प्रभाववाद

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क्लॉड मोनेट, इम्प्रेशन, सोलेल लेवांट (इम्प्रेशन, सनराइज़), 1872, कैनवास पर तेल, म्यूज़ी मारनोटान

प्रभाववाद 19वीं सदी का एक कला आंदोलन था, जो पेरिस-स्थित कलाकारों के एक मुक्‍त संगठन के रूप में आरंभ हुआ, जिनकी स्‍वतंत्र प्रदर्शनियों ने 1870 और 1880 के दशकों में उन्‍हें प्रतिष्ठा दिलवाई. इस आंदोलन का नाम क्‍लाउड मॉनेट की कृति इम्प्रेशन, सनराइज़ (Impression, soleil levant ) से व्युत्‍पन्‍न है, जिसने आलोचक लुई लेरॉय को ले शैरीवेरी में प्रकाशित एक व्‍यंगात्‍मक समीक्षा में शब्द गढ़ने को उकसाया.

प्रभाववादी चित्रों की विशेषताओं में अपेक्षाकृत सूक्ष्‍म, बारीक़, लेकिन दृष्टिगोचर ब्रश स्पर्श, मुक्त संयोजन, प्रकाश का उसके परिवर्तनशील गुणों के साथ स्‍पष्‍ट चित्रण (प्राय: समय व्‍यतीत होने के प्रभावों को अंकित करते हुए), सामान्‍य विषयवस्‍तु, मानव-बोध और अनुभव के रूप में गति को एक महत्‍वपूर्ण तत्‍व के रूप में शामिल करना और असामान्‍य दृश्‍यात्मक कोण शामिल हैं. दृश्‍य कला में प्रभाववाद के उद्भव का शीघ्र ही अन्‍य माध्‍यमों में सदृश आन्‍दोलनों द्वार अनुगमन किया जाने लगा, जो प्रभाववादी संगीत और प्रभाववादी साहित्‍य के रूप में विख्यात हुआ.

प्रभाववाद इस शैली में सृजित कला को भी निरूपित करता है, परंतु 19वीं सदी के परवर्ती समयावधि से बाहर.

विहंगावलोकन[संपादित करें]

अल्फ्रेड सिसली, विरेन्यूवे-ला-गारेन में पुल, 1872, मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ़ आर्ट

अपने समय के अतिवादी, पूर्ववर्ती प्रभाववादियों ने अकादमिक चित्रकला के नियमों को भंग किया. यूजीन डिलेक्रोइक्‍स जैसे चित्रकारों की रचनाओं से प्रेरणा ग्रहण करते हुए उन्होंने रंग, मुक्‍त रूप से ब्रश के प्रयोग, रेखाओं को प्राथमिकता देना प्रारंभ किया. उन्होंने चित्रकला को स्‍टूडियो से बाहर निकाल और आधुनिक संसार में ले आए. इससे पहले निश्‍चल जीवन और रूपचित्र तथा प्रकृति-चित्रण प्राय: अंदर ही किया जाता था.[1] प्रभाववादियों ने पाया कि वे सूरज की रोशनी के क्षणिक और परिवर्तनशील प्रभावों को en plein air (खुली हवा में) चित्रण द्वारा निरूपित कर सकते हैं. आधुनिक जीवन के यथार्थ दृश्‍यों के चित्रण द्वारा उन्‍होंने विस्‍तृत विवरणों की अपेक्षा समग्र दृश्‍य प्रभावों का चित्रण किया. उन्होंने गहन रंग प्रकंपन का प्रभाव उत्‍पन्‍न करने के लिए, मिश्रित और विशुद्ध अमिश्रित रंगों के आंशिक “खंडित” ब्रश स्पर्शों का उपयोग किया, न कि परंपरागत हल्‍के सम्मिश्र या छायायुक्‍त स्पर्शों का.

यद्यपि फ्रांस में प्रभाववाद का उदय ऐसे समय में हुआ जब मैशियायोली के रूप में विख्यात इटली के कलाकार, और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में विनस्‍लो होमर सहित अनेक दूसरे कलाकार भी खुली हवा में चित्रकारी की गवेषणा कर रहे थे, प्रभाववादियों ने नई तकनीकें विकसित की, जो आंदोलन के लिए विशिष्ट थीं. उसके अनुयायियों ने जिसे देखने का अलग नज़रिया के रूप में तर्क दिया, उसे शामिल करते हुए, यह कला का सरल मुद्राओं और संयोजनों का, उज्जवल और वैविध्यपूर्ण रंगों का इस्तेमाल करते हुए प्रकाश की क्रीड़ा का, अव्यवहितत्व और आंदोलन था.

आरंभ में जनता इसके विरुद्ध थी, परंतु धीरे-धीरे उन्होंने विश्‍वास करना शुरू कर दिया कि प्रभाववादियों ने एक नूतन और मौलिक दृष्टि पर जीत हासिल की है, भले ही उन्हें कला आलोचकों और प्रतिष्‍ठान का अनुमोदन प्राप्त नहीं हुआ हो.

विषय-वस्तु की पुनर्रचना के बजाय, विषय को देखने वाले नेत्रों में उत्तेजना के पुनर्सृजन द्वारा, और तकनीकों तथा रूपों के तरंगों के निर्माण के ज़रिए, प्रभाववाद चित्रकला में विभिन्‍न आंदोलनों का प्रारंभिक अग्रदूत बना, जिसका अनुसरण करने वालों में नव-प्रभाववाद, प्रभाववादोत्तर, द्विआयामवाद और घनवाद शामिल हैं.

प्रारंभ[संपादित करें]

पियरे-अगस्टे रेनायर, ले मॉलिन डी ला गैलेट में नृत्य (Bal du moulin de la Galette), म्यूज़ी डी'ओर्से, 1876

परिवर्तन के वातावरण में जब सम्राट नेपोलियन III ने पेरिस का पुनर्निर्माण किया और युद्ध शुरू किए, 19वीं सदी के मध्‍य में फ्रांसीसी कला परिदृश्‍य पर आकदमी दा ब्‍युक्‍स-आर्टस का प्रभुत्‍व था. अकादमी पर फ्रांसीसी चित्रकला की सामग्री और शैली दोनों में परंपरागत मानकों को बनाए रखने का उत्तरदायित्‍व था. ऐतिहासिक विषय, धार्मिक प्रसंग और चित्राकृतियों को महत्व दिया जाता था (प्रकृति-चित्रण और निश्‍चल जीवन को नहीं), और अकादमी सावधानी से तैयार छवियों को प्राथमिकता देती थी, जो पास से देखने पर वास्तविकता को प्रतिबिंबित करते थे. रंग उदासीन और रूढि़वादी होते थे तथा ब्रश स्‍पर्श के चिह्नों को दबा दिया जाता था, जो कलाकार के व्‍यक्तित्‍व और भावनाओं तथा कामकाजी तकनीकों को छुपा लेते थे.

पियरे-अगस्टे रेनॉयर, हूप के साथ लड़की, 1885

अकादमी सैलून दा पेरिस में वार्षिक अभिनिर्णायक कला प्रदर्शनी आयोजित करती थी और कलाकार अपनी रचनाएं इसमें प्रदर्शित करते, पुरस्‍कार ग्रहण करते, कमीशन प्राप्‍त करते और अपनी प्रतिष्‍ठा बढ़ाते थे. जूरी के मानक, अकादमी के महत्व को दर्शाते थे, जहां जीन-लिओन जेरोम और अलैक्‍ज़ैंडर कैबेनल जैसे कलाकारों के अत्‍यधिक परिष्कृत कार्यों का प्रतिनिधित्व होता था. कुछ युवा कलाकारों ने पूर्ववर्ती कलाकारों की अपेक्षा हल्‍के और चटकीले रूप में चित्रकारी करते हुए गुस्‍ताव कॉर्बेट और बार्बिज़न स्‍कूल के यथार्थवाद को और आगे बढ़ाया. वे ऐतिहासिक दृश्‍यों के पुनर्निर्माण की अपेक्षा प्राकृतिक दृश्‍य और समकालीन जीवन के चित्रण में अधिक दिलचस्पी रखते थे. प्रत्‍येक वर्ष, उन्होंने अपनी कला सैलून को प्रस्‍तुत की, लेकिन निर्णायकों ने अनुमोदित शैली में काम करने वाले कलाकारों की मामूली कृतियों के पक्ष में, उनके सर्वोत्तम प्रयासों को अस्वीकृत किया. युवा यथार्थवादियों का एक केंद्रीय समूह, क्‍लॉड मोनेट, पीयरे आग्‍स्‍ट रिनोयर, अल्‍फ्रेड सिसली और फ़्रेड्रिक बैज़ाइल, जिन्‍होने चार्ल्‍स ग्‍लेयर के अधीन शिक्षा पाई थी, मित्र बन गए और अक्सर एक साथ चित्रकारी करते रहे. जल्द ही केमिली पिस्‍सारो, पॉल सेज़ॉन और आर्मंड गिलॉमिन भी उनके साथ जुड़ गए.[2]

पियरे-अगस्टे रेनायर, छत पर, कैनवास पर तेल, 1881, शिकागो कला संस्थान
क्लॉड मोनेट, छाते के साथ महिला, (केमिली और जीन मोनेट), 1875, नेशनल गैलरी ऑफ़ आर्ट, वाशिंगटन, डी.सी.

1863 में, निर्णायकों ने एडवर्ड मानेट की रचना द लंचन ऑन द ग्रास (Le déjeuner sur l'herbe ) को मुख्यतः इस आधार पर खारिज कर दिया कि इसमें पिकनिक पर एक नग्‍न महिला को दो वस्‍त्रधारी पुरूषों के साथ चित्रित किया गया था. जबकि ऐतिहासिक और लाक्षणिक चित्रों में नज़र आने वाले नग्‍न चित्र सैलून द्वारा नियमित रूप से स्‍वीकार किए जा रहे थे, जूरी ने एक यथार्थवादी नग्‍न महिला को समकालीन परिदृश्‍य में चित्रित करने के लिए मानेट की निंदा की.[3] जूरी द्वारा मानेट के चित्र की तीखे शब्‍दों में अस्‍वीकृति और साथ ही उस वर्ष असामान्‍य रूप से असंख्य कार्यों की अस्वीकृति ने फ्रांसीसी कलाकारों में उत्तेजना भर दी. मोनेट और उनके साथियों ने मानेट की प्रशंसा की और कैफ़े ग्‍वेरबॉईस में परिचर्चा का आयोजन किया, जहां अक्सर कलाकारों के समूह मिलते थे.

1863 में अस्‍वीकृत कार्यों को देखने के बाद, सम्राट नेपोलियन III ने आदेश दिया कि जनता द्वारा स्वयं किसी कार्य पर निर्णय लेना अनुमत किया जाए और सैलून दा रेफ्युज़स (अस्‍वीकृतों का सैलून) संगठित हुआ. हालांकि अनेक दर्शक केवल हंसी उड़ाने के लिए आए, सैलून दा रेफ्युज़स ने कला में एक नई प्रवृत्ति की विद्यमानता की ओर ध्‍यान आकर्षित किया और नियमित सैलून की अपेक्षा अधिक आगुंतकों को आकर्षित किया.[4]

कलाकारों द्वारा 1867 में और दोबारा 1872 में एक नए सैलून दा रेफ्युज़स के आग्रह वाली याचिकाओं को अस्वीकृत कर दिया गया. 1873 के उत्तरार्द्ध में, मोनेट, रिनोयर, पिस्‍सारो और सिसली ने अपने कलात्‍मक कार्यों के स्‍वतंत्र प्रदर्शनों के उद्देश्‍य से Société Anonyme Coopérative des Artistes Peintres, Sculpteurs , Graveurs (चित्रकारों, शिल्‍पकारों, और उत्‍कीर्णकों का सहकारी अनाम समूह) का गठन किया. संघ के सदस्‍यों से, जिसमें शीघ्र ही सेज़ान, बर्थ मॉरिसॉट और एडगर डेगास भी शामिल हुए, शपथपूर्वक सैलून त्यागने की अपेक्षा की गई. आयोजकों ने यूजेन बॉडिन सहित, जिनके नमूनों ने वर्षों पहले मानेट को पहली बार plein air (खुली हवा में) चित्रकारी के लिए प्रेरित किया, बड़ी संख्‍या में प्रगतिशील कलाकारों को उद्घाटन प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया.[5] एक अन्‍य कलाकार जोहान जान्गकिंड, जिसने मोनेट और उनके साथियों को अत्‍यधिक प्रभावित किया, मानेट की भांति भाग लेने से मना कर दिया. फ़ोटोग्राफ़र नाडार के स्टुडियो में अप्रैल 1874 में आयोजित उनकी प्रथम प्रदर्शनी में कुल 30 कलाकारों ने भाग लिया.

क्लॉड मोनेट, तूफ़ान के बाद एट्रेटैट में प्रपात, १८८५, क्लार्क आर्ट इन्स्टिट्यूट, विलियम्सटाउन, मैसाचुसेट्स

आलोचकों की प्रतिक्रियाएं मिश्रित थी, जिनमें मोनेट और सेज़ान को अप्रिय हमले झेलने पड़े. आलोचक और व्‍यंग्‍यकार लुई लेरॉय ने ले शैरीवेरी समाचारपत्र में एक कटु समीक्षा लिखी, जिसमें क्‍लॉड मोनेट के शीर्षक इम्प्रेशन, सनराइज़ (Impression, soleil levant ) के शब्‍दों से खेलते हुए उन्होंने कलाकारों को नाम दिया, जो उनकी पहचान बन गई. उपहासपूर्ण ढंग से अपने लेख को द एक्ज़िबिशन ऑफ़ द इम्प्रेशनिस्ट्स शीर्षक देते हुए, लेरॉय ने घोषण की कि ज़्यादातर मोनेट का चित्र एक रेखाचित्र है और इसे मुश्किल से संपूर्ण कार्य कहा जा सकता है.

उन्होंने दर्शकों के बीच संवाद के रूप में लिखा,

प्रभाव- मैं इसके बारे में निश्चित था. मैं अपने आप से कह रहा था, चूंकि मैं प्रभावित था, कि इसमें कुछ प्रभाव होना चाहिए... और स्‍वतंत्रता क्‍या है, क्या सहज कारीगरी है

! अपने निर्माण दशा में वॉलपेपर उस समुद्री दृश्य से अधिक संपूर्ण है.[6]

क्लॉड मोनेट, घास का टीला, (सूर्यास्त), 1890-1891, म्यूज़ियम ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स, बोस्टन

"प्रभाववादी" शब्‍द ने शीघ्र ही जनता का समर्थन प्राप्‍त किया. इसे स्‍वयं कलाकारों ने भी स्‍वीकार कर लिया, हालांकि शैली और प्रकृति की दृष्टि से उनका समूह नानाविध था, पर वे मुख्यतः स्‍वतंत्रता और विद्रोह की भावना से एकजुट थे. उन्‍होंने एक साथ प्रदर्शनियां आयोजित की—हालांकि 1874 से 1886 के बीच आठ बार—सदस्‍यता परिवर्तन करते हुए.

मोनेट, सिसली, मॉरिसॉट और पिस्‍सारो को उनकी सहजता, प्रकाश और रंगों की कला के सतत अनुसरण के लिए "विशुद्ध" प्रभाववादी माना जा सकता है. डेगास ने अधिकतर इसे खारिज कर दिया, क्‍योंकि वह रंगों से अधिक रेखांकन को महत्‍त्‍व देता था और बाहर खुले में चित्रांकन के अभ्‍यास को तुच्‍छ समझता था.[7] रिनोयर 1880 के दशक में एक समय के लिए प्रभाववाद के विरूद्ध हो गया, और कभी भी पूर्ण रूप से इसके विचारों के प्रति प्रतिबद्धता पुनर्प्राप्‍त नहीं कर सका. एडवर्ड मानेट ने, समूह के नेता के रूप में अपनी भूमिका के बावजूद, काले रंग का मुक्‍त रूप से प्रयोग करना कभी नहीं छोड़ा और न ही कभी प्रभाववादी प्रदर्शनियों में भाग लिया. उसने अपने कार्यों की सैलून में प्रस्‍तुति जारी रखी, जहां उनके स्पैनिश सिंगर ने 1861 में द्वितीय श्रेणी का पदक प्राप्‍त किया, और यह तर्क देते हुए कि "सैलून ही असली जंग का मैदान है" जहां प्रतिष्‍ठा अर्जित की जा सकती है, अन्‍य लोगों को भी ऐसा करने के लिए उकसाता रहा.[8]

केमिली पिसारो, बाउलेवार्ड मॉन्टमार्ट्रे, 1897, द हर्मिटेज, सेंट पीटर्सबर्ग

केंद्रीय समूह के कलाकारों में (बैज़ाइल के अतिरिक्‍त, जिसकी 1870 के फ्रांसीसी-प्रशिया युद्ध में मृत्‍यु हो गई) दरार उत्‍पन्‍न हो गई, सेज़ान और बाद में रिनोयर ने, सिसली, मोनेट ने सैलून में अपने कार्य प्रस्‍तुत करने के उद्देश्‍य से स्‍वयं को समूह की प्रदर्शनियों से अलग रखा. समूह में गिलामिन की सदस्‍यता जैसे विषयों पर मतभेद उत्‍पन्‍न हो गए, जिसे अयोग्य समझने वाले मानेट और डिगास के प्रतिरोध के विरूद्ध पिस्‍सारो और सेज़ान का समर्थन प्राप्‍त हुआ.[9] डेगास ने 1879 की प्रदर्शनी में अपना कार्य प्रदर्शि‍त करने के लिए मेरी कसाट को आमंत्रित किया, लेकिन उसने प्रभाववादी पद्धतियों का निरूपण न करने वाले जीन-फ्रांकॉइस राफ़ेल, लुडोविक लेपिक और अन्‍य यथार्थवादियों को शामिल करने पर ज़ोर देते हुए मतभेद को मौक़ा दिया, जिसके परिणामस्‍वरूप 1880 में "पहले आने वाले डाबर्स के लिए दरवाजे खोलने" का प्रभाववादियों पर आरोप लगा.[10] 1886 में समूह अपने साथ सिग्‍नैक और स्युरैट को प्रदर्शनी के लिए आमंत्रित करने के मामले पर बंट गया. पिस्‍सारो एकमात्र ऐसा कलाकार था जिसने आठ प्रभाववादी प्रदर्शनियों में अपनी कला प्रदर्शित की.

व्यक्तिगत कलाकारों को प्रभाववादी प्रदर्शनियों से कुछ वित्तीय पुरस्‍कार प्राप्‍त हुए, लेकिन उनकी कला को धीरे-धीरे जनता की स्वीकार्यता और समर्थन प्राप्‍त हुआ. उनके डीलर डूरंड-रूएल ने इसमें प्रमुख भूमिका निभाई जो उनका कार्य जनता के सामने ले गए और उनके लिए लंदन और न्‍यूयॉर्क में प्रदर्शनी की व्‍यवस्‍था की. हालांकि सिसली की 1899 में ग़रीबी की वजह से मृत्‍यु हुई, रिनोयर को 1879 में महत्‍वपूर्ण सैलून सफलता प्राप्‍त हुई. मोनेट को 1880 दशक के आरंभ में और पिस्‍सारो को 1890 दशक के प्रारंभ में वित्तीय सुरक्षा प्राप्‍त हुई. तब तक प्रभाववादी चित्रकला पद्धति, हल्के रूप में, सैलून कला में आम जगह बना चुकी थी.[11]

प्रभाववादी तकनीक[संपादित करें]

बर्थ मोरिसॉट, पालना, 1872, म्यूज़ी डी'ओर्से
  • विषयवस्तु के विवरणों के बजाय, उसके सार को परदे पर उतारने के लिए, रंग के छोटे और मोटे स्पर्शों का उपयोग किया जाता है. अक्सर रंग थोपा जाता है.
  • एक जीवंत सतह तैयार करते हुए, रंगों को यथासंभव कम मिश्रित करते हुए, पास-पास लगाया जाता है. रंगों का दृश्य मिश्रण दर्शकों की आंखों में होता है.
  • पूरक रंगों के मिश्रण से धुंधली और काली रंगत तैयार की जाती है. शुद्ध प्रभाववाद में काले रंगों के प्रयोग से बचा जाता है.
  • उत्तरोत्तर प्रयुक्त रंगों के सूखने की प्रतीक्षा किए बिना गीले रंग को गीले रंग के साथ रखा जाता है, जिससे किनारे हल्के बनते हैं और रंग परस्पर मिल जाते हैं.
  • शाम को चित्रकारी ताकि effets de soir - शाम के प्रकाश या गोधूलि के छायादार प्रभाव को पा सकें.
  • प्रभाववादी चित्रों में पतले रंगों की परतों की पारदर्शिता (चमक) को काम में नहीं लाया जाता, जिस पर पिछले कलाकारों ने प्रभाव उत्पन्न करने के लिए बारीक़ी से ध्यान दिया था. एक प्रभाववादी चित्रकला की सतह आम तौर पर अपारदर्शी होती है.
  • प्राकृतिक प्रकाश के उपयोग पर ज़ोर दिया जाता है. वस्तु दर वस्तु रंगों के प्रतिबिंब पर नज़दीक से ध्यान दिया जाता है.
  • en plein air (खुली हवा में) बनाए गए चित्रों में, आकाश के नीले रंग के साथ छाया को गहरा रंगा जाता था, जिससे एक ताज़गी और खुलेपन का एहसास जगता है, जिस पर इससे पहले के चित्रों में ध्यान नहीं दिया जाता था. (बर्फ़ पर नीली छाया ने इस तकनीक को प्रेरित किया.)
मेरी कसाट, लिडिया अपनी बाहों पर झुकी हुई (एक थिएटर बॉक्स में), 1879

समग्र इतिहास में चित्रकारों ने इन तरीकों का इस्तेमाल कभी-कभी ही किया था, लेकिन प्रभाववादियों ने सबसे पहले उन सबका एक साथ और इतने साहस के साथ प्रयोग किया था. पूर्व कलाकारों में, जिनकी कलाकृतियों में इस तकनीक का प्रदर्शन देखा जा सकता है, फ़्रैंस हाल्स, डिएगो वेलाज़क्वेज़, पीटर पॉल रूबेन्स, जॉन कॉन्स्टेबल, और जे.एम.डब्ल्यू. टर्नर शामिल हैं.

फ्रांसीसी चित्रकार जिन्होंने प्रभाववाद का पथ प्रशस्त किया, उनमें शामिल हैं रोमांटिक रंगरेज़ यूजीन डेलाक्रोइक्स, जो यथार्थवादी गुस्ताव कोरबेट के नेता थे, और थिओडोर रूसो जैसे बार्बिज़ॉन स्कूल के चित्रकार. प्रभाववादियों ने जीन-बैप्टिस्ट-केमिली कोरोट और यूजीन बाउडिन के चित्रों से बहुत कुछ सीखा, जो प्रकृति को जिस शैली में चित्रित करते थे, वह प्रभाववाद के नज़दीक था.

प्रभाववादियों ने मध्य-शताब्दी में प्रवर्तित सीसे की ट्यूबों में (जो आधुनिक टूथपेस्ट ट्यूब जैसी लगती है) पहले से मिश्रित रंगों का लाभ उठाया, जिससे कलाकार, बाहर और अंदर, दोनों जगह अधिक सहज रूप से काम कर सकते थे. पहले चित्रकार, सूखे रंगों को पीसते और अलसी के तेल में मिला कर, व्यक्तिगत रूप से अपना रंग तैयार करते थे, जिन्हें पशुओं के मूत्राशय की थैलियों में संग्रहित किया जाता था.[12]

सामग्री और संरचना[संपादित करें]

केमिली पिसारो, एराग्नी में घास की कटाई, 1901, नेशनल गैलरी ऑफ़ कनाडा, ओटावा, ओंटारियो

प्रभाववादियों से पहले, अन्य चित्रकार, विशेष रूप से जैन स्टीन जैसे 17वीं सदी के डच चित्रकारों ने सामान्य विषयवस्तुओं पर ध्यान केंद्रित किया, लेकिन कृतियों के प्रति उनका अभिगम पारंपरिक था. उन्होंने अपनी कृतियों को इस तरह व्यवस्थित किया कि मुख्य वस्तु दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने में सफल रही. प्रभाववादियों ने विषय-वस्तु और पृष्ठभूमि के बीच की सीमा में छूट दी जिससे प्रभाववादी चित्र का प्रभाव अक्सर स्नैपशॉट के समान लगता, मानो वह अचानक चित्रबंद वास्तविक दृश्य का एक अंश हो.[13] फोटोग्राफ़ी लोकप्रियता हासिल कर रही थी, और कैमरा अधिक पोर्टेबल, और तस्वीरें अधिक स्पष्ट होने लगी थीं. फोटोग्राफ़ी ने प्रभाववादियों को कैमरे में क्षण को क़ैद करने के लिए प्रेरित किया, न केवल परिदृश्य की क्षणभंगुर रोशनी को, बल्कि लोगों के दैनंदिन जीवन को भी.

बर्थ मोरिसॉट, पढ़ती महिला, 1873, क्लीवलैंड कला संग्रहालय

प्रभाववादी आंदोलन के उदय को फ़ोटोग्राफ़ी के नव स्थापित माध्यम के प्रति कलाकारों की प्रतिक्रिया के अंश के रूप में भी देखा जा सकता है. यथार्थ को हू-ब-हू चित्रित करने के लिए एक नया माध्यम उपलब्ध कराने की वजह से, स्थिर या निश्चल छवियों को ग्रहण करना चित्रकारों के लिए एक चुनौती बन गया. शुरूआत में फ़ोटोग्राफ़ी की मौजूदगी, प्रकृति-चित्रण और वास्तविकता को प्रतिबिंबित करने में कलाकार की क्षमता को नुक्सान पहुंचाने वाली लगी. दोनों, चित्र और प्राकृतिक दृश्य वाले चित्र कुछ हद तक कमज़ोर और यथार्थ से दूर लगने लगे, चूंकि फ़ोटोग्राफ़ी ने "जीवंत छवियों को अधिक कुशलता और विश्वसनीयता के साथ पेश किया".[14]

अल्फ्रेड सिसली, सेंट-मार्टिन नहर का दृश्य, पेरिस, 1870 म्यूज़ी डी'ओर्से

इसके बावजूद, फ़ोटोग्राफ़ी ने वास्तव में कलाकारों को, यथार्थ का अनुकरण करने के लिए फ़ोटोग्राफ़ी के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय, अलग कलात्मक अभिव्यक्ति के साधन तलाशने के लिए प्रेरित किया और कलाकारों ने अपना ध्यान "उस एक चीज़ पर केंद्रित किया जो अनिवार्यतः वे फ़ोटोग्राफ़ से बेहतर कर सकते थे - यानी छवि की संकल्पना की मूल अवास्तविकता को, जिसे फ़ोटोग्राफ़ी ने हटाया था, कला रूप में और विकसित करना".[14] प्रभाववादियों ने दुनिया की वास्तविक परछाई या प्रतिबिंब तैयार करने की जगह, प्रकृति की अपनी धारणा व्यक्त की. इसने कलाकारों को उनके द्वारा अपनी "रुचि और विवेक की अनिवार्य अंतर्हित" भावना से देखी गई विषयवस्तु को चित्रित करने की छूट दी.[15] फ़ोटोग्राफ़ी ने चित्रकारों को रंग जैसे, चित्र माध्यम के पहलुओं को उजागर करने के लिए प्रोत्साहित किया, जिसका उस समय की फ़ोटोग्राफ़ी में अभाव था; "प्रभाववादियों ने ही पहले-पहल फ़ोटोग्राफ़ के लिए पूरी समझ के साथ व्यक्ति-सापेक्ष विकल्प प्रस्तुत किया".[14]

एक और प्रमुख प्रभाव था जापानी कला प्रिंट (जेपोनिज़्म), जो मूलतः फ़्रांस में आयातीत माल को लपेटने वाले काग़ज़ के रूप में पहुंचा. इन मुद्रणों की कला ने "स्नैपशॉट" कोणों और अपरंपरागत रचनाओं में विशेष रूप से योगदान दिया, जो आगे चल कर आंदोलन की विशेषता बन गई.

एडगर डेगास फ़ोटोग्राफ़र और जापानी प्रिंटों का संग्रहकर्ता, दोनों था.[16] उसकी 1874 की कृति नृत्य कक्षा (La classe de danse) अपनी विषम संरचना में दोनों का प्रभाव दर्शाती है. नर्तकियों को विभिन्न अजीबो-ग़रीब मुद्राओं में उतारा गया, जहां निचले दाएं चतुर्थांश में फ़र्श का विस्तार ख़ाली छूटा है. उनकी नर्तकियों को छोटी चौदह वर्षीय नर्तकी जैसी मूर्ति में भी ग्रहण किया गया है.

प्रमुख प्रभाववादी[संपादित करें]

केमिली पिसारो, पाला, 1873, म्यूज़ी डी'ओर्से, पेरिस
बर्थ मोरिसॉट, लोरीएंट में बंदरगाह, 1869, नेशनल गैलरी ऑफ़ आर्ट, वाशिंगटन, डी.सी.

फ्रांस में प्रभाववाद के विकास में केंद्रीय व्यक्तित्व, वर्णानुक्रम में सूचीबद्ध निम्न थे:

  • फ़्रेडरिक बेज़िल (1841-1870)
  • गुस्ताव कैलेबोटे (जो, दूसरों से छोटे थे, और 1870 दशक के मध्य में दल के साथ जुड़े) (1848-1894)
  • मेरी कसाट (अमेरिका में जन्मी, वह पेरिस में रहती थी और उसने चार प्रभाववादी प्रदर्शनियों में भाग लिया)(1844-1926).
  • पॉल सेज़ान (हालांकि बाद में वे प्रभाववादियों से अलग हो गए) (1839-1906)
  • एडगर डेगास (यथार्थवादी, जिन्होंने प्रभाववादी शब्द को तिरस्कृत किया, लेकिन समूह के प्रति उनकी वफ़ादारी के कारण उन्हें ऐसा माना जाता है)(1834-1917)
  • आर्मंड ग्विलामिन (1841-1927)
  • एड्वर्ड मानेट (जो ख़ुद को ऐसा नहीं मानते थे और ना ही

आम तौर पर प्रभाववादी जैसे लगते थे, लेकिन जिन्होंने प्रभाववादियों के साथ अपना काम प्रदर्शित किया और उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया), ((1832-1883)

  • क्लॉड मानेट (प्रभाववादियों में सर्वाधिक बहुसर्जक और उनके सौंदर्यबोध को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने वाला) [17] (1840-1926)
  • बर्थ मॉरिसॉट (1841-1895)
  • कैमिली पिसारो (1830-1903)
  • पियरे-अगस्टे रेनॉयर (1841-1919)
  • अल्फ्रेड सिसली (1839-1899)

गैलरी[संपादित करें]

समय-रेखा: प्रभाववादियों का जीवन[संपादित करें]

प्रभाववादी

सहयोगी और प्रभावित कलाकार[संपादित करें]

जेम्स एबॉट मॅकनील व्हिसलर, [20] (1874), डेट्राइट कला संस्थान

प्रभाववादियों के क़रीबी सहयोगियों में कई ऐसे चित्रकार थे, जिन्होंने कुछ हद तक उनके तरीकों को अपनाया था. इनमें शामिल हैं पेरिस में बसे इतालवी कलाकार जियुसेप डी निटिस, जिन्होंने डेगास के निमंत्रण पर पहली प्रभाववादी प्रदर्शनी में भाग लिया, हालांकि अन्य प्रभाववादियों ने उनके काम को तुच्छ समझा.[18] फ़े़डेरिको ज़ैंडोमेनेघी डेगास के एक और इतालवी मित्र थे, जिन्होंने प्रभाववादियों के साथ प्रदर्शनी में भाग लिया. ईवा गोन्ज़ेल्स मानेट का अनुयायी था, जिसने समूह के साथ प्रदर्शन नहीं किया. जेम्स एबॉट मॅकनील व्हिसलर एक अमेरिकी मूल का चित्रकार था, जिसने प्रभाववाद में भूमिका निभाई, हालांकि उन्होंने समूह में भाग नहीं लिया और वे धूसर रंगों को पसंद करते थे. एक अंग्रेज़ कलाकार, वाल्टर सिकर्ट आरंभ में व्हिसलर का अनुयायी था, लेकिन बाद में डेगास का प्रमुख शिष्य बन गया; उसने प्रभाववादियों के साथ प्रदर्शनी में भाग नहीं लिया. 1904 में कलाकार और लेखक विनफ़ोर्ड ड्यूहर्स्ट ने फ़्रांसीसी चित्रकारों का पहला महत्वपूर्ण अध्ययन इंप्रेशनिस्ट पेंटिंग: इट्ज़ जेनेसिस एंड डेवलपमेंट लिखा जो अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुआ, और जिसने ग्रेट ब्रिटेन में प्रभाववाद को लोकप्रिय बनाने में काफ़ी योगदान दिया.

1880 दशक के प्रारंभ तक, इंप्रेशनिस्ट तरीक़े कम से कम सतही तौर पर, सैलून की कला को प्रभावित कर रहे थे. जीन बेरॉड और हेनरी जरवेक्स जैसे फ़ैशनेबल चित्रकारो को, सैलून की कला में अपेक्षित कोमल सज्जा को क़ायम रखते हुए अपनी रंगपट्टिका को चमकाने के ज़रिए समीक्षात्मक और वित्तीय सफलता मिली.[19] इन कलाकारों की कृतियों को कभी-कभी यों ही प्रभाववादी कहा जाता है, भले ही वे प्रभाववादी पद्धति से काफ़ी दूर हों.

फ्रांस से परे[संपादित करें]

मेरी कसाट, बच्चे का स्नान (द बाथ), 1893, कैनवास पर तेल, शिकागो कला संस्थान

जैसे-जैसे प्रभाववाद का प्रभाव फ्रांस से परे फैलने लगा, असंख्य कलाकारों की पहचान नई शैली को अपनाने वालों के रूप में बनती गई. अधिक महत्वपूर्ण उदाहरणों में से कुछ निम्न हैं:

  • अमेरिकी प्रभाववादी, जिसमें शामिल हैं मेरी कसाट, विलियम मेरिट चेस, फ्रेडरिक कार्ल फ़्रीसेक, चाइल्ड हासम, विलार्ड मेटकाफ़, लिला काबोट पेरी, थिओडोर रॉबिन्सन, एडमंड चार्ल्स टार्बेल, जॉन हेनरी ट्वाचमैन, और जे. आल्डेन वियर.
  • अन्ना बोश, विन्सेन्ट वान गाग के मित्र यूजीन बोश, जार्ज लेमेन और थियो वैन राइसेरबर्घ बेल्जियम से प्रभाववादी चित्रकार.
  • वाल्टर रिचर्ड सिकर्ट और फिलिप विल्सन स्टीर यूनाइटेड किंगडम के सुप्रसिद्ध प्रभाववादी चित्रकार थे.
  • ऑस्ट्रेलियाई प्रभाववादियों में शामिल थे हीडलबर्ग स्कूल के प्रमुख सदस्य फ्रेडरिक मॅकक्युबिन और टॉम रॉबर्ट्स तथा वान गाग के मित्र जॉन पीटर रसेल, रोडिन, मोनेट तथा मैटिसे और साथ ही, रूपर्ट बन्नी, एग्नेस गुडसर व ह्यूग रामसे.
  • जर्मनी में लोविस कोरिंथ, मैक्स लीबरमैन मैक्स स्लेवोग्ट.
  • हंगरी में लैस्ज़लो मेडनियान्ज़्की.
  • आयरलैंड में रोडरिक ओ'कोनोर और वाल्टर ओसबॉर्न.
  • रूस में कॉन्स्टैनटिन कोरोविन और वैलेन्टिन सरनोव.
  • प्युर्टो रीको देशवासी और पिसारो तथा सेज़ान के मित्र फ्रांसिस्को ओलेरी सेस्टरो.
  • स्कॉटलैंड में विलियम मॅकटागार्ट.
  • कनाडाई कलाकार लॉरा मुंट्ज़ लायाल.
  • पोलिश प्रभाववादी और प्रतीकवादी लैडिस्लॉ पोडकोविंस्की.
  • तुर्की में प्रभाववाद लाने वाले नाज़्मी ज़िया गुरान.
  • मिस्र में शारोबिम शाफ़िक.
  • ब्राज़ील में एलिसा विस्कॉन्टी.
  • लात्विया, जर्मनी और संयुक्त राज्य अमेरिका में मार्टिन्स क्रुमिन्स.
  • स्पेन में जोकिन सोरोला.
  • अर्जेंटीना में फर्नांडो फ़ेडर, मार्टिन मलहारो, रेमन सिल्वा.

मूर्तिकला, फ़ोटोग्राफ़ी और फ़िल्म[संपादित करें]

मूर्तिकार ऑगस्ट रोडिन को, कभी-कभी उनके द्वारा अल्पकालिक प्रकाश प्रभाव को सुझाने वाले खुरदुरी सतहों के उपयोग करने की पद्धति के लिए, प्रभाववादी कहा जाता है.

चित्रात्मक फ़ोटोग्राफ़रों को भी, जिनकी कृति नाज़ुक फ़ोकस और परिवेशी प्रभावों की विशेषताओं से युक्त है, प्रभाववादी कहा जाता है.

फ्रांसीसी प्रभाववादी सिनेमा एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग फ़्रांस में 1919-1929 के बीच बनी फ़िल्मों और फ़िल्म निर्माताओं के समूह के लिए प्रयुक्त किया जाता है, हालांकि ये वर्ष बहस का मुद्दा रहे हैं. फ्रांसीसी प्रभाववादी फ़िल्म निर्माताओं में शामिल हैं एबल गांस, जीन एपस्टीन, जर्मेन ड्यूलाक, मार्सेल ल’हर्बियर, लुई डेलुक, और डिमित्री कर्सनॉफ़.

संगीत और साहित्य[संपादित करें]

क्लॉड मोनेट, जल लिली, 1916, पश्चिमी कला का राष्ट्रीय संग्रहालय, टोक्यो

संगीत प्रभाववाद यूरोपीय शास्त्रीय संगीत के आंदोलन को दिया गया नाम है, जिसका उदय 19वीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ और जो 20वीं सदी के मध्य तक जारी रहा. फ्रांस में शुरूआत के साथ, संगीत प्रभाववाद की विशेषता रही है रोमांटिक युग के संकेत और परिवेश तथा भावनात्मक अतिरेक. प्रभाववादी संगीतकार निशा-गीत, अरबस्क, और प्रस्तावना जैसे छोटे रूपों को पसंद करते थे, और अक्सर पूरे सरगम की स्वर-शैली जैसे असामान्य सरगम का उपयोग करते थे. शायद प्रभाववादी संगीतकारों द्वारा प्रयुक्त सबसे उल्लेखनीय नवोन्मेष दीर्घ सप्तम तार का पहला प्रयोग और तार संरचना का गांधार से पंचम और षड्ज स्वरसंगति तक विस्तार रहा है.

दृश्य प्रभाववाद का उसके संगीत समकक्ष पर प्रभाव बहस का मुद्दा है. क्लॉड डिबसी और मॉरिस रैवेल को आम तौर पर महान प्रभाववादी संगीतकार माना जाता है, लेकिन डिबसी ने इस शब्द को आलोचकों का आविष्कार कहते हुए, अस्वीकार किया. एरिक सेटी को भी इस वर्ग का माना जाता है हालांकि उनके दृष्टिकोण को स्वभाव में कम गंभीर और संगीत में अधिक नवीन माना जाता है. पॉल ड्युकास एक और फ्रांसीसी संगीतकार हैं जिन्हें कभी-कभी प्रभाववादी माना जाता है, लेकिन उनकी शैली शायद परवर्ती रोमांसवादियों से अधिक निकट से संबद्ध है. फ्रांस से परे संगीत प्रभाववाद में राल्फ़ वॉघम विलियम्स, ओटोरिनो रेसपिघी (इटली) और एलन विलीकॉक्स, सिरिल स्कॉट और जॉन आयरलैंड (इंग्लैंड) जैसे संगीतकारों के काम शामिल हैं.

प्रभाववाद शब्द का उपयोग ऐसे साहित्य के लिए भी किया गया है, जिसमें किसी घटना या दृश्य के संवेदी प्रभाव व्यक्त करने के लिए चुनिंदा विवरण पर्याप्त होते हैं. प्रभाववादी साहित्य का प्रतीकवाद से निकट का संबंध है, जिसके प्रमुख उदाहरणकर्ताओं में शामिल हैं बॉडेलेयर, मालार्मे, रिमबॉड और वेरालेन. वर्जीनिया वुल्फ़ और जोसेफ़ कॉनराड जैसे लेखकों की रचनाएं पात्र की मानसिकता का गठन करने वाले प्रभावों, संवेदनाओं और भावनाओं की व्याख्या के बजाय वर्णन की शैली में प्रभाववादी हैं.

प्रभाववादोत्तर[संपादित करें]

केमिली पिसारो, एक फार्म पर बच्चे, 1887

प्रभाववादोत्तर का विकास प्रभाववाद से हुआ. 1880 के दशक से कई कलाकार प्रभाववादी उदाहरणों से व्युत्पन्न रंग, पैटर्न, रूप और रेखा के उपयोग में अलग धारणाएं विकसित करने लगे: विन्सेन्ट वान गाग, पॉल गॉग्विन, जॉर्जस स्युरैट, और हेनरी डी टूलूज़-लॉट्रेक. इन कलाकारों की उम्र प्रभाववादियों की अपेक्षा कुछ कम थी, और उनका काम प्रभाववादोत्तर कहलाया. कुछ मूल प्रभाववादी कलाकारों ने भी इस नए क्षेत्र में क़दम रखा; केमिली पिसारो ने कुछ समय तक बिंदु-चित्रण पद्धति में चित्रकारी की, और मोनेट ने भी खुली हवा (plein air) में पेंटिग का परित्याग किया. पॉल सेज़ान ने, जिसने प्रथम व तृतीय प्रभाववादी प्रदर्शनियों में भाग लिया, चित्रात्मक संरचना पर ज़ोर देते हुए अत्यंत व्यक्तिगत दृष्टि विकसित की, और उन्हें बहुधा प्रभाववादोत्तर कहा जाता है. हालांकि ये मामले नाम देने की कठिनाई को वर्णित करते हैं, मूल प्रभाववादी चित्रकारों की कृतियों को, परिभाषा के अनुसार, प्रभाववाद के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • कला काल
  • अभिव्यंजनावाद (प्रभाववाद की प्रतिक्रिया के रूप में)
  • Les XX
  • चित्रात्मकवाद

नोट[संपादित करें]

  1. अपवादों में शामिल है कानालेट्टो, जिसने बाहर पेंट किया और संभवतः कैमरा ओबस्क्युरा का इस्तेमाल किया.
  2. "विन्सेन्ट वान गाग" ऑक्सफोर्ड आर्ट ऑनलाइन
  3. डेनविर (1990), पृ.133.
  4. डेनविर (1990), पृ.194.
  5. डेनविर (1990), पृ.32.
  6. रेवाल्ड (1973), पृ. 323.
  7. गॉर्डन; फोर्ज (1988), पृ. 11-12.
  8. रिचर्डसन (1976), पृ. 3.
  9. डेनविर (1990), पृ.105.
  10. रेवाल्ड (1973), पृ. 603.
  11. रेवाल्ड, (1973), पृ. 475-476.
  12. रेनॉइर और प्रभाववाद प्रक्रिया, फिलिप्स संग्रह
  13. रोसेनब्लम (1989), पृ. 228. लोप
  14. लेविनसन, पॉल (1997) द सॉफ़्ट एड्ज; अ नैचुरल हिस्ट्री एंड फ़्यूचर ऑफ़ द इन्फर्मेशन रेवल्यूशन , राउटलेड्ज, लंदन और न्यूयॉर्क
  15. सोनटैग, सुसान (1977) फ़ोटोग्राफ़ी पर, पेंगुइन, लंदन
  16. बाउमैन; काराबेल्निक, व अन्य. (1994), पृ. 112.
  17. डेनविर (1990), पृ.140.
  18. डेनविर (1990), पृ.152.
  19. रेवाल्ड (1973), पृ.476-477.

संदर्भ[संपादित करें]

  • बॉमन, फ़ेलिक्स; काराबेल्निक, मेरियाने, व साथी. (1994). डेगास पोर्ट्रेट्स . लंदन: मेरेल होलबर्टन. ISBN 1-85894-014-1
  • डेनविर, बर्नार्ड (1990). द थेम्स एंड हड्सन एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इम्प्रेशनिज़्म . लंदन: थेम्सऔर हड्सन. ISBN 0-500-20239-7
  • गॉर्डन, रॉबर्ट; फ़ोर्ज, एंड्रयू (1988). डेगास . न्यूयॉर्क: हैरी एन अब्राम्स. ISBN 0-8109-1142-6
  • गोविंग, लॉरेंस, एड्रियानी, गोट्ज़ के साथ; क्रमराइन, मेरी लुईस; लुईस, मेरी टॉम्पकिन्स; पेटिन, सिल्वी; रिवाल्ड, जॉन (1988). सेज़ान: द अर्ली इयर्स 1859-1872 . न्यूयॉर्क: हैरी एन. अब्राम्स.
  • मॉस्कोविट्ज़, ईरा; सेरुलाज़, मॉरिस (1962). फ़्रेंच इम्प्रेशनिस्ट्स: ए सेलेक्शन ड्राइंग्स ऑफ़ द फ़्रेंच नाइन्टिंथ सेंचुरी . बॉस्टन और टोरंटो: लिटल, ब्राउन एंड कंपनी. ISBN 0-316-58560-2
  • रेवाल्ड, जॉन (1973). द हिस्ट्री ऑफ़ इम्प्रेशनिज़्म (चौथा संशोधित संस्करण). न्यूयॉर्क: आधुनिक कला संग्रहालय. ISBN 0-87070-360-9
  • रिचर्डसन, जॉन (1976). मानेट (तीसरा संस्करण). ऑक्सफोर्ड: फ़ाइडोन प्रेस लिमिटेड. ISBN 0-7148-1743-0
  • रोसेनब्लम, रॉबर्ट (1989). पेंटिग्स इन द म्यूसी डीऑर्से . न्यूयॉर्क: स्टीवर्ट, टाबोरी और चांग. ISBN 1-55670-099-7

बाह्य लिंक[संपादित करें]

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