेहनत से दुर्गम इलाको मे बख्तरबंद वाहनो का प्रयोग किया किंतु उस युद्ध मे बख्तर बंद वाहनो को अपेक्षित सफलता नही मिली | भारत-चीन युद्ध

सीमा रेखा मे आये बदलाव[संपादित करें]

  • सीमा रेखा मे आये परिवर्तनो का यदी अध्ययन किया जाय तो काफी रोचक तथ्य उभर कर आते हैं। एक बार सेनाओं का जमावड़ा पूरा होने के बाद नियंत्रण रेखा मे बदलाव बेहद धीमा हो गया और विजय केवल उन इलाकों तक सीमित हो गयी जिनमे सैनिक घनत्व विरल था जैसे की उत्त्री हिमालय के उंचे इलाके जिनमे शुरुवात मे आजाद कश्मीर की सेना को सफलताएं मिली थी।
१९४८ में पाकिस्तान कश्मीर पर आक्रमण करके, उसके एक तिहाई भाग पर अधिकार कर लिया। अभी तक यह एक तिहाई भाग पाकिस्तान के पास है।

सेनांओ की तैनाती[संपादित करें]

  • जम्मू और कश्मीर रियासत की सेनाएं इस युद्ध के प्रारंभ मे फैली हुईं और छोटी संख्या मे केवल आतंकवादी हमलो से निपटने के लिये तैनात थीं। जिससे वे पारंपरिक सैनिक हमले के सामने निष्फल साबित हुई। इस रणनीती को भारत ने पुर्वी पाकिस्तान (आज का बंग्लादेश) मे भारत पाकिस्तान के बीच तीसरा युद्ध मे सफलता पूर्वक प्रयोग किया।

संदर्भ[संपादित करें]

Notes[संपादित करें]

Bibliography[संपादित करें]

Major sources
  • 'प्रतिरक्षा पत्रकारिता' शिव अनुराग पटैरया छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी,
  • Operations In Jammu and Kashmir 1947-1948, Ministry of Defence, Government of India, Thomson Press (India) Limited. New Delhi 1987. This is the Indian Official History.
  • The Indian Army After Independence, by KC Praval, 1993. Lancer International, ISBN 1-897829-45-0
  • Slender Was The Thread: The Kashmir confrontation 1947-1948, by Maj Gen LP Sen, 1969. Orient Longmans Ltd New Delhi.
  • Without Baggage: A personal account of the Jammu and Kashmir Operations 1947-1949 Lt Gen. E. A. Vas. 1987. Natraj Publishers Dehradun. ISBN 81-85019-09-6.
  • Kashmir: A Disputed Legacy, 1846-1990 by Alastair Lamb, 1991. Roxford Books. ISBN 0-907129-06-4.
Other sources
  • The Indian Armour: History Of The Indian Armoured Corps 1941-1971, by Maj Gen Gurcharn Sandu, 1987, Vision Books Private Limited, New Delhi, ISBN 81-7094-004-4.
  • Thunder over Kashmir, by Lt Col Maurice Cohen. 1955 Orient Longman Ltd. Hyderabad
  • Battle of Zoji La, by Brig Gen SR Hinds, Military Digest, New Delhi, 1962.
  • History of Jammu and Kashmir Rifles (1820-1956), by Maj K Barhma Singh, Lancer International New Delhi, 1990, ISBN 81-7062-091-0.