पंचकोश

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योग की धारणा के अनुसार मानव का अस्तित्व पाँच भागों में बंटा है जिन्हें पंचकोश कहते हैं । ये कोश एक साथ विद्यमान अस्तित्व के विभिन्न तल समान होते हैं । विभिन्न कोशों में चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन की अनुभूति होती है । प्रत्येक कोश का एक दूसरे से घनिष्ठ संबंध होता है । वे एक दूसरे को प्रभावित करती और होती हैं ।

ये पाँच कोश हैं -

  1. अन्नमय कोश - अन्न तथा भोजन से निर्मित । शरीर और मस्तिष्क ।
  2. प्राणमय कोश - प्राणों से बना ।
  3. मनोमय कोश - मन से बना ।
  4. विज्ञानमय कोश - अंतर्ज्ञान या सहज ज्ञान से बना ।
  5. आनंदमय कोश - आनंदानुभूति से बना ।

योग मान्यताओं के अनुसार चेतन और अवचेतन मान का संपर्क प्राणमय कोश के द्वारा होता है[1] । स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा लिखित स्वर योग के तहत कोशों के मनोवैज्ञानिक आयाम, शारीरिक दशा और अनुभूति के प्रकार का उल्लेख किया गया ।

संदर्भ[संपादित करें]

  1. सत्यानंद सरस्वती. स्वर योग. प॰ 28.