प्रमात्रा क्षेत्र सिद्धान्त

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प्रमात्रा क्षेत्र सिद्धान्त (QFT) प्रमात्रा यान्त्रिकी के निर्माण के लिए एक सैद्धांतिक ढांचा प्रदान करता है जिसमें क्वांटम यांत्रिक प्रणालियों को अनंत स्वतंत्रता की डिग्री प्रदर्शित किया जाता है।

अनुक्रम

इतिहास [संपादित करें]

मूल सिद्धांत [संपादित करें]

क्षेत्र का प्रारम्भिक विकास डिराक, फाॅक्क, पाउली, हाइजनबर्ग, बोगोल्युबोव द्वारा किया गया। इसका १९५० में के दशक में प्रमात्रा विद्युत चुम्बकीकी के विकास के साथ सम्पन्न हुआ।

आमान सिद्धांत [संपादित करें]

आमान सिध्दान्त कण भौतिकी के मानक प्रतिमान में सन्निहित बलों के एकीकरण का सूत्रबद्ध प्रमात्रिकरण है।

वृहत संश्लेषण [संपादित करें]

सिद्धांत [संपादित करें]

चिरसम्मत और प्रमात्रा क्षेत्र [संपादित करें]

चिरसम्मत क्षेत्र सिध्दांत दिक्-काल के अध्ययन क्षेत्र में परिभाषित फलन है [1] दो परिघटनाएं जो जो कि चिरसम्मत सिद्धान्त द्वारा वर्णित की जा सकती हैं वो हैं न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त g(x, t) (यहाँ g, x और t का सतत् फलन है) और चिरसम्मत विद्युत-चुम्बकत्व जिसे विद्युत क्षेत्र E(x, t) और चुम्बकीय क्षेत्र B(x, t) से वर्णित किया जा सकता है। क्योंकि ये क्षेत्र समष्टि के प्रत्येक बिन्दु पर सिद्धान्तन विशिष्ट मान रख सकते हैं, इनकी स्वतंत्रता की विमा अनन्त होती है।[1]

लाग्रांजियन सूत्र [संपादित करें]

प्रमात्रा क्षेत्र सिद्धान्त में अक्सर चिरसम्मत सिद्धान्त के लाग्रांजियन सूत्रों का उपयोग होता है। ये सूत्र किसी क्षेत्र के प्रभाव में कण की गति का अध्ययन करने के लिए चिरसम्मत यांत्रिकी में उपयोग होने वाले लाग्रांजियन सूत्रों के अनुरूप हैं। चिरसम्मत क्षत्र सिद्धान्त में इन्हें लाग्रांजियन घनत्व, \mathcal{L}, जो कि क्षेत्र φ(x,t), और इसके प्रथम अवकलज (∂φ/∂t and ∇φ) का फलन है पर आयलर-लाग्रांजियन क्षेत्र सिद्धान्त समीकरण लागू की जाती है। निर्देशांक बिन्दुओं को (t, x) = (x0, x1, x2, x3) = xμ लिखने पर, आयलर-लाग्रांजियन गति की समीकरण [1]

\frac{\partial}{\partial x^\mu} \left[\frac{\partial\mathcal{L}}{\partial(\partial\phi/\partial x^\mu)}\right] - \frac{\partial\mathcal{L}}{\partial\phi} = 0,

जहाँ आइनस्टाइन पद्धति के अनुसार μ चर के सापेक्ष इन्हे जोड़ा जाता है।

इस समीकरण को हल करने पर हमें क्षेत्र की "गति की समीकरण" प्राप्त होती हैं।[1] उदाहरण के लिए लाग्रांजियन घनत्व से आरम्भ करने पर

 \mathcal{L}(\phi,\nabla\phi) = -\rho(t,\mathbf{x})\,\phi(t,\mathbf{x}) - \frac{1}{8\pi G}|\nabla\phi|^2,

इस पर आयलर-लाग्रांजियन समीकरण लागू करने पर हमें गति की समीकरण प्राप्त होती है-

 4\pi G \rho(t,\mathbf{x}) = \nabla^2 \phi.

इकाई- और बहु-कण प्रमात्रा यांत्रिकी [संपादित करें]

प्रमात्रा यांत्रिकी में कण (इलेक्ट्रोन या प्रोटोन) को एक समिश्र तरंग फलन, ψ(x, t) द्वारा निरुपित किया जाता है जिसका समय के साथ परिवर्तन का अध्ययन श्रोडिंगर समीकरण द्वारा दिया जाता है

-\frac{{\hbar}^2}{2m}\frac{{\partial}^2}{\partial x^2}\psi(x,t) + V(x)\psi(x,t) = i \hbar \frac{\partial}{\partial t} \psi(x,t).

जहाँ m कण का द्रव्यमान है और V(x) उस पर आरोपित संवेग

द्वितीय प्रमात्रिकरण [संपादित करें]

बोसॉन [संपादित करें]

फर्मियोन [संपादित करें]

क्षेत्र संकारक [संपादित करें]

उलझन [संपादित करें]

क्षेत्रों और कणों का एकीकरण [संपादित करें]

कण अभेद्यता का भौतिक अर्थ [संपादित करें]

कण सरंक्षण और असरक्षण [संपादित करें]

स्वयंसिद्ध दृष्टिकोण [संपादित करें]

सम्बंधित घटना [संपादित करें]

पुनर्मानकीकरण [संपादित करें]

आमान स्वतंत्रता [संपादित करें]

बहू-आमान परिवर्तन [संपादित करें]

अति-सममिति [संपादित करें]

अति-सममिति

ये भी देखें [संपादित करें]

टिप्पणी [संपादित करें]

सन्दर्भ [संपादित करें]

आगे का अध्ययन [संपादित करें]

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अग्रवर्ती अवतरण:

अनुच्छेद:

बाहरी कड़ियाँ [संपादित करें]