पसीने की बीमारी

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पसीने की बीमारी
वर्गीकरण व बाहरी संसाधन
आईसीडी- 078.2
एमईएसएच D018614

पसीने की बीमारी, जिसे "अंग्रेज़ी Sweating Sickness " (लातिन : sudor anglicus) के नाम से भी जाना जाता है, एक रहस्यमय और उच्च विषमय रोग था, जिससे 1485 में शुरु होने वाली महामारी की श्रृंखला में, इंग्लैंड, और बाद में महाद्वीपीय यूरोप अत्यधिक प्रभावित हुआ. इसका अंतिम प्रकोप 1551 में आया था, जिसके बाद स्पष्टतया रोग गायब हो गया. लक्षणों की शुरुआत नाटकीय और आकस्मिक थी, जिसमें मौत एक घंटे के अंदर हो जाती थी. इसका कारण अब भी अज्ञात है. हंटा वायरस को इसका एक कारण माना जाता रहा है.

पुनरावृत महामारी[संपादित करें]

1485[संपादित करें]

चिकित्सकों का ध्यान पसीने की बीमारी पर सबसे पहले हेनरी सातवें के शासनकाल के आरंभिक काल में गया. यद्यपि, इसका पता 7 अगस्त 1485 को मिलफ़ोर्ड हेवन में हेनरी के आगमन के कुछ दिनों बाद ही चल गया था, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि इसके स्पष्ट प्रमाण 22 अगस्त को हुए बोसवोर्थ क्षेत्र के युद्ध से ठीक पहले मिले थे. 28 अगस्त को हेनरी के लंदन आने के तुरंत बाद, यह राजधानी में फैल गया. वहाँ, यह उस वर्ष अक्टूबर अंत तक के निकाले निष्कर्ष के अनुसार हजारों लोगों की मौत का कारण बना.[1] मरने वाले लोगों में दो लार्ड मेयर छह एल्डरमैन और तीन शेरीफ़ थे.[2] इस खतरनाक रोग को जल्दी ही पसीने की बीमारी के रूप में जाना जाने लगा. इसे प्लेग, जिसे पूर्व में मारक बुखार या अन्य महामारी के रूप में जाना जाता था, से भिन्न माना जाता है, इसे इसका नाम केवल विशिष्ट लक्षणों के कारण नहीं मिला, बल्कि इसका अत्यधिक तेज़ी से फैलना और घातक होना भी एक कारण है. पसीने की बीमारी 1492 तक आयरलैंड पहुँच चुका था, उसी समय अल्सटर के इतिहास (वॉ.iii, सं. बी मैककार्थी, डबलिन, 1895, पृ. 358f.), में आयरलैंड में पहली बार आए, प्लेघ अलियास के स्लेन के व्यापारी जेम्स फ्लेमिंग की मृत्यु दर्ज की गई थी. कोनाच्ट का इतिहास (सं. ए.एम.फ्रीमैन, डबलिन, 1944, पृ. 594f.) में भी इस मृत्युलेख को रिकॉर्ड किया गया था, और चार मास्टर्स का इतिहास (वॉ.iii, सं. जे.ओ'डोनोवैन, डबलिन, 1856, पृ. 1194f.) में 24 घंटे की अवधि में एक असामान्य प्लेग रिकॉर्ड किया गया था; और उस अवधि के बाद जिन लोगों में इसका खतरा पाया गया, उनका इलाज़ कर दिया गया था. इससे शिशु या छोटे बच्चे प्रभावित नहीं हुए थे. हालांकि, ध्यान देनें योग्य तथ्य है कि फ्रीमैन ने कोनाच्ट का इतिहास के फुटनोट में इस बात को अस्वीकारा है कि नाम में समानता होने के बावजूद यह प्लेग पसीने की बीमारी ही था, बल्कि यह 'पुनः पतन या अकाल से बुखार', संभवतः सन्निपात हो सकता है.

1502, 1507, 1517[संपादित करें]

1492 से 1502 तक, इस व्याधि के बारे में सुना नहीं गया. 1502 में, ऐसा माना गया था कि इसके कारण इंग्लैंड के हेनरी आठवें के बड़े भाई युवा लेखक, प्रिंस ऑफ वेल्स की मृत्यु हुई थी. इनकी मृत्यु उनके घर लड्लो कैसल में 1502 को हुई थी, वे अपनी युवा विधवा पत्नी, कॅथरीन आरागॉन को पीछे छोड़ गए.

१५०७ में एक दूसरा कम व्यापक प्रकोप सामने आया, इसके बाद 1517 में तीसरी बार, इससे कुछ गंभीर महामारी सामने आई. ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज में, साथ ही अन्य शहरों में इसका प्रभाव बहुत घातक था, कुछ मामलों कहा जाता है कि इसके कारण आधी जनसंख्या का नाश हो गया. कलैस और एंटवर्प में इसके प्रकोप के फैलने के प्रमाण मिले हैं, लेकिन इंग्लैंड से बाहर किसी और स्थान पर कोई प्रमाण नहीं मिला.

1528[संपादित करें]

1528 में बीमारी चौथी बार और बहुत ही गंभीरता के साथ सामने आया. इसे पहली बार लंदन में मई के अंत में महसूस किया गया और यह उत्तर को दूर छोड़ते हुए, स्कॉटलैंड और आयरलैंड को बख्शते हुए बहुत तेज़ी से संपूर्ण इंग्लैंड में फैल गया. लंदन में मृत्यु दर बहुत अधिक थी; अदालत को रद्द कर दिया गया था, और हेनरी आठवें लंदन छोड़ दिया, और इधर-उधर निवास बदलते रहे. महामारी का सबसे उल्लेखनीय तथ्य यूरोप में इसका फैलना है, यह अचानक हैम्बर्ग में प्रकट हुआ और अत्यधिक तेज़ी से फैलने लगा और इससे कुछ ही सप्ताह की अवधि के दौरान हजारों लोगों की मृत्यु हो गई. इसके बाद पसीने के बीमारी का विनाशकारी रूप जारी रहा, इस दौरान पूर्वी यूरोप में में मृत्यु दर उच्चतम स्तर पर थी. यह हैजा की ही तरह फैल रहा था. इसका प्रकोप दिसम्बर में स्विट्जरलैंड पहुंचा, उसके बाद उत्तर की ओर डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे, और पूर्व की ओर लिथुआनिया, पोलैंड और रूस पहुंचा. इसे फ्रांस या इटली में कभी महसूस नहीं किया गया. यह बेल्जियम और नीदरलैंड में भी उभर कर सामने आया, संभवतः यह इंग्लैंड से सीधे संक्रमित हुआ था, यह इसका कहर 27 सितम्बर की सुबहएंटवर्पऔर एम्स्टर्डम जैसे शहर में देखा गया. इससे संक्रमित हर स्थान में यह बहुत थोड़े समय के लिए ही मौजूद था, कहीं भी यह एक पखवाड़े से अधिक नहीं रहा. वर्ष के अंत तक, यह पूर्वी स्विट्जरलैंड, जहां इसका प्रभाव अगले वर्ष देखा गया, को छोड़कर, सभी स्थानों में पूरी तरह गायब हो गया था. इसके बाद, यह कभी भी यूरोप की धरती पर दोबारा दिखाई नहीं दिया.

अंतिम प्रकोप[संपादित करें]

इस रोग का अंतिम प्रमुख प्रकोप 1551 में इंग्लैंड में सामने आया था. एक प्रख्यात चिकित्सक, जॉन सायस ने रोग का प्रत्यक्ष बयान लिखा है, जिसे आज के समय में सामान्यतया पसीना या पसीने की बीमारी कहे जाने वाले रोग के विरुद्ध ए बोक या कॉन्सेल कहा जाता है.

अभिलक्षण[संपादित करें]

सायस और अन्य द्वारा वर्णित किए गए लक्षण और संकेत इस प्रकार है: रोग अचानक बीमार होने की आशंका के साथ शुरू होता है, उसके बाद ठंडा बुख़ार(कभी कभी बहुत उत्तेजक), चक्कर, सिरदर्द और थकावट के साथ गर्दन, कंधा और पैर मे अत्यधिक दर्द जैसे लक्षण दिखते हैं. ठंडी अवस्था के बाद, जो कि लगभग आधे घंटे से तीन घंटे तक रहता है, गर्मी लगती है और साथ ही पसीना आने लगता है. बिना किसी स्पष्ट कारण के पसीना आने लगता है. पसीने के साथ-साथ या पसीना निकल जाने के बाद, गर्मी लगने लगती थी, सिरदर्द होता था, उन्माद आने लगता था, नाड़ी हो जाती थी और तीव्र प्यास लगने लगती थी. घबराहट और दिल में दर्द सामान्य लक्षण थे. सायस सहित प्रेक्षकों द्वारा त्वचा में किसी प्रकार का दाद नोट नहीं किया गया था. अंतिम चरण में, या तो सर्वांगीण तंद्रा और निपात होता था या सोने की तीव्र इच्छा होती थी, जो कि सायस के अनुसार घातक हो सकता था, यदि रोगी को ऐसा करने की अनुमति दे दी जाती. एक आघात से रोगक्षमता में कमी नहीं आती थी, लेकिन कई लोगों को मृत्यु से पहले कई आघातों के कारण अत्यधिक पीड़ा का सामना करता पड़ता था.

यह रोग इंग्लैंड में 1578 तक विलुप्त रहा, हालांकि इसी प्रकार की एक बीमारी, जिसे पिकार्डी पसीना के रूप में जाना जाता था, 1718 और 1861 के बीच में फ्रांस में दिखाई दी, लेकिन वह उतनी घातक नहीं थी और यह चकत्ता के संगत था, जो कि प्रारंभिक प्रकोप के किसी भी लक्षण का हिस्सा नहीं था.

कारण[संपादित करें]

रोग का कारण ही इसका सबसे रहस्यमय पहलू है. तब और आज के टिप्पणीकार सामान्य गंदगी और उस समय के मल को इसका दोषी मानते हैं, जो कि संक्रमण का स्रोत हो सकता है. गुलाबों के युद्ध (वार ऑफ़ द रोजेज़) के अंत में फैलने वाले पहले प्रकोप का अर्थ यह है कि हो सकता है यह रोग फ़्रांस से उन किराये के फ्रेंच सैनिकों द्वारा लाया गया हो, जिनका उपयोग हेनरी सांतवें ने इंग्लिश सिंहासन प्राप्त करने के लिए किय था, क्योंकि विशेष रूप से ऐसा लगता है कि वे प्रतिरक्षित थे. हालांकि, डर्बी के पहले अर्ल, थॉमस स्टेनली ने "पसीने की बीमारी" का उपयोग बोसवर्थ के युद्ध (बैटल ऑफ़ बोर्सवर्थ) से पहले रिचर्ड तृतीय की सेना के साथ नहीं जुड़ने के लिए बहाने के रूप में किया था, इससे यह स्पष्ट है कि हेनरी टुडर के आने से पहले इंग्लैंड में यह बीमारी अपने पैर पसार चुकी थी. रोग के गरीबों से ज्यादा अमीरों के बीच फैलने के कारण इसे उस काल के दौरान हुई अन्य बीमारियों की तुलना में अधिक जहरीला करार दिया गया.

पुनरावर्ती बुखार को एक संभावित कारण माना जाता है. टिक और जूँ द्वारा फैलने वाला यह रोग अक्सर गर्मियों के महीनों के दौरान सबसे ज्यादा देखे जा सकते हैं, क्योंकि इस दौरान पसीना अधिक आता है. हालांकि, पुनरावर्ती बुखार को टिक के काटने के स्थान पर हुए स्थायी काले धब्बे के निशान और अनुवर्ती त्वचा चकता से चिह्नित किया जाता है, जबकि समसामायिक व्यक्ति इन प्रासंगिक स्पष्ट संकेतों को देख नहीं पाए, इसलिए इसकी पहचान निश्चितता से कोषों दूर है.

मारक मांसल पीड़ा के प्रकोप पर 1934 के लेख पर आधारित चौधरिया और बेहन द्वारा सुझावित चिरकारी थकान संलक्षण बोर्नहोम रोग के निदान को साझा करती है.[3]

अभी हाल ही में, एक हंटा वायरस भी प्रस्तावित किया गया है, और इस बीमारी के हेतुविज्ञान पर विचार करने के लिए एक दिलचस्प उम्मीदवार दिखाई देता है.[4] हालांकि,हंटा वायरस के फैलने के कुछ चिकित्सीय सुविधाएं पसीने की बीमारी के विकास में सहयोगी नहीं हैं; विशेष रूप से, जबकि हंटा वायरस के एक व्यक्ति से दूसरे में संक्रमित होने की बहुत कम संभावना होती है, फिर भी इसे पसीने की बीमारी के संक्रमण का महत्वपूर्ण कारक माना जाता है.[5] यद्यपि हंटा वायरस फुफ्फुसीय सिंड्रोम प्रकोप का निदान पसीने की बीमारी के निदान के वर्णन से काफी मिलता-जुलता है, फिर भी कई ऐसे प्रश्न अब भी हैं, जिनका उत्तर दिया जाना आवश्यक है, और इन्हीं कारणों से हेतुविज्ञान के सिद्धांत के लिए रास्ते खुले हैं.

नोट्स[संपादित करें]

  1. Entick, John (1766). A new and accurate history and survey of London, Westminster, Southwark, and places adjacent. London. pp. 434, vol. 1. 
  2. Harrison, Walter (1775). A new and universal history, description and survey of the cities of London and Westminster, the borough of Southwark. London. प॰ 127. 
  3. http://www.informaworld.com/smpp/content~content=a903578375&db=all
  4. http://www.pubmedcentral.nih.gov/articlerender.fcgi?artid=1043971
  5. http://www.findarticles.com/p/articles/mi_qa3874/is_200101/ai_n8939673

संदर्भ[संपादित करें]

बाहरी लिंक्स[संपादित करें]