प्रशासकीय न्याय

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प्रशासकीय न्याय (Administrative justice) की व्याख्या ऐसी व्यवस्था के रूप में की जा सकती है जिसके अंतर्गत प्रशाकीय अधिकारियों को कानून द्वारा इस बात का अधिकार मिलता है कि वे निजी मामलों का अथवा निजी एवं सरकारी अधिकारियों के बीच उठनेवाले मामलों का निपटारा कर सकें। भारत में यह व्यवस्था यद्यपि ब्रिटिश शासन की देश में शुरुआत होने के समय से ही कोई अनजानी बात नहीं रह गई थी, फिर भी 20वीं सदी में हुए प्रथम तथा द्वितीय महायुद्धों के बाद यह उत्तरोत्तर अधिक प्रचलित होती गई ; विशेषत: देश की स्वाधीनता के बाद, जब कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दल ने समाजवादी समाज के ढाँचे का रूप राष्ट्रीय लक्ष्य के तौर पर अपनाया।

प्रशासकीय न्याय भारत में इन दिनों एक उपयोगी कार्य कर रहा है। विधिव्यवस्था की रक्षा के लिये यह आवश्यक नहीं है कि केवल सामान्य न्यायालयों को ही मामलों के निर्णय का एकाधिकार प्राप्त हो। प्रशासकीय न्यायालयों का सहारा लिए बिना आज का राज्यतंत्र अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह भलीभाँति नहीं कर सकता।

परिचय एवं इतिहास[संपादित करें]

जब उन्मुक्त-व्यापार (laissey faire) वाले राज्य की परिकल्पना का स्थान कल्याणकारी राज्य की कल्पना ले लेती है तब राज्य की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि आम लोगों के व्यक्तित्व के विकास के लिये आवश्यक न्यूनतम भौतिक परिस्थितियाँ प्रस्तुत की जायॅ। इस सिद्धांत को अपनाने के लिये यह पहला कदम उठाना आवश्यकथा कि बिना मीनमेख के मुक्त व्यापार की नीति अपनाने से उत्पन्न अन्यायों का उच्छेद किया जाय। यह कार्य अधिकांश में विधिनिर्माण द्वारा ही किया जा सकता था। उदाहरण के लिये हम करार अथवा अनुबंध (contract) की स्वतंत्रता को लें जो व्यक्तिवादी राज्य का एक मान्य सिद्धांत है, तो हम पाएँगे कि इसके परिणामस्वरूप बहुतेरे मामलों में, औद्योगिक तथा ग्राम्य मजदूरों की स्थिति वस्तुत: दासों जैसी ही हो जाती है। उत्पादकों के बीच बड़े पैमाने पर होनेवाली गुटबंदी से भी एकाधिपत्य की सारी बुराइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं जिससे उपभोक्ताओं का अधिशोषण होने की संभावना बढ़ जाती है।

इन दो महायुद्धों के अतिरिक्त दुर्भिक्ष, बाढ़ तथा महामारी जैसी देवी विपत्तियों के कारण आकस्मिक अथवा संकटकालिक विधि-निर्माण का स्वरूप और उसके परिणाम जनता के सम्मुख आए जिनके अंतर्गत भी बहुधा प्रशासकीय न्याय के तत्व विद्यमान रहते थे। शासन की जनतांत्रिक प्रणाली का क्रमश: स्वीकार किया जाना और ऐसा शासन स्थापित करने के लिये सार्वभौम मताधिकार को मुख्य साधन मानना गरीब आदमी के मतदान का और इस तरह राजनीति मे उसके निर्णायक महत्व का द्योतक है। इन सब का समष्टिगत परिणाम यह हुआ कि जनता द्वारा चुने गए विधानमंडलों पर, जो अधिकारों से संपन्न किए गए थे, यह जिम्मेदारी भी आ गई कि वे उन तात्कालिक समस्याओं का हल भी ढूढें जो राष्ट्र के सामने उपस्थित थीं।

अपने घरेलू उद्योग को बचाने के लिये अनुकूल न पड़नेवाली अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विताओं की रोकथाम जरूरी थी। किसी देश में रेलवे मार्गो का फैलाया जाना उसे सभ्य बनाने की दिशा में प्रथम चरण के समान है, तथा रेलवे के उपयोग के लिये उसकी दरें तै करने को एक प्रशाासकीय न्यायाधिकरण का होना भी लाजिमी है। करनिर्धारण का महत्व बढ़ता गया। पहले भूमिकर एवं सीमाशुल्क और फिर अन्य सभी प्रकार के कर भी, विशेषतया आयकर, कानूनी व्यवस्था के अंग बन गए। कुछ वस्तुओं का अधिक उत्पादन तथा कुछ के कम उत्पादन किए जाने की स्थिति के कारण उत्पादन के नियमन की माँग हुई। उत्पादन के दो अंगों अर्थात्‌ पूँजी एवं श्रम के बीच होनेवाले लगातार झगड़ों ने बराबर गतिरोध का भय उत्पन्न किया और ऐसे झगड़ों को तय करने के लिये एक विशेष व्यवस्था की तीव्र आवश्यकता महसूस की गई। बेकारों तथा काम का अधिक भार उठानेवालों की तरफ ध्यान देना जरूरी समझा गया। उन मजदूरों को जिन्हें काम करते समय कोई क्षति उठानी पड़ी हो, उचित मुआवजा देना आवश्यक समझा गया तथा ऐसे हर एक मामले में अदायगी और मुआवजे की मात्रा स्थिर करने के प्रश्नों को लेकर जो भी मामले उठ खड़े हों उनका निर्णय करने के लिये भी अधिकारियों की नियुक्ति आवश्यक समझी गई। जनसंख्या में वृद्धि नगरों के विस्तार तथा उद्योगकरण आदि ने शहरों में ऐसी भीड़भाड़ पैदा कर दी कि भूमिपतियों द्वारा महँगे किरायों का लादा जाना आम बात हो गई। अत: किरायों पर नियंत्रण जरूरी हो गया। सस्ते भाड़ों का तय किया जाना, मकानों से जबर्दस्ती हटाए जाने को रोकना तथा खाली मकानों में किरायेदारों को बसाने आदि की समस्याएँ ऐसी परिस्थिति का स्वाभाविक परिणाम थीं।

राज्य के व्यक्तिवादी अथवा उन्मुक्त व्यापार के सिद्धांत के अंतर्गत तथा सामान्य न्यायलयों के सम्मुख, निज मामलों पर सार्वजनिक हितों की अपेक्षा अधिक ध्यान दिया जाता था। अब यह अनुभव किया जाने लगा कि सार्वजनिक हितों की रक्षा अधिक आवश्यक है, उदारणार्थ गंदी बस्तियों का हटाया जाना, गंदे आवासों के मालिकों के निजी हितों की अपेक्षा अधिक जरूरी है। चालू न्यायालयों से भिन्न प्रकार की एक न्यायिक व्यवस्था आवश्यक समझी गई जो ऐसे संसार की दार्शनिक परिकल्पना करती थी जिसमें अस्वच्छ नालियाँ न हों, बिना बहावाले सीवर न हों, दूषित पानी देने की व्यवस्था न हो, अस्वास्थ्यकर मकानों का अभाव हो, बार बार बिजली फेल होने की घटनाएँ न हों तथा जलाने के लिये समुचित गैस का अभाव न हो, जहाँ उद्योगतंत्र अरक्षित न हो, जहाँ मजदूर उपेक्षित न हों तथा बच्चे लापरवाही का शिकर न हों और अधिक उम्रवाले बूढ़ों की मिट्टी पलीद न हो।

विभिन्न कारणों से, देश के आम न्यायालय उपर्युक्त सूची में आए ऐसे असंख्य प्रश्नों के लिये निर्णय देने में अशक्य अथवा अनुपयुक्त सिद्ध होते हैं जिनके निर्णय का प्राविधान कानून द्वारा किया गया है। औद्योगिक झगड़ों या मजदूरों के मुआवजे संबंधी विवादों में, यहाँ तक कि शहर के किरायेदारों तथा मकान मालिकों के झगड़ों या मजदूरों के मुआवजे संबंधी विवादों में, अपेक्षाकृत गरीब मजदूर तथा लगान देनेवाले काश्तकार सामान्य अदालतों की धीमी तथा महँगी कार्यवाही का भारी खर्च नहीं उठा सकते। सामान्य अदालतों की अपेक्षा किसी त्वरित एवं सुलभ व्यवस्था को जन्म देना अपेक्षित था। परिणामस्वरूप श्रम, भाड़े, तथा औद्योगिक झगड़ों संबंधी न्यायाधिकरण स्थापित किए गए। भारत के औद्योगिक न्यायधिकरणों के अंतर्गत औद्योगिक झगड़ों में समझौता करानेवाले तथा न्यायिक विचार के न्यायलय, मजदूरों के मुआवजा के आयुक्त, पगारों की अदायगी करानेवाले अधिकारी तथा कारखाने के वे निरीक्षक भी शामिल हैं जिन्हें ऐसी कितनी ही बातों का निर्णय करना पड़ता है जिनका संबंध मिल मालिकों एवं मजदूरों के कानूनी हकों से होता है।

जब झगड़ा किसी ऐसे विषय के संबंध से होता है जिसमें न्यायाधिकारी महोदय को विवेक से काम लेने की यथेष्ट छूट रहती है या जहाँ मामले को तय तमाम करने के लिये कितने ही संभावित समाधानों में से एक को चुनना पड़ता है। यह साफ है कि सामान्य कानूनी अदालतों के लिये, जिन्हें किसी मामले पर तयशुदा कानूनी सिद्धांतों को लागू करने की आदत है, ऐसे मामले कुछ अपरिचित से प्रतीत होंगे। जब व्यापार के क्षेत्र में निर्णायक को राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की ओर भी ध्यान देना पड़ता हे, तब उसे ऐसे अधिकारों की आवश्यकता होती है जो हमेशा बदलती रहनेवाली स्थितियों की माँगों के साथ मेल खा सकें या उनपर लागू हो सकें। आयात निर्यात शुल्क बोर्ड (टैरिफ बोर्ड) तथा निषेधात्मक नजरबदी (प्रिवेंटिव डिटेंशन) के अधिकार से लैस कार्यकारी अफसर, उपर्युक्त तर्क के अनुसार, ऐसे कर्तव्यों को निभाने के लिये सामान्य अदालतों की अपेक्षा अधिक उपयुक्त सिद्ध होते हैं। कर्मचारियों के राष्ट्रीय बीमे (नेशनल इंश्यारेंस ऑव वर्कर्स) संबंधी दावे तथा विवाद इतनी अधिक संख्या में होने संभव हैं कि यदि सामान्य अदालतें उन सभी पर विचार करने लग जायँ तो वे और कोई काम कर ही न सकेंगी। उदाहरणार्थ, मोटर सवारी अधिनियम (मोटर वेहिकिल्स ऐक्‌ट) के अंतर्गत किसी खास रास्ते के लिये परमिट प्राप्त करने का ही मामला लें। एतदर्थ किसी निर्णय पर पहुँचने के लिये क्षेत्रीय परिवहन विभाग (रीजनल ट्रांसपोर्ट अथारिटी) तथा परिवहन संबंधी सुनवाई विभाग (एपिलेंट ट्रांसपोर्ट अथारिटी) को बहुतेरी छोटी बड़ी बातों पर गौर करना पड़ सकता है जो, संभव है, काफी जटिल एवं प्राविधिक ढंग की हों। इन पर विचारार्थ सामान्य अदालतें वैसी समर्थ नहीं सिद्ध होंगी। ऐसे मामलों पर विचार करने के लिये न्यायधीशों से पृथक्‌ कोटि के व्यक्तियों को न्यायधिकार संपन्न किया जाता है और न्याय की कार्यवाही सामान्य अदालतों से अलग किन्हीं जगहों पर संपन्न होती है। इन मामलों की विशिष्टता के कारण इन्हें मुख्य रूप से उन्हीं सरकारी पदाधिकारियों को सौंपना पड़ता है जो प्रशासन का कार्य करते हैं। इन प्रकार, प्रकाशकों द्वारा की जानेवाली न्याय की यह सारी कार्रवाही समष्टि रूप से 'प्रशासकीय न्याय' कहलाने लगी हैं।

जब ऐसे प्रत्येक प्रशासकीय अधिकारी को न्यायाधिकार प्राप्त हो गया और प्रशासकीय न्याय की व्यवस्था आरंभ हो गई; तो इस व्यवस्था की जो अनेक विशेषताएँ थीं : कम खर्च, शीघ्रता, लचीलापन, विशिष्ट ज्ञान, निर्णयों को बाँध देनेवाली नजीरों का अभाव और साक्ष्य के प्राविधिक नियमों से मुक्ति: और जिनके कारण ही इसकी आरंभिक स्थापना को बल मिला था, उन्हीं से यह स्पष्ट होने लगा कि इसमें भी अनेक त्रुटियाँ विद्यमान हैं। ये प्रशासक न्यायाधीश बहुत से मामलों में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण नियमों की बुद्धिमत्ता के प्रति बेखबर होते थे, जैसे बिना सुनवाई के किसी को भी दोषी न ठहराया जाय तथा केवल सुनी सुनाई बातों के आधार पर ही फैसला करना खतरनाक है। सुधार करने के लिये विधान मंडल द्वारा सौंपी गई अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की उतावली में ये कभी कभी सामने आए निजी स्वामित्व के मामलों के प्रति बड़ी बेरुखी का बर्ताव कर बैठते थे। जब विधान मंडल ने इन न्यायाधिकरणों एवं पदाधिकारियों द्वारा किए गए निर्णयों को अंतिम मान्यता देने के लिये कदम उठाने का प्रयत्न किया तो जनता में इस संबंध में एक तरह के भय की भावना उत्पन्न हो गई। कारण यह था कि इस व्यवस्था से इन निर्णयों में दखल देने का कोई अधिकार सामान्य अदालतों को नहीं रह जाता था, भले ही ये निर्णय प्रत्यक्षता अवैध हों अथवा मनमाने ढंग से किए गए हों।

जब कोई केंद्रीय विभाग किसी मामले का फैसला करता था तो एकरूपता उसकी एक स्पष्ट विशेषता होती थी। लेकिन जब किसी कानूनी नुक्ते का सही अर्थ बतलाने के लिये पुनर्विचार करनेवाले किसी केंद्रीय न्यायाधिकरण का अभाव होता था, तो ऐसी दशा में समान न्यायाधिकार रखनेवाले अनेक प्रशासकीय न्यायालय जो फैसला देते थे, वे परस्पर विरोधी होते थे और उनमें तालमेल बिठाने का कोई चारा नहीं रह जाता था। विभिन्न क्षेत्रों में प्रशासकीय न्याय की ये कुछ त्रुटियाँ बतलाई जाती हैं : सावधानी के साथ तथ्यों की छानबीन न करना, साक्ष्य के कुछ आधारभूत सिद्धांतों की उपेक्षा (जैसे सर्वोत्तम उपलब्घ साक्ष्य को ही मान्यता दी जाय), मामले की खुली अदालत में सुनवाई की व्यवस्था न होना, तर्कयुक्त निर्णयों का न दे सकना तथा उनका विवरण प्रस्तुत करने में ढिलाई आदि। इन त्रुटियों के अलावा एक मुख्य दोष तो यह है ही कि देश की सामान्य उच्च अदालतों द्वारा इनपर नियंत्रण का कोई प्रविधान नहीं है। फिर बहुत से लोकप्राधिकारियों में न्यायाधीश का काम तथा मुकदमा चलानेवाले का काम एक ही व्यक्ति के जिम्मे रहता है।

सामाजिक विकास के लिये स्थापित इन नए संस्थानों का भीतरी गठन भी इतना वैविध्यपूर्ण है कि इन्हें सामान्य वर्ग में रखकर वर्णन करना बहुत मुश्किल है। यह विभिन्नता संविधान की 262वीं धारा के अंतर्गत अंत: प्रदेशीय जल 'आयोग' तथा 307वीं धारा के अंतर्गत प्रदेशीय वाणिज्य अधिकारी जैसे प्रशासनिक न्यायाधिकरणों से लेकर स्थानीय स्वायत्तशासन विधान के अनुसार नगरपालिकाओं द्वारा गठित संपत्तिकर संबंधी मामलों की अपील सुननेवाले अधिकारी तक के बीच व्याप्त है। यदि हम अकेले आयकर संबंधी कानून को ही लें तो हम पाएँगे कि आयकर के देनेवाले व्यक्ति और सरकार के बीच चलनेवाले विवादों में निर्णय देने का अधिकार आयकर अधिकारी, पुनर्विचार संबंधी सह आयुक्त, आयकर आयुक्त तथा आयकर विषयक मामलों की अपील सुननेवाले न्यायालय आदि में बँटा होता है। ये सभी अधिकारी केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं। इनकी कार्यपद्धति अलग अलग स्तर पर अलग अलग ढंग की होती है तथा आयकर की अपील पर पुन: विचार करनेवाला न्यायाधिकरण उसी ढंग से काम करता है जिस तरह सामान्य कानूनी अदालतें करती हैं। यह पुनर्विचारक न्यायाधिकरण अनेक व्यक्तियों से मिलकर बनता है जिसमें गणक (एकाउंटिंग) सदस्य तथा विधिज्ञ (लॉइयर) सदस्य समान संख्या में होते हैं और सबके ऊपर एक अध्यक्ष होता है। अन्य अदालतें एकल व्यक्याेिं से ही बनी होती हैं। कोई कानूनी मसला पैदा होने पर पुनर्विचार न्यायाधिकरण द्वारा किए गए फैसले के संबंध में उच्चतर न्यायलय से निवेदन किया जा सकता है। विभिन्न राज्यों के बिक्रीकर कानून के अंतर्गत बने अधिकरणों का गैठन और निर्माण, आयकर कानून द्वारा गठित नमूनों पर ही होता है। देश में जो विभिन्न न्यायाधिकरण काम कर रहे हैं उनके निर्णयों पर पुनर्विचार करने के लिये कोई न्यायालय नहीं है। पर आवश्यक पुनर्विचार अब संविधान की 136वीं धारा के अनुसार अपील की विशिष्ट अनुमति मिलने पर किया जाता है। उपर्युक्त न्यायाधिकरणों के अधिकारी पूरे समय काम करनेवाले (फुल टाइम) अफसर होते हैं। किंतु मोटर सवारी अधिनियम के भीतर आनेवाले क्षेत्रीय परिवहन विभाग तथा राज्य परिवहन विभाग के अधिकारी सरकारी तथा गैससरकारी दोनों अंशकालिक (पार्ट टाइम) होते हैं। कुछ अन्य अधिकारियों के लिये, जिन्हें मामलों का निपटारा करने का अधिकार दिया गया है, सलाहकार समितियों की व्यवस्था की गई है। इन न्यायाधिकरणों के आकार प्रकार का कोई एक तयशुदा ढाँचा नहीं है। गैरसरकारी सदस्यों के लिये इतने पारिश्रमिक की व्यवस्था नहीं होती कि उपयुक्त व्यक्ति इस ओर आकर्षित हो सकें। बहुत से प्रशासकीय न्यायाधिकरणों के लिये प्राय: आवश्यक अर्हताओं का भी निर्धारण नहीं रहता।

इसमें संदेह नहीं कि प्रशासकीय न्याय की व्यवस्था, जिसकी रूपरेखा ऊपर दी गई है, देश में स्थायी रूप से कायम रहने के लिये ही की गई है। अब सवाल यह है इसमें जो त्रुटियाँ देख पड़ती हैं उन्हें दूर करने और व्यवस्था को अधिक कार्यक्षम बनाने के लिये क्या सुधार और संशोधन किए जायँ। इंग्लैंड और अमरीका में 1930 से 1960 तक के दौरान प्रशासकीय न्याय की प्रणाली में अनेक अनुसंधान हुए और उसमें बहुत से सुधार किए गए। इस संबंध में तीन अनुसंधान समितियों की चर्चा की जा सकती है : प्रशासकीय कार्य पद्धति के लिये अमरीका में बनी एटार्नी जनरल की समिति (1939), इंग्लैंड में मंत्रियों के अधिकारों के लिये बनी विशेष समिति (1932) तथा वहीं की प्रशासकीय न्यायलयों तथा प्रशासकीय जाँच पड़ताल आदि की समिति (1957)। इनमें से अंतिम ने कुछ विशिष्ट गुणों या बातों पर बल दिया यथा, निरवग्रहता, न्यायौचित्य एवं निष्पक्षता निर्णयों की पुष्टि में तर्क देना, निर्णयों को प्रकाशित करना तथा उन प्रमाणों को उद्घाटित करना जिनके आधार पर प्रतिकूल निर्णय प्रशासकीय न्यायाधिकरणों द्वारा सामान्य स्वीकृति के लिये किए जाते हैं। इंग्लैंड में इन सुझावों के मुख्यांश को कुछ अपवादों के साथ, कानूनों में समाविष्ट कर लिया गया था।

भारत में इस समस्या को लेकर कोई व्यापक खोजबीन नहीं हुई है। भारत का विधि आयोग भी इस समस्या पर पूरी तौर से नहीं विचार कर पाया। भारतीय संविधान की 32वीं, 136वीं तथा 226वीं धाराओं में इन प्रशासकीय न्यायाधिकरणों को एक हद तक नियंत्रित रखने की व्यवस्था है। 32वीं धारा न्यायालय को अधिकार देती है कि किसी भी लोक प्राधिकारी या खुद सरकार को बुनियादी अधिकारों के व्यावहारिक रूप से लागू करने के लिये वह आज्ञा अथवा समादेशपत्र (रिट) जारी कर सके। उसका यह कार्य हैबियस कार्पस (बंदीप्रत्यक्षीकरण), मैडेसस (परमादेश या नीचे की अदालतों को मुकदमे के कागज बड़ी अदालत में भेजने का निर्देश), प्रतिषेध प्रादेश (नीचे की अदालत को मुकदमा रोक देने का आदेश, अथवा क्वो वारंटो (अधिकार पृच्छा) आदि की शक्ल में हो सकता है। 226वीं धारा ऐसे ही कानूनी अधिकार उच्च न्यायालयों को प्रदान करती है जिनके द्वारा वे न केवल बुनियादी अधिकारों को अपितु अन्य कानूनी अधिकारों एवं उद्देश्यों को भी कार्यान्वित करा सकते हैं। 136वीं धारा सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार देती है कि वह अपनी निर्णय बुद्धि के अनुसार किसी भी न्यायाधिकरण के निर्णय के विषय में की गई अपील पर विचार कर सके (इसमें तथा 32 वीं धारा में सैनिक न्यायालय के निर्णय नहीं शामिल हैं)। भारत में प्रशासकीय न्याय के क्षेत्र में इनके अतिरिक्त और कोई एकरूपता नहीं है। इस पूरे क्षेत्र में स्थिति की समीक्षा के लिये उच्चाधिकार संपन्न आयोग की आवश्यकता है। उक्त आयोग का ही कर्तव्य होगा कि वह उन विभिन्न प्रश्नों पर अपना निर्णय दे जिनमें से बहुतों की चर्चा ऊपर की जा चुकी है। कुछ आवश्यक प्रश्न जिनका उल्लेख यहाँ विशेष रूप से किया जाना चाहिए, ये हैं: किसी विभाग के मुकदमा चलानेवाले अनुभाग को (प्रोजेक्यूटिंग सेक्शन) न्यायिक निर्णय का कार्य करनेवाले अनुभाग (जजिंग सेक्शन) से अलग कर दिए जाने की आवश्यकता, न्यायधिकरणों में ऐसे स्वतंत्र सदस्यों की नियुक्ति की आवश्यकता जिनके सम्मुख सरकारी विभागों के अधिकारियों या कर्मचारियों को आवेदार (क्लेमैंट) अथवा मुकदमा चलानेवालों के रूप में बार बार उपस्थित होना पड़े; मामलों की सुनवाई खुले रूप से की जाय; तथा अंत में, जो सबसे महत्वपूर्ण है, यह कि प्रशासकीय अपीलें सुननेवाले ऐसे न्यायालय की स्थापना की जाय जो भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ही अंग हो, ओर जिसके न्यायसभ्यों में अनुभवी नागरिक पदाधिकारी भी शामिल हों।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]