बाबरी मस्जिद

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बाबरी मस्जिद
बाबरी मस्जिद

बाबरी मस्जिद का पश्च दृश्य

निर्देशांक: 26°47′44″N 82°11′40″E / 26.7956°N 82.1945°E / 26.7956; 82.1945Erioll world.svgनिर्देशांक: 26°47′44″N 82°11′40″E / 26.7956°N 82.1945°E / 26.7956; 82.1945
स्थान अयोध्या, भारत्
स्थापित निर्माण - 1527
विध्वंस - 1992
वास्तु संबंधित सूचनायें
वास्तु शैली तुग़लकी

बाबरी मस्जिद (हिन्दी: बाबरी मस्जिद,उर्दू: بابری مسجد, अनुवाद: बाबर की मस्जिद ), उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अयोध्या शहर में रामकोट पहाड़ी ("राम का किला") पर एक मस्जिद थी. रैली के आयोजकों द्वारा मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाने देने की भारत के सर्वोच्च न्यायालय से वचनबद्धता के बावजूद, 1992 में 150,000 लोगों की एक राजनीतिक रैली[1] के दंगा में बदल जाने से यह विध्वस्त हो गयी.[2][3] मुंबई और दिल्ली सहित कई प्रमुख भारतीय शहरों में इसके फलस्वरूप हुए दंगों में 2,000 से अधिक लोग मारे गये.[4]

भारत के प्रथम मुगल सम्राट बाबर के आदेश पर 1527 में इस मस्जिद का निर्माण किया गया था.[5][6] पुजारियों से हिन्दू ढांचे या निर्माण को छीनने के बाद मीर बाकी ने इसका नाम बाबरी मस्जिद रखा. 1940 के दशक से पहले, मस्जिद को मस्जिद-इ-जन्मस्थान (हिन्दी: मस्जिद ए जन्मस्थान,उर्दू: مسجدِ جنمستھان, अनुवाद: "जन्मस्थान की मस्जिद") कहा जाता था, इस तरह इस स्थान को हिन्दू ईश्वर, भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है.[7] पुजारियों से हिन्दू ढांचे को छीनने के बाद मीर बाकी ने इसका नाम बाबरी मस्जिद रखा.

बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश, भारत के इस राज्य में 3 करोड़ 10 लाख मुस्लिम रहा करते हैं, की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक थी.[8] हालांकि आसपास के जिलों में और भी अनेक पुरानी मस्जिदें हैं, जिनमे शरीकी राजाओं द्वारा बनायी गयी हज़रत बल मस्जिद भी शामिल है, लेकिन विवादित स्थल के महत्व के कारण बाबरी मस्जिद सबसे बड़ी बन गयी. इसके आकार और प्रसिद्धि के बावजूद, जिले के मुस्लिम समुदाय द्वारा मस्जिद का उपयोग कम ही हुआ करता था और अदालतों में हिंदुओं द्वारा अनेक याचिकाओं के परिणामस्वरूप इस स्थल पर राम के हिन्दू भक्तों का प्रवेश होने लगा. बाबरी मस्जिद के इतिहास और इसके स्थान पर तथा किसी पहले के मंदिर को तोड़कर या उसमें बदलाव लाकर इसे बनाया गया है या नहीं, इस पर चल रही राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक बहस को अयोध्या बहस के नाम से जाना जाता है.

मस्जिद की वास्तुकला[संपादित करें]

Babri Mosque


मुग़ल साम्राज्य अर्थात दिल्ली की सल्तनत के शासक और उनके उत्तराधिकारी कला और स्थापत्य के बहुत बड़े संरक्षक थे और उन्होंने अनेक उत्कृष्ट मकबरों, मस्जिदों और मदरसाओं का निर्माण किया. इनमें एक विशिष्ट शैली है, जिनपर 'तुगलक उत्तरकालीन' वास्तुकला के प्रभाव हैं. पूरे भारत में मस्जिदें अलग-अलग शैलियों में बनायी गयी थीं; सबसे सुंदर शैलियां उन क्षेत्रों में विकसित हुई जहां देशी पारंपरिक कला बहुत मजबूत थी और स्थानीय कारीगर अत्यंत ही कुशल थे. इसीलिए क्षेत्रीय या प्रांतीय शैलियों की मस्जिदें स्थानीय मंदिरों या घरेलू शैलियां से विकसित हुईं, जो कि वहां की जलवायु, भूभाग, सामग्रियों द्वारा अनुकूलित थे; इसीलिए बंगाल, कश्मीर और गुजरात की मस्जिदों में भारी अंतर है. बाबरी मस्जिद ने जौनपुर की स्थापत्य पद्धति का अनुकरण किया.

एक विशिष्ट शैली की एक महत्वपूर्ण मस्जिद बाबरी मुख्यतया वास्तुकला में संरक्षित रही, जिसे दिल्ली सल्तनत की स्थापना (1192) के बाद विकसित किया गया था. हैदराबाद के चारमीनार (1591) चौक के बड़े मेहराब, तोरण पथ, और मीनार बहुत ही खास हैं. इस कला में पत्थर का व्यापक उपयोग किया गया है और 17वीं सदी में मुगल कला के स्थानांतरित होने तक जैसा कि ताजमहल जैसी संरचनाओं द्वारा दिखाई पड़ता है; मुसलमानों के शासन में भारतीय अनुकूलन प्रतिबिंबित होता है.

एक संलग्न आंगन के साथ परंपरागत हाइपोस्टाइल योजना पश्चिमी एशिया से आयात की गयी, जो आम तौर पर नए क्षेत्रों में इस्लाम के प्रवेश के साथ जुड़ी हुई है, लेकिन बाद में स्थानीय आबोहवा और जरुरत के हिसाब से अधिक उपयुक्त योजनाओं के कारण इसे त्याग दिया गया. बाबरी मस्जिद स्थानीय प्रभाव और पश्चिम एशियाई शैली का मिश्रण थी और भारत में इस प्रकार की मस्जिदों के उदाहरण आम हैं.

तीन गुंबदों के साथ बाबरी मस्जिद की भव्य संरचना थी, तीन गुंबदों में से एक प्रमुख था और दो गौण. यह दो ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था, जो एक दूसरे के समानांतर थीं और एक कुएं के साथ एक बड़ा-सा आंगन संलग्न था, उस कुएं को उसके ठंडे व मीठे जल के लिए जाना जाता है. गुंबददार संरचना के ऊंचे प्रवेश द्वार पर दो शिलालेख लगे हुए हैं जिनमे फ़ारसी में दो अभिलेख दर्ज हैं, जो घोषित करते हैं कि बाबर के आदेश पर किसी मीर बाक़ी ने इस संरचना का निर्माण किया. बाबरी मस्जिद की दीवारें भौंडे सफेद रेतीले पत्थर के खंडों से बने हैं, जिनके आकार आयताकार हैं, जबकि गुंबद पतले और छोटे पके हुए ईंटों के बने हैं. इन दोनों संरचनात्मक उपादानों को दानेदार बालू के साथ मोटे चून के लसदार मिश्रण से पलस्तर किया गया है.

मध्य आंगन बड़ी मात्रा में वक्र स्तंभों से घिरा हुआ था, छत की ऊंचाई बढ़ाने के लिए ऐसा किया गया था. योजना और वास्तुकला जहांपनाह की बेगमपुर शुक्रवार मस्जिद से प्रभावित थी, न कि मुगल शैली से, जहां हिंदू राजमिस्त्री अपनी सीधी संरचनात्मक और सजावटी परंपराओं का इस्तेमाल किया करते थे. उनकी दस्तकारी की उत्कृष्टता उनके वानस्पतिक इमारती सजावट और कमल आकृति में साफ दिखती है. ये बेलबूटे फिरोजाबाद के फिरोज शाह मस्जिद (ई.सं. 1354), जो अब एक उजड़ी हुई स्थिति में है, किला कुहना मस्जिद (ई.सं. 1540), दीवार गौड़ शहर के दक्षिणी उपनगर की दरसबरी मस्जिद और शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित जमाली कामिली मस्जिद में भी मौजूद हैं. यह अकबर द्वारा अपनाई गयी भारत-इस्लामी शैली का अग्रवर्ती था.

बाबरी मस्जिद ध्वनिक और शीतलन प्रणाली[संपादित करें]

लॉर्ड विलियम बेंटिक (1828–1833) के वास्तुकार ग्राहम पिकफोर्ड के अनुसार "बाबरी मस्जिद के मेहराब से एक कानाफूसी भी दूसरे छोर से, 200 फीट [60 मी] दूर और मध्य आंगन की लंबाई और चौडाई से, सुनी जा सकती है." उनकी पुस्तक "हिस्टोरिक स्ट्रक्चर्स ऑफ़ अवध" (अवध अर्थात अयोध्या) में उन्होंने मस्जिद की ध्वनिकी का उल्लेख किया है, जहां वे कहते हैं "किसी 16वीं सदी की इमारत में मंच से आवाज का फैलाव और प्रक्षेपण अत्यधिक उन्नत है, इस संरचना में ध्वनि का अद्वितीय फैलाव आगंतुक को चकित कर देगा."

आधुनिक वास्तुकारों ने इस ध्वनिक विशेषता के लिए मेहराब की दीवार में बड़ी खाली जगह और चारों ओर की दीवारों में अनेक खाली जगहों को श्रेय दिया है, जो अनुनादक परिपथ के रूप में काम करती हैं; इस डिजाइन ने मेहराब के वक्ता को सुनने में सबकी मदद की. बाबरी मस्जिद के निर्माण में इस्तेमाल किये गये रेतीले पत्थर भी अनुनादक किस्म के थे, जिनका अद्वितीय ध्वनिकी में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा.

बाबरी मस्जिद की तुगलकी शैली अन्य स्वदेशी डिजाइन घटकों और तकनीक के साथ एकीकृत हुई, जैसे कि मेहराब, मेहराबी छत और गुम्बज जैसे इस्लामी वास्तुशिल्प तत्वों के आवरण में वातानुकूलित प्रणाली. बाबरी मस्जिद की एक शांतिपूर्ण पर्यावरण नियंत्रण प्रणाली में ऊंची छतें, गुम्बज और छः बड़ी जालीदार झरोखे शामिल रहे थे. यह प्रणाली प्राकृतिक रूप से अंदरुनी भाग को ठंडा रखने और साथ ही सूर्य के प्रकाश को आने में मदद करती थी.

बाबरी मस्जिद के चमत्कारी कुएं की किंवदंती[संपादित करें]

मस्जिद के बीचोंबीच आंगन के गहरे कुएं में औषधीय गुणों की खबर विभिन्न खबरों में स्थान पाती रही है, जैसा कि दिसंबर 1989 में बीबीसी (BBC) और विभिन्न समाचारपत्रों में खबरें प्रकाशित हुईं. बाबरी के कुएं के पानी के संबंध में पूर्व विवरण का संदर्भ दो पंक्तियों में 1918 के फैजाबाद जिला गजट में दिया गया है, जिसमें कहा गया है "यहां कोई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतें नहीं है, सिवाय बौद्ध तीर्थों के. कुएं के साथ बाबरी मस्जिद एक प्राचीन संरचना है, जिसके चमत्कारी गुण पर हिंदू और मुसलमान दोनों ही दावा करते हैं."

अयोध्या हिंदुओं का तीर्थ स्थल है और हिंदू तथा मुस्लिम दोनों धर्मों में आस्था रखनेवाले 500,000 से भी अधिक लोगों द्वारा नियमित रूप से यहां सालाना राम महोत्सव मनाया जाता है, और बाबरी मस्जिद के प्रांगण के कुएं से बहुत सारे भक्त पानी पीने आते हैं. मान्यता यह है कि इस कुएं का पानी पीने से बहुत सारी बीमारियों का इलाज हो सकता है. हिंदू तीर्थयात्रियों का यह भी मानना हैं कि बाबरी पानी का कुआं वास्तव में मस्जिद के नीचे राम मंदिर का ही था. अयोध्या के मुसलमानों का मानना था कि कुआं अल्लाह द्वारा दी गयी नियामत है. स्थानीय महिलाएं इस प्रसिद्ध आरोग्यकारी पानी को पिलाने के लिए नियमित रूप से अपने नवजात बच्चों को लेकर आती हैं.

125 फुट (40 मीटर) गहरा कुआं बाबारी मस्जिद के बहुत ही बड़े आयताकार प्रांगण के दक्षिण-पूर्व भाग में अवस्थित था. 1890 में वहां कुएं के साथ भगवान राम की एक मूर्ति को जोड़ कर एक छोटा-सा हिंदू मंदिर बनवाया गया. यह एक उत्स्रुत (आर्टीजि़यन) कुआं था और नीचे काफी गहराई में भौम जल स्तर से पानी ऊपर आता था. त्रिज्या में ग्यारह फीट (3 मीटर), जमीनी स्तर से ऊपर 30 फीट (10 मीटर) तक यह ईंटों का बना हुआ था. जलाशय में शीस्ट रेत और बजरी के स्तर पर जमे पानी को खींच कर निकाला जाता था, जिसे असामान्य रूप से ठंडे तापमान का पानी कहा जा सकता था. इस पानी में सोडियम लगभग नहीं था, जिसने इसे 'मीठे' पानी के रूप में ख्याति प्रदान की. कुआं तक पहुंचने के लिए तीन फुट (1 मीटर) के प्लेटफॉर्म पर चढ़ना होता, जहां यह कुआं एक अव्यवस्थित चोर दरवाजे के साथ लकड़ी की मोटी तख्ती से ढंका होता था. एक बाल्टी और लंबी रस्सी के द्वारा पानी खींच कर निकाला जाता था और इसमें 'आध्यात्मिक गुण' होने का दावा किए जाने के कारण इसका इस्तेमाल केवल पीने के लिए ही होता था. अयोध्या में हिंदुओं और मुसलमानों में इस ठंडे और विशुद्ध भूमिगत जल के चमत्कारी गुण पर गहरी आस्था थी, जिससे स्थानीय लोक मान्यता सुदृढ़ हुई.

इतिहास[संपादित करें]

हिंदू व्याख्या[संपादित करें]

1527 में फरगना से जब मुसिल्म सम्राट बाबर आया तो उसने सिकरी में चित्तौड़गढ़ के हिंदू राजा राणा संग्राम सिंह को तोपखाने और गोला-बारूद का इस्तेमाल करके हाराया. इस जीत के बाद, बाबर ने उस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया, उसने अपने सेनापति मीर बाकी को वहां का सूबेदार बना दिया.

मीर बाकी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण कर इसका नामकरण सम्राट बाबर के नाम पर किया.[9] बाबर के रोजनामचा बाबरनामा में वहां किसी नई मस्जिद का जिक्र नहीं है, हालांकि रोजमानचे में उस अवधि से संबंद्ध पन्ने गायब हैं. समकालीन तारीख-ए-बाबरी कहता है कि बाबर की सेना ने "चंदेरी में बहुत सारे हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था."[10]

1992 में ध्वस्त ढांचे के मलबे से निकले एक मोटे पत्थर के खंड के अभिलेख से उस स्थल पर एक पुराने हिंदू मंदिर के पैलियोग्राफिक (लेखन के प्राचीनकालीन रूप के अध्ययन) प्रमाण प्राप्त हुए. विध्वंस के दिन 260 से अधिक अन्य कलाकृतियां और प्राचीन हिंदू मंदिर का हिस्सा होने के और भी बहुत सारे तथ्य भी निकाले गये. शिलालेख में 20 पंक्तियां, 30 श्लोक (छंद) हैं, और इसे संस्कृत में नागरी लिपि में लिखा गया है. ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी में 'नागरी लिपि' प्रचलित थी. प्रो. ए. एम. शास्त्री, डॉ. के. वी. रमेश, डॉ. टी. पी. वर्मा, प्रो. बी.आर. ग्रोवर, डॉ. ए.के. सिन्हा, डॉ. सुधा मलैया, डॉ. डी. पी. दुबे और डॉ. जी. सी. त्रिपाठी समेत पुरालेखवेत्ताओं, संस्कृत विद्वानों, इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के दल द्वारा गूढ़ लेखों के रूप में संदेश के महत्वपूर्ण भाग को समझा गया.

शुरू के बीस छंद राजा गोविंद चंद्र गढ़वाल (1114-1154 ई.) और उनके वंश की प्रशंसा करते हैं. इक्कीसवां छंद इस प्रकार कहता है: "वामन अवतार (बौने ब्राह्मण के रूप में विष्णु के अवतार) के चरणों में शीश नवाने के बाद अपनी आत्मा की मुक्ति के लिए राजा ने विष्णु हरि (श्री राम) के अद्भुत मंदिर के लिए संगमरमर के खंबे और आकाश तक पहुंचनेवाले पत्थर की संरचना का निर्माण करने और शीर्ष चूड़ा को बहुत सारे सोने से मढ़ दिया और वाण का मुंह आकाश की ओर करके इसे पूरा किया - यह एक ऐसा भव्य मंदिर है जैसा इससे पहले देश के इतिहास में किसी राजा ने नहीं बनाया."

इसमें आगे भी कहा गया है कि यह मंदिर, मंदिरों के शहर अयोध्या में बनाया गया था.

एक अन्य संदर्भ में, एक महंत रघुबर दास द्वारा दायर शिकायत पर फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने 18 मार्च 1886 को फैसला सुनाया था. हालांकि शिकायत को खारिज कर दिया गया था, फिर भी फैसले में दो प्रासंगिक तथ्य निकल कर आए:

"मैंने पाया कि सम्राट बाबर द्वारा निर्मित मस्जिद अयोध्या नगर की सीमा पर स्थित है. सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मस्जिद ऐसी विशेष जमीन पर बनायी गयी है कि जो हिंदुओं द्वारा पूज्य है, लेकिन चूंकि यह घटना 358 साल पहले की है, इसीलिए इस शिकायत के प्रतिकार के लिए अब बहुत देर हो चुकी है. जो किया जा सकता है वह यह कि सभी पक्षों द्वारा यथास्थिति को बनाए रखा जाए. ऐसे किसी मामले में जैसा कि वर्तमान मामला है, किसी भी तरह का नवप्रवर्तन लाभ के बजाए और भी अधिक नुकसान और शांति में खलल पैदा करेगा."

जैन व्याख्या[संपादित करें]

जैनियों के सामाजिक संगठन जैन समता वाहिनी के अनुसार, "उत्खनन के दौरान अगर कोई संरचना यहां मिलती है तो वह केवल छठी सदी का जैन मंदिर ही हो सकती है."

जैन समता वाहिनी के महासचिव सोहन मेहता का दावा है कि बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद सुलझाने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर एएसआई द्वारा किया गया उत्खनन इस बात को प्रमाणित कर देता है कि विवादित ध्वस्त ढांचा वास्तव में, एक प्राचीन जैन मंदिर के अवशेष पर बनाया गया था.

मेहता 18वीं शताब्दी के जैन भिक्षुओं की रचानाओं का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि अयोध्या वह जगह हैं जहां पांच जैन तीर्थंकर, ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और अनंतनाथ रहा करते थे. 1527 से पहले यह प्राचीन शहर जैन धर्म और बौद्ध धर्म के पांच बड़े केंद्रों में से एक रहा है.[11]

मुस्लिम व्याख्या[संपादित करें]

ऐसा कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड इस तथ्य की ओर संकेत नहीं करता है कि 1528 में जब मीर बाकी ने मस्जिद स्थापित की, उस समय यहां अस्तित्व में रहे किसी हिंदू मंदिर का विध्वंस किया गया था. 23 दिसंबर 1949 को जब अवैध रूप से मस्जिद में राम की मूर्तियों को रखा गया, तब प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यूपी के मुख्यमंत्री जेबी पंत को पत्र लिखकर उस गडबडी को सुधारने की मांग की; क्योंकि "इससे वहां एक खतरनाक मिसाल स्थापित होती है." स्थानीय प्रशासक, फैजाबाद उपायुक्त के. के. नायर ने नेहरू की चिंताओं को खारिज कर दिया. हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि मूर्तियों की स्थापना "एक अवैध कार्य थी", नायर ने मस्जिद से उन्हें हटाने से मना करते हुए यह दावा किया कि "इस गतिविधि के पीछे जो गहरी भावना है ... उसे कम करके नहीं आंका जाना चाहिए." 2010 में, हिंदू धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए हजारों पृष्ठों के फैसले में उच्च न्यायालय ने जमीन का दो-तिहाई हिंदू मंदिर को दे दिया, लेकिन 1949 के अधिनियम की अवैधता की जांच में बहुत कम प्रयास किये गये. मनोज मिट्टा के अनुसार, "एक तरह से मस्जिद को मंदिर में तब्दील करने के लिए मूर्तियों के साथ छेड़छाड़ किया जाना, स्वत्वाधिकार मुकदमा के अधिनिर्णय का केंद्र था." [12]

मुसलमानों और अन्य आलोचकों का दावा है कि पुरातत्व रिपोर्ट जो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और हिंदू मुन्नानी जैसे अतिवादी हिंदू संगठनों द्वारा बाबरी मस्जिद स्थल पर किए गए दावे पर भरोसा करके तैयार किये गए हैं, वे राजनीति से प्रेरित है. आलोचकों का कहना है कि एएसआई (ASI) द्वारा "हर जगह पशु की हड्डियों के साथ-साथ 'सुर्खी' और चूना-गारा पाया गया", ये सभी मुसलमानों की मौजूदगी के लक्षण है जो कि "बाबरी मस्जिद के नीचे हिंदू मंदिर की संभावना को खारिज करते हैं," लेकिन रिपोर्ट में 'खंभों की बुनियाद' के आधार पर दावा किया जाना इसके साथ "साफ तौर पर धोखाधड़ी" है क्योंकि कोई खंभा नहीं पाया गया और कथित तौर पर खंभे की बुनियाद के अस्तित्व पर पुरातत्वविदों द्वारा तर्क-वितर्क किया गया है[13].

ब्रिटिश व्याख्या[संपादित करें]

"1526 में पानीपत में विजय प्राप्त करने के बाद बाबर के कदम हिंदुस्तान पर पड़े और अफगानी वंश के लोधी को परास्त कर वर्तमान संयुक्त प्रांत के पूर्वी जिलों और मध्य दोआब, अवध पर कब्जा करते हुए वह आगरा की ओर बढ़ा. 1527 में, बाबर के मध्य भारत से लौटने पर, कन्नौज के पास दक्षिणी अवध में उसने अपने विरोधियों को हरा दिया, और प्रांत को पार करते हुए बहुत दूर तक जाते हुए अयोध्या तक पहुंच गया, जहां उसने 1528 में एक मस्जिद का निर्माण किया. 1530 में बाबर की मृत्यु के बाद अफगान बादशाह विपक्षी बने रहे, लेकिन अगले वर्ष लखनऊ के पास उन्हें हरा दिया." इम्पीरियल गजट ऑफ इंडिया 1908 भाग XIX पृष्ठ 279-280

स्थल को लेकर संघर्ष[संपादित करें]

आधुनिक समय में इस मसले पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा की पहली घटना 1853 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल के दौरान दर्ज की गयी. निर्मोही नामक एक हिंदू संप्रदाय ने ढांचे पर दावा करते हुए कहा कि जिस स्थल पर मस्जिद खड़ा है वहां एक मंदिर हुआ करता था, जिसे बाबर के शासनकाल के दौरान नष्ट कर दिया गया था. अगले दो वर्षों में इस मुद्दे पर समय-समय पर हिंसा भड़की और नागरिक प्रशासन को हस्तक्षेप करते हुए इस स्थल पर मंदिर का निर्माण करने या पूजा करने की अनुमति देने से इंकार करना पड़ा.

फैजाबाद जिला गजट 1905 के अनुसार, "इस समय (1855) तक, हिंदू और मुसलमान दोनों एक ही इमारत में इबादत या पूजा करते रहे थे. लेकिन विद्रोह (1857) के बाद, मस्जिद के सामने एक बाहरी दीवार डाल दी गयी और हिंदुओं को अदंरुनी प्रांगण में जाने, वेदिका (चबूतरा), जिसे उन लोगों ने बाहरी दीवार पर खड़ा किया था, पर चढ़ावा देने से मना कर दिया गया."

1883 में इस चबूतरे पर मंदिर का निर्माण करने की कोशिश को उपायुक्त द्वारा रोक दिया गया, उन्होंने 19 जनवरी 1885 को इसे निषिद्ध कर दिया. महंत रघुवीर दास ने उप-न्यायाधीश फैजाबाद की अदालत में एक मामला दायर किया. 17 फीट x 21 फीट माप के चबूतरे पर पंडित हरिकिशन एक मंदिर के निर्माण की अनुमति मांग रहे थे, लेकिन मुकदमे को बर्खास्त कर दिया गया. एक अपील फैजाबाद जिला न्यायाधीश, कर्नल जे.ई.ए. चमबिअर की अदालत में दायर किया गया, स्थल का निरीक्षण करने के बाद उन्होंने 17 मार्च 1886 को इस अपील को खारिज कर दिया. एक दूसरी अपील 25 मई 1886 को अवध के न्यायिक आयुक्त डब्ल्यू. यंग की अदालत में दायर की गयी थी, इन्होंने भी इस अपील खारिज कर दिया. इसी के साथ, हिंदुओं द्वारा लड़ी गयी पहले दौर की कानूनी लड़ाई का अंत हो गया.

1934 के "सांप्रदायिक दंगों" के दौरान, मस्जिद के चारों ओर की दीवार और मस्जिद के गुंबदों में एक गुंबद क्षतिग्रस्त हो गया था. ब्रिटिश सरकार द्वारा इनका पुनर्निर्माण किया गया.

मस्जिद और गंज-ए-शहीदन कब्रिस्तान नामक कब्रगाह से संबंधित भूमि को वक्फ क्र. 26 फैजाबाद के रूप में यूपी सुन्नी केंद्रीय वक्फ (मुस्लिम पवित्र स्थल) बोर्ड के साथ 1936 के अधिनियम के तहत पंजीकृत किया गया था. इस अवधि के दौरान मुसलमानों के उत्पीड़न की पृष्ठभूमि की क्रमशः 10 और 23 दिसंबर, 1949 की दो रिपोर्ट दर्ज करके वक्फ निरीक्षक मोहम्मद इब्राहिम द्वारा वक्फ बोर्ड के सचिव को दिया गया था.

पहली रिपोर्ट कहती है "मस्जिद की तरफ जानेवाले किसी भी मुस्लिम टोका गया और नाम वगैरह ... लिया गया. वहां के लोगों ने मुझे बताया कि हिंदुओं से मस्जिद को खतरा है ... जब नमाजी (नमाज अदा करने वाले) लौट कर जाने लगते है तो उनकी तरफ आसपास के घरों के जूते और पत्थर फेंके जाते हैं. मुसलमान भय के कारण एक शब्द भी नहीं कहते. रघुदास के बाद लोहिया ने अयोध्या का दौरा किया और वहां भाषण दिया ... कब्र को नुकसान मत पहुंचाइए... बैरागियों ने कहा मस्जिद जन्मभूमि है और इसलिए इसे हमें दे दें... मैंने अयोध्या में एक रात बिताई और बैरागी जबरन मस्जिद पर कब्जा करने लगे... .."

22 दिसंबर 1949 की आधी रात को जब पुलिस गार्ड सो रहे थे, तब राम और सीता की मूर्तियों को चुपचाप मस्जिद में ले जाया गया और वहां स्थापित कर दिया गया. अगली सुबह इसकी खबर कांस्टेबल माता प्रसाद द्वारा दी गयी और अयोध्या पुलिस थाने में इसकी सूचना दर्ज की गयी. 23 दिसंबर 1949 को अयोध्या पुलिस थाने में सब इंस्पेक्टर राम दुबे द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराते हुए कहा गया: "50-60 व्यक्तियों के एक दल ने मस्जिद परिसर के गेट का ताला तोड़ने के बाद या दीवारों को फांद कर बाबरी मस्जिद में प्रवेश किया .. और वहां श्री भगवान की मूर्ति की स्थापना की तथा बाहरी और अंदरुनी दीवार पर गेरू (लाल दूमट) से सीता-राम का चित्र बनाया गया ... उसके बाद, 5-6 हजार लोगों की भीड़ आसपास इकट्ठी हुई तथा भजन गाते और धार्मिक नारे लगाते हुए मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश करने लगी, लेकिन रोक दिए गए." अगली सुबह, हिंदुओं की बड़ी भीड़ ने भगवानों को प्रसाद चढ़ाने के लिए मस्जिद में प्रवेश करने का प्रयास किया. जिला मजिस्ट्रेट के.के. नायर ने दर्ज किया है कि "यह भीड़ जबरन प्रवेश करने की कोशिश करने के लिए पूरी तरह से दृढ़ संकल्प थी. ताला तोड़ डाला गया और पुलिसवालों को धक्का देकर गिरा दिया गया. हममें से सब अधिकारियों और दूसरे लोगों ने किसी तरह भीड़ को पीछे की ओर खदेड़ा और फाटक को बंद किया. पुलिस और हथियारों की परवाह न करते हुए साधु एकदम से उन पर टूट पड़े और तब बहुत ही मुश्किल से हमलोगों ने किसी तरह से फाटक को बंद किया. फाटक सुरक्षित था और बाहर से लाये गए एक बहुत ही मजबूत ताले से उसे बंद कर दिया गया तथा पुलिस बल को सुदृढ़ किया गया (शाम 5:00 बजे)."

इस खबर को सुनकर प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को यह निर्देश दिया कि वे यह देखें कि देवताओं को हटा लिया जाए. पंत के आदेश के तहत मुख्य सचिव भगवान सहाय और फैजाबाद के पुलिस महानिरीक्षक वी.एन. लाहिड़ी ने देवताओं को हटा लेने के लिए फैजाबाद को तत्काल निर्देश भेजा. हालांकि, के.के. नायर को डर था कि हिंदू जवाबी कार्रवाई करेंगे और आदेश के पालन को अक्षम करने की पैरवी करेंगे.

1984 में, विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने मस्जिद के ताले को खुलवाने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया, और 1985 में राजीव गांधी की सरकार ने अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का ताला खोल देने का आदेश दिया. उस तारीख से पहले केवल हिन्दू आयोजन की अनुमति थी, जिसमें हिंदू पुरोहित मूर्तियों की सालाना पूजा करते थे. इस फैसले के बाद, सभी हिंदुओं को, जो इसे राम का जन्मस्थान मानते थे, वहां तक जाने की अनुमति मिल गयी और मस्जिद को एक हिंदू मंदिर के रूप में कुछ अधिकार मिल गया.[14]

क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव तब बहुत अधिक बढ़ गया जब नवंबर 1989 में राष्ट्रीय चुनाव से पहले विहिप को विवादित स्थल पर शिलान्यास (नींव स्थापना समारोह) करने की अनुमति प्राप्त हो गई. वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने एक रथ पर सवार होकर दक्षिण से अयोध्या तक की 10,000 किमी की यात्रा की शुरूआत की.

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट[संपादित करें]

1970, 1992 और 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा विवादित स्थल के आसपास की गयी खुदाई से उस स्थल पर हिंदू परिसर मौजूद होने का संकेत मिला है.

2003 में, भारतीय अदालत द्वारा दिए गए आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को इसका और अधिक गहन अध्ययन करने तथा मलबे के नीचे विशेष तरह की संचरना की खुदाई करने को कहा गया.[15] एएसआई का रिपोर्ट सारांश[16] मस्जिद के नीचे मंदिर के सबूत होने के निश्चित संकेत देता है. एएसआई शोधकर्ताओं के शब्दों में, उनलोगों ने "उत्तर भारत के मंदिरों से जुड़ी... विशिष्टताओं की" खोज की. खुदाई का नतीजा:

stone and decorated bricks as well as mutilated sculpture of a divine couple and carved architectural features, including foliage patterns, amalaka, kapotapali, doorjamb with semi-circular shrine pilaster, broke octagonal shaft of black schist pillar, lotus motif, circular shrine having pranjala (watershute) in the north and 50 pillar bases in association with a huge structure" [17]


आलोचना[संपादित करें]

सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट (सहमत) ने रिपोर्ट की आलोचना यह कहते हुए की कि "हर तरफ पशु हड्डियों के साथ ही साथ सुर्खी और चूना-गारा की मौजूदगी" जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को मिला, ये सब मुसलमानों की उपस्थिति के लक्षण हैं "जो कि मस्जिद के नीचे हिंदू मंदिर के होने की बात को खारिज कर देती है" लेकिन 'खंबों की बुनियाद' के आधार पर रिपोर्ट कुछ और दावा करती है जो कि अपने निश्चयन में "स्पष्टतः धोखाधड़ी" है क्योंकि कोई खंबा नहीं मिला है, और पुरातत्वविदों के बीच उस तथाकथित 'खंबे की बुनियाद' के अस्तित्व पर बहस जारी है[13]. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआइएमपीएलबी) के अध्यक्ष सैयद रबे हसन नदवी ने बताया कि एएसआई अपनी अंतरिम रिपोर्ट में किसी मंदिर के कोई सबूत का उल्लेख करने में विफल रहा है और राष्ट्रीय तनाव के समय के दौरान केवल अंतिम रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया गया, जिससे रिपोर्ट बहुत ही सदिग्ध बन जाती है.[18].

हालांकि, न्यायाधीश अग्रवाल, एक न्यायाधीश जिन्होंने क्षेत्र का विभाजन किया, कहते हैं कि बहुत सारे "स्वतंत्र इतिहासकारों" ने तथ्‍यों के मामले में "शुतुरमुर्ग जैसे रवैए" का प्रदर्शन किया और वास्तव में जब उनको "जांचा गया तो पता चला" कि इस विषय पर किसी तरह की विशेषज्ञता का उनमें अभाव था. इसके अलावा, ज्यादातर "विशेषज्ञ" परस्पर आपस में जुड़े पाए गए: या तो उनलोगों ने खबरों को पढ़कर अपनी विशेषज्ञता को तैयार किया या फिर वक्फ बोर्ड के लिए "विशेषज्ञ गवाह" की तरह उनका किसी अन्य व्यावसायिक संगठनो के साथ जुड़ाव है.[19]

ढांचे के नीचे मंदिर (हिंदू मंदिर) पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निष्कर्ष की जांच करते हुए विहिप और आरएसएस, मुसलमानों से यह मांग करते हुए आगे आए कि उत्तर भारतीयों की तीन पवित्रतम मंदिर हिंदुओं को सौंप दी जाए.[17]

विध्वंस[संपादित करें]

16 दिसंबर 1992 भारत सरकार द्वारा बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए बनी परिस्थितियों की जांच करने के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया. विभिन्न सरकारों द्वारा 48 बार अतिरिक्त समय की मंजूरी पाने वाला ,भारतीय इतिहास में सबसे लंबे समय तक काम करनेवाला यह आयोग है. इस घटना के l6 सालों से भी अधिक समय के बाद 30 जून 2009 को आयोग ने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी.[20]

रिपोर्ट की सामग्री नवंबर 2009 को समाचार मीडिया में लीक हो गयी. मस्जिद के विध्वंस के लिए रिपोर्ट ने भारत सरकार के उच्च पदस्थ अधिकारियों और हिंदू राष्ट्रवादियों को दोषी ठहराया. इसकी सामग्री भारतीय संसद में हंगामे का कारण बनी.

6 दिसंबर 1992 को कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद विध्वंस के दिन जो कुछ भी हुआ था, लिब्रहान रिपोर्ट ने उन सिलसिलेवार घटनाओं के टुकड़ों कों एक साथ गूंथा था.

रविवार की सुबह लालकृष्ण आडवाणी और अन्य लोगों ने विनय कटियार के घर पर मुलाकात की. रिपोर्ट कहती है कि इसके बाद वे विवादित ढांचे के लिए रवाना हुए. आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कटियार पूजा की वेदी पर पहुंचे, जहां प्रतीकात्मक रूप से कार सेवा होनी थी, फिर आडवाणी और जोशी ने अगले 20 मिनट तक तैयारियों का निरीक्षण किया. इसके बाद दोनो वरिष्ठ नेता 200 मीटर की दूरी पर राम कथा कुंज के लिए रवाना हो गए. यह वह इमारत है जो विवादित ढांचे के सामने थी, जहां वरिष्ठ नेताओं के लिए एक मंच का निर्माण किया गया था.

दोपहर में, एक किशोर कार सेवक कूद कर गुंबद के ऊपर पहुंच गया और उसने बाहरी घेरे को तोड़ देने का संकेत दिया. रिपोर्ट कहती है कि इस समय आडवाणी, जोशी और विजय राजे सिंधिया ने "... या तो गंभीरता से या मीडिया का लाभ उठाने के लिए कार सेवकों से उतर आने का औपचारिक अनुरोध किया. पवित्र स्थान के गर्भगृह में नहीं जाने या ढांचे को न तोड़ने की कार सेवकों से कोई अपील नहीं की गयी थी. रिपोर्ट कहती है: "नेताओं के ऐसे चुनिंदा कार्य विवादित ढांचे के विध्‍वंस को पूरा करने के उन सबके भीतर छिपे के इरादों का खुलासा करते हैं

रिपोर्ट का मानना है कि "राम कथा कुंज में मौजूद आंदोलन के प्रतीक ... तक बहुत ही आसानी से पहुंच कर ... विध्वंस को रोक सकते थे." [21]

विध्वंस में अग्रिम योजना बनाई गई[संपादित करें]

पूर्व खुफिया ब्यूरो (आईबी) के संयुक्त निदेशक मलय कृष्ण धर ने 2005 की एक पुस्तक में दावा किया कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की योजना 10 महीने पहले आरएसएस, भाजपा और विहिप के शीर्ष नेताओं द्वारा बनाई गई थी और इन लोगों ने इस मसले पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव द्वारा उठाये गए कदम पर सवाल उठाया था. धर ने दावा किया है कि भाजपा/संघ परिवार की एक महत्वपूर्ण बैठक की रिपोर्ट तैयार करने का प्रबंध करने का उन्हें निर्देश दिया गया था और उस बैठक ने "इस शक की गुंजाइश को परे कर दिया कि उनलोगों (आरएसएस, भाजपा, विहिप) ने आनेवाले महीने में हिंदुत्व हमले का खाका तैयार किया और दिसंबर 1992 में अयोध्या में 'प्रलय नृत्य' (विनाश का नृत्य) का निर्देशन किया... बैठक में मौजूद आरएसएस, भाजपा, विहिप और बजरंग दल के नेता काम को योजनाबद्ध रूप से अंजाम देने की बात पर आपसी सहमति से तैयार हो गए." उनका दावा है कि बैठक के टेप को उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अपने बॉस के सुपुर्द किया, उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि उन्हें इसमें कोई शक नहीं है कि उनके बॉस ने उस टेप की सामग्री को प्रधानमंत्री (राव) और गृह मंत्री (एसबी चव्हाण) को दिखाया. लेखक ने दावा किया है कि यहां एक मूक समझौता हुआ था जिसमें अयोध्या ने उन्हें "राजनीतिक लाभ उठाने के लिए हिंदुत्व की लहर को शिखर पर पहुंचाने का एक अद्भुत अवसर" प्रदान किया.[3]

लिब्रहान आयोग के निष्कर्ष[संपादित करें]

न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह लिब्राहन द्वारा लिखी गयी रिपोर्ट में मस्जिद के विध्वंस के लिए 68 लोगों को दोषी ठहराया गया है - इनमें ज्यादातर भाजपा के नेता और कुछ नौकरशाह हैं. रिपोर्ट में पूर्व भाजपा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और संसद में पार्टी के तत्कालीन (2009) नेता लालकृष्ण आडवाणी का नाम लिया गया हैं. कल्याण सिंह, जो मस्जिद विध्वंस के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, की भी रिपोर्ट में कड़ी आलोचना की गयी. उन पर अयोध्या में ऐसे नौकरशाहों और पुलिस को तैनात करने का आरोप है, जो विध्वंस के दौरान मूक बन कर खड़े रहे.[22] लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में राजग सरकार में भूतपूर्व शिक्षा मंत्री मुरली मनोहर जोशी को भी विध्वंस में दोषी ठहराया गया है. एक भारतीय पुलिस अधिकारी अंजू गुप्ता अभियोजन गवाह के रूप में पेश की गयीं. विध्वंस के दिन वे आडवाणी की सुरक्षा प्रभारी थीं और उन्होंने खुलासा किया कि आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भड़ाकाऊ भाषण दिए.[23]

लोकप्रिय संस्कृति में[संपादित करें]

बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन द्वारा 1993 में लिखे गए विवादास्पद बांग्ला उपन्यास लज्जा में कहानी विध्वंस के बाद के दिनों पर आधारित है. इसके विमोचन के बाद लेखिका को उनके गृह देश में जान से मारने की धमकी मिली है और तब से वे निर्वासन में रह रही हैं.

विध्वंस से उठे धुएं के परिणामस्वरूप घटनेवाली घटनाएं और दंगे बोम्बे(1995), दैवनामाथिल (2005) जैसी फिल्म की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं, दोनों फिल्मों को राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का संबंधित राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड के दौरान नरगिस दत्त अवार्ड मिला; नसीम (1995), स्ट्राइकर (2010) और स्लमडॉग मिलियनेयर (2008) में भी इसका जिक्र था.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

साँचा:Ayodhya debate

  • राम जन्मभूमि
  • मस्जिदों में गैर मुस्लिम के पूजा के स्थानों का रूपांतरण
  • भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद
  • उपन्यास में: बॉम्बे
  • बॉम्बे राइअट

संदर्भ[संपादित करें]

  1. आज बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की सुनवाई. याहू (Yahoo) समाचार - 18 सितंबर 2007
  2. बाबरी मस्जिद टियरिंग डाउन - आई विटनेस बीबीसी मार्क टुली बीबीसी (BBC) - गुरुवार, 5 दिसम्बर 2002, 19:05 GMT
  3. 10 महीने पहले ही बाबरी मस्जिद विध्वंस की योजना बनाई गई थी - पीटीआई (PTI)
  4. अयोध्या विवाद. बीबीसी (BBC) समाचार. 15 नवंबर 2004.
  5. Flint, Colin (2005). The geography of war and peace. Oxford University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780195162080. http://books.google.com/books?id=7Ms5N7NhGXIC&pg=PA165. 
  6. Vitelli, Karen (2006). Archaeological ethics (2 ed.). Rowman Altamira. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780759109636. http://books.google.com/books?id=LTW1Rf-NfJsC&pg=PA104. 
  7. सैयद शहाबुद्दीन अब्दुर रहमान, बाबरी मस्जिद, तीसरा मुद्रण, आजमगढ़: दारूल मुसंनिफिन शिबली अकादमी, 1987, पीपी 29-30.
  8. भारतीय जनगणना
  9. "Babri Mosjid -- Britannica Online Encyclopedia". Encyclopædia. Encyclopædia Britannica. http://www.britannica.com/EBchecked/topic/47510/Babri-Mosjid. अभिगमन तिथि: 2008-07-02. 
  10. शर्मा, मुगल सम्राटों के धार्मिक नीति, पृष्ठ 9
  11. http://www.expressindia.com/news/fullstory.php?newsid=19686
  12. अयोध्या फैसला टाइम्स ऑफ इंडिया, 3 अक्टूबर 2010
  13. धर्मनिरपेक्षवा को अयोध्या के फैसले से एक और झटका: सहमत हिंदू, 3 अक्टूबर 2010
  14. http://www.outlookindia.com/article.aspx?224878
  15. रतनागर, शेरीन (2004) "सीए (CA) फोरम ऑन ऐन्थ्रपालॉजी इन पब्लिक: आर्कीआलॉजी एट द हार्ट ऑफ़ अ पॉलिटिकल कान्फ्रन्टेशन: द केस ऑफ़ अयोध्या" करेंट ऐन्थ्रपालॉजी 45(2): पीपी 239-259, पृष्ठ 239
  16. प्रसन्नं, आर. (7 सितंबर 2003) "अयोध्या: लेयर्स ऑफ़ ट्रुथ" द वीक (इंडिया), फ्रॉम वेब आर्चिव
  17. Suryamurthy, R. (August 2003) "ASI findings may not resolve title dispute" The Tribune - August 26, 2003
  18. Muralidharan, Sukumar (September 2003). "Ayodhya: Not the last word yet". http://www.hinduonnet.com/fline/fl2019/stories/20030926005412900.htm. 
  19. Abhinav Garg (October 9, 2010). "How Allahabad HC exposed 'experts' espousing Masjid cause". http://timesofindia.indiatimes.com/india/How-Allahabad-HC-exposed-experts-espousing-Masjid-cause/articleshow/6716643.cms. 
  20. प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (30 जून 2009). बाबरी मस्जिद मामला: लिब्रहान आयोग ने प्रधानमंत्री को रिपोर्ट सौंपी. बिजनेस स्टैंडर्ड .
  21. http://www.ndtv.com/news/india/report_sequence_of_events_on_december_6.php
  22. अपरोर ओवर इंडिया मॉस्क रिपोर्ट: इन्क्वैरी इनटू बाबरी मॉस्क डिमोलीशन इन 1992 इंडिक्ट्स आपोज़िशन बीजेपी (BJP) लीडर्स अल-जज़ीरा इंग्लिश - 24 नवंबर 2009
  23. इन द डॉक अगेन , फ्रंटलाइन

आगे पढ़ें[संपादित करें]

  • राम शरण शर्मा. कम्युनल हिस्ट्री एंड राम अयोध्या , पीपुल्स पब्लिशिंग हॉउस (पीपीएच (PPH)), दूसरा संशोधित संस्करण, सितंबर, 1999, दिल्ली. बंगाली, हिंदी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु और उर्दू में अनुवादित. बंगाली में दो संस्करण.
  • पुनियानी, राम. कम्युनल पॉलिटिक्स: मिथ्स वर्सेस फैक्ट्स. सेज प्रकाशन इंक, 2003
  • बचेटा, पाओला. "सेक्रेड स्पेस इन कंफ्लिक्ट इन इंडिया: द बाबरी मस्जिद अफेय्रर." ग्रोथ एंड चेंज. स्प्रिंग2000, खंड. 31, अंक 2.
  • 'बाबरनामा': बाबर, राजकुमार और सम्राट का संस्मरण. 1996. संपादित, व्हीलर एम. थैक्सन द्वारा एनोटेट और अनुवाद. न्यूयॉर्क और लंदन: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस.
  • 'अयोध्या और भारत का भविष्य'. 1993. जितेंद्र बजाज द्वारा संपादित. नीति अध्ययन के लिए केंद्र मद्रास. ISBN 81-86041-02-8 hb ISBN 81-86041-03-6 pb
  • एल्स्ट, कोएंराड. 1991. Ayodhya and After: Issues Before Hindu Society. 1991. नई दिल्ली: भारत की आवाज. [1]
  • इम्मानुएल, डोमिनिक. 'द मुंबई बॉम्ब ब्लास्ट्स एंड द अयोध्या टैंगल', नैशनल कैथलिक रिपोर्टर (कैनसस सिटी, 27 अगस्त 2003).
  • सीता राम गोएल: हिन्दू मंदिर - उन्हें क्या हुआ ? , भारत की आवाज, दिल्ली 1991. [2] [3]
  • हर्ष नारायण. 1993. अयोध्या मंदिर मस्जिद विवाद: मुस्लिम सूत्रों पर प्रकाश. दिल्ली: पेनमैन प्रकाशक.
  • हैस्नर, रॉन ई., पवित्र मैदान पर युद्ध. 2009. इथाका: कॉर्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस. [4]
  • रोमी, क्रिस्टिन एम., "फ्लैश्पॉइन्ट अयोध्या." आर्कीआलॉजी जुलाई/अगस्त2004, खंड. 57, अंक 4.
  • रोमिला थापर. थापर (2000) में 'राम की कहानी पर एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य'.
  • अयोध्या का इतिहास एवं पुरातत्व - ऋग्वेद कल से अब तक ('इतिहास और अयोध्या के पुरातत्व - ऋग्वेद के समय से लेकर वर्तमान तक') ठाकुर प्रसाद वर्मा और स्वराज्य प्रकाश गुप्ता द्वारा भारतीय इतिहास एवं संस्कृत परिषद और डीके प्रिंटवर्ल्ड. नई दिल्ली.
  • पी. वी. नरसिंह राव द्वारा 'अयोध्या : 6 दिसंबर 1992' (ISBN 0-670-05858-0)


बाहरी लिंक्स[संपादित करें]

अनुसंधान पत्र

साँचा:Mosques in India