प्रणव मुखर्जी
|
प्रणव मुखर्जी
প্রণব মুখোপাধ্যায় |
|
|
|
|
| पदस्थ | |
| कार्यभार ग्रहण जनवरी २४, २००९ |
|
| प्रधान मंत्री | मनमोहन सिंह |
|---|---|
| पूर्व अधिकारी | मनमोहन सिंह |
| कार्यकाल जनवरी १९८२ – दिसम्बर १९८४ |
|
| प्रधान मंत्री | इंदिरा गाँधी राजीव गाँधी |
| पूर्व अधिकारी | रामास्वामी वेंकटरमण |
| उत्तराधिकारी | विश्वनाथ प्रताप सिंह |
|
|
|
| कार्यकाल अक्टूबर २४, २००६ – मई २३, २००९ |
|
| प्रधान मंत्री | मनमोहन सिंह |
| पूर्व अधिकारी | मनमोहन सिंह |
| उत्तराधिकारी | एस. एम. कृष्णा |
| कार्यकाल फरवरी १०, १९९५ – मई १६, १९९६ |
|
| प्रधान मंत्री | पी.वी. नरसिम्हा राव |
| पूर्व अधिकारी | दिनेश सिंह |
| उत्तराधिकारी | सिकंदर बख्त |
|
|
|
| कार्यकाल मई २२, २००४ – अक्टूबर २६, २००६ |
|
| प्रधान मंत्री | मनमोहन सिंह |
| पूर्व अधिकारी | जोर्ज फ़र्नान्डिस |
| उत्तराधिकारी | ऐ. के. एंटोनी |
|
|
|
| कार्यकाल जून २४, १९९१ – मई १५, १९९६ |
|
| प्रधान मंत्री | पी.वी. नरसिम्हा राव |
| पूर्व अधिकारी | मोहन धारिया |
| उत्तराधिकारी | मधु दंदावत |
|
|
|
| जन्म | 11 दिसंबर 1935 बीरभूम, ब्रिटिश राज |
| राजनैतिक पार्टी | UPA-INC |
| आवास | कलकत्ता, भारत |
| विद्या अर्जन | कलकत्ता विश्वविद्यालय |
| धर्म | हिन्दू |
| वेबसाइट | Official Website |
प्रणव कुमार मुखर्जी (बांग्ला: প্রণব কুমার মুখোপাধ্যায় 11 दिसम्बर 1935 को जन्म, पश्चिम बंगाल, भारत) वर्तमान में भारत के वित्त मंत्री एवं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख नेता है और गाँधी परिवार के वफादार भी माने जाते हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें]
उन्होंने इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री ली है और कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की उपाधि भी उन्हें हासिल है. वे किसी समय एक वकील और कॉलेज प्राध्यापक भी रह चुके हैं। उन्हें मानद् डी.लिट भी मिली है।
अनुक्रम |
[संपादित करें] प्रारम्भिक जीवन
पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के किरनाहर शहर के निकट मिराती गांव में एक ब्राह्मण परिवार में कामदा किंकर मुखर्जी और राजलक्ष्मी मुखर्जी के बेटे के रूप में उनका जन्म हुआ. उनके पिता 1920 से कांग्रेस पार्टी में सक्रिय थे तथा AICC, पश्चिम बंगाल विधान परिषद (1952-64) के सदस्य और वीरभूम (पश्चिम बंगाल) जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे.[1] उनके पिता एक सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जिन्हें ब्रिटिश शासन की खिलाफत के लिए 10 वर्षो से अधिक समय के लिए जेल भेजा गया था. उन्होंने सूरी (वीरभूम) के सूरी विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा पाई, जो उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध था.
[संपादित करें] करियर
प्रणव मुखर्जी ने एक कॉलेज प्राध्यापक के रूप में और बाद में एक पत्रकार के रूप में अपना करियर शुरू किया. उन्होंने जाने-माने बांग्ला प्रकाशन संस्थान देशेर डाक (मातृभूमि की पुकार) के लिए काम किया. वे बंगीय साहित्य परिषद के ट्रस्टी और बाद में निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी बने.[2]
[संपादित करें] राजनीतिक करियर
उनका संसदीय करियर करीब पांच दशक पुराना है, जो 1969 में कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सदस्य के रूप में (उच्च सदन) शुरू हुआ और वह 1975, 1981, 1993 और 1999 में फिर से चुने गए. 1973 में वे औद्योगिक विकास विभाग के केंद्रीय उप मंत्री के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल हुए.
वे सन 1982 से 1984 तक कई कैबिनेट पदों के लिए चुने जाते रहे और और सन 1984 में भारत के वित्त मंत्री बने. सन 1984 में, यूरोमनी पत्रिका के एक सर्वेक्षण में उनका विश्व के सबसे अच्छे वित्त मंत्री के रूप में मूल्यांकन किया गया.[3] उनका कार्यकाल भारत के IMF या अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऋण की 1.1 अरब अमरीकी डॉलर की आखिरी किस्त नहीं लेने के लिए उल्लेखनीय रहा. वित्त मंत्री के रूप में प्रणव के कार्यकाल के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर थे. वे इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव के बाद राजीव गांधी की समर्थक मंडली के षड्यंत्र के शिकार हुए जिसने इन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया. एक छोटी अवधि के लिए कांग्रेस पार्टी से उन्हें निकाल दिया गया था और उस दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक दल राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया, लेकिन बाद में सन 1989 में राजीव गांधी के साथ समझौता होने के बाद उसका कांग्रेस पार्टी में विलय हो गया.[4] उनका राजनीतिक करियर तब पुनर्जीवित हो उठा, जब पी.वी. नरसिंह राव ने उन्हें योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में और बाद में एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के तौर पर नियुक्त करने का फैसला किया. उन्होंने राव के मंत्रिमंडल में 1995 से 1996 तक पहली बार विदेश मंत्री के रूप में कार्य किया. 1997 में उन्हें उत्कृष्ट सांसद चुना गया.
सन 1985 के बाद से वह कांग्रेस की पश्चिम बंगाल राज्य इकाई के भी अध्यक्ष हैं. सन 2004 में, जब कांग्रेस ने गठबंधन सरकार के अगुआ के रूप में सरकार बनायी, तो कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सिर्फ एक राज्यसभा सांसद थे. इसलिए [[जंगीपुर (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र)|जंगीपुर (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र)]] से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतनेवाले प्रणव मुखर्जी को लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया. उन्हें रक्षा, वित्त, विदेश विषयक मंत्रालय, राजस्व, नौवहन, परिवहन, संचार, आर्थिक मामले, वाणिज्य और उद्योग, समेत विभिन्न महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री होने का गौरव भी हासिल है. वह कांग्रेस संसदीय दल और कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं, जिसमें देश के सभी कांग्रेस सांसद और विधायक शामिल होते हैं, साथ-साथ वह लोकसभा में सदन के नेता, बंगाल प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष, कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मंत्रिपरिषद में केन्द्रीय वित्त मंत्री हैं. लोकसभा चुनावों से पहले जब प्रधानमंत्री ने बाई-पास सर्जरी कराई, प्रणव, विदेश मंत्रालय में केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद राजनैतिक मामलों की कैबिनेट समिति के अध्यक्ष और वित्त मंत्रालय में केंद्रीय मंत्री का अतिरिक्त प्रभार लेकर मंत्रिमंडल के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
[संपादित करें] अंतरराष्ट्रीय भूमिका
10 अक्तूबर 2008 को मुखर्जी और अमेरिकी विदेश सचिव कोंडोलीजा राइस ने धारा 123 समझौते पर हस्ताक्षर किए. वे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विश्व बैंक,एशियाई विकास बैंक और अफ्रीकी विकास बैंक के प्रशासक बोर्ड के सदस्य हैं.
सन 1984 में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक से जुड़े ग्रुप-24 की बैठक की अध्यक्षता की. मई और नवम्बर 1995 के बीच उन्होंने SAARC मंत्रिपरिषद सम्मेलन की अध्यक्षता की.[5]
[संपादित करें] राजनीतिक दल में भूमिका
मुखर्जी को पार्टी के भीतर व सामाजिक नीतियों के क्षेत्र में काफी सम्मान मिलता है."[6] अन्य प्रचार माध्यमों में उन्हें बेजोड़ स्मरणशक्ति वाला आंकड़ाप्रेमी और अपना अस्तित्व बरकरार रखने की अचूक इच्छाशक्ति रखने वाले एक राजनेता के रूप में वर्णित किया जाता है."[7]
जब सोनिया गांधी अनिच्छा के साथ राजनीति में शामिल होने के लिए राजी हुईं तब प्रणव मुखर्जी उनके प्रमुख परामर्शदाताओं में से रहे, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में उन्हें उदाहरणों के जरिये बताया कि उनकी सास इंदिरा गांधी इस तरह के हालात से कैसे निपटती.[8] मुखर्जी की अमोघ निष्ठा और योग्यता ने उन्हें सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के करीब लाया और इस वजह से जब 2004 में पार्टी सत्ता में आयी तो उन्हें भारत के रक्षा मंत्री के प्रतिष्ठित पद पर पहुंचने में मदद मिली.
सन 1991 से 1996 तक वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष पर रहे.
2005 के प्रारंभ में पेटेंट संशोधन बिल पर समझौते के दौरान उनकी प्रतिभा के दर्शन हुए. कांग्रेस एक IP विधेयक पारित करने के लिए प्रतिबद्ध थी, लेकिन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में शामिल वाममोर्चे के कुछ घटक दल बौद्धिक संपदा के एकाधिकार के कुछ पहलुओं का परंपरागत रूप से विरोध कर रहे थे. रक्षा मंत्री के रूप में प्रणव मामले में औपचारिक रूप से शामिल नहीं थे, लेकिन बातचीत के कौशल को देखकर उन्हें आमंत्रित किया गया था. वह CPI-M नेता ज्योति बसु सहित कई पुराने गठबंधनों को मनाकर मध्यस्थता के कुछ नये बिंदु तय किये, जिसमे उत्पाद पेटेंट के अलावा और कुछ और बातें शामिल थीं. तब उन्हें, वाणिज्य मंत्री कमल नाथ सहित अपने सहयोगियों यह कहकर मनाना पड़ा कि: "कोई कानून नहीं रहने से बेहतर है एक अपूर्ण कानून बनना.[9] अंत में 23 मार्च 2005 को बिल को मंजूरी दे दी गई.
[संपादित करें] भ्रष्टाचार पर विचार
प्रणव मुखर्जी की खुद की छवि पाक-साफ है, लेकिन वह एक उपयोगितावादी है. सन 1998 में rediff.com को दिये गये एक साक्षात्कार में उनसे जब कांग्रेस सरकार, जिसमें वह विदेश मंत्री थे, पर लगे भ्रष्टाचार के बारे में पूछा गया था. उन्होंने कहा:
- भ्रष्टाचार एक मुद्दा है. घोषणा पत्र में हमने इससे निपटने की बात कही है. लेकिन मैं यह कहते हुए क्षमा चाहता हूं कि ये घोटाले केवल कांग्रेस या कांग्रेस सरकार तक ही सीमित नहीं हैं. बहुत सारे घोटाले हैं. विभिन्न राजनीतिक दलों के कई नेता उनमे शामिल हैं. तो यह कहना काफी सरल है कि कांग्रेस सरकार भी इन घोटालों में शामिल थी.[10]
[संपादित करें] विदेश मंत्री: अक्टूबर 2006
24 अक्टूबर 2006 को उन्हें भारत का विदेश मंत्री नियुक्त किया गया. रक्षा मंत्रालय में उनकी जगह ए.के. एंटनी ने ली, जो कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और दक्षिणी राज्य केरल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री रह चुके थे.
प्रणव मुखर्जी के नाम पर एक बार भारतीय राष्ट्रपति जैसे सम्मानजनक पद के लिए भी विचार किया गया था. लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल में व्यावहारिक रूप से उनके अपरिहार्य योगदान को देखते हुए नाम हटा लिया गया. मुखर्जी की वर्तमान विरासत में अमेरिकी सरकार के साथ असैनिक परमाणु समझौते पर भारत-अमेरिका के सफलतापूर्वक हस्ताक्षर और परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं होने के बावजूद असैन्य परमाणु व्यापार में भाग लेने के लिए परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के साथ हुआ हस्ताक्षर शामिल है. सन 2007 में उन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया.
[संपादित करें] वित्त मंत्री
मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में श्री मुखर्जी भारत के वित्त मंत्री बने, जिस पद पर वे पहले 1980 के दशक में काम कर चुके थे. 6 जुलाई, 2009 को उन्होंने सरकार का सालाना बजट पेश किया. इसमें उन्होंने '(क्षुब्ध करने वाले)' फ्रिंज बेनिफिट टैक्स और कमोडिटीज ट्रांसक्शन कर को हटाने सहित कई तरह के कर सुधारों की घोषणा की. उन्होंने ऐलान किया कि वित्त मंत्रालय की हालत इतनी अच्छी है कि माल और सेवा कर लागू कर सके, जिसे महत्वपूर्ण कॉरपोरेट अधिकारियों और अर्थशास्त्रियों ने सराहा. उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, लड़कियों की साक्षरता और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए और धन का प्रावधान किया. इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम, बिजलीकरण का विस्तार और जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन की तरह बुनियादी सुविधाओं वाले कार्यक्रमों का भी विस्तार किया. हालांकि, कई लोगों ने 1991 के बाद से सबसे अधिक बढ़ रहे राजकोषीय घाटे के बारे में चिंता व्यक्त की. श्री मुखर्जी ने कहा कि सरकारी खर्च में विस्तार केवल अस्थायी है और सरकार वित्तीय दूरदर्शिता के सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्ध है.
[संपादित करें] निजी जीवन
वे स्वर्गीय श्री कामदा किंकर मुखर्जी और स्वर्गीय श्रीमती राजलक्ष्मी मुखर्जी के पुत्र है. उनका जन्म बंगाल (भारत) के वीरभूम जिले के मिराती, किर्नाहार में 11 दिसम्बर 1935 को हुआ. 13 जुलाई 1957 में सुर्वा मुखर्जी से उनकी शादी हुई और उनके दो बेटे और एक बेटी है. पढ़ना, बागवानी और संगीत उनके शौक रहे हैं. [1]
[संपादित करें] सम्मान और विशिष्टता
(i) न्यूयॉर्क से प्रकाशित पत्रिका, यूरोमनी के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 1984 के लिए दुनिया के सर्वोत्तम पांच वित्त मंत्रियों में से एक करार दिए गये.
(ii) उन्हें सन 1997 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का अवार्ड मिला.
(iii) वित्त मंत्रालय और अन्य आर्थिक मंत्रालयों में राष्ट्रीय और आंतरिक रूप से उनके नेतृत्व का लोहा माना गया. वह लंबे समय के लिए देश की आर्थिक नीतियों को बनाने में महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माने जाते हैं. उनके नेत़त्व में ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऋण की 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर की अंतिम किस्त नहीं लेने का गौरव अर्जित किया. उन्हें प्रथम दर्जे का मंत्री माना जाता है और सन 1980-1985 के दौरान प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता की.
(iv) सन 2008 में उन्हें सार्वजनिक मामलों में उनके योगदान के लिए भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, पद्म विभूषण से नवाजा गया. [2]
[संपादित करें] संदर्भ
| विकिसमाचार पर संबंधित समाचार देखें: Mukherjee injured in accident |
- ↑ विदेश मंत्रालय में रूपरेखा.
- ↑ “FM Pranab's first priority: Presenting budget 09-10 (page3)”, Indian Express, May 23, 2009। अभिगमन तिथि: 2009-05-23।
- ↑ calcuttayellowpages.com से रूपरेखा
- ↑ “FM Pranab's first priority: Presenting budget 09-10”, Indian Express, May 23, 2009। अभिगमन तिथि: 2009-05-23।
- ↑ रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (IDSA) कार्यकारिणी समिति रूपरेखा
- ↑ “India's new foreign minister Mukherjee: a respected party veteran”, Agence France-Presse, 24 October 2006। अभिगमन तिथि: 2007-04-09।
- ↑ “India gets new foreign minister”, BBC News, 4 October 2006। अभिगमन तिथि: 2007-04-09।
- ↑ GK Gokhale। “Why is Dr. Singh Sonia's choice?”, rediff.com, 19 April 2004। अभिगमन तिथि: 2007-04-09।
- ↑ Aditi Phadnis। “Pranab: The master manager”, rediff.com, 29 March 2005। अभिगमन तिथि: 2007-04-09।
- ↑ Rajesh Ramachandran। “The BJP's new-found secularism is a reckless exercise to hoodwink the people”, rediff.com, 10 January 1998। अभिगमन तिथि: 2007-04-09।
[संपादित करें] बाह्य सूत्र
| विकिमीडिया कॉमन्स पर प्रणव मुखर्जी से सम्बन्धित मीडिया है। |
- वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी
- प्रणव मुखर्जी के बारे में
- भारत सरकार की वेबसाइट पर रूपरेखा
- भारत सरकारी संसद की वेबसाइट में जीवनी का संक्षिप्त वर्णन
- सद्दाम के फैसले: भारत बिबेचित प्रतिक्रिया
- http://www.un.org/webcast/ga/61/pdfs/india-e.pdf
| Lok Sabha | ||
|---|---|---|
| पूर्वाधिकारी Unknown |
Member for Jangipur २००४ – वर्तमान |
पदस्थ |
| राजनीतिक कार्यालय | ||
| पूर्वाधिकारी रामस्वामी वेंकटरमण |
भारत के वित्त मंत्री १९८२–१९८४ |
उत्तराधिकारी विश्वनाथ प्रताप सिंह |
| पूर्वाधिकारी मोहन धारिया |
भारतीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष १९९१–१९९६ |
उत्तराधिकारी मधु दंडवते |
| पूर्वाधिकारी दिनेश सिंह |
Minister of External Affairs of India १९९५–१९९६ |
उत्तराधिकारी अटल बिहारी वाजपेयी |
| पूर्वाधिकारी ज्योर्ज फ़र्नान्डिस |
भारत के रक्षा मंत्री २००४–२००६ |
उत्तराधिकारी ए के एंटोनी |
| पूर्वाधिकारी मनमोहन सिंह |
Minister for External Affairs of India २००६–२००९ |
उत्तराधिकारी Somanahalli Mallaiah Krishna |
| पूर्वाधिकारी पलनिअप्पन चिदंबरम |
भारत के वित्त मंत्री २००९ – वर्तमान |
पदस्थ |
- 1935 में जन्में लोग
- बंगाली राजनीतिज्ञ
- भारत के रक्षा मोंत्रियों
- भारत के वित्त मोंत्रियों
- भारत के विदेश मामलों के मोंत्रियों
- भारतीय राजनीतिज्ञ
- भारतीय हिंदूगण
- जीवित लोग
- भारत के मंत्रिमंडल के सदस्यगण
- कलकत्ता के लोग
- कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों
- 14वीं लोकसभा के सदस्यगण
- पद्म विभूषण के प्राप्तकर्तागण
- उत्कृष्ट सांसद का पुरस्कार प्राप्तकर्तागण
- बीरभूम जिले के लोग
- श्रेष्ठ लेख योग्य लेख