पार्श्वनाथ

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पार्श्वनाथ जी
तेइसवें जैन तीर्थंकर
विवरण
अन्य नाम: पारसनाथ
एतिहासिक काल: ८७७-७७७ ई.पू.
परिवार
पिता: अश्वसेन
माता: वामादेवी
वंश: इक्ष्वाकु
स्थान
जन्म: वाराणसी
निर्वाण: सम्मेद शिखर
लक्षण
रंग: नीला
चिन्ह: साँप
ऊंचाई: ७.७१४२ फीट
आयु: १०० वर्ष
शासक देव
यक्ष: धरणेन्द्र
यक्षिणी: पद्मावती
तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा, कर्नाटक

भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के तेइसवें (23वें) तीर्थंकर हैं।

जन्म और प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 3 हजार वर्ष पूर्व वाराणसी में हुआ था। वाराणासी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय राजा थे जो बड़े धर्मात्मा थे। उनकी रानी वामा भी बड़ी विदुषी और धर्मशीला थीं। उनके गर्भ से पौष कृष्‍ण एकादशी के दिन एक महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका वर्ण नील था और जिसके शरीर पर सर्पचिह्म था। सब लोकों में आनंद फैल गया। वामा देवी ने गर्भकाल में एक बार अपने पार्श्व में एक सर्प देखा था इससे पुत्र का नाम 'पार्श्व' रखा गया। पार्श्व दिन दिन बढ़ने लगे और नौ हाथ लंबे हुए। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। कुशस्थान के राजा प्रसेनजित् की कन्या प्रभावती 'पार्श्व' पर अनुरक्त हुई। यह सुन कलिंग देश के यवन नामक राजा ने प्रभावती का हरण करने के विचार से कुशस्थान को आ घेरा। अश्वसेन के यहाँ जब यह समाचार पहुँचा तब उन्होंने बड़ी भारी सेना के साथ पार्श्व को कुशस्थल भेजा। पहले तो कलिंगराज युद्ध के लिये तैयार हुआ पर जब अपने मंत्री के मुख से उसने पार्श्व का प्रभाव सुना तब आकार क्षमा माँगी। अंत में प्रभावती के साथ पार्श्व का विवाह हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिये एक ओर जा रहे हैं। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी पंचाग्नि ताप रहा है और अग्नि में एक सर्प मरापड़ा है। पार्श्व ने काहा— 'दयाहीन' धर्म किसी काम का नहीं'।

वैराग्य और दीक्षा[संपादित करें]

एक दिन बगीचे में जाकर उन्होंने देखा कि एक जगह दीवार पर नेमिनाथ चरित्र अंकित है। उसे देख उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ और उन्होंने दीक्षा ली तथा स्थान स्थान पर उपदेश और लोगों का उद्धार करते घूमने लगे। वे अग्नि के समान तेजस्वी, जल के समान निर्मल और आकाश के समान निरवलंब हुए। भगवान पार्श्वनाथ तीस वर्ष की आयु में ही गृह त्याग कर संन्यासी हो गए। [1]

कैवल्य ज्ञान[संपादित करें]

काशी में जाकर 83 दिन तक कठोर तपस्या करने के बाद 84वें दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चार गणों या संघों की स्थापना की। प्रत्येक गण एक गणधर के अन्तर्गत कार्य करता था। सारनाथ जैन-आगम ग्रंथों में सिंहपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं पर जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ ने जन्म लिया था और अपने अहिंसा धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। उनके अनुयायियों में स्त्री और पुरुष को समान महत्व प्राप्त था।

कैवल्य ज्ञान के पश्चात्य चातुर्याम (सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह) की शिक्षा दी। ज्ञान प्राप्ति के उपरांत सत्तर वर्ष तक आपने अपने मत और विचारों का प्रचार-प्रसार किया तथा सौ वर्ष की आयु में देह त्याग दी।

निर्वाण[संपादित करें]

अंत में अपना निर्वाणकाल समीप जानकर श्री सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ की पहाड़ी जो हजारीबाग मैं है) पर चले गए जहाँ श्रावण शुक्ला अष्टमी को योग द्वारा उन्होंने शरीर छोड़ा। भगवान पार्श्वनाथ की लोकव्यापकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी सभी तीर्थंकरों की मूर्तियों और चिह्नों में पार्श्वनाथ का चिह्न सबसे ज्यादा है। आज भी पार्श्वनाथ की कई चमत्कारिक मूर्तियाँ देश भर में विराजित है। जिनकी गाथा आज भी पुराने लोग सुनाते हैं। ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्ध के अधिकांश पूर्वज भी पार्श्वनाथ धर्म के अनुयायी थे।. [2]

पूर्वजन्म[संपादित करें]

पहले जन्म में ब्राह्मण, दूसरे में हाथी, तीसरे में स्वर्ग के देवता, चौथे में राजा, पाँचवें में देव, छठवें जन्म में चक्रवर्ती सम्राट और सातवें जन्म में देवता, आठ में राजा और नौवें जन्म में राजा इंद्र (स्वर्ग) तत्पश्चात दसवें जन्म में उन्हें तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों और दसवें जन्म के तप के फलत: वे तीर्थंकर बनें।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]