नेपाल का इतिहास

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नेपाल का इतिहास भारतीय साम्राज्यों से प्रभावित हुआ पर यह दक्षिण एशिया का एकमात्र देश था जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद से बचा रहा । हँलांकि अंग्रेजों से हुई लड़ाई (1814-16) और उसके परिणामस्वरूप हुई संधि में तत्कालीन नेपाली साम्राज्य के अर्धाधिक भूभाग ब्रिटिश इंडिया के तहत आ गए और आज भी ये भारतीय राज्य उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और पश्चिम बंगाल के अंश हैं ।

प्रागैतिहासिक काल[संपादित करें]

हिमालय क्षेत्र मे मनुष्यों का आगमन लगभग ९,००० वर्ष पहले होने के तथ्य की पुष्टि काठमाण्डौ उपत्यका में पाये गये नव पाषाण औजारौं से होती है। सम्भवतः तिब्बती-बर्मीज मूल के लोग नेपाल मे २,५०० वर्ष पहले आ चुके थे।[1]

प्राचीन काल[संपादित करें]

१५०० ईशा पूर्व के आसपास इन्डो-आर्यन जतियों ने काठमाण्डौ उपत्यका में प्रवेश किया । करीब १००० ईसा पूर्व में छोटे-छोटे राज्य और राज्यसंगठन बनें । सिद्धार्थ गौतम (ईसापूर्व ५६३–४८३) शाक्य वंश के राजकुमार थे, जिन्होंने अपना राजकाज त्याग कर तपस्वी का जीवन निर्वाह किया और वह बुद्ध बन गए।

नेपाल का प्राचीन काल सभ्यता, संस्कृति और र्शार्य की दृष्टि से बड़ा गौरवपूर्ण रहा है। प्राचीन काल में नेपाल राज्य की बागडोर क्रमश: गुप्तवंश किरात वंशी, सोमवंशी, लिच्छवि, सूर्यवंशी राजाओं के हाथों में रही है। किरातवंशी राजा स्थुंको, सोमवंशी लिच्छवी, राजा मानदेव, राजा अंशुवर्मा के राज्यकाल बड़े गौरवपूर्ण रहे हैं।कला, शिक्षा, वैभव और राजनीति के दृष्टिकोण से लिच्छवि काल 'स्वर्णयुग' रहा है। जन साधारण संस्कृत भाषा में लिखपढ़ और बोल सकते थे। राजा स्वयं विद्वान्‌ और संस्कृत भाषा के मर्मज्ञ होते थे। 'पैगोडा' शैली की वास्तुकला बड़ी उन्नत दशा में थी और यह कला सुदूर महाचीन तक फैली हुई थी। मूर्तिकला भी समृद्ध अवस्था में थी। धार्मिक सहिष्णुता के कारण् हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म समान रूप से विकसित हो रहे थे। काफी वजनदार स्वर्णमुद्राएँ व्यवहार में प्रचलित थीं। विदेशों से व्यापार करने के लिए व्यापारियों का अपना संगठन था। वैदेशिक संबंध की सुदृढ़ता वैवाहिक संबंध के आधार पर कायम थी।

ई. सन्‌ 880 में लिच्छवि राज्य की समाप्ति पर नुवाकोटे ठकुरी राजवंश का अभ्युदय हुआ। इस समय नेपाल राज्य की अवनति प्रारंभ हो गई थी। केंद्रीय शासन शिथिल पड़ गया था। फलत: नेपाल अनेक राजनीतिक इकाइयों में विभाजित हो गया। हिमालय के मध्य कछार में मल्लों का गणतंत्र राज्य कायम था। लिच्छवि शासन की समाप्ति पर मल्ल राजा सिर उठाने लगे थे। सन्‌ 1350 ई. में बंगाल के शासक शमशुद्दीन इलियास ने नेपाल उपत्यका पर बड़ा जबरदस्त आक्रमण किया। धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था अस्तव्यस्त हो गयी। सन्‌ 1480 ई. में अंतिम वैश राजा अर्जुन देव अथवा अर्जुन मल्ल देव को उनके मंत्रियों ने पदच्युत करके स्थितिमल्ल नामक राजपूत को राजसिंहासन पर बैठाया। इस समय तक केंद्रीय राज्य पूर्ण रूप से छिन्न-भिन्न होकर काठमाडों, गोरखा, तनहुँ, लमजुङ, मकबानपुर आदि लगभग तीस रियासतों में विभाजित हो गया था।

भारतीय साम्राज्यों का प्रभाव[संपादित करें]

२५० ईशा पुर्व तक ईस क्षेत्र मे उत्तर भारत के मौर्य साम्राज्य का प्रभाव पडा और बाद में ४थी शताब्दी मे गुप्तवंश के अधीन में कठपुतली राज्य हो गया। इस क्षेत्र मे ५वी शताब्दी के उत्तरार्ध मे आकर वैशाली के लिच्छवियो के राज्य की स्थापना हुई । ८वी शताव्दी के उत्तरार्ध मे लिच्छवि वंश का अस्त हो गया और सन् ८७९ से नेवार (नेपाल की एक जाति) युग का उदय हुआ, फिर भी इन लोगों का नियन्त्रण देशभर मे कितना बना था, इसका आकलन कर पाना मुश्किल है। ११वी शताब्दी के उत्तरार्ध मे दक्षिण भारत से आए चालुक्य साम्राज्य का प्रभाव नेपाल के दक्षिणी भूभाग मे दिखा । चालुक्यों के प्रभाव मे आकर उस समय राजाओ ने बुद्धधर्म को छोडकर हिन्दू धर्म का समर्थन किया और नेपाल मे धार्मिक परिवर्तन होने लगा।

पाटन का हिन्दू मन्दिर, तीन प्राचीन राज्य मध्येका एककी राजधानी
१९२० की नेपाली राजशाही

मध्यकाल[संपादित करें]

१३वीं शताब्दी के पूर्वार्ध मे संस्कृत शब्द मल्ल कुलनाम वाले राजवंश का उदय होने लगा। २०० वर्ष में इन राजाओं ने शक्ति एकजुट की। १४वीं शताब्दी के उत्तरार्ध मे देश का बहुत ज्यादा भाग एकीकृत राज्य के अधीन में आ गया। लेकिन यह एकीकरण कम समय तक ही टिक सका । १४८२ में यह राज्य तीन भाग मे विभाजित हो गया - कान्तिपुर, ललितपुर, और भक्तपुर – जिसके बीचमे शताव्दियौं तक मेल नही हो सका।

राजा स्थिति मल्ल अस्तव्यस्त आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में पूर्ण रूप से समर्थ हुए। राजा पक्षमल्ल ने केंद्रीय शासन को सुदृढ़ करने का प्रयत्न किया, किंतु उनके निधन पर पश्चात्‌ उनके उत्तराधिकारियें ने राज्य को आपस में बाँटकर पुन: राजनीतिक इकाइयाँ खड़ी कीं। मध्यकालीन नेपाल साहित्य, संगीत और कला की दृष्टि से उन्नत होने पर भी राजनीतिक दृष्टि से अवनति की ओर ही बढ़ा। जनजीवन अशांत था। यूरोपीय साम्राज्यवादियों की कुदृष्टि भारत के पश्चात्‌ नेपाल पर भी पड़ गई थी। नेपाल के विरुद्ध किनलोक का सैनिक अभियान और उपत्यका में ईसाई पादरियों की चहल पहल इस तथ्य के प्रमाण हैं।

गोरखा राज्य इन दिनों काफी सबल हो चुका था। नेपाल की छोटी छोटी राजनीतिक इकाइयों पर और नेपाली जनजीवन पर गोरखा राज्य का प्रभाव छा गया था। न्यायमूर्ति राजा रामशाह के न्याय की चर्चा नेपाल भर में फैल गयी थी। राजा पृथ्वीपति शाह के राज्यकाल में बंगाल के नवाब ने गुर्गिन खाँ के नेतृत्व में नेपाल पर आक्रमण करने के लिए पचास साठ हजार फौज भेजी थी। नवाब की सेना मकवानपुर के तराई क्षेत्र में पड़ाव डाले हुई थी। मकबानपुर ने गोरखा राज्य से सहायता की याचना की। गोराखा के कुछ जवानों ने नवाब की सेना को गाजर मूली की तरह काट डाला। बचे हुए सैनिक अपनी जान बचाकर भाग निकले।

उपर्युक्त इन दो कारणो से गोरखा राज्य नेपाली जनजीवन के सुखद भविष्य का आशाकेंद्र हो गया था। जनजीवन की इस आकांक्षा को नेपाल राष्ट्र के जनक महाराजाधिराज पृथ्वीनारायण शाह ने समझा और नेपाल के एकीकरण के लिए अभियान प्रारंभ किया। जिस प्रकार यूरोप में सार्डिनिया राज्य ने इटली का और प्रशा राज्य ने जर्मनी का एकीकरण किया, उसी प्रकार गोरखा राज्य ने पृथ्वीनारायण शाह के नेतृत्व में नेपाल का एकीकरण किया।

मध्यकालीन नेपाल के अंतिम चरण में अर्थात्‌ राष्ट्र के जनक पृथ्वीनारायण शाह के उदय होने से पूर्व विदेशी लोग नेपाल पर दाँत गड़ाने लगे थे। नेपाल उपत्यका में पादरी लोग ईसाई धर्म का प्रचार करने लगे थे। मल्ल राजा आपसी फूट-वैमनस्य, झगड़ा, युद्ध आदि बातों में निरंतर व्यस्त थे।

नेपाल उपत्यका के बाहर के राज्य भी आपस में लड़-झगड़कर अपनी जन-धन-शक्ति को क्षीण कर रहे थे। राजाओं ने आपसी झगड़े, मल्ल राजाओं द्वारा देव-मंदिर की संपत्ति का व्यक्तिगत उपभोग, राजा भास्कर मल्ल द्वारा हिंदू भावना के विरुद्ध एक मुसलमान को प्रधान मंत्री बनाने का कार्य आदि मध्यकालीन राजनीतिक स्थिति को धूमिल बनाते हैं और साथ ही नेपाल की सार्वभौम स्वतंत्रता को अधर में डाल देते है। जिस प्रकार शमशुद्दीन इलियास के आक्रमण के पश्चात्‌ राजा स्थितिमल्ल ऐतिहासिक आवश्यकता के रूप में दिखाई पड़ते हैं उसी प्रकार साम्राज्यवादियों से नेपाल का बचाने वाले के रूप में पृथ्वीनारायण शाह ऐतिहासिक आवश्यकता स्वरूप दिखलाई पड़ते हैं। गोरखों ने 1790 में तिब्बत पर आक्रमण किया किंतु यह आक्रमण नेपाल को महँगा पड़ा। चीन ने 1791 में तिब्बत का पक्ष लेकर अपनी सेनाएँ नेपाल में प्रविष्ट करा दीं और 1792 में गोरखों को संधि करने पर विवश किया। इसी वर्ष ग्रेट ब्रिटेन और नेपाल में द्वितीय वाणिज्य संधि संपन्न हुई, और नेपाल में एक अंग्रेज कूटनीतिज्ञ की नियुक्ति की व्यवस्था हो गई। भारत नेपाल सीमा विवाद के समय 1814 में ब्रिटेन ने नेपाल के विरूद्ध युद्ध छेड़ दिया। मार्च 1816 में नेपाल ने अपनी कुछ भूमि अंग्रेजों को दे दी, और काठमांडू में अंग्रेजी रेजीडेंसी की स्थापना हो गई। 1857 के भारतीय 'सिपाही विद्रोह' में नेपालके तत्कालीन प्रधान मंत्री जंगबहादुर ने अंग्रेजी सेना की सहायता के लिए 12000 सैनिक भेजे।

धर्मविरोधी, जातिविरोधी तथा राष्ट्रविरोधी कार्यों ने सच्चे नेपाली के मन में सुदृढ़ नेपाल राष्ट्र खड़ा करने की भावना को जन्म दिया। नेपाल की छिन्न-भिन्न राजनीतिक इकाइयों को एक सूत्र में बाँधकर नेपाल राष्ट्र खड़ा करने के लिए वहाँ की राजनीतिक इकाइयों का एकीकरण हुआ।

आधुनिक काल[संपादित करें]

एकीकरण[संपादित करें]

१७६५मे, गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल के छोटे छोटे बाइसे व चोबिसे राज्यके उपर चढाँइ करतेहुए एकिकृत किया, बहुत ज्यादा रक्तरंजित लडाँईयौं पश्वात उन्हौने ३ वर्ष बाद कान्तीपुर, पाटन व भादगाँउ के राजाओं को हराया और अपने राज्य का नाम गोरखा से नेपाल मे परिवर्तित किया। तथापि उन्हे कान्तिपुर विजय मे कोई युद्ध नही करना पड़ा। वास्तव में, उस समय इन्द्रजात्रा पर्व मे कान्तिपुर की सभी जनता फसल के देवता भगवान इन्द्र की पूजा और महोत्सव (जात्रा) मना रहे थे, जब पृथ्वी नारायण शाह ने अपनी सेना लेकर धावा बोला और सिंहासन कब्जा कर लिया। इस घटना को आधुनिक नेपाल का जन्म भी कहते है।

अंग्रेज़ों से संघर्ष[संपादित करें]

तिब्बत से हिमाली (हिमालयी) मार्ग के नियन्त्रण के लिए हुआ विवाद और उसके पश्चात युद्ध में नेपाली सैनिक मानसरोवर से आगे तक बढ चुक़े थे लेकिन तिब्बत की सहायता के लिए चीन के आने के बाद नेपाल पीछे हट गया ।

आधुनिक नेपाल की नींव नेपाल राष्ट्र के एकीकरण से और साम्राज्यवाद के विरोध से निर्मित हुई है। पृथ्वी नारायण शाह के निधन के पश्चात्‌ ही ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने नेपाल पर फिर दाँत गड़ाये और नेपाल के विरुद्ध सैनिक अभियान किया। सिगौली संधि के द्वारा राज्य की सीमा छोटी कर दी गई और नेपाल में रेजिडेंट रहने लगा। पृथ्वीनारायण शाह के चौथे वैधानिक उत्तराधिकारी श्री 5 राजेंद्र विक्रम शाह ने भारत के सिख, मराठे और मुगलों तथा वर्मा, चीन और अफगानिस्तान में अपने राजदूतों को गुप्त रूप से भेजकर यूरोपीय साम्राज्यवादियों के विरुद्ध एक होकर युद्ध करने के लिए आह्वान किया था।

नेपाल की सीमा के नजदीक का छोटे-छोटे राज्यों को हड़पने के कारण से शुरु हुवा विवाद ब्रिटिश इस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ दुश्मनी का कारण बना । इसी वजह से १८१४–१६ रक्तरंजित एङ्गलो-नेपाल युद्ध हो गया। इस युद्ध मे नेपाल ने नालापानी गढी तथा अलमोडा मे विलायती सैनिकों की बड़ी क्षति पहुँचाया था लेकिन नेपाली सैनिक कमाण्डर के इच्छा विपरित नेपाल नरेश ने सन्धिका प्रस्ताव किया जिसमे नेपाल को अपनी दो तिहाई भूभाग से हाथ धोना पड़ा लेकिन अपनी सार्वभौमसत्ता और स्वतन्त्रता कायम रखा। भारतवर्ष में यही एक खण्ड है जो कभी भी किसी बाहरी सामन्तौं (उपनिवेशों) के अधीन में नही आया। विलायत से लड्ने में पस्चिम मे सतलज से पुर्व में टिष्टा नदी तक फैला हुवा बिशाल नेपाल सुगौली सन्धि के बाद पश्चिम में महाकाली और मेची नदियों के बीच सिमट गया लेकिन अपनी स्वाधीनत को बचाए रखने में नेपाल सफल रहा, बाद मे अंग्रेजो ने १८२२ मे मेची नदी व राप्ती नदी के बीच की तराई का हिस्सा नेपाल को वापस किया उसी तरह १८६० मे राणा प्रधानमन्त्री जंगबहादुर से खुश होकर अंग्रेजो ने राप्तीनदी से माहाकाली नदी के बीच का तराई का थोडा और हिस्सा नेपाल को लौटाया । लेकिन सुगौली सन्धी के बाद नेपाल ने जमीन का बहुत बडा हिस्सा गँवा दिया यह क्षेत्र अभी उत्तराञ्चल राज्य और हिमाञ्चल प्रदेश और पञ्जाबी पहाडी राज्य मै सम्मिलित है। पूर्व मै दार्जीलिङ और उसके आसपासका नेपाली मूल के लोगों का भूमि (जो अब पश्चिम बंगाल मे है) भी ब्रिटिस इन्डिया के अधीन मे हो गया तथा नेपाल का सिक्किम के उपरका प्रभाव और शक्ति भी नेपाल को त्यागना पडा।

राजशाही[संपादित करें]

राज परिवार व भारदारोके विच गुटबन्दी की वजहसे युद्धके बाद अस्थायित्व कायम हुवा। शन् १८४६मा शासन कररही रानीकी सेनानायक जङ्गबहादुर राणाको पदच्युत करने षडयन्त्रकी खुलासा होनेसे कोतपर्व नामका नरसंहार हुवा। हतियारधारी सेना व रानीकेप्रति वफादार भाइ-भारदाररोकेविच मारकाट चलनेसे देशके सयौँ राजखलाक, भारदारलोग व दुसरे रजवाडो का हत्याहुवा। जङ्गबहादुरकी जितके बाद राणा खानदान उन्होने सुरुकिया व राणा शासन लागु किया। राजाको नाममात्रमे सिमित किया व प्रधानमन्त्री पदको सक्तिशाली वंशानुगत किया गया। राणाशासक पूर्णनिष्ठाके साथ ब्रिटिसके पक्षमे रहतेथे व ब्रिटिसशासकको १८५७की सेपोई रेबेल्योन (प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम), व बादमे दोनो विश्व युद्धसहयोग कियाथा। शन् १९२३मे संयुक्त अधिराज्य व नेपाल विच आधिकारिक रुपमे मित्रताकी सम्झौतामे हस्ताक्षर हुवा, जिसमे नेपलकी स्वतन्त्रता को संयुक्त अधिराज्य ने स्वीकार किया । दक्षिण एशियाई मुल्कों में पहला, नेपाली राजदुतावास ब्रिटेन की राजधानी लंडन मे खुल गया ।

१९४० दशक के उत्तरार्ध मे लोकतन्त्र-समर्थित आन्दोलनों का उदय होने लगा व राजनैतिक पार्टियां राणा शासनके विरुद्ध में हो गए। उसी समय चीन ने १९५० में तिब्बत पर कब्जा कर लिया जिसकी वजहसे बढ़ती हुई सैनिक गतिविधि को टालने के लिए भारत नेपाल की स्थायित्व पर चाख बनाने लगा । फलस्वरुप राजा त्रिभूवन को भारत ने समर्थन किया १९५१ में सत्ता लेने में सहयोग किया, नयाँ सरकार का निर्माण हो गया, जिसमें ज्यादा आन्दोलनकारी नेपाली कङ्ग्रेस पार्टि के लोगो की सहभागिता थी। राजा व सरकार के बीच वर्षों की शक्ति खींचातानी के पश्चात, १९५९मे राजा महेन्द्र ने लोकतान्त्रिक अभ्यास अन्त किया व "निर्दलिय" पञ्चायत व्यवस्था लागु करके राज किया। सन् १९८९के "जनआन्दोलन"ने राजतन्त्रको सांवैधानिक सुधार करने व बहुदलिय संसद बनाने का वातवरणा बनगया सन १९९०मा कृष्णप्रशाद भट्टराई अन्तरिम सरकारके प्रधानमन्त्री बनगए, नयाँ संविधानका निर्माण हुवा राजा बीरेन्द्र ने १९९० मे नेपालके इतिहासमे दूसरा प्रजातन्त्रिक बहुदलीय संबिधान जारी किया[2] व अन्तरिम सरकार ने संसद के लिए प्रजातान्त्रिक चुनाव करवाए । नेपाली कङ्ग्रेसल ने राष्ट्र की दुसरी प्रजातन्त्रीक चुनाव मे बहुमत प्राप्त किया व गिरिजाप्रशाद कोइराला प्रधानमन्त्री बने।

२१वीं सदी और प्रजातंत्र[संपादित करें]

इक्कसवीं सदी की शुरुआत में नेपाल में माओवादियों का आन्दोलन तेज होता गया । मधेशियों के मुद्दे पर भी आन्दोलन हुए । अन्त में सन् 2008 में राजा ज्ञानेन्द्र ने प्रजातांत्रिक चुनाव करवाए जिसमें माओवादियों को बहुमत मिला और प्रचण्ड नेपाल के प्रधानमंत्री बने और मधेशी नेता रामबरन यादव ने राष्ट्रपति का कार्यभार सम्हाला ।

निरन्तर रुप से राजा-रजवाड़ों के अधीन में रहकर फूट और मिलन का लम्बा तथा सम्पन्न इतिहास वाला, हाल में नेपाल के नाम से प्रसिद्ध, यह भूखण्ड में विक्रम संवत २०४६ साल के आन्दोलन के पश्चात संवैधानिक राजतन्त्र की नीति से अवलम्बित हुवा। लेकिन इसके पश्चात भी राजसंस्था एक महत्त्वपूर्ण तथा अस्पष्ट परिधि एवम् शक्ति सम्पन्न संस्था के रूप मे प्रस्तुत हुवा। इस व्यवस्था मे पहले संसदीय अनिश्चितता तथा सन् १९९६ से ने.क.पा.(माओवादी) के जनयुद्ध के कारण से राष्ट्रिय अनिश्चितता दिख्ने लगा। माओवादिओं ने राजनीति के मूलाधार से पृथक भूमिगत रुप से राजतन्त्र तथा मूलाधार के राजनैतिक दलों के विरुद्ध में गुरिल्ला युद्ध सञ्चालन कर दिया। उन्होंने नेपाल की सामन्ती व्यवस्था (उन के अनुसार इसमें राजतन्त्र भी शामिल है) फेंक कर एक माओवादी राष्ट्र स्थापना करने का प्रण किया । इसी कारण से नेपाली गृहयुद्ध शुरु हो गया जिसके कारण १३,००० लोगों की जान गई । इसी विद्रोह को दमन करने की पृष्ठभूमि में राजा ज्ञानेन्द्र ने सन् २००२ मे संसद को विघटन तथा निर्वाचित प्रधानमन्त्री को अपदस्थ करके प्रधानमन्त्री मनोनित प्रक्रिया से शासन चलाने लगे। सन् २००५मै उन्हौंने एकल रूपमै संकटकाल का घोषणा करके सब कार्यकारी शक्ति ग्रहण किया । सन् २००६ के लोकतान्त्रिक आन्दोलन (जनाअन्दोलन-२) के पश्चात राजा ने देश की सार्वभौम सत्ता जनता को हस्तान्तरित की तथा २४ अप्रैल, २००६ को संसद की पुनर्स्थापना हुई । १८ मई, २००६ को अपनी पुनर्स्थापित सार्वभौमिकता का उपयोग करके नए प्रतिनिधि सभा ने राजा के अधिकार में कटौती कर दी तथा नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया । नवनिर्वाचित संविधान निर्माण करने वाली संविधान सभा की पहली बैठक द्वारा २८ मई, २००८ मे नेपाल को आधिकारिक रूप मे एक सन्घीय गणतन्त्रात्मक राष्ट्र घोषित किया गया।

संदर्भ[संपादित करें]

  1. "A Country Study: Nepal". Federal Research Division, Library of Congress. http://memory.loc.gov/frd/cs/nptoc.html. अभिगमन तिथि: September 23 2005. 
  2. "Timeline: Nepal". BBC News. http://news.bbc.co.uk/1/hi/world/south_asia/country_profiles/1166516.stm. अभिगमन तिथि: 2005. 

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]