बस्ती, उत्तर प्रदेश
| बस्ती | |||||||
| — शहर — | |||||||
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| समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०) | |||||||
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| राज्य | उत्तर प्रदेश | ||||||
| ज़िला | बस्ती | ||||||
| सांसद | |||||||
| जनसंख्या • घनत्व |
२०६८९२२ (२००१ के अनुसार [update]) • ३०३४ |
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| क्षेत्रफल | ७३०९ कि.मी² | ||||||
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विभिन्न कोड
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यह भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक शहर और बस्ती जिला का मुख्यालय है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थान काफी महत्वपूर्ण माना जाता है । बस्ती जिला संत कबीर नगर जिला के पूर्व और गोण्डा के पश्चिम में स्थित है । क्षेत्रफल की दृष्टि से भी यह उत्तर प्रदेश का सातवां बड़ा जिला है । प्राचीन समय में बस्ती को 'कौशल' के नाम से जाना जाता था ।
अनुक्रम |
नाम की उत्पत्ति [संपादित करें]
प्राचीन काल में बस्ती मूलतः वैशिश्थी के रूप में जाना जाता था । वैशिश्थी नाम वसिष्ठ ऋषि के नाम से बना हैं, जिनका ऋषि आश्रम यहां पर था ।
वर्तमान जिला बहुत पहले निर्जन और वन से ढका था लेकिन धीरे - धीरे क्षेत्र बसने योग्य बन गया था । वर्तमान नाम बस्ती राजा कल्हण द्वारा चयनित किया गया था, यह घटना जो शायद १६ वीं सदी में हुई थी । १८०१ में बस्ती तहसील मुख्यालय बन गया था और १८६५ में यह नव स्थापित जिले के मुख्यालय के रूप में चुना गया था ।
इतिहास [संपादित करें]
प्राचीन काल [संपादित करें]
बहुत प्राचीन काल में बस्ती के आसपास का जगह कौशल देश का हिस्सा था । शतपथ ब्राह्मण अपने सूत्र में कौशल का उल्लेख किया हैं, यह एक वैदिक आर्यों और वैयाकरण पाणिनी का देश था । राम चन्द्र राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र थे जिनकी महिमा कौशल देश मे फैली हुई थी, जिंहे एक आदर्श वैध राज्य, लौकिक राम राज्य की स्थापना का श्रेय जाता है । परंपरा के अनुसार, राम के बड़े बेटे कुश कौशल के सिंहासन पर बैठे, जबकि छोटे बेटे लव को राज्य के उत्तरी भाग का शासक बनाया गया राजधानी श्रावस्ती था । इक्ष्वाकु से ९३वां पीढ़ी और राम से ३० वीं पीढ़ी में बृहद्वल था, यह इक्ष्वाकु शासन का अंतिम प्रसिद्ध राजा था, जो महान महाभारत युद्ध में चक्रव्यूह में मारा गया था ।
छठी शताब्दी ई. में गुप्त शासन की गिरावट के साथ बस्ती भी धीरे - धीरे उजाड़ हो गया, इस समय एक नए राजवंश मौखरी हुआ, जिसकी राजधानी कन्नौज था, जो उत्तरी भारत के राजनैतिक नक्शे पर एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया और इसी राज्य में मौजूद जिला बस्ती भी शामिल था ।
९ वीं शताब्दी ई. की शुरुआत में, गुजॅर प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय ने अयोध्या से कन्नौज शासन को उखाड़ फेंका और यह शहर उनके नये बनते शासन का राजधानी बना, जो राजा महीरा भोज १ ( ८३६ - ८८५ ई. ) के समय मे बहुत ऊचाई पर था । राजा महिपाल के शासनकाल के दौरान, कन्नौज के सत्ता में गिरावट शुरू हो गई थी और अवध छोटा छोटे हिस्सों में विभाजित हो गया था लेकिन उन सभी को अंततः नये उभरते शक्ति कन्नौज के गढवाल राजा जय् चंद्र (११७०-११९४ ई.) मिले । यह वंश के अंतिम महत्वपूर्ण शासक थे जो हमलावर सेना मुहम्मद गौर के खिलाफ चँद॔वार की लड़ाई (इटावा के पास) में मारा गये थे उनकी मृत्यु के तुरंत बाद कन्नौज तुर्कों के कब्जे में चला गया ।
किंवदंतियों के अनुसार, सदियों से बस्ती एक जंगल था और अवध की अधिक से अधिक भाग पर भार कब्जा था । भार के मूल और इतिहास के बारे में कोई निश्चित प्रमाण शीघ्र उपलब्ध नही है । जिला में एक व्यापक भर राज्य के सबूत के रुप मे प्राचीन ईंट इमारतों के खंडहर लोकप्रिय है जो जिले के कई गांवों मे बहुतायत संख्या में फैले है ।
मध्ययुगीन काल [संपादित करें]
१३ वीं सदी की शुरुआत में, १२२५ में इल्तुतमिश का बड़ा बेटा, नासिर-उद-दीन महमूद, अवध के गवर्नर बन गया और इसने भार लोगो के सभी प्रतिरोधो को पूरी तरह कुचल डाला । १३२३ में, गयासुद्दीन तुगलक बंगाल जाने के लिए बेहराइच और गोंडा के रास्ते गया शायद वह जिला बस्ती के जंगल के खतरों से बचना चाहता था और वह आगे अयोध्या से नदी के रास्ते गया । १४७९ में, बस्ती और आसपास के जिले, जौनपुर राज्य के शासक ख्वाजा जहान के उत्तराधिकरियो के नियंत्रण में था । बहलूल खान लोधी अपने भतीजे काला पहाड़ को इस क्षेत्र का शासन दे दिया था जिसका मुख्यालय बेहराइच को बनाया था जिसमे बस्ती सहित आसपास के क्षेत्र भी थे । इस समय के आसपास, महात्मा कबीर, प्रसिद्ध कवि और दार्शनिक इस जिले में मगहर में रहते थे ।
यह कहा जाता है कि प्रमुख राजपूत कुलों के आगमन से पहले, इन जिलों में स्थानीय हिंदू और हिंदू राजा थे और कहा जाता है कि इन्ही शासको द्वारा भार, थारू, दोमे और दोमेकातर जैसे आदिवासी जनजातियों और उनके सामान्य परम्पराओ को खत्म कर दिया गया, ये सब कम से कम प्राचीन राज्यों के पतन के बाद और बौद्ध धर्म के आने के बाद हुआ । इन हिंदुओं में भूमिहार ब्राह्मण, सर्वरिया ब्राह्मण और विसेन शामिल थे । पश्चिम से राजपूतों के आगमन से पहले इस जिले में हिंदू समाज का राज्य था । १३ वीं सदी के मध्य में श्रीनेत्र पहला नवागंतुक था जो इस क्षेत्र मे आ कर स्थापित हुआ । जिनका प्रमुख चंद्रसेन पूर्वी बस्ती से दोम्कातर को निष्कासित किया था । गोंडा प्रांत के कल्हण राजपूत स्वयं परगना बस्ती में स्थापित हुए थे । कल्हण प्रांत के दक्षिण में नगर प्रांत में गौतम राजा स्थापित थे । महुली में महसुइया नाम का कबीला था जो महसो के राजपूत थे ।
अन्य विशेष उल्लेख राजपूत कबीले में चौहान का था । यह कहा जाता है कि चित्तौङ से तीन प्रमुख मुकुंद भागे थे जिनका जिला बस्ती की अविभाजित हिस्से पर (अब यह जिला सिद्धार्थ नगर में है) शासन था । १४ वीं सदी की अंतिम तिमाही तक बस्ती जिले का एक भाग अमोढ़ा पर कायस्थ वंश का शासन था ।
अकबर और उनके उत्तराधिकारी के शासनकाल के दौरान जिला बस्ती, अवध सुबे के गोरखपुर सरकार का एक हिस्सा बना हुआ था । जौनपुर के गवर्नर के शासनकाल के शुरू के दिनों में यह जिला विद्रोही अफगानिस्तान के नेताओं जैसे अली कुली खान, खान जमान का शरणस्थली था । १६८० में मुगल काल के दौरान औरंग़ज़ेब ने एक दूत (पथ के धारक) काजी खलील-उर-रहमान को गोरखपुर भेजा था शायद स्थानीय प्रमुखों से राजस्व का नियमित भुगतान प्राप्त करने के लिए । खलील-उर-रहमान ने ही गोरखपुर से सटे जिलो के सरदारों को मजबूर किया था कि वे राजस्व का भुगतान करे । इस कदम का यह परिणाम हुआ कि अमोढ़ा और नगर के राजा, जो हाल ही में सत्ता हासिल की थी, राजस्व का भुगतान को तैयार हो गये और टकराव इस तरह टल गया । इसके बाद खलील-उर-रहमान ने मगहर के लिए रवाना हुआ जहाँ उसने अपनी चौकी बनाया तथा राप्ती के तट पर बने बांसी के राजा के किले पर कब्ज़ा कर लिया । नव निर्मित जिला संत कबीर नगर का मुख्यालय खलीलाबाद शहर का नाम खलील उर रहमान से पङा जिसका कब्र मगहर मे बना है । उसी समय एक प्रमुख सङक गोरखपुर से अयोध्या का निर्माण हुआ था 1690 फरवरी में, हिम्मत खान (शाहजहाँ खान बहादुर जफर जंग कोकल्ताश का पुत्र, इलाहाबाद का सूबेदार) को अवध का सूबेदार और गोरखपुर फौजदार बनाया गया, जिसके अधिकार में बस्ती और उसके आसपास का क्षेत्र बहुत समय तक था ।
आधुनिक काल [संपादित करें]
एक महान और दूरगामी परिवर्तन तब आया जब 9 सितम्बर 1772 मे सआदत खान को अवध सूबे का राज्यपाल नियुक्त किया गया जिसमे गोरखपुर का फौजदारी भी था । उसी समय बांसी और रसूलपुर पर सर्नेट राजा का, बिनायकपुर पर बुटवल के चौहान का, बस्ती पर कल्हण शासक का, अमोढ़ा पर सुर्यवंश का, नगर पर गौतम का, महुली पर सुर्यवंश का शासन था । जबकि अकेला मगहर पर नवाब का शासन था, जो मुसलमान चौकी से मजबूत बनाया गया था ।
नवंबर 1801 में नवाब शुजा उद दौलाह का उत्तराधिकारी सआदत अली खान ने गोरखपुर को ईस्ट इंडिया कंपनी को आत्मसमर्पण कर दिया, जिसमे मौजूद जिला बस्ती और आसपास के क्षेत्र का भी समावेश था । रोलेजे गोरखपुर का पहला कलेक्टर बना था । इस कलेक्टर ने भूमि राजस्व की वसूली के लिए कुछ कदम उठाये थे लेकिन आदेश को लागू करने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने मदद के लिए सेना बढा दिया था ।
भूगोल [संपादित करें]
स्थिति और सीमा -- यह जिला २६° २३' और २७° ३०' उत्तर अक्षांश तथा ८२° १७' और ८३° २०' पूर्वी देशांतर के बीच उत्तर भारत में स्थित है । इसका उत्तर से दक्षिण की अधिकतम लंबाई ७५ किमी है और पूर्व से पश्चिम में लगभग ७० किमी की चौड़ाई है । बस्ती जिला पूर्वी में नव निर्मित जिला संत कबीर नगर और पश्चिम में गोंडा के बीच स्थित है, दक्षिण में घाघरा नदी इस जिले को फैजाबाद जिला और नव निर्मित अंबेडकर नगर जिला से अलग करती है, जबकि उत्तर में सिद्धार्थ नगर जिला से घिरा है । जिला तलहटी - संबंधी मैदान में पूरी तरह से फैला है तथा कोई प्राकृतिक उन्नयन नही है जो इस पर असर डाले ।
जनसांख्यिकी [संपादित करें]
२००१ की जनगणना के रूप में बस्ती की आबादी २०६८९२२ ( १९९१ में २७५०७६४ )थी । जिनमें से १०७९९७१ पुरुष ( १९९१ में १४३७७२७ ) और ९८८९५१ महिला ( १९९१ में १३१३०३७ ) (९१६ लिंग अनुपात) थी । पुरुषों और महिलाओं की जनसंख्या ४८ % से ५२ % थी । बस्ती ६९ % की एक औसत साक्षरता दर ५९.५% के राष्ट्रीय औसत से अधिक थी । पुरुष साक्षरता ७४% और महिला साक्षरता ६२% थी । बस्ती में, जनसंख्या का १३% उम्र के ६ साल के अंतर्गत थी ।
यातायात [संपादित करें]
बस्ती अच्छी तरह से रेल और सड़क मार्ग से देश एवं प्रदेश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है ।
रेल द्वारा -- मुख्य रेल लाइन लखनऊ और गोरखपुर को जोङता है और बिहार से होते हुए पूर्व मे असम को जाता है, यह जिले के दक्षिण से होकर गुजरता है । मुख्य रेल लाइन मे जनपद के भीतर पूर्व से पश्चिम की तरफ 7 मुख्य रेलवे स्टेशन मुंडेरवा, ओडवारा, बस्ती, गोविंद नगर, टिनिच, गौर, बभनान पड़ता है ।
सड़क मार्ग द्वारा -- बस्ती राष्ट्रीय राजमार्ग सं० - 28 पर स्थित है जो लखनऊ से मोकामा ( बिहार ) तक जाता है । वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की (लगभग) ३०० बसें जिले में २७ मार्गों पर चल रही है ।
प्रमुख स्थल [संपादित करें]
संत रविदास वन विहार, भद्रेश्वर नाथ, मखौडा, श्रंगीनारी, गणेशपुर,धिरौली बाबू,, छावनी बाजार, केवाड़ी मुस्तहकम, नागर, चंदू ताल, बराह, अगौना,पकरी भीखी आदि यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से है ।
संत रविदास वन विहार -- संत रविदास वन विहार (राष्ट्रीय वन चेतना केन्द्र) कुवाना नदी के तट पर स्थित है । यह वन विहार जिला मुख्यालय से केवल एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित गणेशपुर गांव के मार्ग पर है । यहां पर एक आकर्षक बाल उद्यान और झील स्थित है । इस बाल उद्यान और झील की स्थापना सरकार द्वार पिकनिक स्थल के रूप में की गई है । वन विहार के दोनों तरफ से कुवाना नदी का स्पर्श इस जगह की खूबसूरती को और अधिक बढ़ा देता है । संत रविदास वन विहार स्थित झील में बोटिंग का मजा भी लिया जा सकता है । सामान्यत: अवकाश के दौरान और रविवार के दिन अन्य दिनों की तुलना में काफी भीड़ रहती है ।
भादेश्वर नाथ -- यह कुवाना नदी के तट पर, जिला मुख्यालय से लगभग ६ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । भद्रेश्वर नाथ भगवान शिव को समर्पित मंदिर है । माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना रावण ने की थी । प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि के अवसर पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है । काफी संख्या में लोग इस मेले में सम्मिलित होते है ।
मखौडा -- मखौडा जिला मुख्यालय के पश्चिम से लगभग ५७ किलोमीटर की दूरी पर है । यह स्थान रामायण काल से ही काफी प्रसिद्ध है । राजा दशरथ ने इस जगह पर पुत्रेस्ठी यज्ञ किया था । मखौडा कौशल महाजनपद का एक हिस्सा था ।
श्रंगीनारी -- अयोध्या धाम से लगभग 30 किमी की दूरी पर स्थित ऋषि श्रंगी का आश्रम व तपोस्थली।
गनेशपुर -- गनेशपुर बस्ती जिला का एक छोटा सा गांव है । यह पश्चिम में मुख्यालय से सिर्फ ४ किमी. दूर और कुवांना नदी के तट पर स्थित है । यह पुराने मूल के पिंडारियो के उत्पत्ति का स्थान है ।
धिरौली बाबू -- धिरौली बाबू बस्ती जिले का एक एतिहासिक गांव है । यह मुख्यालय से पश्चिम में छावनी बाजार से सिर्फ ६ किमी. दूर और अमोढ़ा रियासत से ४ किमी दूर घाघरा नदी के तट पर स्थित है । घिरौलीबाबू निवासी कुलवंत सिंह, हरिपाल सिंह, बलवीर सिह, रिसाल सिंह, रघुवीर सिंह, सुखवंत सिह,रामदीन सिंह रामगढ़ गांव में अंग्रेजों का मुकाबला करने की रणनीति बनाने के लिए 17 अप्रैल 1858 को बुलायी गयी बैठक में शामिल थे । इन सभी को अंग्रेज सेना ने पकड़ के छावनी के पीपल के वृक्ष पर फासी पे लटका दिया। घिरौलीबाबू के क्रांतिकारियों ने घाघरा नदी में नौसेना का निरीक्षण करने आये अंग्रेज अफसर को पकड़ के मार दिया था किन्तु उसकी पत्नी को छोड़ दिया,जिसकी सुचना मिलते ही गोरखपुर के जिलाधिकारी ने पुरे ग्राम को जला देने और भूमि जब्त करने का ऑर्डर दे दिया ।आज भी धिरौली बाबू में कुलवंत सिंह एवम रिसाल सिंह के वंशज रणजीत सिंह, कृष्ण कुमार सिंह एवम हरिपाल सिंह एवं रामदीन सिंह के वंशज रहते है ।
छावनी बाजार -- छावनी बाजार जिला मुख्यालय से लगभग ४० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । छावनी बाजार १८५८ ई. के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों का प्रमुख शरण स्थान रहा है । यह स्थान शहीदो के पीपल के वृक्ष के लिए भी प्रसिद्ध है । इसी जगह पर ब्रिटिश सरकार ने जनरल फोर्ट की मृत्यु के पश्चात् कार्रवाई में ५०० जवानों को फांसी पर लटका दिया था ।
केवाड़ी मुस्तहकम -- बस्ती जिले से २९ किलोमीटर दूर रामजानकी रास्ते पर स्थित यह छोटा सा गाँव चिलमा बाज़ार के बगल में स्थित है | यह गाँव अध्यापको की मातृभूमि कही जाती है | जिसको शुरुआत श्री रामदास चौधरी ने भटपुरवा इंटर कॉलेज की स्थापना १९६३ में कर की| और उनके इस शुभ कार्य को सफलता की उचाइयों पर श्री शिव पल्टन चौधरी ने बखूबी पहुँचाया |
नगर -- जिला मुख्यालय से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित नागर एक छोटा सा गांव है । नगर गांव की पश्चिम दिशा में विशाल झील चंदू तल स्थित है । यह मछली पकड़ने और निशानेबाज़ी करने के लिए प्रसिद्ध है । इसके अलावा यह गांव गौतम बुद्ध के जन्म स्थल के रूप में भी जाना जाता है । चौदहवीं शताब्दी में यह स्थान गौतम राजाओं का जिला मुख्यालय बन गया था । उस समय का प्राचीन दुर्ग आज भी यहां देखा जा सकता है । ʺʺसिसवारी रघुवीर सिहं‘‘
जिला मुख्यालय से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके पूर्व में चन्दो नदी है। गॉव के चारो तरफ नहर है यहॉ पर सबसे प्रतिष्ठित ब्राम्हण रहते है। उनमें से स्व0 राम कुबेर तिवारी प्रमुख है। इसके दक्षिण में बहादुरपुर ब्लाक है। अधिक जानकारी हेतू www.facebook.com/akashchauhannagar
""पकरी भीखी ""-- यह जिला से 15 कि.मि. दूरी पर है शुकुल जाति निवास करती है ।
अगौना -- अगुना जिला मुख्यालय मार्ग में राम जानकी मार्ग पर बसा हुआ है । अगुना प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार श्री राम चन्द्र शुक्ल की जन्म भूमि है ।
बराह छतर -- बराह छतर ज़िला मुख्यालय से पश्चिम में लगभग १५ किमी की दूरी पर कुवांना नदी के तट पर स्थित है । यह जगह मुख्य रूप से बराह मंदिर के लिए प्रसिद्ध है । बराह छतर लोकप्रिय पौराणिक पुस्तकों में वियाग्रपुरी रूप में जाना जाता है । इसके अलावा बराह को भगवान शिव की नगरी के नाम से भी जाना जाता है ।
चंदू तल -- चंदू तल जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । माना जाता है कि प्राचीन समय में इस जगह को चन्द्र नगर के नाम से जाना जाता था । कुछ समय पश्चात् यह जगह प्राकृतिक रूप से एक झील के रूप में बदल गई और इस जगह को चंदू तल के नाम से जाना जाने लगा । यह झील पांच किलोमीटर लम्बी और चार किलोमीटर चौड़ी है । माना जाता है कि इस झील के आस-पास की जगह से मछुवारों व कुछ अन्य लोगों को प्राचीन समय के धातु के बने आभूषण और ऐतिहासिक अवशेष प्राप्त हुए थे । इसके अलावा इस झील में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पक्षियों की अनेक प्रजातियां भी देखी जा सकती है ।
पकरी भीखी -- यह गावं गर्ग जातियोँ का एक समूह है, जिनसे पाँच गावं का उदय हुआ - पकरी भीखी, जिनवा, बाँसापार, पचानू, आमा। पकरी भीखी का नाम भीखी बाबा के नाम का अंश है।
शिक्षा [संपादित करें]
२००१ के रूप में, साक्षरता दर १९९१ में ३५.३६% से ५४.२८% की वृद्धि हुई है । साक्षरता दर पुरुषों के लिए ६८.१६% (१९९१ में ५०.९३% से बढ़ी हुई) और ३९.००% प्रतिशत महिलाओं के लिए (१९९१ में १८.०८% से बढ़ गया)। बस्ती शिक्षा और औद्योगिक में उत्तर प्रदेश के पिछड़े जिले में है ।
भाषा एवं बोली [संपादित करें]
बस्ती जनपद की प्रमुख भाषा हिँदी है, और यहां पर हिंदी के साथ में अवधी भाषा का प्रयोग बोलने में होता है।
संबंधित लेख [संपादित करें]
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