बासमाची विद्रोह

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ऍनवर पाशा एक तुर्की सिपहसालार थे जिन्होंने बासमाची विद्रोहियों को अपने नेतृत्व में संगठित करने का असफल प्रयास किया

बासमाची विद्रोह (रूसी: Басмачество, बासमाचेस्त्वो, Basmachi) सोवियत संघ और, सोवियत संघ के बनने से पहले, रूस की शाही सरकार के विरुद्ध मध्य एशिया में बसने वाले तुर्की भाषाएँ बोलने वाले मुस्लिम समुदायों के विद्रोहों के एक सिलसिले को कहते हैं जो सन् १९१६ से १९३१ तक चले। 'बासमाची' शब्द उज़बेक भाषा से लिया गया है, जिसमें इसका अर्थ 'डाकू' होता है, और यह हिन्दी भाषा में पाए जाने वाले 'बदमाश' शब्द का एक रूप है।[1]

मध्य एशिया के तुर्किस्तान क्षेत्र में रूसी क़ब्ज़े और उसके बाद की साम्राज्यवादी नीतियों से वहाँ की पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था काफ़ी गड़बड़ा गई थी जिस से वहाँ की जनता में रोष बन रहा था। विद्रोह की सबसे पहली चिंगारियाँ तब भड़कीं जब १९१६ में रूसी शाही सरकार ने प्रथम विश्वयुद्ध के लिए ज़बरदस्ती तुर्की मुस्लिम युवकों को फ़ौज में भारती करने की कोशिश कर रही थी।[2] १९१७ की अक्तूबर समाजवादी क्रांति के बाद फ़रग़ना घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जो अन्य क्षेत्रों में फैलने लगी। सोवियत संघ और रूसियों के खिलाफ़ हमले कई वर्षों तक बहुत से इलाक़ों में चले और इन उग्रवादियों को 'बासमाची' नाम दिया गया। कुछ अरसे तक बहुत से ग़ैर-शहरी क्षेत्रों में बासमाचियों का नियंत्रण था हालांकि उनपर सोवियत लाल सेना का दबाव निरंतर बना रहा।[3] बहुत से बासमाची नेताओं ने पड़ोसी अफ़्ग़ानिस्तान को अपना अड्डा बनाया और अफ़्ग़ान मददगारों से सहायता भी लेते रहे। सोवियत संघ ने उस समय भारत पर शासन कर रहे ब्रिटिश राज पर भी बासमाचियों की मदद करने का इलज़ाम लगाया।[4]

ऍनवर पाशा की भूमिका और विद्रोह का अंत[संपादित करें]

नवम्बर १९२१ में तुर्की के भूतपूर्व रक्षामंत्री, ऍनवर पाशा (तुर्की: Enver Paşa), सोवियत संघ की बासमचियों के खिलाफ़ सहायता करने के लिए बुख़ारा पहुँचे। उनमें तुर्की जातियों के लिए हमदर्दी थी इसलिए वे सोवियत संघ की मदद करने की बजाए बासमाचियों से जा मिले और उनके सबसे महत्वपूर्ण नेता बन गए। उनका सपना था कि पूर्वी तुर्केस्तान (जो आधुनिक चीन का शिनजियांग प्रांत है) से लेकर तुर्की तक एक महान तुर्की परिसंघ खड़ा हो जाए। उन्होंने जिहाद का नारा दिया और १६,००० लड़ाकों की बासमाची सेना तैयार कर ली। इस सब के बाद भी बासमाची कभी भी पूरी तरह संगठित नहीं हो सके और भिन्न जातियों-क़बीलों के आधार पर बंटे रहे। सोवियत संघ ने भी यहाँ के समुदायों पर एक तरफ़ तो सोवियतकरण और रूसीकरण का दबाव बनाए रखा लेकिन दूसरी ओर सरकार की नास्तिक नीतियों के बावजूद धर्म के मामले में थोड़ी रियायत और ढील देनी शुरू कर दी। उन्होंने बासमाची ठिकानों की हवाई बमबारी भी शुरू कर दी। जून १९२२ में सोवियत टुकड़ियों ने कफ़रून के युद्ध में बामाचियों को हरा दिया। खेल ख़त्म जानकर ऍनवर पाशा ने ४ अगत १९२२ को सोवियत फ़ौजों पर सीधा आक्रमण किया, जिसमें वे मारे गए। सोवियत सैन्य जीतों और सामाजिक स्तर पर मध्य एशिया के निवासियों के लिए अधिक सहनीय वातावरण से समय के साथ-साथ बासमाची विद्रोह शांत हो गया।[5][6]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Inside Central Asia: a political and cultural history of Uzbekistan, Turkmenistan, Kazakhstan, Kyrgyzstan, Tajikistan, Turkey, and Iran, Dilip Hiro, Penguin, 2009, ISBN 978-1-59020-221-0, ... The Communists' major problem now was how to counter the continuing nationalist Basmachi (meaning “bandit” in Uzbek) movement ...
  2. Central Asia: its strategic importance and future prospects, Hafeez Malik (editor), Palgrave Macmillan, 1996, ISBN 978-0-312-16452-2, ... Impact of Afghanistan's War on the Former Soviet Republics of Central Asia (Victor Spolnikov) ... These colonial policies, and especially the June 25, 1916, decree ordering the mobilization of almost half a million Muslim men for military service behind the front lines, 'touched off a chain reaction of rebellion,' but it was suppressed ...
  3. A modern history of the Islamic world, Reinhard Schulze, NYU Press, 2002, ISBN 978-0-8147-9819-5, ... Until 1924 the Basmachi, though they experienced many vicissitudes, exercised military control over the rural areas of Turkestan ...
  4. The history of the Central Asian republicsThe Greenwood histories of the modern nations, Peter Roudik, Greenwood Publishing Group, 2007, ISBN 978-0-313-34013-0, ... The Russians blamed aid from the Afghan emir and British arms in continuing fierce resistance to the Red Army. The Basmachis lost their dominance in local affairs after the Afghani emir stopped supporting the insurgents ...
  5. Turkmenistan: Strategies of Power, Dilemmas of Development, Sebastien Peyrouse, M.E. Sharpe, 2011, ISBN 978-0-7656-3203-6, ... The Basmachi did not constitute a united political or centralized tactical opposition ...
  6. Setting the East ablaze: Lenin's dream of an empire in Asia, Peter Hopkirk, Kodansha Globe, 1995, ISBN 978-1-56836-102-4, ... in a bid to break the basmachi for good and woo the Muslim masses to the Bolshevik cause, Lenin himself decided to take an enormous gamble. The man he chose to carry out his plan was a former Turkish general named Enver Pasha ...