नाग केसर
| नाग केसर | ||||||||||||||||||
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Ceylon ironwood in Thelwatta, South-East Sri Lanka.
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| वैज्ञानिक वर्गीकरण | ||||||||||||||||||
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| द्विपद नाम | ||||||||||||||||||
| Mesua ferrea Carolus Linnaeus |
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| पर्याय | ||||||||||||||||||
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Mesua coromandelina Wight |
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नागकेसर (वानस्पतिक नाम : Mesua Ferrea) एक सीधा सदाबहार पेड़ जो देखने में बहुत सुंदर होता है। यह द्विदल अंगुर से उत्पन्न होता है । पत्तियाँ इसकी बहुत पतली और घनी होती हैं, जिससे इसके नीचे बहुत अच्छी छाया रहती है । इसमें चार दलों के बडे़ और सफेद फूल गरमियों में लगते हैं जिनमें बहुत अच्छी महक होती है । लकड़ी इसकी इतनी कडी और मजबूत होती है कि काटनेवाले की कुल्हाडियों की धारें मुड मुड जाती है; इसी से इसे 'वज्रकाठ' भी कहत हैं । फलों में दो या तीन बीज निकलते हैं । हिमालय के पूरबी भाग, पूरबी बंगाल, आसाम, बरमा, दक्षिण भारत, सिहल आदि में इसके पेड बहुतायत से मिलते हैं ।
नागकेसर के सूखे फूल औषध, मसाले और रंग बनाने के काम में आते हैं । इनके रंग से प्रायः रेशम रँगा जाता है । श्री लंका में बीजों से गाढा, पीला तेल निकालते हैं, जो दीया जलाने और दवा के काम में आता है । तमिलनाडु में इस तेल को वातरोग में भी मलते हैं । इसकी लकड़ी से अनेक प्रकार के सामान बनते हैं । लकड़ी ऐसी अच्छी होती है कि केवल हाथ से रँगने से ही उसमें वारनिश]] की सी चमक आ जाती है । बैद्यक में नागकेसर कसेली, गरम, रुखी, हलकी तथा ज्वर, खुजली, दुर्गंध, कोढ, विष, प्यास, मतली और पसीने को दूर करनेवाली मानी जाती है । खूनी बवासीर में भी वैद्य लोग इसे देते हैं । इसे 'नागचंपा' भी कहते हैं ।