प्रतिरोध वेल्डन

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प्रतिरोध वेल्डन (resistance welding) में धातु के दो टुकड़ों को जोडने के लिये विद्युत धारा के साथ यांत्रिक दाब का सहारा लिया जाता है। वेल्डन एलेक्ट्रोडों में उस समय धारा बहती है जब वेल्ड किये जा रहे दोनों टुकड़े आपस में जुड रहे होते हैं।

वेल्डन की इस क्रिया में पहले विद्युत धारा द्वारा धातुओं के एक छोटे से भाग में कम से कम इतनी ऊष्मा पैदा की जाती है कि वहाँ का भाग द्रवित हो जाय। इसके बाद दोनो टुकड़े कुछ देर तक दबाकर ही रखे जाते हैं ताकि पिघली हुई धातु ठण्डी हो जाय और उसमें आप्स में जुड़े रहने के लिये पर्याप्त शक्ति आ जाय।

प्रतिरोध वेल्डन के लाभ
  • तेजी से वेल्दन ( High speed welding)
  • वेल्डन की प्रक्रिया आसानी से स्वयंचालित की जा सकती है। (Easily automated)
  • सस्ती (Economical )
सीमायें (Resistance Welding Limitations)
  • प्रारम्भिक औजारों का अधिक मूल्य (Initial equipment costs)
  • जोड़ का तनाव की दशा में शक्ति तथा फैटिग-शक्ति कम होती है (Lower tensile and fatigue strengths)
  • लैप ज्वाइंट के कारण भाबढ़ जाता है। (Lap joints add weight and material )

प्रतिरोध वेल्डन (Resistance welding) द्वारा वेल्डन में दमक वेल्डन (Flash welding), चित्ती (Spot), प्रक्षेपी (Projection), सीवन (Seam) और टक्कर (Butt) की विधियाँ मुख्य हैं।

दमक वेल्डन (Flash Welding)[संपादित करें]

वेल्डन की यह विधि भी टक्कर की वेल्डन विधि के समान ही है, भेद केवल इतना ही है कि दोनों पिंडों को संपर्क में लाने के पहले ही यंत्र में विद्युत् धारा प्रवाहित कर दी जाती है और पिंडों के निकट आने पर उनके बीच के अंतराल में विद्युत् आर्क के चालू होने से धातुपिंड के किनारे पिघलने लगते हैं। जब धातु के कुछ छीटे उनमें से उछलने लगते हैं, तब धारा को बंद कर यंत्र से ही उन्हें दबाकर जोड़ देते हैं।

चित्ती वेल्डन (Spot Welding)[संपादित करें]

वेल्डन की यह विधि वही अपनाई जाती है जहाँ धातु की चादरों के किनारों को एक पर एक रखकर जोड़ना हो। इसका सिद्धांत भी टक्कर के वेल्डन के समान ही है। इसका सिद्धांत भी टक्कर के वेल्डन के समान ही है। इस काम के यंत्र में, वेल्डन करनेवाले किनारों को एक दूसरे के ऊपर नीचे रखकर, यंत्र में लगे दो इलेक्ट्रोडों के बीच में रख देते हैं। फिर पैर से एक लीवर को दबाने पर, ऊपरवाला इलेक्ट्रोड नीचे उतरकर संपीडित वायु की शक्ति से उन प्लेटों को दबा देता है और इलेक्ट्रोडों तथा प्लेटों के संपर्क में आते ही, उसमें विद्युत् धारा प्रवाहित होकर प्लेटों में से होती हुई नीचे के इलेक्ट्रोड में प्रवेश करती है, उस समय प्लेटों का वह भाग, जो उन इलेक्ट्रोडों के संपर्क में आता है, गरम होकर ज्यों ही वेल्डन के ताप पर पहुँचता है, उन इलेक्ट्रोडों का दबाव और बढ़ा दिया जाता है, जिससे वे उस स्थान पर आपस में जुड़ जाते हैं और वहाँ एक चित्ती सी पड़ जाती है।

प्रक्षेपी वेल्डन[संपादित करें]

वेल्डन की इस विधि के सिद्धांत भी वे ही हैं जा चित्ती वेल्डन के हैं, केवल भेद यही है कि इसमें इलेक्ट्रोड से प्राप्त होनेवाली ऊष्मा एक छोटे से बिंदु पर ही केंद्रित कर दी जाती है। वैसे इलेक्ट्रोडों का क्षेत्रफल तो काफी बड़ा होता है। ऊष्मा को केंद्रित करने के लिए एक अथवा दोनों प्लेटों में उभार या गड्ढा बना दिया जाता है। इस विधि से विभिन्न मोटाई के प्लेटों को भी आपस में जोड़ा जा सकता है।

सीवन वेल्डन[संपादित करें]

यह विधि भी सिद्धांत और क्रिया में चित्ती वेल्डन के समान ही है, अंतर यही है कि इलेक्ट्रोड स्थिर स्तंभ के आकार के होने के बदले बेलनाकार घूमते हुए बनाए जाते हैं और जुड़नेवाले प्लेटों को उनके बीच यंत्र से चलाया जाता है तथा उन बेलनों की विद्युत् धारा आंतरायिक रूप (intermittent) से चटका लगाती हुई चलती है। धारा के प्रवाहित होने और रुकने के समय का अनुपात 1:1 से लेकर 1:10 तक रखा जा सकता है, इस कारण जोड़ ऐसा लगता है मानो डोरे से सी दिया गया हो।

टक्कर विधि[संपादित करें]

इस विधि में मशीन के एक शिकंजे में एक टुकड़े को पहले स्थिरता से बाँधकर, दूसरे टुकड़े को सरकनेवाले दूसरे शिकंजे में इस प्रकार बाँध देते हैं। कि दोनों को निकट लाने पर जोड़ सही सही बैठ जाए। यह दोनों शिकजे विद्युत्रोधी आवरणों द्वारा ऐ दूसरे से विद्युतरोधी आवरणों द्वारा एक-दूसरे से विद्युतरुद्ध (insulated) रहते हैं और इनमें विद्युत् धारा देने के एक की धारा दूसरे में नहीं जाने पाती। जब सरकनेवाले शिकंजे को धातुपिंड सहित स्थिर शिंकजे की ओर सरकाते हैं, तब इन धातुपिंडों के जुड़नेवाले किनारों का ताप, किनारों के निकट आने पर, विद्युत् धारा के उच्च प्रतिरोध के प्रभाव से एकदम गरम होने के कारण, वेल्डन के ताप तक पहुँच जाता है; फिर किनारों को धीरे-धीरे खूब दबा दिया जाता है और विद्युत् धारा बंद कर दी जाती है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]