फिनोल

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दर्शव (फ़िनोल) (IUPAC: Benzenol) वस्तुत: कार्बनिक यौगिकों की एक श्रेणी का नाम है जिसका प्रथम सदस्य सामान्य दर्शव या कार्बोलिक अम्ल है। बेंजीन केंद्रक का एक या एक से अधिक हाइड्रोजन जब हाइड्रॉक्सिल समूह से विस्थापित होता है, तब उससे जो उत्पाद प्राप्त होते हैं उसे दर्शव कहते हैं। यदि केंद्रक में एक ही हाइड्रॉक्सिल रहे, तो उसे मोनोहाइ-ड्रिक दर्शव, दो हाइड्रॉक्सिल रहें तो उसे डाइहॉइड्रिक दर्शव और तीन हाइड्रॉक्सिल रहें, तो उसे ट्राइहाइड्रिक दर्शव कहते हैं।

अन्य नाम

Hydroxybenzene, Carbolic Acid, Benzenol, Phenylic Acid

Hydroxybenzene, Phenic acid, Phenyl alcohol

निर्माण[संपादित करें]

मोनोहाइड्रिक दर्शव कोयले और काठ के शुष्क आसवन से बनते हैं। इसी विधि से व्यापार का कार्बोलिक अम्ल प्राप्त होता है। कार्बोलक अम्ल का आविष्कार पहले-पहले रूंगे (Runge) द्वारा 1834 ई. में हुआ था। 1840 ई. में लॉरें (Laurent) को अलकतरे में इसकी उपस्थिति का पता लगा। इसका दर्शव नाम ज़ेरार (Gerhardt) द्वारा 1843 ई. में दिया गया था। 1867 ई. में वुर्टस (Wurts) और केक्यूले (Kekule) द्वारा दर्शव धूपेन्य (बेंजीन) से पहले पहल तैयार हुआ था।

दर्शव तैयार करने की अनेक विधियाँ मालूम हैं, पर आज दर्शव का व्यापारिक निर्माण अलकतरे या धूपेन्य (बेंजीन) से होता है। अलकतरे के प्रभाजी आसवन से जो अंश 170 डिग्री सें 230 डिग्री सें. पर आसुत होता है उसे मध्य तेल या कार्बोलिक तेल कहते हैं। सामान्य दर्शव इसी में नैपथलीन के साथ मिला हुआ रहता है। दाहक क्षार के तनु विलयन से उपचारित करने से दर्शव विलयन में घुलकर निकल जाता है और नैपथेलीन अवलेय रह जाता है। विलयन के [गन्धकाम्ल]] या प्रांगार द्विजारेय द्वारा विघटित करने से दर्शव अवक्षिप्त होकर जल से पृथक् हो जाता है।

गुण[संपादित करें]

शुद्ध कार्बोलिक अम्ल सफेद, क्रिस्टलीय, सूच्याकार, ठोस होता है, पर, यह वायु में रखे रहने से पानी का अवशोषण कर द्रव बन जाता है, जिसका रंग पहले गुलाबी पीछे प्राय: काला हो जाता है। इसके क्रिस्टल 430 डिग्री सें. पर पिघलते हैं। यह जल में कुछ विलेय होता है। इसका जलीय विलयन निस्संक्रामक होता है और घावों तथा सर्जरी के उपकरणों आदि के धोने में प्रयुक्त होता है। दर्शव की गंध विशिष्ट होती है। यह विषैला होता है। अम्लों के साथ यह एस्टर बनाता है। इसके वाष्प को तप्त (390 डिग्री से 450 डिग्री सें.) ह्रसातु (थोरियम) पर ले जाने से दर्शव दक्षु (ईथर) बनता है। दर्शव के ईथर सरल या मिश्रित दोनों प्रकार के हो सकते हैं। भास्वर पञ्चनीरेय (पेंटाक्लोराड) के उपचार से यह नीर धूपेन्य (क्लोरो बेंजीन) बनता है। दुराघ्री (ब्रोमीन) की क्रिया से यह त्रिदुरा (ट्राइब्रोमो) दर्शव बनता है। यह क्रिया मात्रात्मक होती है और दर्शव को अन्य पदार्थों से पृथक करने या दर्शव की मात्रा निर्धारित करने में प्रयुक्त होती है। दर्शव सक्रिया यौगिक है। अनेक अभिकर्मकों के साथ वह यौगिक बनता है। अनेक पदार्थों के संपर्क में आने से वह विशिष्ट रंग देता है, जिससे यह पहचाना जाता है।

उपयोग[संपादित करें]

दर्शव से सैलिसिलिक अम्ल और उसके एस्टर सैलोल आदि बड़े महत्व के व्यापारिक पदार्थ बनते हैं। इससे पिक्रिक अम्ल भी बनता है, जो एक समय बड़े महत्व का विस्फोटक और रंजक था। कृत्रिक रंजकों के निर्माण में भी कार्बोनिक अम्ल प्रयुक्त होता है। यह बड़े महत्व का निस्संक्रामक है। इससे अनेक जीवाणुनाशक, कवकनाशक, घासपात नाशक तथा अन्य बहुमूल्य ओषधियाँ आज तैयार होती हैं।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]