भानगढ़

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भानगढ़ का गोपीनाथ मन्दिर

भानगढ़, राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के एक छोर पर है। यहाँ का किला बहुत प्रसिद्ध है जो 'भूतहा किला' माना जाता है। इस किले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था। भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधो सिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया। माधोसिंह के तीन बेटे थे। (१) सुजाणसिंह (२) छत्रसिंह (३) तेजसिंह। माधोसिंह के बाद छत्रसिंह भानगढ़ का शासक हुआ। छत्रसिंह के बेटा अजबसिंह थे। यह भी शाही मनसबदार थे। अजबसिंह ने आपने नाम पर अजबगढ़ बसाया था। अजबसिंह के बेटा काबिलसिंह और इस के बेटा जसवंतसिंह अजबगढ़ में रहे। अजबसिंह के बेटा हरीसिंह भानगढ़ में रहे (वि. सं. १७२२ माघ वदी भानगढ़ की गद्दी पर बैठे)। माधोसिंह के दो वंशज (हरीसिंह के बेटे) औरंग़ज़ेब के समय में मुसलमान हो गये थे। उन्हें भानगढ़ दे दिया गया था। मुगलों के कमज़ोर पड़ने पर महाराजा सवाई जयसिंह जी ने इन्हें मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया।

भानगढ़ दुर्ग[संपादित करें]

भानगढ़ का किला चहारदीवारी से घिरा है जिसके अंदर घुसते ही दाहिनी ओर कुछ हवेलियों के अवशेष दिखाई देते हैं। सामने बाजार है जिसमें सड़क के दोनों तरफ कतार में बनाई गई दोमंजिली दुकानों के खंडहर हैं। किले के आखिरी छोर पर दोहरे अहाते से घिरा तीन मंजिला महल है जिसकी उपरी मंजिल लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।

भानगढ से सम्‍बन्‍िधत कथा उक्‍त भानगढ बालूनाथ योगी की तपस्‍या स्‍थल था जि‍सने इस शर्त पर भानगढ के कि‍ले को बनाने की सहमति‍ दी कि‍ कि‍ले की परछाई कभी भी मेरी तपस्‍या स्‍थल को नही छूनी चाहि‍ये परन्‍तु राजा माधो सि‍हं के वंशजो ने इस बात पर ध्‍यान नही देते हुए कि‍ले का निर्माण उपर की ओर जारी रखा इसके बाद एक दि‍न कि‍ले की परछाई तपस्‍या स्‍थल पर पड गयी जि‍स पर योगी बालूनाथ ने भानगढ को श्राप देकर ध्वस्‍त कर दि‍या, श्री बालूनाथ जी की समाध्‍ि‍ा अभी भी वहां पर मौजूद है

अन्‍य कथा

भानगढ की राजकुमारी रत्‍नावती अपूर्व सुन्‍दरी थी जि‍सके स्‍वयंवर की तैयारी चल रही थी परन्‍तु उसी राज्‍य मे एक तान्‍तरि‍क सिंघि‍या नाम का था जो राजकुमारी को पाना चाहता था परन्‍तु यह संभव नही था इसलि‍ए उसने राजकुमारी की दासी जो राजकुमारी के श्रंगार के लि‍ये तेल ले जाने बाजार आयी थी उस तेल को जादू से सम्‍मोहि‍त करने वाला बना दि‍या, राजकुमारी रत्‍नावती के हाथ से वह तेल एक चटटान पर गि‍रा तो वह चटटान तान्‍तरि‍क सिंघि‍या की तरफ लुढकती हुयी आने लगी व उसके उपर गि‍र कर उसे मार दि‍या जि‍स पर सिंघि‍या ने मरते समय उस नगरी व राजकुमारी को नाश होने का श्राप दे दि‍या जि‍ससे यह नगर ध्‍वस्‍त हो गया