वृक्ष

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एक वृक्ष

वृक्ष का सामान्य अर्थ ऐसे पौधे से होता है जिसमें शाखाएँ निकली हों, जो कम से कम दो-वर्ष तक जीवित रहे, जिससे लकड़ी प्राप्त हो।

वृक्ष की एक जड़ होती है जो प्रायः ज़मीन के अन्दर में होती है, तथा जड़ से निकलकर तना तथा पत्तियां हवा में रहते हैं। यह प्रदूषण कम करने में कारगर सिद्ध हुआ है। पर लकड़ियो तथा ज़मीन की आवश्यकताओं के कारण लोग इसे काटते जा रहे हैं।

महत्व[संपादित करें]

वृक्ष प्रकृति के अहं भाग ही नहीं हैं बल्कि जन्तुओं के जीवन के आधार भी हैं।

संस्कृत साहित्य में वृक्षों की महिमा का वर्ण प्रचुरता से हुआ है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध के 22वें अध्याय में आया हुआ विवरण हम सब की आँकें खोलने वाला है। उसके अनुसार, एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण गोचारण करते हुए वृन्दावन से बहुत दूर निकल गये। ग्रीष्म ऋतु के संताप से व्यकुल होकर सभी ग्वाल-बाल घने वृक्षों की शीतल छाया में विश्राम करने लगे। वे वृक्षों की लटहनियों से पंखों का काम ले रहे थे। तबी अचानक श्रीकृष्ण अपने साथियों को सम्बोधित करते हुए कहने लगे—

हे स्तोककृष्ण हे अंशो श्रीदामन्सुबलार्जुन ।
विशाल वृषभौजस्विन्देवप्रस्थ वरूथप ॥
पश्यतैतान्महाभागान्परार्थैकान्तजीवितान् ।
वातवर्षातपहिमान्सहन्तो वारयन्ति नः ॥
अहो एषां वरं जन्म सर्व प्राण्युपजीवनम् ।
सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥

अर्थात् हे श्रीकृष्ण ! हे अंशप ! हे श्रादामा ! हे सुबल ! हे अर्जुन ! हे विशाल ! हे ऋषभ ! हे जसस्वी ! हे वरुथप ! (ये उनके सखाओं के नाम हैं उनमें से प्रत्येक का सम्बोधन है) इन भाग्यशाली वृक्षों को देखो जो दूसरों की भलाई के लिए ही जीवित हैं। ये वृक्ष हम सबकी आँधी, वर्षा, ओला, पाला, धूप से रक्षा करते हैं और स्वयं इनको झेलते हैं। इन (वृक्षों) का जीवन धन्य है क्योंकि ये सब प्राणियों को उपजीवन (सहारा) देते हैं। जैसे कोई सज्जन पुरुष किसी याचक को खाली नहीं लौटाता, वैसे ही ये वृक्ष भी लोगों को खाली हाथ न लौटाकर उन्हें कुछ न कुछ अवश्य देते हैं।

वृक्ष हमें क्या-क्या देते हैं उनसे हमें क्या लाभ हैं? यह सहब विस्तारपूर्वर समझाते हुए कृष्ण आगे कहते हैं-

पत्रपुष्पफलच्छाया मूलवल्कलदारुभिः ।
गन्धनिर्यासभस्मास्थि तोक्मैः कामान्वितन्वते ॥
एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।
प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेयआचरणं सदा ॥

अर्थात् ये वृक्ष पत्र (पत्ती), पुष्प, फल, छाया, मूल (जड़), वल्कल (छाल), दारू या लकड़ी, गंध, निर्यास या गोंद, भस्म (राख), अस्थि (कोयला), तोक्म (बीज) आदि पदार्थों के द्वारा हमारा उपकार करते हैं। इन वृक्षों की भाँति ही मनुष्य को अपना जीवन, तन, मन, धन, सब कुछ दूसरों की भलाई में लगा देना चाहिए। इसी में मानव जीवन की सफलता है।

प्राचीनकाल के आश्रमवासी किस प्रकार की व्यवस्था करते थे उसका उल्लेख करते हुए महाकवि कालिदास ने रघुवंश में वृक्षों के संरक्षण हेतु अपनी भावी पीढ़ियों को चेतावनी दी है—

आधारबन्धैः प्रमुखैः प्रयत्नैः, सम्बद्धितानां सुत निर्वशेषम्।
कष्चिमन्न वाय्वादिरुपप्लवो वा, श्रमच्छिदं आश्रम पादपानाम्।।

अर्थात् आधारबन्ध (आलवाल, घेरा, घरोंगा, थावंला) आदि प्रयत्नों से एवं उनकी कटाई-छटाई आदि करके पुत्रों के समान वृक्षों की रक्षा करनी चाहिए, जिससे वे आँधी, पानी आदि उपद्रवों से बचे रहकर आश्रम में आये पथिकों का श्रम (थकावट) दूर करने योग्य बने रहें। प्राचीन काल में आश्रमवासी एक-दूसरे की कुशल-क्षेम में, आश्रम में रोपे गये वृक्षों की कुशलता अवश्य ही पूछा करते थे। इस श्लोक से यह तथ्य स्पष्ट विदित होता है कि प्राचीन ऋषि-मुनि वृक्षों के प्रति कितने सचेत और गम्भीर थे।

संबंधित शब्द[संपादित करें]

हिंदी में[संपादित करें]

  • पादप - वृक्ष से संबंधित तथा खुद वृक्ष भी, जैसे - पादप कोशिका।
  • पेड़ - सामान्य बोलचाल में वृक्ष की जगह प्रयुक्त।
  • तरु - काव्यों में काफी प्रयुक्त।
  • वन - वृक्षों तथा अन्य जीवों, पौधों का समूह।
  • पौधा - अपेक्षाकृत छोटा वृक्ष।

अन्य भारतीय भाषाओं में निकटतम शब्द[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]