पलाश

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Butea monosperma
बंगलौर, भारत में
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत: Plantae
विभाग: मैग्नेलियोफाइटा
वर्ग: मैग्नोलियोप्सीडा
गण: Fabales
कुल: Fabaceae
प्रजाति: Butea
जाति: B. monosperma
द्विपद नाम
Butea monosperma
(Lam.) Taub.
कोलकाता पश्चिम बंगाल में ढाक के पेड़ की पत्तियां
पुष्पों से लदा हुआ पलाश

पलाश (पलास, परसा, ढाक, टेसू , किंशुक, केसू ) एक वृक्ष है जिसके फूल बहुत ही आकर्षक होते हैं। इसके आकर्षक फूलो के कारण इसे "जंगल की आग" भी कहा जाता है। प्राचीन काल ही से होली के रंग इसके फूलो से तैयार किये जाते रहे है। भारत भर मे इसे जाना जाता है। एक "लता पलाश" भी होता है। लता पलाश दो प्रकार का होता है। एक तो लाल पुष्पो वाला और दूसरा सफेद पुष्पो वाला। लाल फूलो वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। सफेद पुष्पो वाले लता पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। वैज्ञानिक दस्तावेजो मे दोनो ही प्रकार के लता पलाश का वर्णन मिलता है। सफेद फूलो वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है जबकि लाल फूलो वाले को ब्यूटिया सुपरबा कहा जाता है। एक पीले पुष्पों वाला पलाश भी होता है।

परिचय[संपादित करें]

पलाश की जड़ से बांख तैयार करता ग्रामीण बालक

पलास भरातवर्ष के सभी प्रदेशों और सभी स्थानों में पाया जाता है। पलास का वृक्ष मैदानों और जंगलों ही में नहीं, ४००० फुट ऊँची पहाड़ियों की चोटियों तक पर किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है । यह तीन रूपों में पाया जाता है—वृक्ष रूप में, क्षुप रूप में और लता रूप में । बगीचों में यह वृक्ष रूप में और जंगलों और पहाड़ों में अधिकतर क्षुप रूप में पाया जाता है । लता रूप में यह कम मिलता है । पत्ते, फूल और फल तीनों भेदों के समान ही होते हैं । वृक्ष बहुत ऊँचा नहीं होता, मझोले आकार का होता है । क्षुप झाड़ियों के रूप में अर्थात् एक स्थान पर पास पास बहुत से उगते हैं । पत्ते इसके गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं जिनका रंग पीठ की ओर सफेद और सामने की ओर हरा होता है । पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन तीन होते हैं । इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है । लकड़ी बड़ी टेढ़ी मेढ़ी होती है । कठिनाई से चार पाँच हाथ सीधी मिलती है । इसका फूल छोटा, अर्धचंद्राकार और गहरा लाल होता है । फूल को प्रायः टेसू कहते हैं और उसके गहरे लाल होने के कारण अन्य गहरी लाला वस्तुओं को 'लाल टेसू' कह देते हैं । फूल फागुन के अंत और चैत के आरंभ में लगते हैं । उस समय पत्ते तो सबके सब झड़ जाते हैं और पेड़ फूलों से लद जाता है जो देखने में बहुत ही भला मालूम होता है । फूल झड़ जाने पर चौड़ी चौ़ड़ी फलियाँ लगती है जिनमें गोल और चिपटे बीज होते हैं । फलियों को 'पलास पापड़ा' या 'पलास पापड़ी' और बीजों को 'पलास-बीज' कहते हैं।

पलास के पत्ते प्रायः पत्तल और दोने आदि के बनाने के काम आते हैं । राजस्थान और बंगाल में इनसे तंबाकू की बीड़ियाँ भी बनाते हैं । फूल और बीज ओषधिरूप में व्यवहृत होते हैं । वीज में पेट के कीड़े मारने का गुण विशेष रूप से है । फूल को उबालने से एक प्रकार का ललाई लिए हुए पीला रंगा भी निकलता है जिसका खासकर होली के अवसर पर व्यवहार किया जाता है । फली की बुकनी कर लेने से वह भी अबीर का काम देती है । छाल से एक प्रकार का रेशा निकलता है जिसको जहाज के पटरों की दरारों में भरकर भीतर पानी आने की रोक की जाती है । जड़ की छाल से जो रेशा निकलता है उसकी रस्सियाँ बटी जाती हैं । दरी और कागज भी इससे बनाया जाता है । इसकी पतली डालियों को उबालकर एक प्रकार का कत्था तैयार किया जाता है जो कुछ घटिया होता है और बंगाल में अधिक खाया जाता है । मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार करते हैं । छाल पर बछने लगाने से एक प्रकार का गोंद भी निकलता है जिसको 'चुनियाँ गोंद' या पलास का गोंद कहते हैं । वैद्यक में इसके फूल को स्वादु, कड़वा, गरम, कसैला, वातवर्धक शीतज, चरपरा, मलरोधक तृषा, दाह, पित्त कफ, रुधिरविकार, कुष्ठ और मूत्रकृच्छ का नाशक; फल को रूखा, हलका गरम, पाक में चरपरा, कफ, वात, उदररोग, कृमि, कुष्ठ, गुल्म, प्रमेह, बवासीर और शूल का नाशक; बीज को स्तिग्ध, चरपरा गरम, कफ और कृमि का नाशक और गोंद को मलरोधक, ग्रहणी, मुखरोग, खाँसी और पसीने को दूर करनेवाला लिखा है।

यह वृक्ष हिंदुओं के पवित्र माने हुए वृक्षों में से हैं । इसका उल्लेख वेदों तक में मिलता है । श्रोत्रसूत्रों में कई यज्ञपात्रों के इसी की लकड़ी से बनाने की विधि है । गृह्वासूत्र के अनुसार उपनयन के समय में ब्राह्मणकुमार को इसी की लकड़ी का दंड ग्रहण करने की विधि है । वसंत में इसका पत्रहीन पर लाल फूलों से लदा हुआ वृक्ष अत्यंत नेत्रसुखद हेता है । संस्कृत और हिंदी के कवियों ने इस समय के इसके सौंदर्य पर कितनी ही उत्तम उत्तम कल्पनाएँ की हैं । इसका फूल अत्यंत सुंदर तो होता है पर उसमें गंध नहीं होते । इस विशेषता पर भी बहुत सी उक्तियाँ कही गई हैं।

पर्याय[संपादित करें]

किंसुक , पर्ण , याज्ञिक , रक्तपुष्पक , क्षारश्रेष्ठ , वात-पोथ , ब्रह्मावृक्ष , ब्रह्मावृक्षक , ब्रह्मोपनेता , समिद्धर , करक , त्रिपत्रक , ब्रह्मपादप , पलाशक , त्रिपर्ण , रक्तपुष्प , पुतद्रु , काष्ठद्रु , बीजस्नेह , कृमिघ्न , वक्रपुष्पक , सुपर्णी ,केसूदो ।

दीर्घा[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]


सन्दर्भ[संपादित करें]