पेशवा बाजीराव द्वितीय
| पेशवा बाजीराव प्रथम |
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|---|---|
| पेशवा | |
| पेशवा बाजीराव का बिरला मंदिर, दिल्ली में एक स्तंभ पर शैल चित्र | |
| शासन | मराठा साम्राज्य |
| पूरा नाम | बाजीराव बाळाजी भट (पेशवे) |
| उपाधियाँ | राऊ, श्रीमंत |
| जन्म | १८ अगस्त १७०० |
| मृत्यु | २८ अप्रैल १७४० |
| मृत्यु स्थान | रावेरखेडी, पश्चिम निमाड, मध्य प्रदेश |
| समाधी | नर्मदा नदी घाट, रावेरखेडी |
| पूर्वाधिकारी | बाळाजी विश्वनाथ पेशवा |
| उत्तराधिकारी | बाळाजी बाजीराव पेशवा |
| जीवन संगी | काशीबाई, मस्तानी |
| पिता | बाळाजी विश्वनाथ पेशवा |
| माता | राधाबाई |
पेशवा बाजीराव प्रथम (१७००-१७४०) मराठा साम्राज्य के शासक थे। बाजीराव, शिवाजी महाराज के पौत्र शाहूजी महाराज के पेशवा (प्रधान) थे। इनके पिता श्री बाळाजी विश्वनाथ पेशवा भी शाहूजी महाराज के पेशवा थे। बचपन से बाजीराव को घुड़सवारी करना, तीरंदाजी, तलवार भाला, बनेठी, लाठी आदि चलाने का शौक था। १३-१४ वर्ष की खेलने की आयु में बाजीराव अपने पिताजी के साथ घूमते थे।[1] उनके साथ घूमते हुए वह दरबारी चालों व रीतिरिवाजों को आत्मसात करते रहते थे। यह क्रम १९-२० वर्ष की आयु तक चलता रहा। जब बाजीराव के पिताश्री का अचानक निधन हो गया। पिता के निधन के बाद मात्र बीस वर्ष की आयु के बाजीराव को शाहूजी महाराज ने पेशवा बना दिया। पेशवा बनने के बाद अगले बीस वर्षों तक बाजीराव मराठा साम्राज्य को बढ़ाते रहे। इसके लिए उन्हें अपने दुश्मनों से लगातार लड़ाईयाँ करना पड़ी। अपनी वीरता, अपनी नेतृत्व क्षमता व कौशल युद्ध योजना द्वारा यह वीर हर लड़ाई को जीतता गया। विश्व इतिहास में बाजीराव पेशवा ऐसा अकेला योद्धा माना जाता है जो कभी नहीं हारा। छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह वह बहुत कुशल घुड़सवार था। घोड़े पर बैठे-बैठे भाला चलाना, बनेठी घुमाना, बंदूक चलाना उनके बाएँ हाथ का खेल था। घोड़े पर बैठकर बाजीराव के भाले की फेंक इतनी जबरदस्त होती थी कि सामने वाला घुड़सवार अपने घोड़े सहित घायल हो जाता था।
इस समय भारत की जनता मुगलों के साथ-साथ अंग्रेज़ों व पुर्तगालियों के अत्याचारों से त्रस्त हो चुकी थी। ये भारत के देवस्थान तोड़ते, जबरन धर्म परिवर्तन करते, महिलाओं व बच्चों को मारते व भयंकर शोषण करते थे।[1] ऐसे में बाजीराव पेशवा ने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक ऐसी विजय पताका फहराई कि चारों ओर उनके नाम का डंका बजने लगा। लोग उन्हें शिवाजी का अवतार मानने लगे। बाजीराव में शिवाजी महाराज जैसी ही वीरता व पराक्रम था तो वैसा ही उच्च चरित्र भी था।
इन्हें भी देखें [संपादित करें]
| पूर्वाधिकारी बाळाजी विश्वनाथ |
पेशवा १७२०-१७४० |
उत्तराधिकारी बाळाजी बाजीराव |
संदर्भ [संपादित करें]
- ↑ 1.0 1.1 अपराजेय सेनानी बाजीराव (प्रथम) ।वेबदुनिया