प्रेम न हाट बिकाय

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प्रेम न हाट बिकाय  
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लेखक रवीन्द्र प्रभात
मूल शीर्षक प्रेम न हाट बिकाय
अनुवादक Love can't be sold in fares
देश भारत
भाषा हिन्दी
विषय त्रिकोणीय प्रेम संघर्ष पर आधारित
प्रकार उपन्यास
प्रकाशक हिन्द युग्म, नई दिल्ली,भारत
प्रकाशन तिथि फरवरी 2012
मीडिया प्रकार प्रिंट (हार्डकवर)
पृष्ठ 176 पृष्ठ (प्रथम संस्करण)
आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9381394105,ISBN-13:9789381394106
ओ॰सी॰एल॰सी॰ क्र॰ 834088431
लाइब्रेरी ऑफ़ कॉंग्रेस
वर्गीकरण
2013330952

प्रेम न हाट बिकाय (अंग्रेज़ी: Prem na hat bikay), हिन्दी का एक उपन्यास है, जो रवीन्द्र प्रभात द्वारा लिखित है । यह उपन्यास त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग पर आधारित है । [1]

सारांश[संपादित करें]

इस उपन्यास की कथा के केन्द्र में प्रेम है। प्रेम ही एक ऐसा भाव है जो व्यक्ति को हर जटिल से जटिल स्थिति से निपटने की ताकत देता है। प्रेम जोड़ता है तो कभी कभी प्रेम तोड़ता भी है। यहाँ प्रेम माँजता है। चाहे प्रशांत हो या स्वाति और चाहे देव हो या गुलाब से नगीना और नगीना से गुलाब की यात्रा करती हुई एक स्त्री –सभी को विपरीत स्थितियों से प्रेम ही बचाता है। इस उपन्यास का मुख्य पात्र "प्रशांत" है, जो शादी शुदा रहता है । जीवन और जीविका के बीच तारतम्य स्थापित करने के क्रम में बिहार के एक छोटे से गाँव से वाराणसी आ जाता है । यहाँ वह बनवारी लाल की बनारसी साड़ियों के कारखाने में काम करता है। धीरे-धीरे बनवारी लाल के परिवार से प्रशांत की नज़दीकियाँ बढ़ती चली जाती है । मन ही मन बनवारी लाल की बेटी स्वाती उसे चाहने लगती है । प्रशांत को जब इसका भान होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । स्वाती का एकतरफा प्रेम परवान चढ़ चुका होता है । इसी क्रम में गणिका गुलाब और देव की उपस्थिती होती है, जो इस उपन्यास को एक नया मोड देती हैं । गुलाब यानि नगीना और देव ने मिलकर दोनों के प्रेम को पवित्रता की परिधि में ले जाते हैं, जहां प्रेम का अध्यात्म शुरू होता है । गाँव में रह रही प्रशांत की पत्नी और बच्चों का त्याग इस उपन्यास के एक भाग को भावुकता की परिधि में ले जाता है । अंतत: प्रशांत और स्वाती दोनों मौत को गले लगाकर प्यार को बचाने का यत्न करता है ।

हिन्दी के नाट्य समीक्षक एवं साहित्यकार प्रताप सहगल के अनुसार "रवीन्द्र प्रभात ने प्रेम के स्वरूप को देह से निकाल कर अध्यात्म तक पहुँचाने का उपक्रम इस कथा के माध्यम से किया है।" उनके अनुसार "प्रेम का आधार जैसे कोई भी हो सकता है वैसे ही अध्यात्म का आधार भी। हरी-भरी दुनिया या सामाजिक नज़रियों से इतर प्रेम अध्यात्म का ही एक रूप है। इन अर्थों में ही इस उपन्यास की कथा को समझा-परखा जा सकता है। रवीन्द्र प्रभात हिन्दी ब्लागिंग की दुनिया में एक चर्चित नाम है और वह अपने पहले उपन्यासताकि बचा रहे लोकतन्त्र’ से साहित्य के क्षेत्र में भी चर्चित लेखकों के दायरे में दाखिल हो चुके हैं। इस उपन्यास की कथा को भी उन्होंने कहीं संवादों तो कहीं सधे हुए वर्णन के सहारे साधने की कोशिश की है।”[2]

उपन्यासकार रवीन्द्र प्रभात हिन्दी के कवि, लेखक,व्यंग्यकार, कथाकार और न्यू मीडिया विशेषज्ञ हैं । ये व्यंग्य के एक नियमित स्तंभकार भी हैं । यह इनका दूसरा उपन्यास है ।[3][4][5] [6][7] [8][9][10][11]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. प्रेम न हाट बिकाय, लेखक - रवीन्द्र प्रभात, प्रकाशक-हिन्द युग्म , 1, जिया सराय,हौज खास, नई दिल्ली-110016, भारत, वर्ष- 2012, आई एस बी एन 9381394105, आई एस बी एन 9789381394106
  2. परिकल्पना ब्लॉगोत्सव में लोकरपन का समाचार, शीर्षक : रवीन्द्र प्रभात ने प्रेम के स्वरुप को देह से निकालकर अध्यात्म तक पहुंचाया : प्रताप सहगल
  3. Manoj Kumar Pandey. "A conversation with Ravindra Prabhat". Another Subcontinent. http://www.southasiatoday.org/2012/02/today-we-have-any-type-of-new.html. "Ravindra Prabhat Today we have many type of new applications, which will help in promoting Hindi very fast on Internet." 
  4. Ravindra Prabhat's second novel released Today
  5. स्वर्गविभा में रवीन्द्र प्रभात का संक्षिप्त परिचय
  6. फ्लिपकार्ट पर उपन्यास की विस्तृत चर्चा
  7. होम शॉप 18 पर प्रेम न हाट बिकाए
  8. हिन्दी बूक सेंटर पर प्रेम न हाट बिकाए
  9. ई बे डॉट कॉम पर प्रेम न हाट बिकाय
  10. रेडिफ़ बूक / प्रेम न हाट बिकाय
  11. ई-साहित्य में रवीन्द्र प्रभात का साक्षात्कार

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]