बचपन

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बचपन, जन्म से लेकर किशोरावस्था तक के आयु काल को कहते है।[1] विकासात्मक मनोविज्ञान में, बचपन को शैशवावस्था (चलना सीखना), प्रारंभिक बचपन (खेलने की उम्र), मध्य बचपन (स्कूली उम्र), तथा किशोरावस्था (वयः संधि) के विकासात्मक चरणों में विभाजित किया गया है।

बचपन की उम्र सीमाएं[संपादित करें]

शब्द बचपन अविशिष्ट है मानव विकास में उम्र के विभिन्न चरणों के लिए प्रयुक्त हो सकता है। विकासात्मक रूप से, यह बचपन और वयस्कता के बीच की अवधि को दर्शाता है। सामान्य शब्दों में, बचपन को जन्म से आरंभ हुआ माना जाता है। अवधारणा के रूप में कुछ लोग बचपन को खेल और मासूमियत से जोड़ कर देखते हैं, जो किशोरावस्था में समाप्त होता है। कई देशों में, एक बालिग होने की उम्र होती है जब बचपन आधिकारिक तौर पर समाप्त होता है और व्यक्ति क़ानूनी तौर पर वयस्क हो जाता है। यह उम्र 13 से 21 के बीच कहीं भी हो सकती है और 18 सबसे आम है।

बचपन के विकासात्मक चरण[संपादित करें]

प्रारंभिक बचपन[संपादित करें]

शैशवावस्था के बाद प्रारंभिक बचपन आता है और बच्चे के लड़खड़ाते हुए चलने के साथ शुरू होता है, जब बच्चा बोलना और स्वतंत्र रूप से क़दम बढाने लगता है। जहां शैशवावस्था तीन साल की उम्र में समाप्त होती है जब बच्चा बुनियादी ज़रूरतों के लिए अपने माता-पिता पर कम निर्भर रहने लगता है, प्रारंभिक बचपन सात से आठ साल की उम्र तक चलता है। नन्हे बच्चों की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय संगठन के अनुसार, प्रारंभिक बचपन की अवधि जन्म से आठ की उम्र तक होती है।

मध्य बचपन[संपादित करें]

मध्य बचपन लगभग सात या आठ की उम्र से शुरु होता है, जो अनुमानतः प्राथमिक स्कूल की उम्र है और लगभग यौवन काल पर समाप्त होता है, जो किशोरावस्था की शुरुआत है।

किशोरावस्था[संपादित करें]

किशोरावस्था, या बचपन की अंतिम अवस्था, यौवन की दशा से शुरू होती है। किशोरावस्था का अंत और वयस्कता की शुरूआत में देशवार तथा क्रियावार भिन्नता है और एक ही देश-राज्य या संस्कृति के भीतर अलग-अलग उम्र होती है जिसके व्यक्ति को इतना परिपक्व (कालक्रमानुसार तथा कानूनी रूप से) माना जाता है कि समाज द्वारा किन्हीं कार्यों को सौपा जा सके.

बचपन का इतिहास[संपादित करें]

सांग राजवंश के चीनी कलाकार सू हैनचेन, सी. द्वारा खेलने वाले बच्चे ई.पू. 1150.

यह तर्क दिया जाता है कि बचपन एक प्राकृतिक घटना न होकर समाज की रचना है। एक महत्वपूर्ण मध्यवादी तथा इतिहासकार फिलिप एरीस ने अपनी पुस्तक सेंचुरीज़ ऑफ़ चाइल्डहुड में इस बात को उठाया है। इस विषय को कनिंघम द्वारा अपनी पुस्तक इनवेन्शन ऑफ़ चाइल्डहुड (2006) में आगे बढ़ाया गया, जो मध्यकाल से बचपन के ऐतिहासिक पहलुओं पर नज़र डालता है, जिसे वे विश्व युद्ध के बाद के 1950, 1960 तथा 1970 दशक की अवधि के रूप में संदर्भित करते हैं।

एरीस ने पेंटिग, समाधि-पत्थर, फ़र्नीचर तथा स्कूल-अभिलेखों के अध्ययन को 1961 में प्रकाशित किया था। उन्होने पाया कि 17वीं शताब्दी से पहले बच्चों का प्रतिनिधित्व अल्प-वयस्कों की तरह किया जाता था। तब से इतिहासकारों द्वारा गुज़रे ज़माने के बचपन पर काफी शोध किया गया है। एरीस के पहले जार्ज बोआस ने दी कल्ट आफ़ चाइल्डहुड प्रकाशित किया था।

नवजागरण काल के दौरान, यूरोप में बच्चों का कलात्मक प्रदर्शन नाटकीय रूप से बढ गया। तथापि इसने बच्चों के प्रति सामाजिक रवैये को प्रभावित नहीं किया- बाल श्रम पर आलेख देखें.

जीन जैक्स रूसो वे व्यक्ति हैं आम तौर पर जिन्हें बचपन की आधुनिक धारणा की उत्पत्ति का श्रेय दिया जाता है - या उन पर आरोपित किया जाता है। जान लॉक तथा अन्य 17वीं सदी के अन्य उदार विचारकों के विचार के आधार पर रूसो ने बचपन को वयस्कता के ख़तरों और कठिनाइयों से मुठभेड़ से पहले की लघु अभ्यारण्य अवधि कहा. रूसो ने निवेदन किया, "इन मासूमों की खुशियों को क्यों लूटें जो इतनी जल्दी बीत जाता है". "शुरुआती बचपन के जल्दी निकल जाने वाले दिनों में कड़वाहट क्यों भरें, जो दिन न उनके लिए और ना ही आपके लिए कभी लौट कर आने वाले हैं?"

विक्टोरिया काल को बचपन की आधुनिक संस्था के स्रोत के रूप में वर्णित किया गया है। विडंबना यह है कि इस काल की औद्योगिक क्रांति ने बाल श्रम को बढ़ा दिया था, लेकिन ईसाई सुसमाचार लेखक तथा लेखक चार्ल्स डिकेन्स तथा अन्य के अभियानों के कारण, बाल मजदूरी उत्तरोत्तर कम होती गई और 1802-1878 के कारख़ाना अधिनियम द्वारा समाप्त हो गई। विक्टोरिया कालीन लोगों ने एकजुट होकर परिवार की भूमिका तथा बच्चे की पवित्रता पर ज़ोर दिया और मोटे तौर पर, तभी से पश्चिमी समाजों में यह रवैया बरक़रार रहा.[मूल शोध?]

समकालीन युग में, जो एल.किन्चेलो और शर्ली आर. स्टीनबर्ग ने बचपन और बचपन की शिक्षा पर एक आलोचनात्मक सिद्धांत का निर्माण किया, जिसे उन्होंने किंडरकल्चर का नाम दिया. किन्चेलो और स्टीनबर्ग ने बचपन के अध्ययन के लिए कई अनुसंधान और सैद्धांतिक विमर्शों (ब्रिकोलेज) का उपयोग विभिन्न दृष्टिकोणों - इतिहास लेखन, नृवंशविज्ञान, संज्ञानात्मक अनुसंधान, मीडिया अध्ययन, सांस्कृतिक अध्ययन, राजनीतिक आर्थिक विश्लेषण, हेर्मेनेयुटिक्स, सांकेतिकता, सामग्री विश्लेषण आदि के आधार पर किया। इस बहुपरिपेक्षीय जांच के आधार पर किन्चेलो और स्टीनबर्ग ने दृढ़ता पूर्वक कहा कि आधुनिक काल ने बचपन के नए युग में प्रवेश किया है। इस नाटकीय सांस्कृतिक परिवर्तन के साक्ष्य सर्वव्यापी है, लेकिन 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी की शुरुआत में कई व्यक्तियों ने इसे अभी तक देखा नहीं है। जब किन्चेलो और स्टीनबर्ग ने किंडरकल्चर का पहला संस्करण लिखा: दी कोर्पोरेट कल्चर ऑफ़ चाइल्डहुड इन 1997 (द्वितीय संस्करण, 2004), अनेक लोग जो बच्चों से संबंधित अध्ययन, अध्यापन या उनकी देखभाल करके अपनी जीविका चला रहे थे, वे रोज़ाना सामना करने वाले बचपन के स्वभाव में आए परिवर्तनों से अवगत नहीं थे।

किंडरकल्चर से पहले मनोविज्ञान, शिक्षा और कुछ कम मात्रा में समाजशास्त्र और सांस्कृतिक अध्ययन के क्षेत्रों के कुछ पर्यवेक्षकों द्वारा अध्ययन किया गया था कि ज्ञान विस्फोट ने, जो हमारे समकालीन युग (हाइपररियालिटी) की विशेषता है, बचपन की परंपरागत धारणाओं को कमज़ोर किया है और बचपन की शिक्षा के क्षेत्र को परिवर्तित किया है। जिन्होंने समकालीन सूचना प्रौद्योगिकी को आकार दिया है, निर्देशित और नियोजित किया है, उन्होंने बचपन के पुनःनिरूपण में एक अतिरंजित भूमिका निभाई है। किन्चेलो और स्टीनबर्ग का मानना है कि बेशक, सूचना प्रौद्योगिकी ने अकेले ही बचपन के एक नए युग का सूत्रपात नहीं किया है। ज़ाहिर है, कई सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक कारकों ने इस तरह के परिवर्तनों को संचालित किया है। किंडरकल्चर का मुख्य प्रयोजन, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से बचपन की बदलती ऐतिहासिक स्थिति को स्थापित करना तथा विविध मीडिया द्वारा स्थापना में सहायक उन तरीकों को विशेष रूप से जांचना है जिसे किन्चेलो तथा स्टीनबर्ग "नया बचपन" कहते हैं। किंडरकल्चर समझता है कि बचपन एक हमेशा बदलती सामाजिक और ऐतिहासिक शिल्पकृति है - ना कि केवल एक जैविक इकाई. क्योंकि कई मनोवैज्ञानिकों ने तर्क दिया है कि बचपन बढ़ने, वयस्क बनने का एक प्राकृतिक चरण है, शैक्षिक संदर्भ से आने वाले किन्चेलो और स्टीनबर्ग ने किंडरकल्चर को बचपन के "मनोवैज्ञानिकीकरण" (साइकॉलोजिज़ेशन) जैसे सुधारात्मक रूप में देखा.

बचपन की भौगोलिकताएं[संपादित करें]

बचपन के भूगोल में सम्मिलित हैं कि किस प्रकार (वयस्क) समाज बचपन के विचार को ग्रहण करता है और अनेक रूपों में वयस्कों का आचरण बच्चों के जीवन को प्रभावित करता है। इसमें बच्चों के आस-पास के परिवेश संबंधी दृष्टिकोण और तत्संबंधी निहितार्थ शामिल हैं। कुछ विषयों में यह बच्चों के भूगोल के समान है जो उस समय एवं स्थान का परीक्षण करता है जिसमें बच्चे जीवन व्यतीत करते हैं।

बचपन की आधुनिक अवधारणाएं[संपादित करें]

बचपन की अवधारणा जीवन-शैलियों में परिवर्तन और वयस्क अपेक्षाओं के परिवर्तनों के अनुसार विकसित होती और आकार बदलती प्रतीत होती है। कुछ लोगों का मानना है कि बच्चों को कोई चिन्ता नहीं होनी चाहिए और उन्हें काम करने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; जीवन ख़ुशहाल और परेशानियों से मुक्त रहना चाहिए. आम तौर पर बचपन ख़ुशी, आश्चर्य, चिंता और लचीलेपन का मिश्रण है। आम तौर पर यह संसार में वयस्कों के हस्तक्षेप के बिना, अभिभावकों से अलग रहकर खेलने, सीखने, मेल-मिलाप, खोज करने का समय है। यह वयस्क जिम्मेवारियों से अलग रहते हुए उत्तरदायित्वों के बारे में सीखने का समय है।

बचपन को अक्सर बाहरी तौर पर मासूमियत के काल के रूप में देखा जाता है, जिसे सामान्यतः सकारात्मक सन्दर्भ में लिया जाता है, जो विश्व के सकारात्मकक दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है, विशेषकर जहां ज्ञान का अभाव ग़लतियों से प्रस्फुटित होता है, जबकि महानतम ज्ञान गलतियां करने से प्राप्त होता है। "मासूमियत का ह्रास" एक सामान्य संकल्पना है और प्राय: इसे आयु वृद्धि के अभिन्न अंश के रूप में देखा जाता है। इसे आम तौर पर एक अनुभव या बच्चे के जीवन के एक ऐसे काल के रूप में माना जाता है जब बुराई, पीड़ा या अपने चारों ओर की दुनिया के बारे में उनकी जागरूकता विस्तृत होती है। इस विषय को टू किल ए मॉकिंग बर्ड और लार्ड ऑफ़ द फ्लाईज़ उपन्यासों में दर्शाया गया है। काल्पनिक चरित्र पीटर पैन ऐसे बचपन का अवतार है जो कभी ख़त्म नहीं होता.

प्रकृति अभाव विकार[संपादित करें]

प्रकृति अभाव विकार (नेचर डेफ़िसिट डिसार्डर), रिचर्ड लउ द्वारा अपनी 2005 की पुस्तक लास्ट चाइल्ड इन द वुड्स में गढ़ा गया शब्द है, जो संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में[2] बच्चों द्वारा घर से बाहर कम समय व्यतीत करने की कथित प्रवृत्ति को निर्दिष्ट करता है[3] जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न व्यवहारपरक समस्याएं उत्पन्न होती हैं।[4] कंप्यूटर, वीडियो गेम और टेलीविज़न के आगमन के साथ, बच्चों को बाहर की छानबीन से अधिक से घर के अंदर रहने के अनेक कारण मिल गए हैं। "औसत अमेरिकी बच्चा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ सप्ताह के 44 घंटे बिताता है".[5] माता-पिता भी बच्चों को अपने बढ़ते हुए "अजनबियों के ख़तरों" से संबंधित भय के कारण उनकी सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें घर के भीतर ही रख रहे हैं।[5] हाल के शोध ने बच्चों द्वारा संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में राष्ट्रीय उद्यानों में जाने की घटती संख्या और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उपभोग में वृद्धि के अतिरिक्त अंतर को रेखांकित किया है।[6]

स्वस्थ बचपन[संपादित करें]

माता-पिता की भूमिका[संपादित करें]

शारीरिक स्वास्थ्य[संपादित करें]

बाल संरक्षण[संपादित करें]

बचपन का खेल[संपादित करें]

बच्चे के ज्ञानात्मक, शारीरिक, सामाजिक और भावनात्म‍क सुदृढ़ता के लिए खेल अनिवार्य है।[7] यह बच्चों को शारीरिक (दौड़ना, कूदना, चढ़ना आदि), बौद्धिक (सामाजिक कौशल, समुदाय नियम, नैतिकता और सामान्यं ज्ञान) और भावनात्मबक विकास (सहानुभूति, करूणा और दोस्ती) के अवसर प्रदान करता है। असंयोजित खेल रचनात्मकता और परिकल्पना को प्रोत्साहित करते हैं। अन्य बच्चों और साथ ही, कुछ वयस्कों के साथ खेलना और परस्पर बातचीत करना दोस्ती, सामाजिक अन्योन्य क्रिया, मतभेद और संकल्पों के अवसर प्रदान करते हैं।

खेल के माध्यम से बच्चे बहुत ही कम उम्र में अपने आस-पास की दुनिया के संपर्क में आते हैं और परस्पर क्रिया करते हैं। खेल बच्चों को एक ऐसे संसार की रचना करने और खोज करने की अनुमति देता है जिसमें वे कभी-कभार अन्य बच्चों या देखभालकर्ताओं के साथ संयुक्त रूप से वयस्कों के समान भूमिका निभाते समय अपने भय पर विजय पाकर मास्ट‍र बन सकते हैं।[7] अनिर्देशित खेल बच्चों को समूह में कार्य करने, बांटने, समझौता करने, विवाद सुलझाने और स्व-प्रवक्ता कौशल सीखने के अवसर प्रदान करता है। लेकिन जब खेल वयस्कों द्वारा नियंत्रित किया जाता है, बच्चे वयस्कों के नियमों और चिंताओं को मौन रूप से स्वीकार कर लेते हैं और खेल द्वारा प्रदत्त कुछ लाभ विशेषकर रचनात्मकता, नेतृत्व और सामूहिक कौशल विकास के अवसर खो देते हैं।[7]

खेल को बच्चों के श्रेष्ठ विकास के लिए इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि इसे मानवाधिकार संयुक्त राष्ट्र उच्च आयोग में प्रत्येक बच्चे के अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।[8] बच्चे, जिनका पालन-पोषण त्वरित और दबावपूर्ण शैली में होता है, वे बच्चों द्वारा संचालित खेल से हासिल होने वाले लाभों से वंचित हो सकते हैं।[7]

गली की संस्कृति[संपादित करें]

बच्चों की गलियों की संस्कृति को युवा बच्चों द्वारा रचित सामूहिक संस्कृति के रूप में निर्दिष्ट किया जाता है और कभी-कभार इसे उनके गोपनीय संसार के रूप में निर्दिष्ट किया जाता है। यह सात और बारह वर्ष के बीच की उम्र वाले बच्चों के बीच बहुत आम है। यह शहरी औद्योगिक जिलों के कामकाजी वर्ग में दृढ़तम है जहां बच्चों को परंपरागत रूप से बिना निगरानी के लंबे समय तक बाहर खेलने की छूट है। वयस्कों के न्यूनतम हस्तक्षेप के साथ इसका आविष्कार और काफी हद तक संचालन खुद बच्चों द्वारा किया गया है।

युवा बच्चों की गली संस्कृंति प्राय: शांत पिछली गलियों और फुटपाथों तथा स्थानीय उद्यानों, खेल के मैदानों, झाडि़यों और बंजरभूमि तथा स्थानीय दुकानों तक जाने वाले मार्गों पर विकसित होती है। यह अक्सर शहरी क्षेत्रों के विभिन्न भागों (स्था‍नीय भवनों, किनारों, गली की चीज़ों आदि) को कल्पनाशील प्रतिष्ठा प्रदान करती है। बच्चे निश्चित क्षेत्र निर्धारित करते हैं जो अनौपचारिक मिलन और आराम करने के स्थलों का उद्देश्य पूर्ण करते हैं (देखें: सोबेल,2001). एक शहरी क्षेत्र जो किसी वयस्क के लिए पहचान विहीन और उपेक्षित दिखाई देता है बच्चों के संदर्भ में गहन 'आत्मीय स्थल' हो सकता है। वीडियो गेम और टेलीविज़न जैसे आंतरिक मनबहलाव साधनों के आविष्कार के बाद, बच्चों की गली संस्कृति की जीवन-शक्ति - या अस्तित्व - के बारे में चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं।

सामाजिक विज्ञान में शोध[संपादित करें]

हाल के वर्षों में वयस्कता के समाजशास्त्रीय अध्ययन संबंधी दिलचस्पी में तेजी से वृद्धि हुई है। समकालीन सामाजिक और मानवविज्ञान अनुसंधान तक पहुंचते हुए, इथियोपिया में लोगों ने बचपन और सामाजिक सिद्धांत के बीच, उनके ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आयामों की खोज के साथ प्रमुख कड़ियों को विकसित किया है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • जन्मदिन की पार्टी
  • बचपन और पलायन
  • बच्चा
  • बच्चों की पार्टी के खेल
  • वयस्कता
  • बच्चों से संबंधित लेखों की सूची
  • पारंपरिक बच्चों के खेलों की सूची
  • अवस्था परिवर्तन (राइट ऑफ़ पैसेज)
  • बचपन का समाजशास्त्र
  • गली में रहने वाले बच्चे

पाद-लेख[संपादित करें]

  1. मैकमिलन डिक्शनरी फॉर स्टुडेंट्स मैकमिलन, पैन लिमिटेड (1981), पृष्ठ 173. 2010/07/15 को पुनःप्राप्त.
  2. फ़ॉर मोर चिल्ड्रन, लेस टाइम फ़ॉर आउटडोर प्ले: बिज़ी शेड्यूल्स, लेस ओपन स्पेस, मोर सेफ़्टी फ़ियर्स, एंड ल्यूर ऑफ़ द वेब कीप किड्स इनसाइड मर्लिन गार्डनर द्वारा, क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर, 29 जून 2006.
  3. यू.एस. चिल्ड्रन एंड टीन्स स्पेंड मोर टाइम ऑन एकडेमिक्स डायने स्वैनब्रो द्वारा, द यूनिवर्सिटी रिकॉर्ड ऑनलाइन, द यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन.
  4. आर यूअर चिल्ड्रन रियली स्पेंडिंग इनफ़ टाइम आउटडोर्स?गेटिंग अप क्लोज़ विथ नेचर ओपन्स ए चाइल्ड्स आईस टु द वंडर्स ऑफ़ द वर्ल्ड, विथ अ बाउंटी ऑफ़ हेल्थ बेनिफ़िट्स. टैमि बुराक द्वारा, कैनेडियन लिविंग.
  5. आउटसाइड अजिटेटर्स बिल ओ'ड्रिसकॉल द्वारा, पिट्सबर्ग सिटी पेपर
  6. "Is There Anybody Out There?", Conservation 8 (2), April–June 2007, http://www.conbio.org/cip/article82nic.cfm 
  7. Kenneth R. Ginsburg, MD, MSEd. "The Importance of Play in Promoting Healthy Child Development and Maintaining Strong Parent-Child Bonds". American Academy of Pediatrics. Archived from the original on 2007-10-09. http://web.archive.org/web/20071009180324/http://www.wcss.wa.edu.au/pdf/importanceoftheplay_AAP.pdf. 
  8. "Convention on the Rights of the Child. General Assembly Resolution 44/25 of 20 नवम्बर 1989.". Office of the United Nations High Commissioner for Human Rights.. http://www.unhchr.ch/html/menu3/b/k2crc.htm. 

अतिरिक्त पठन[संपादित करें]

  • एरीस, फ़िलिप. सेंचुरीज़ ऑफ़ चाइल्डहुड: ए सोशल हिस्ट्री ऑफ़ फ़ैमिली लाइफ़ . न्यूयॉर्क: एल्फ्रेड ए. नॉफ़, 1991.
  • बोआस, जॉर्ज. द कल्ट ऑफ़ चाइल्डहुड . लंदन: वारबर्ग, 1966.
  • ब्राउन, मर्लिन आर, सं. पिक्चरिंग चिल्ड्रन: कंस्ट्रक्शन्स ऑफ़ चाइल्डहुड बिट्विन रौस्यु एंड फ्रायड . एल्डरशॉट: एशगेट, 2002.
  • बकिंघम, डेविड. ऑफ़्टर द डेथ ऑफ़ चाइल्डहुड: ग्रोइंग अप इन द एज ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया . ब्लैकवेल पब्लिशर्स, 2000. आईएसबीएन 0745619339.
  • बंज, मार्शिया जे., सं. द चाइल्ड इन क्रिश्चियन थॉट . ग्रैंड रैपिड्स, एमआई: विलियम बी. एर्डमैन्स पब्लिशिंग कंपनी, 2001.
  • कैलवर्ट, केरिन. चिल्ड्रन इन द हाउस: द मेटीरियल कल्चर ऑफ़ अर्ली चाइल्डहुड, 1600-1900 . बॉस्टन: नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी प्रेस, 1992.
  • क्लेवरली, जॉन और डी.सी. फ़िलिप्स. विशन्स ऑफ़ चाइल्डहुड: इन्फ़्लुएंशल मॉडल्स फ़्रॉम लोकी टू स्पॉक . न्यूयॉर्क: टीचर्स कॉलेज, 1986.
  • कैनेला, गेल और जो एल. किन्चोलो. "किडवर्ल्ड: चाइल्डहुड स्टडीज़, ग्लोबल पर्स्पेक्टिव्स एंड एजुकेशन". न्यूयॉर्क: पीटर लैंग, 2002.
  • कनिंघम, ह्यू. चिल्ड्रन एंड चाइल्डहुड इन वेस्टर्न सोसाइटी सिन्स 1500 . लंदन: लॉन्गमैन, 1995.
  • कनिंग्टन, फ़िलिस और ऐनी बक. चिल्ड्रन्स कॉस्ट्यूम इन इंग्लैंड: 1300 टू 1900 . न्यूयॉर्क: बार्न्स एंड नोबल, 1965.
  • डीमॉस, लॉयड, सं. द हिस्ट्री ऑफ़ चाइल्डहुड . लंदन: सावनीर प्रेस, 1976.
  • हिगोनेट, ऐनी. पिक्चर्स ऑफ़ इन्नोसेन्स: द हिस्ट्री एंड क्राइसिस ऑफ़ आइडियल चाइल्डहुड . लंदन: थेम्स और हडसन लिमिटेड, 1998.
  • इम्मेल, एंड्रिया और माइकल विटमोर, सं. चाइल्डहुड एंड चिल्ड्रन्स बुक्स इन अर्ली मॉडर्न यूरोप, 1550-1800 . न्यूयॉर्क: रूटलेड्ज, 2006
  • किनकैड, जेम्स आर. चाइल्ड लविंग: द इरॉटिक चाइल्ड एंड विक्टोरियन कल्चर . न्यूयॉर्क: रूटलेड्ज, 1992
  • नॉर, जैकलिन, सं. चाइल्डहुड एंड माइग्रेशन. फ़्रॉम एक्सपीरियंस टू एजेंसी . बिएलेफ़ेल्ड: ट्रांसक्रिप्ट, 2005.
  • मुलर, अंजा, सं. फ़ैशनिंग चाइल्डहुड इन द एइटिंथ सेंचुरी: एज एंड आइडेंटिटी . बर्लिंगटन, वीटी: एशगेट, 2006.
  • ओ'माले, एंड्रयू. द मेकिंग ऑफ़ द मॉडर्न चाइल्ड: चिल्ड्रन्स लिटरेचर एंड चाइल्डहुड इन द लेट एइटिंथ सेंचुरी . लंदन: रुटलेड्ज, 2003.
  • पिंचबेक, आइवी और मार्गरेट हेविट. चिल्ड्रन इन इंग्लिश सोसायटी . 2 खंड. लंदन: रुटलेड्ज, 1969.
  • पोलॉक, लिंडा ए. फ़रगॉटन चिल्ड्रन: पेरेंट-चिल्ड्रन रिलेशन्स फ़्रॉम 1500 टू 1900 . केम्ब्रिज: केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1983.
  • पोस्टमैन, नील. द डिसपियरेंस ऑफ़ चाइल्डहुड . न्यूयॉर्क: विंटेज, 1994.
  • शुल्ट्ज़, जेम्स. द नॉलेज ऑफ़ चाइल्डहुड इन द जर्मन मिडल एजस.
  • शॉर्टर, एडवर्ड. द मेकिंग ऑफ़ द मॉडर्न फ़ैमिली .
  • सोमरविले, सी. जॉन. द डिस्कवरी ऑफ़ चाइल्डहुड इन प्यूरिटन इंग्लैंड . एथेंस: यूनिवर्सिटी ऑफ़ जॉर्जिया प्रेस, 1992.
  • स्टीनबर्ग, शर्ली आर. और जो एल. किन्चेलो. किंडरकल्चर: द कॉर्पोरेट कंस्ट्रक्शन ऑफ़ चाइल्डहुड . वेस्टव्यू प्रेस इंक, 2004. आईएसबीएन 081339157.
  • स्टोन, लॉरेंस. द फ़ैमिली, सेक्स एंड मैरेज इन इंग्लैंड 1500-1800 . न्यूयॉर्क: हार्पर और रो, 1979.
  • ज़ोरनाडो, जोसेफ़ एल. इन्वेंटिंग द चाइल्ड: कल्चर, आइडियॉलोजी, एंड द स्टोरी ऑफ़ चाइल्डहुड . न्यूयॉर्क: गारलैंड, 2001.

बाह्य लिंक[संपादित करें]

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