ताज़िया

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इस्‍लाम इक ऐसा धर्म है।अगर कोई भी व्‍य‍क्‍त‍ी सही नियमों से इस धर्म का पालन करें और मोहम्‍मद पैगम्‍बर की बातों को अपनी निजी जिन्‍दगी में उतार लें चाहे वो उन नियमों का अपनाने में थोडा. बहूत आलसी किस्‍म का है। लेकिन थोडा सा भी अम्‍ल करले तो उसकी जिन्‍दगी में अल्‍लाह की तरफ से कोई सिकायत नहीं रहती क्‍योंकि अल्‍लाह ये बात नहीं कहता कि तूम इस्‍लाम बनो ओर ना ही ये बात कहते हैं कि तूम मेरी इस सभा में रोज सामिल हो लेकिन उन्‍होनें तो इक मूस्‍लमान से तो बस थोडा सा ही वक्‍त मांगा है। वो भी जूम्‍में की दोपहर को । क्‍या हो जाता है की अगर कोई मूसलमान सप्‍ताह के इक दिन जूम्‍में के दिन में दोपहर को आराम न करें तो वो आदमी मर नहीं जाता और कोई कठिन कार्य के लिए भी नहीं कहा है। ना कि तूम मेरे लिए कोई ऐसा काम करों जिससें आपको काफी मेहनत भी करनी पडे् लेकिन हां मस्जिद में जाकर दोपहर केवल 30 मिनट ही नमाज पढ् ले तों वो और उसके अन्‍दर कोई भी किसी भी प्रकार का परिवर्तन भी तो नहीं होता । मेरी मानों तो दोस्‍तों इस्‍लाम को किसी भी प्रकार का खतरा है तो वो इक खुद किसी मूसलमान से है जो दिन में नमाज नहीं पढता अगर इस कोम को कोई खतरा है तो वो है इस्‍लाम व पैंगम्‍बर में बनाये नियमो का पालन न करनें वालो लोगों से ही हैा

गजेन्‍द्र सिंह पवांर

क्‍यों कि कहते हैं कि अल्‍लाह ने रोटी की व्‍यवस्‍था तो हमारे जन्‍म लेने से पहले ही कर दी फिर भी हम इस दूनियां में आकर रोटी के लिए ही भागतें फिरतें ही और पांच वक्‍त की नमाज नहीं पढ् सकते ा


मुहर्रम के मौके पर ताजिये सहित जुलूस

ताज़िया बाँस की कमाचिय़ों पर रंग-बिरंगे कागज, पन्नी आदि चिपका कर बनाया हुआ मकबरे के आकार का वह मंडप जो मुहर्रम के दिनों में मुसलमान/ शिआ लोग हजरत इमाम हुसेन की कब्र के प्रतीक रूप में बनाते है,और जिसके आगे बैठकर मातम करते और मासिये पढ़ते हैं। ग्यारहवें दिन जलूस के साथ ले जाकर इसे दफन किया जाता है। ताजिया हजरत इमाम हुस्सैन कि याद मे बनय जत है इस्लाम मे कुच्ह लोग इस कि आलोच्ह्न कर्ते है मगर ये तजियदारि बहुत शान् से होति है हिन्दु भै भि इस मे हिस्सा लेते है और तजिया बनते है इन्दिआ मे सब्से अच्च्हि तजियदारि जावरा मध्याप्रदेश मे होति है यहा ताजिये बास से नहि बन्ते है बल्कि शिशम और सग्वान कि लकरि से बन्ते है जिस पर कान्च और माइका का काम होता है जावरा मे ३०० से ज्यादा (१२ फिट)ताजिया बन्ते है


मुहावरा

ताजिया ठंढा करना-मुहर्रम के आरंभिक दस दिन समाप्त हो जाने पर नियत स्थान पर ताजिया Dafnana ।