भगवती चरण वर्मा

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
भगवती चरण वर्मा
Bhagwati ver.jpg
भगवती चरण वर्मा
जन्म: ३० अगस्त १९०३
उन्नाव जिला, उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु: ५ अक्तूबर १९८८
भारत
कार्यक्षेत्र: रचनाकार, साहित्यकार
राष्ट्रीयता: भारतीय
भाषा: हिन्दी
काल: आधुनिक काल
विधा: नाटक, कहानी, उपन्यास
विषय: आधुनिक हिंदी साहित्य
प्रमुख कृति(याँ): चित्रलेखा

भगवती चरण वर्मा (३० अगस्त १९०३- ५ अक्तूबर १९८८) हिन्दी भाषा के साहित्यकार थे। इनका विषय वर्तमान राष्ट्रीय उत्थान तथा भाषा सजीव और हृदय को छूनेवाली होती है। शैली कलात्मकर है। इनका जन्म उन्नाव जिले, उत्तर प्रदेश के शफीपुर गाँव में हुआ था। वर्माजी ने इलाहाबाद से बी.ए., एल. एल. बी. की डिग्री प्राप्त की और प्रारम्भ में कविता लेखन किया । फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात । १९३३ के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे । १९३६ के लगभग फिल्म कारपोरेशन, कलकत्ता, में कार्य । कुछ दिनों ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन-संपादन, इसके बाद बंबई में फिल्म-कथालेखन तथा दैनिक ‘नवजीवन’ का सम्पादन, फिर आकाशवाणी के कई केंन्दों में कार्य। बाद में, १९५७ से मृत्यु-पर्यंत स्वतंत्न साहित्यकार के रूप में लेखन। ‘चित्रलेखा’ उपन्यास पर दो बार फिल्म-निर्माण और ‘भूले-बिसरे चित्र’ साहित्य अकादमी से सम्मानित। पद्मभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त। भगवती चरण वर्मा को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा, सन १९७१ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

अनुक्रम

[संपादित करें] कार्यक्षेत्र

प्रारंभ में कविता लेखन फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात। १९३६ में फ़िल्म कारपोरेशन कलकत्ता में कार्य। विचार नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन संपादन। इसके बाद बम्बई में फ़िल्म कथा लेखन तथा दैनिक नवजीवन का संपादन। आकाशवाणी के कई केन्द्रों में कार्य। १९५७ से स्वतंत्र लेखन। 'चित्रलेखा' उपन्यास पर दो बार फ़िल्म निर्माण और भूले बिसरे चित्र पर साहित्य अकादमी पुरस्कार। पद्मभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त।

[संपादित करें] भगवती चरण वर्मा और हिन्दी साहित्य

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर के साथ साथ मानव को समान महत्व दिया गया। भावना के साथ-साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली. पद्य के साथ-साथ गद्य का भी विकास हुआ और छापेखाने के आते ही साहित्य के संसार में एक नई क्रांति हुई. आधुनिक हिन्दी गद्य का विकास केवल हिन्दी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा. पूरे देश में और हर प्रदेश में हिन्दी की लोकप्रियता फैली और अनेक अन्य भाषी लेखकों ने हिन्दी में साहित्य रचना करके इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया

[संपादित करें] श्री भगवती चरण वर्मा की कुछ रचनाएँ

सामर्थ्य और सीमा- सामर्थ्य और सीमा सुप्रसिद्घ कथाकार भगवती चरण वर्मा का बहुचर्चित उपन्यास है । इसमें अपने सामर्थ्य की अनुभूति से पूर्ण कुछ ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों की कहानी है जिन्हें परिस्थितियाँ एक स्थान पर एकत्रित कर देती है । हर व्यक्ति अपनी महत्ता, अपनी शक्ति और सामर्थ्य से सुपरिचित था – हरेक को अपने पर अटूट विश्वास था; लेकिन परोझ की शक्तियों को कौन जानता था जो उनके इस दर्प को चकनाचूर करने को तैयार हो रही थी। इस उपन्यास में आज के महान सघंर्ष से युक्त जीवन का सशक्त और रोचक चित्रण हुआ है । इसके द्वारा कथाकार ने जहाँ मानवीय प्रयत्नों की गरिमा को पूरी कलात्मकता से उजागर किया है, वही यह भी सिद्घ किया है कि मनुष्य नियति और प्रकति के हाथों महज एक खिलौना है । वह समर्थ है, प्रबुद्घ और ज्ञानी भी है, लेकिन उसके सारे सामर्थ्य और ज्ञान की एक सीमा है, जिससे वह अनजान बना रहता है ।

वैसे तुम चेतन हो, तुम प्रबुद्घ ज्ञानी हो, तुम समर्थ, तुम कर्ता, अतिशय अभिमानी हो, लेकिन अचरज इतना तुम कितने भोले हो, ऊपर से ठोस दिखो, अन्दर से पोले हो, बनकर मिट जाने की एक तुम कहानी हो ! भगवती बाबू के इस उपन्यास में मनुष्य की इसी सीमा का प्रभावशाली चित्रण है ।

श्री भगवती चरण वर्मा की एक कविता

मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम मातृ-भू, शत-शत बार प्रणाम ऐ अमरों की जननी, तुमको शत-शत बार प्रणाम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम। तेरे उर में शायित गांधी, 'बुद्ध औ' राम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम। हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक, तेरे चरण चूमता सागर, श्वासों में हैं वेद-ऋचाएँ वाणी में है गीता का स्वर। ऐ संसृति की आदि तपस्विनि, तेजस्विनि अभिराम। मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम। हरे-भरे हैं खेत सुहाने, फल-फूलों से युत वन-उपवन, तेरे अंदर भरा हुआ है खनिजों का कितना व्यापक धन। मुक्त-हस्त तू बाँट रही है सुख-संपत्ति, धन-धाम। मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम। प्रेम-दया का इष्ट लिए तू, सत्य-अहिंसा तेरा संयम, नयी चेतना, नयी स्फूर्ति-युत तुझमें चिर विकास का है क्रम। चिर नवीन तू, ज़रा-मरण से - मुक्त, सबल उद्दाम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम। एक हाथ में न्याय-पताका, ज्ञान-द्वीप दूसरे हाथ में, जग का रूप बदल दे हे माँ, कोटि-कोटि हम आज साथ में। गूँज उठे जय-हिंद नाद से - सकल नगर औ' ग्राम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

मुग़लों ने सल्तनत बख़्श दी- भगवती चरण वर्मा जी की एक सुंदर कहानी 'मुग़लों ने सल्तनत बख़्श दी'। यह एक व्यंग्य हैं, जिसमें लेखक ने अंग्रेजों द्वारा भारत पर धीरे -धीरे कब्जा कर लेने की घटना को बड़े ही रोचक रूप मैं प्रस्तुत किया है। इसमें तत्कालीन मुग़ल साम्राज्य मैं व्याप्त राग, रंग और रोचक रूप मैं प्रस्तुत किया है।

सबहिं नचावत राम गोसाईं

भगवती चरण वर्मा द्वारा रचित यह उपन्यास सर्वप्रथम १९७० में प्रकाशित हुआ था । इस का कालखंड १९२० - २१ से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद १९६० - ६५ तक का है। उपन्यास मूलत: तीन लोगों के आस पास घूमता है, उद्योगपति सेठ राधेश्याम, गृह मंत्री जबर सिंह, तथा पुलिस इंसपेक्टर रामलोचन । तीनो लोग अलग अलग गुणों का प्रतिनिधित्व करतें है। सेठ राधेश्याम एक छोटे से गांव के बनिये का पौत्र है जो घर से निकला था आई सी एस की परीक्षा देने के लिए परन्तु अपनी विलक्षण प्रतिभा, चतुराई और अवसरवादिता से देश का प्रमुख उद्योगपति बन गया। जबर सिंह एक डाकू का वंशज है जिसे उस के भाग्य ने प्रदेश का गृह मंत्री बना दिया । और तीसरा रामलोचन जो कि एक ब्राह्मण परिवार से है तथा मुकदमेबाजी के चलते पुलिस की नौकरी करने को मजबूर था। रामलोचन एक संवेदनशील, निर्मल मन और भावनाशील युवक जो लाग लपेट, छःल कपट से कोसों दूर था, अपने आप को बनावटी लोगों से घिरा पाता है। उपन्यास देश के उस समय के राजनैतिक, सामाजिक परिवेश पर भरपूर व्यंगात्मक छिंटाकशी है। जहाँ राजनीति में भाई भतीजावाद, अवसरवादिता और छुरा घोंप संस्कृति का बोलबाला चरम सीमा पर था वहीं जो उद्योगपति स्वंतत्रता प्राप्ति से पूर्व अंग्रेजों का हुक्का भरते थे, आजादी के आस पास गाँधी टोपी और खादी पहन कांग्रेस के कार्यकर्त्ता बन गए तथा कांग्रेस को चन्दा दे दे कर उन लोगों का अन्य लोगों को क्रय करने का व्यापार पहले से अधिक फलने फूलने लगा। आज़ादी के बाद राजनीति की सत्ता शक्ति और पूंजीवाद की धन शक्ति अब मिल जुल कर पूर्ण आज़ादी से आम जनता के रक्त का रसास्वादन करने लगी । सरकारी अफसर, सामंतवाद, समाजवाद, पूंजीवाद, कम्युनिस्ट या दक्षिणपंथी सभी लेखक के व्यंग पर कसे दिखते हैं । उपन्यास का अन्तिम अध्याय 'उठापटक' पुस्तक का सर्वाधिक रोचक हिस्सा है जिस में कहानी के सारे पात्र इकट्ठे हो जातें है। अपनी हरेक योजना में बिना अवरोध लगातार सफल होने वाले और "समस्त भावना का स्वामी होता है रूपया" का निरंतर जाप करने वाले राधेश्याम जैसे लोगों को ग़लत सिद्ध करने वाला अगर कोई था तो वह था रामलोचन पाण्डेय । भगवती बाबु के प्रत्येक चरित्र के मुंह से निकली बात पाठक के हृदय पर अंकित हो जाती है और हर घटना सोचने को विवश करती है। यह कथा बेशक आधी शताब्दी पूर्व की हो लेकिन आज भी उतनी ही प्रासंगिक और पठनीय है ।

[संपादित करें] प्रकाशित पुस्तकें

उपन्यास

१) अपने खिलौने

२) पतन

३) तीन वर्ष

४) चित्रलेखा

५) भूले-बिसरे चित्र

६) टेढे़-मेढे़ रास्ते

७) सीघी सच्ची बातें

८) सामर्थ्य और सीमा

९) रेखा

१०) वह फिर नही आई

११) सबहिं नचावत राम गोसाई

१२) प्रश्न और मरीचिका

१३) युवराज चूण्डा


१४) घुप्पल

कहानी-संग्रह

मोर्चाबंदी

कविता-संग्रह

१) सविनय

२) एक नाराज कविता

नाटक

१) वसीहत

२) रुपया तुम्हें खा गया

संस्मरण

अतीत के गर्भ से

साहित्यालोचन

१) साहित्य के सिद्घातं

२) रुप

[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ

[संपादित करें] ये भी देखें

वैयक्तिक औज़ार
नामस्थान

संस्करण
क्रियाएं
परिभ्रमण
योगदान
सहायता
उपकरण
मुद्रण/निर्यात
अन्य भाषाएँ