धरमपाल

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धरमपाल भारत के एक महान गांधीवादी विचारक, इतिहासकार एवं दार्शनिक थे।

धरमपाल (1922-2006) का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुआ था। भारत से लेकर ब्रिटेन तक लगभग 30 साल उन्होंने इस बात की खोज में लगाये कि अंग्रेजों से पहले भारत कैसा था। इसी कड़ी में उनके द्वारा जुटाये गये तथ्यों, दस्तावेजों से भारत के बारे में जो पता चलता है वह हमारे मन पर अंकित तस्वीर के उलट है।

स्वर्गीय श्री धरमपाल जी हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई के समय के एक ऐसे नायक थे जिनके बार में शायद ही कुछ लिखा गया हो। वे एक गांधीवादी थे, एक अच्छे विचारक, इतिहासकार और लेखक थे और उन्होंने हिन्दुस्तान में विज्ञान के इतिहास, पुराने समाज और लोगों के बारे में काफी लिखा। उन्होंने कई सारे दस्तावेज़ जमा करके किताबें लिखीं जिनमें उन्होंने दिखलाया कि पुराने हिन्दुस्तान के लोग विज्ञान जानते थे और उन्होंने कई सारे ऐसे तरीकों को ईजाद किया था जिनके बारे में हमको पता भी नहीं है। कैसे हिंद्स्तान की कुछ अच्छी विरासतों को ब्रितानी शासकों द्वारा तरीके से ख़त्म किया गया जिससे कि आम आदमी का अपने आप से और अपनी विरासत से यकीन उठ जाए।

कृतियाँ[संपादित करें]

उनके द्वारा रचित प्रमुख पुस्तकें हैं-

  • साइंस एण्ड टेक्नालॉजी इन एट्टींथ सेंचुरी
  • द ब्यूटीफुल ट्री
  • भारतीय चित्त मानस और काल
  • भारत का स्वधर्म
  • सिविल डिसआबिडिएन्स एण्ड इंडियन ट्रेडिशन
  • डिस्पाइलेशन एण्ड डिफेमिंग आफ इंडिया.

द ब्युटिफुल ट्री[संपादित करें]

गाँधीजी भारतीय शिक्षा को 'द ब्यूटीफुल ट्री' (The beautiful tree) कहा करते थे। इसके पीछे कारण यह था कि गाँधी ने भारत की शिक्षा के बारे में जो कुछ पढ़ा था, उससे पाया था कि भारत में शिक्षा सरकारों के बजाय समाज के अधीन थी।

गाँधी के वाक्य 'द ब्यूटीफुल ट्री' को जस का तस लेकर डॉ॰ धर्मपाल ने अपना शोध शुरू किया और अँगरेजों और उससे पूर्व के समस्त दस्तावेज खंगाले। जो कुछ भारत में मिला उन्हें संग्रहालयों और ग्रंथालयों से लिया और जो जानकारी भारत से बाहर ईस्ट इंडिया कंपनी और यहाँ तक कि सर टामस रो से लेकर अँगरेजों के भारत छोड़ने तक की, इंग्लैंड में उपलब्ध थी, उसे वहाँ जाकर खोजा। डॉ॰ धर्मपाल ने शिक्षा में ठीक वैसा ही काम किया जैसाकि एक समय डॉ॰ सुंदरलाल ने 'भारत में अँगरेजी राज' को लेकर इतिहास में किया था और स्वयं अँगरेजों और विदेशी इतिहासकारों के साक्ष्य और प्रमाणों से साबित किया था कि ब्रिटिश शासन ने किस प्रकार भारत का सांस्कृतिक अपहरण किया और यहाँ की स्वदेशी व्यवस्था को भंग कर अपना शासन स्थापित कर भारत को करीब पौने दो शताब्दी तक लूटा।

धर्मपालजी ने अँगरेजकालीन घटनाओं का जो ऐतिहासिक अन्वेषण कर यह साबित किया कि जिस प्रकार उन लोगों ने न केवल हमारे अर्थशास्त्र और कुटीर उद्योग को समाप्त कर हमारे पूरे अर्थतंत्र को डस लिया, बल्कि भारत का सांस्कृतिक, साहित्यिक, नैतिक और आध्यात्मिक विखंडन भी किया जिससे भारत अपना भारतपन ही भूल गया और अँगरेजी शिक्षा से आच्छन्न यहाँ के कुछ बड़े घरानों के लोग भारत भाग्य विधाता बन गए।

धर्मपाल इस पुस्तक में लिखते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 1822 से 1826 तक भारत में शिक्षा स्तर का सर्वेक्षण कराया था। सर्वेक्षण के फार्म में छ: कालम बनाये गये। एक कालम मुसलमानों का था और पांच कालम हिन्दुओं के थे। इस सर्वेक्षण का नाम था- कास्टवाइज सर्वे आफ एजूकेशन, किन्तु सर्वे किया गया वर्ण के आधार पर। पहला कालम ब्राह्मण, दूसरा क्षत्रिय, तीसरा वैश्य, चौथा शूद्र और पांचवा अदर कास्ट। धर्मपाल लिखते हैं कि "अदर कास्ट" ही आज की अनुसूचित जातियां हैं। इसका अर्थ है कि अनुसूचित या दलित व हरिजन वर्ग को 1826 के बाद ही शूद्र श्रेणी में धकेला गया और हिन्दू समाज ने मान लिया। हिन्दू नेतृत्व उस समय तक इतना दीन-हीन हो गया था कि उसने अंग्रेजों द्वारा फैलाये सभी भ्रमों को ब्राह्म वाक्य मानकर स्वीकार कर लिया।

बाह्य सूत्र[संपादित करें]