बनारस घराना
बनारस घराना भारतीय तबला वादन के छः प्रसिद्ध घरानों में से एक है।[1] ये घराना २०० वर्षों से कुछ पहले ख्यातिप्राप्त पंडित राम सहाय (१७८०-१८२६) के प्रयासों से विकसित हुआ था। पंडित राम सहाय ने अपने पिता के संग पांच वर्ष की आयु से ही तबला वादन आरंभ किया था। ९ वर्ष की आयु में ये लखनऊ आ गये एवं लखनऊ घराने के मोधु खान के शिष्य बन गये। जब राम सहाय मात्र १७ वर्ष के ही थे, तब लखनऊ के नये नवाब ने मोधु खान से पूछा कि क्या राम सहाय उनके लिये एक प्रदर्शन कर सकते हैं? कहते हैं, कि राम सहाय ने ७ रातों तक लगातार तबला-वादन किया जिसकी प्रशंसा पूरे समाज ने की एवं उन पर भेटों की बरसात हो गयी। अपनी इस प्रतिभा प्रदर्शन के बाद राम सहाय बनारस वापस आ गये।
कुछ समय उपरांत राम सहाय ने पारंपरिक तबला वादन में कुछ बदलाव की आवश्यकता महसूस की। अगले छः माह तक ये एकांतवासी हो गये और इस एकांतवास का परिणाम सामने आया, जिसे आज बनारस-बाज कहते हैं। ये बनारस घराने की विशिष्ट तबला वादन शैली है। इस नयी वादन शैली के पीछे प्रमुख उद्देश्य था कि ये एकल वादन के लिये भी उपयुक्त थी, और किसी अन्य संगीत वाद्य या नृत्य के लिये संगत भी दे सकती थी। इसमें तबले को नाज़ुक भी वादन कर सकते हैं, जैसा कि खयाल के लिये चाहिये होता है, और पखावज की तरह ध्रुपद या कथक नृत्य शैली की संगत के लिये द्रुत गति से भी बजाया जा सकता है। राम सहाय ने तबला वादन में अंगुली की थाप का नया तरीका खोजा, जो विशेषकर ना की ताल के लिये महत्त्वपूर्ण था। इसमें अंगुली को मोड़कर दाहिने में अधिकतम अनुनाद कंपन उत्पन्न कर सकते हैं। इन्होंने तत्कालीन संयोजन प्रारूपों जैसे जैसे गट, टुकड़ा, परान, आदि से भी विभिन्न संयोजन किये, जिनमें उठान, बनारसी ठेका और फ़र्द प्रमुख हैं।
आज बनारसी तबला घराना अपने शक्तिशाली रूप के लिये प्रसिद्ध है, हालांकि बनारस घराने के वादक हल्के और कोमल स्वरों के वादन में भी सक्षम हैं। घराने को पूर्वी बाज मे वर्गीकृत किया गया है, जिसमें लखनऊ, फर्रुखाबाद और बनारस घराने आते हैं। बनारस शैली तबले के अधिक अनुनादिक थापों का प्रयोग करती है, जैसे कि ना और धिन। बनारस वादक अधिमान्य रूप से पूरे हाथ से थई-थई थाप देते हैं, बजाय एक अंगुली से देने के; जैसे कि दिल्ली शैली में देते हैं। वैसे बनारस बाज शैली में दोनों ही थाप एकीकृत की गई हैं। बनारस घराने के तबला वादक तबला वादन की सभी शैलियों में, जैसे एकल, संगत, गायन एवं नृत्य संगत आदि में पारंगत होते हैं।
बनारस घराने में एकल वादन बहुत इकसित हुआ है, और कई वादक जैसे पंडित शारदा सहाय, पंडित किशन महाराज[2], और पंडित समता प्रसाद [3], एकल तबला वादन में महारत और प्रसिद्धि प्राप्त हैं। घराने के नये युग के तबला वादकों में पं. कुमार बोस, पं.समर साहा, पं.बालकृष्ण अईयर, पं.शशांक बख्शी, संदीप दास, पार्थसारथी मुखर्जी, सुखविंदर सिंह नामधारी, विनीत व्यास और कई अन्य हैं। बनारसी बाज में २० विभिन्न संयोजन शैलियों और अनेक प्रकार के मिश्रण प्रयुक्त होते हैं।
संदर्भ
- ↑ कुमार, राज (२००३). एसेज़ ऑन इण्डियन म्यूज़िक (हिस्ट्री एण्ड कल्चर सीरीज़). डिस्कवरी पब्लिशिंग हाउस. प॰ २००. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 8171417191. http://books.google.co.in/books?id=wwwX6DWfn3gC&pg=PA200&dq=Samta+Prasad&lr=&cd=21#v=onepage&q=Samta%20Prasad&f=false.
- ↑ शोभना नारायण (६ मई, २००८). "पं.किशन महाराज: एण्ड ऑफ एन एरा". द ट्रिब्यून. http://www.tribuneindia.com/2008/20080506/nation.htm#16.
- ↑ "समता प्रसाद". kippen.org. http://kippen.org/t_masters/samtaprasad.html. अभिगमन तिथि: १ मई, २००९.
- सहाय, शारदा एण्ड शेफ़र्ड, फ़्रांसिस ए, २००० प्ले तबला, ए मैन्युअल फ़ोर तबला प्लेइंग। सिटिंगबोर्न:एशियन एजुकेशन प्रेस
बाहरी सूत्र
- बनारस तबला घराना
- बेतिया ध्रुपद घराना (द्वितीय बनारस घराना-मूलस्रोत)- वाराणसी वैभव
- घरानाज़ ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूज़िक
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