भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् अभयचरणारविन्द भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद (1 सितंबर, 1896 – 14 नवंबर, 1977), इण्टरनेशनल सोसायटी फ़ार कृष्णा कान्शियस्नेस यानी इस्कॉन (ISKCON), (कृष्ण चेतना हेतु अन्तर्राष्ट्रीय समाज) के संस्थापक थे। यह गौड़ीय वैष्णव धर्म का प्रसार करने हेतु बनी संस्था थी। यह न केवल भारत, वरन पूरे विश्व में फ़ैली है।
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[संपादित करें] जीवनी
कोलकाता के एक साधारण परिवार में सन् 1896 में जन्मे अभयचरण (प्रभुपाद) ने वर्षों तक वृंदावन के राधादामोदर मंदिर में रहकर भजन साधना की व धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया। इनकी अनोखी प्रतिभा को देखकर इनके आध्यात्मिक गुरु श्रीभक्ति सिद्धांत सरस्वती ने इन्हें प्रेरणा दी कि तुम चैतन्य महाप्रभु की कृष्णभावनामृत को विश्व में प्रचारित करने की इच्छा को पूरी करने में सक्षम हो।
अपने गुरु के आदेश पर स्वामी प्रभुपाद 69 वर्ष की आयु में 11 अगस्त, 1965 को पानी के जहाज जलदूत पर सवार होकर अमेरिका की ओर निकल पड़े। लेकिन इस प्रथम विदेश प्रस्थान के समय न तो उनके पास उत्साहवर्धक व ऊर्जावान यौवन था और न ही मित्र, न अनुयायी, और तो और उनके पास समूचे पाश्चात्य जगत में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन का प्रचार-प्रसार करने हेतु किसी स्पष्ट योजना व अपनी जीविका के निश्चित साधन का भी अभाव था।
ऐसे में भगवद्धाम का संदेश लेकर विदेशी धरती पर पहुंचे अपूर्व जीवट वाले भारतीय मनीषी, तत्वचिंतक व भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन में अटूट आस्था वाले इस संत को आत्मबल व दृढ़ विश्वास की पूंजी के सहारे ही अपना मार्ग खोजना था और यह मार्ग उन्हें मिला भी। हृदय के तारों को झंकृत करती उनकी वाणी, दर्शन व विचारों को अमेरिकी समाज ने गंभीरता से लिया और बड़ी संख्या में लोग उनकी पुस्तकों, उपदेशों सीधी सरल बातों, कीर्तन व सादा जीवन शैली से प्रभावित होकर उनसे जुड़ते चले गए।
14 नवंबर 1977 को 81 वर्ष की आयु में उनका गोलोकवास हो गया। इन बारह सालों में प्रभुपाद ने न केवल 12 बार संपूर्ण विश्व भ्रमण किया बल्कि 51 खंडों में व 28 भाषाओं में अपनी सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित करके वैदिक धर्म, दर्शन व संस्कृति से समूचे विश्व को जोड़ने का महती प्रयास किया और कृष्ण भावनामृत के लाखों अनुगामी बना दिए। प्रभुपाद ने जुलाई 1966 में न्यूयार्क शहर के लोअर ईस्ट साइड के एक उपेक्षित से स्टोर फ्रंट में अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) की स्थापना की थी। आज विश्व में इस्कॉन के अनुयायियों की संख्या करोड़ों में है और यह संस्था दुनियाभर में 300 से अधिक भव्य व समृद्ध मंदिरों, गुरुकुल, कृषि क्षेत्र व विशेष योजनाओं को संचालित कर रहा है। प्रभुपाद द्वारा स्थापित भक्ति वेदांत बुक ट्रस्ट संसार में वैदिक साहित्य का सबसे बड़ा प्रकाशक है।
[संपादित करें] प्रणती
- नमः ओम विष्णुपादाय कृष्णप्रेष्ठाय भूतले
- श्रीमते भक्तिवेदांत स्वामिन् इति नामिने ।
- नमस्ते सारस्वते देवे गौरवाणी प्रचारिणे
- निर्विशेष शून्यवादी पश्र्यात्य देश तारिणे ॥
[संपादित करें] इन्हें भी देखें
[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ
- "Bhaktivedanta VedaBase - Srila Prabhupada's books online". http://vedabase.net/en/.
- "BBT - Publishing House". http://www.bbt.info/.
- "iskcon.com - About A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada". http://www.iskcon.com/about/parampara/srila_prabupada.html.
- "Letters by Srila Prabhupada - Anthology". http://www.prabhupada.blogspot.com/.
- "The Bhaktivedanta Archives". http://www.prabhupada.com/books.html.
- "Photos and Audio of Srila Prabhupada". http://www.prabhupada.krishna.com/.
- "Srila Prabhupada’s Presentation of Srimati Radharani". http://www.sdgonline.org/radha/radharani_prabhupada.html.
- "Catalogue and online lectures by Srila Prabhupada". http://www.prabhupadavani.org/main/page_lectures_directory.html.
- प्रभुपाद के भजनों का संग्रह