पेशी

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
पेशी की संरचना

पेशी (Muscle) प्राणियों का आकुंचित होने वाला (contractile) ऊतक है। इनमें आंकुंचित होने वाले सूत्र होते हैं जो कोशिका का आकार बदल देते हैं। पेशी कोशिकाओं द्वारा निर्मित उस ऊतक को पेशी ऊतक कहा जाता है जो समस्त अंगों में गति उत्पन्न करता है।[1] इस ऊतक का निर्माण करने वाली कोशिकाएं विशेष प्रकार की आकृति और रचना वाली होती हैं। इनमें कुंचन करने की क्षमता होती है। पेशिया रेखित, अरेखित एवं हृदय तीन प्रकार की होती हैं। मनुष्य के शरीर में 40 प्रतिशत भाग पेशियों का होता है।

वर्गीकरण[संपादित करें]

तीन प्रकार के पेशी ऊतक

शरीर में तीन प्रकार की पेशियाँ पाई जाती है :

(1) रेखांकित (skeletal) (2) अरेखांकित (smooth) और (3) हार्दिकी (cardiac)

रेखांकित पेशियाँ ऐच्छिक, अर्थात्‌ इच्छा होने से संकुचित होनेवाली, होती हैं और अस्थियों पर लगी रहती हैं। शरीर की गति : चलना फिरना, दौड़ना, पकड़ना, खड़े होना - इन्हीं पेशियों के आकुंचन और प्रसार का फल है।

अरेखांकित पेशियाँ हमारी इच्छा के अधीन नहीं है। वे स्वत: ही आकुचित और प्रसरित होती है। सारी पाचनप्रणाली, ग्रसनिका से लेकर गुदा तक, में इन पेशियों का प्रधान भाग रहता है। आंवगति इन्हीं की क्रिया का फल होती है। प्रत्येक नलिका रक्तवाहिनियों तथा आशयों की भित्तियाँ प्रधानत: इन्हीं पेशियों की बनी होती है।

हार्दिकी पेशियों की रचना यद्यपि ऐच्छिक पेशी के समान होती है, तथापि वे इच्छा के अधीन नहीं होतीं, स्वत: ही संकोच और प्रसार करती रहती है। वास्तव में यह सिद्ध हो चुका है कि हृदय की पेशी में स्वत: आकुंचन करने की शक्ति होती है, जो नाड़ी नियत्रण से बिलकुल स्वतंत्र है।

रचना[संपादित करें]

प्रत्येक पेशी सूत्रों का समूह होती है। ये सूत्र पेशी को लंबाई की ओर चीरने से एक दूसरे से पृथक किए जा सकते हैं। ये सूत्र भी सूत्राणुओं (fibrils) के बने होते हैं। प्रत्येक सूत्र पर एक आवरण रहता है, जिसके भीतर कई केंद्रक होते हैं। प्रत्येक सूत्र पर एक आवरण रहता है, जिसके भीतर कई केंद्रक होते हैं और कोशिकासार भरा रहता है, जिसके भीतर कई केंद्रक होते हैं और कोशिकासार भरा रहता है। कंकन की दीर्घ पेशियों में 5 इंच तक लंबे और 0.01 से 0.1 मिलीमीटर व्यास तक के सूत्र पाए जाते हैं। छोटे आकार की पेशियों में सूत्र भी छोटे हैं और प्रारंभ से कंडरा तक विस्तृत होते हैं। बड़ी पेशियों में कई सूत्र अपने सिरों पर मिलकर पेशी की लंबाई को पूर्ण करते हैं। प्रत्येक सूत्र में नाड़ी का एक सूत्र जाता है। यहाँ वह शाखाओं में विभक्त हो जाता है जिनके अंतिम भागों के चारों ओर कोशिकासार में कुछ कण एकत्र रहते हैं। ये स्थान अंत:पट्ट (end plate) कहलाते हैं। इन्हीं में होकर उत्तेजनाएँ सूत्रों में जाती हैं, जिनसे पेशी आकुंचन करती है।

ऐच्छिक पेशी के सूत्रों की प्रकाश द्वारा परीक्षा करने से वे लंबाई की ओर खंडों में विभक्त पड़ते हैं, जिनमें से एक प्रकाशहीन और दूसरा प्रकाशमय खंड बारी बारी से स्थित है, अर्थात्‌ प्रकाशमय के पश्चात्‌ प्रकाशहीन और उसके पश्चात्‌ फिर प्रकाशमय। प्रकाहीन खंड के दोनों सिरों पर चौड़ाई की ओर बिंदु दिखाई देते हें, जो आपस में चौड़ाई की ओर अत्यंत सूक्ष्म रेखाओं से जुड़े हुए हैं। ऐसी ही रेखाएँ सूत्र की लंबाई की ओर भी इन बिंदुओं को जोड़े हुए हैं। यही रेखाजाल (straition) कहलाता है, जो अनुप्रस्थ और अनुदैर्ध्य दोनों प्रकार है। प्रत्येक सूत्राणु में यह दृश्य दीखता है। ये सूत्राणु अंतस्सूत्राणु वस्तु द्वारा गुच्छों में बँधे हैं, जिनके चारों ओर पेशीसार (sarcopl) स्थित है और जिसमें केंद्रक (nucleus) स्थित है।

अनैच्छिक पेशीसूत्र छोटे होते हैं। प्रत्येक सूत्राणु एक लंबोतरे आकार की कोशिका होता है, जो एक सिरे पर चपटा सा होता है और दूसरे पर लंबा, जहाँ वह कडरा में लग जाता है। इसकी लंबाई की ओर रेखाएँ भी दिखाई पड़ती हैं। एक कोशिका की लंबाई 200 माइक्रोन और चौड़ाई 4 से 7 माइक्रोन से अधिक नहीं होती। ये रेखांकित नहीं होती। इनमें एक ही केंद्रक होता है। ये पेशियाँ स्तरों में स्थित होती हैं, जिनमें सूत्राणु या सूत्रकोशिका अपने सिरों से मिली रहती है। आशायों या आंत्रनाल में ये पेशियाँ दो स्तरों में स्थित हैं। एक स्तर आंत्र की लंबाई की ओर स्थित है और दूसरा उसको चौड़ाई की ओर से घेरे हुए है। इसको अनुवृत्तकार और अनुदैर्ध्यं स्तर कहा जाता है। इन दोनों स्तरों के संकोच से नाली के भीतर की वस्तु आगे की ओर को संचरित होती है।

हार्दिक पेशीसूत्र इन दोनों के बीच में हैं। प्रत्येक सूत्र एक कोशिका है, जिससे अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ दोनों प्रकार का रेखांकन दिखाई देता है। किंतु ये सूत्र इच्छा के अधीन नहीं है। कोशिकाओं में विशेषता यह है कि उनसे शाखाएँ निकलती हैं, जो दूसरी कोशिकाओं की शाखाओं में मिल जाती है।

पेशी के गुण[संपादित करें]

पेशी का विशेष गुण आकुंचन करना है, जिससे उसकी लंबाई कम और चौड़ाई अधिक हो जाती है, अर्थात्‌ वह छोटी और मोटी हो जाती है। आकुंचन के समय जिस स्थान से उसका उद्गम (origin) होता है वह भाग खिंचकर प्रथम के पास पहुँच जाता है। सी से शरीर के अंगों की गति होती है। आकुचन के पश्चात्‌ पेशी फिर प्रसरित होकर अपनी पूर्व अवस्था में आ जाती है। ऐच्छिक पेशियों में आकुंचन उन उत्तेजनाओं के परिणाम होते हैं जो मस्तिक या सुषुम्ना के केंद्रों से नाड़ियों द्वारा पेशियों में आती है। मनुष्य की पेशी एक सेकेड में 10 या 12 बार से अधिक संकोच नहीं कर सकती। मक्खी की पेशी 400 बार संकोच कर सकती है। यदि पेशी में जानेवाली नाड़ी को उत्तेजित किया जाय, तो उत्तेजित स्थल पर विद्युद्विभव (potential) उत्पन्न हो जाता है और यहाँ से दोनों ओर को विद्युत्प्रवाह होने लगता है। इसकी विद्युन्मापी से नापा जा सकता है।

प्रत्येक आकुंचन में ऊर्जा की उत्पत्ति होती है। पेशी में जारण या ऑक्सीकरण की क्रिया से वहाँ के ग्लूकोज़ का जल और कार्बन डाइऑक्साइड में विभंजन हो जाता है। इससे 0.0030 सें. ताप भी बढ़ जाता है। वहाँ उपस्थित ऑक्सीजन व्यय हो जाता है और लैक्टिक अम्ल उत्पन्न होता है, जो शरीर में रक्त द्वारा पेशी में हटा दिया जाता है। शरीर से पृथक्‌ करके पेशी को कुछ समय तक उत्तेजित करने से वह इस अम्ल के एकत्र होने से श्रमित हो जाती है। यह अन्वेषण से पूर्णतया सिद्ध हो चुका है कि ऑक्सीजन की अनुपस्थिति इस अम्ल के बनने का कारण है। ग्लाइकोजन (glycogen) इसका पूर्वरूप है।

पेशी और व्यायाम[संपादित करें]

व्यायाम के समय पेशियों में कुछ समय तक बार बार संकोच होते हैं, जिससे पेशियों में ऊपर बताए हुए सब प्रकार के परिवर्तन होते हैं और गति करने की ऊर्जा उत्पन्न होती है। ऊर्जा की उत्पत्ति ऑक्सीजन के व्यय और कार्बन डाइऑक्साइड की उत्पत्ति से मालूम की जाती है। श्वास द्वारा बाहर निकली हुई वायु को एकत्र करके, उसके विश्लेषण से ये दोनों मात्राएँ मालूम की जा सकती हैं। इससे व्यय हुई ऑक्सीजन का पता लग जाता है। यह निर्धारित हो चुका है कि 1 लिटर ऑक्सीजन के व्यय से 5.14 कैलोरी ऊष्मा उत्पन्न होती है, जो 15.560 फुट पाउंड के समान है।

संदर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  • स्टालिंग : फिज़ियॉलोजी;
  • बेलिस : प्रिंसिपल्स ऑव जेनरल फिज़ियॉलोजी ;
  • वेनब्रिज ; फिज़ियॉलोजी ऑव मस्क्यूलर एकसरसाइज;
  • शेफ़र : हिस्टोलॉजी
  1. त्रिपाठी, नरेन्द्र नाथ (मार्च २००४). सरल जीवन विज्ञान, भाग-२. कोलकाता: शेखर प्रकाशन. प॰ ८६-८७. 

इन्हें भी देखें[संपादित करें]