भारतीय कला
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कला, संस्कृति की वाहिका है। भारतीय संस्कृति के विविध आयामों में व्याप्त मानवीय एवं रसात्मक तत्व उसके कला-रूपों में प्रकट हुए हैं। कला का प्राण है रसात्मकता। रस अथवा आनन्द अथवा आस्वाद्य हमें स्थूल से चेतन सत्ता तक एकरूप कर देता है। मानवीय संबन्धों और स्थितियों की विविध भावलीलाओं और उसके माध्यम से चेतना को कला उजागार करती है। अस्तु चेतना का मूल ‘रस’ है। वही आस्वाद्य एवं आनन्द है, जिसे कला उद्घाटित करती है। भारतीय कला जहाँ एक ओर वैज्ञानिक और तकनीकी आधार रखती है, वहीं दूसरी ओर भाव एवं रस को सदैव प्राणतत्वण बनाकर रखती है। भारतीय कला को जानने के लिये उपवेद, शास्त्र, पुराण, और पुरातत्त्व और प्राचीन साहित्य का सहारा लेना पडता है।
इन्हें भी देखें [संपादित करें]
- भारतीय संगीत
- भारतीय चित्रकला
- भारतीय वास्तुकला
- भारतीय मूर्तिकला
- भारतीय साहित्य
- अलंकार
- सौन्दर्यशास्त्र
- चौसठ कलाएँ
बाहरी कड़ियाँ [संपादित करें]
- विश्व मंच पर पहचान बनाती भारतीय कला (संजय द्विवेदी)
- यूरोप में बढ़ती भारतीय कला की पूछ
- भारतीय कला (गूगल पुस्तक ; लेखक - उदय नारायण राय)
- 5,000 years of Indian art in pictorial text
- जैन कला