तरंग-कण द्वैतता

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तरंग-कण द्वैतता अथवा तरंग-कण द्विरूप सिद्धान्त के अनुसार सभी पदार्थों में कण और तरंग (लहर) दोनों के ही लक्षण होते हैं। आधुनिक भौतिकी के क्वाण्टम यान्त्रिकी क्षेत्र का यह एक आधारभूत सिद्धान्त है। जिस स्तर पर मनुष्यों की इन्द्रियाँ दुनिया को भाँपती हैं, उस स्तर पर कोई भी वस्तु या तो कण होती है या तरंग होती है, लेकिन एक साथ दोनों नहीं होते। परमाणुओं के बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर ऐसा नहीं होता, और यहाँ भौतिकी समझने के लिए पाया गया कि वस्तुएँ और प्रकाश कभी तो कण की प्रकृति दिखाती हैं और कभी तरंग की।

इस समय स्थिति बड़ी विलक्षण है। कुछ घटनाओं से तो प्रकाश तरंगमय प्रतीत होता है और कुछ से कणिकामय। संभवत: सत्य द्वैतमय है। रूपए के दोनों पृष्ठों की तरह, प्रकाश के भी दो विभिन्न रूप हैं। किंतु हैं दोनों ही सत्य। ऐसा ही द्वैत द्रव्य के संबंध में भी पाया गया है। वह भी कभी तरंगमय दिखाई देता है और कभी कणिकामय। न तो प्रकाश के ओर न द्रव्य के दोनों रूप एक ही समय में एक ही साथ दिखाई दे सकते हैं। वे परस्पर विरोधी, किंतु पूरक रूप हैं।

तरंग और कण के दृष्टिकोणों का इतिहास[संपादित करें]

यदि प्रकाश तरंग होता तो उष्मागतिकी के नज़रिए से कृष्णिका को छोटी तरंगदैर्ध्यों (वैवलॅन्थों) पर अनंत उर्जा छोड़नी चाहिए, पर ऐसा नहीं है - प्लांक के कणों वाले गणित का उत्तर ठीक निकलता है (काली लक़ीर तरंगों पर आधारित ग़लत भविष्यवाणी दिखाती है और अन्य लक़ीरें भिन्न तापमानों पर कणों पर आधारित सही नतीजा दिखतीं हैं

प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने प्रकाश की प्रकृति के बारे में अपनी सोच प्रस्तुत की थी कि प्रकाश हवा में एक तरंग-नुमा उत्तेजना है (जिस तरह पानी में पत्थर फेंकने से पानी में उत्तेजना से तरंगे बनकर फैलने लगती हैं)। दुसरे यूनानी चिन्तक डमोक्रिटस ने इससे विपरीत नज़रईया लेते हुए कहा के ब्रह्माण्ड में हर चीज़ कणों कि बनी है, और यही बात प्रकाश पर भी लाघू होती है।[1] यह मतभेद उन्नीसवी सदी तक चलता रहा। तरंगों की एक एक विशेषता है के जब दो या उस से अधिक शुद्ध तरंगे टकराती हैं तो एक विवर्तन का पैटर्न या चित्र बना लेती हैं। ठीक यही प्रकाश की सशक्त ("कोहीरंट") किरणों के साथ देखा गया। हालांकि सर आइज़क न्यूटन प्रकाश को कणों से बना हुआ मानते थे और उन्होंने अपने दृष्टिकोण अपनाए जाने के लिए भरसक प्रयास किया, धीरे-धीरे ज़्यादातर वैज्ञानिक मानने लगे की प्रकाश की मूल प्रकृति तरंगे ही हैं। उन्नीसवी सदी में स्कॉटलैण्ड के वैज्ञानिक जेम्स क्लर्क माक्सवेल ने चार समीकरण खोज निकाले जो तरंगों पर आधारित थे और जो प्रकाश की प्रकृति को पूरी तरह उजागर करते थे।[2] इसके बाद लगने लगा के प्रकाश वास्तव में विद्युतचुंबकीय तरंग ही है। इसके विपरीत, जो परमाणुओं पर अनुसंधान हो रहा था, उस से लगने लगा के परमाणु और उसके छोटे अंश (जैसे इलेक्ट्रॉन) कण ही हैं। परमाणु भार जैसी अवधारणाएँ जैसे-जैसे सामने आई वैसे-वैसे लगने लगा के वास्तव में परमाणु एक कण है जिसके अन्दर स्वयं अन्य छोटे-छोटे कण ही हैं।

उन्नीसवी शताब्दी में बदलाव[संपादित करें]

उन्नीसवी सदी में कई वैज्ञानिक कृष्णिका (ब्लैक बॉडी) से उत्पन्न होने वाली विद्युतचुंबकीय विकिरण (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन) का अध्ययन कर रहे थे, और आरम्भ में इसका गणित में सही प्रतिरूप (मॉडल) बनाने में असफल होते रहे। ध्वनी और अन्य तरंगों में देखा जाता है के जब भी किसी वस्तु में तरंगे बनती हैं तो उन तरंगों की तरंगदैर्ध्य (वैवलॅन्थ) उस वस्तु में मौजूद खुले स्थान पर निर्भर करती है जहाँ उन तरंगों को बनाने का अवसर मिलता है। संगीत में प्रयोग होने वाली बांसुरी से जो ध्वनियाँ निकलती हैं उनका तरंगदैर्ध्य बांसुरी के मुख (जहाँ से हवा फूंकी जाती है) से लेकर पहले खुले छेद (जिसे ऊँगली से न ढका गया हो) की लम्बाई के बराबर या फिर उस का हत (फैक्टोरीअल, जैसे की आधा, एक-तिहाई, एक-चौथाई, वग़ैराह) होती है। उष्मागतिकी (थर्मोडाएनैमिक्स) का एक सिद्धांत है कि जो वस्तु उष्मीय संतुलन में हो (यानि उसमें जितनी उर्जा आ रही है उतनी ही जा रही है), उसमें हर संभव उर्जा धारण करने के तरीके में सामान स्तर की उर्जा होनी चाहिए। इस अध्ययन में काले पदार्थ को उष्मीय संतुलन में लिया गया और, क्योंकि उसके अनंत हत निकलते थे, तो लगा के उर्जा भी अनंत तरंगदैर्ध्यों में दिखनी चाहिए और अनंत होनी चाहिए। लेकिन देखा गया की काले पदार्थ से निकलती विद्युतचुंबकीय उर्जा में ऐसा कुछ नहीं था।

१९०० में जर्मन वैज्ञानिक मैक्स प्लांक ने इस दुविधा का तोड़ निकला। उन्होंने कहा के जब विद्युतचुंबकीय उर्जा काले पदार्थ के किसी अणु पर पड़ती है तो वह उसे सोख लेता हैं और एक उत्तेजित स्थिति में आ जाता है। जब वह पर्याप्त उर्जा पा लेता है तो उस उर्जा को एक विद्युतचुंबकीय किरण के रूप में प्रसारित करके वापस अपनी विश्राम की स्थिति में आ जाता है। उन्होंने परमाणु द्वारा प्रसारित उर्जा को गणित में E=hv लिखा, जिसमें E उर्जा है, v आवृत्ति (फ़्रीक्वॅन्सी) है और h एक नियतांक (कॉन्सटॅन्ट) है। उनके कहने का मतलब था के काले पदार्थ की उर्जा का स्रोत उष्मीय संतुलन में स्थित काले पदार्थ के अन्दर का खुला स्थान नहीं बल्कि काले पदार्थ के अणु हैं जो उत्तेजना और विश्राम की स्थितियों में आते-जाते पहले तो उर्जा सोखते हैं और फिर उसे छोड़ते हैं। बड़ी आवृत्ति (v) की किरण के लिए अधिक उर्जा चाहिए और वह तभी छोरी जाएगी जब उसके बराबर की उर्जा सोख ली जाए। प्लांक का तरीका लगाकर जब काले पदार्थ से उमड़ने वाली विद्युतचुंबकीय उर्जा को देखा गया, तो उन्हें बिलकुल ठीक पाया गया। इस से तहलका मच गया, क्योंकि यह बात तुरंत ज़ाहिर हो गयी के जो उत्तेजित अणुओं द्वारा विद्युतचुंबकीय उर्जा छोड़ी जा रही है उन्हें किरानंश (यानि कणों) के रूप में भी देखा जा सकता है। अभी तक प्रकाश को तरंग माना जाता था। उसमें कणों की प्रवृति देखकर असमंजस पैदा हुआ क्योंकि इसका अर्थ यह बना के प्रकाश कभी कण और कभी तरंग होता है। यह द्विरूप प्लांक स्वयं मानने को तैयार नहीं थे और उन्होंने कहा कि हालांकि उनका सिद्धांत ठीक बैठता है, लेकिन उनकी गणित में कुछ गड़बड़ है।[3] आने वाले दशकों ने दिखला दिया के कोई ऐसी गड़बड़ नहीं थी। प्रकाश वास्तव में तरंग-कण का द्विरूप रखता है।

प्रकाश विद्युत प्रभाव[संपादित करें]

प्रकाश विद्युत प्रभाव में प्रकाश के फ़ोटोन पड़ने पर धातु से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं

बहुत से वैज्ञानिक प्लांक से सहमत थे, के प्रकाश केवल तरंग ही है, और वे प्रयास करने लगे की कोई नया तरीक़ा मिले जिस से यह साबित हो सके। अल्बर्ट आइंस्टीन ने इस से बिलकुल विपरीत काम किया। उन्होंने स्वीकार लिया के प्रकाश में कणों की भी प्रवृति मौजूद है और इस सच्चाई से एक पुराना मसला हल करने का प्रयास किया। १८८७ में हाइनरिख़ हर्ट्ज़ नाम के एक जर्मन वैज्ञानिक ने मालूम किया था कि जब बहुत कम तरंगदैर्ध्य (वैवलॅन्थ) का प्रकाश कुछ धातुओं और अन्य पदार्थों पर पड़ता है तो बिजली का बहाव पैदा होता है।[4] १९०१ में निकोला टेस्ला ने दिखाया कि विद्युत् इसलिए पैदा हो रही है क्योंकि इस प्रकाश से अनायास ही धातु से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं। अगले ही साल, १९०२ में, फिलिप लेनार्ड ने पाया कि प्रकाश अगर बड़े तरंगदैर्ध्य का हो तो ऐसा नहीं होता, चाहे रोशनी कितनी ही अधिक क्यों न डाली जाए, जबकि छोटे तरंगदैर्ध्य वाले हलकी रोशनी में भी यह होता है। इसे प्रकाश विद्युत प्रभाव कहा जाने लगा और वैज्ञानिक कई वर्षों तक यह समझने में नाकाम रहे कि ऐसा क्यों होता है और कम तरंगदैर्ध्य वाले प्रकाश से ही क्यों होता है।

आइनस्टाइन ने प्लांक के सिद्धांत को लेकर यह गुत्थी सुलझा दी। उन्होंने कहा कि वास्तव में प्रकाश को उसके कणों के रूप में देखा जा सकता है। प्रकाश के हर कण में प्लांक कि बताई हुई उर्जा होती है, यानि E=hv। तरंगदैर्ध्य और आवृत्ति में उल्टा रिश्ता होता है - बड़े तरंगदैर्ध्य का मतलब है के प्रकाश के कणों में आवृत्ति (v) कम होगी और प्लांक नियम के अनुसार उर्जा भी कम होगी। कम तरंगदैर्ध्य का मतलब है के प्रकाश के कणों में आवृत्ति (v) अधिक होगी और प्लांक नियम के अनुसार उर्जा भी अधिक होगी। उन्होंने इस आधार पर कुछ भविष्यवाणियाँ करीं जो प्रयोगशाला में बिलकुल ठीक पाई गयीं। इसके लिए आइनस्टाइन को १९२१ में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। [5] मैक्स प्लांक को उस से भी पहले, १९१८ में, भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया।

आइनस्टाइन की खोज के बाद यह झुठलाना असंभव हो गया के प्रकाश में कण और तरंग दोनों की प्रवृतियाँ हैं। १९२५ के बाद प्रकाश के कणों को फ़ोटोन बुलाया जाने लगा और यह नाम अब प्रचलित हो चुका है।

द ब्रॉई[संपादित करें]

आइनस्टाइन की खोज और जीत के बाद, वैज्ञानिकों ने धीरे-धीरे प्रकाश के तरंग-कण द्विरूप को मानना शुरू कर दिया था, जब १९२४ में फ़्रांसिसी वैज्ञानिक लुई द ब्रॉई (जिन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में लोग अक्सर लुइ दि ब्रॉग्ली बुलाते हैं) ने भौतिकी की दुनिया में एक और सनसनी फैला दी। उन्होंने कहा के न सिर्फ़ प्रकाश, बल्कि सारे पदार्थ के भी तरंग-कण द्विरूप होते हैं और किसी भी गतिशील पदार्थ को तरंग या कण के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने अपने गणित से दिखाया के गतिशील कण का तरंगदैर्ध्य (वैवलॅन्थ, λ) उसके संवेग (मोमॅन्टम, p) पर निर्भर करता है -

\lambda = \frac{h}{p}

तीन साल बाद इलेक्ट्रॉनों के साथ प्रयोगों में बिलकुल यही पाया गया। यह परमाणुओं के अंश होते हैं और इन्हें हमेशा कण समझा जाता था, लेकिन जब इलेक्ट्रॉन किरण पूँज एक परदे पर फेंकी गयी तो बिलकुल सशक्त प्रकाश की तरह इन्हों ने भी तरंगों वाले विवर्तन (डिफ़्रैक्शन) के चित्र दिखा दिए। उनकी इस खोज के लिए द ब्रॉई को १९२९ में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया।

अनिश्चितता सिद्धान्त[संपादित करें]

१९२७ में जर्मन वैज्ञानिक वॅर्नर हाइज़ॅनबर्ग ने अपना अनिश्चितता सिद्धान्त प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने कहा के यह पूर्ण निश्चितता के साथ कभी नहीं कहा जा सकता के कोई वस्तु कहाँ स्थित है या उस की गति क्या है। उन्होंने स्पष्ट किया की यह किसी मापदण्ड में कमी की वजह से नहीं है, बल्कि प्रकृति में ही ऐसा नियम है। जिस तरह से किसी तरंग के बारे में यह ठीक से नहीं कहा जा सकता के वह कहाँ स्थित है उसी तरह से वस्तुओं के बारे में भी यह नहीं कहा जा सकता। जितनी छोटी वस्तु होगी उसके अकार के हिसाब से उतनी ही अनिश्चितता अधिक होगी। उन्होंने गणित में इसे ऐसे लिखा -

\Delta x \Delta p \ge \frac{\hbar}{2}

जहाँ

\Delta मानक विचलन (स्टैन्डर्ड डीवीएशन) है, जिसे अनिश्चितता का एक माप समझा जा सकता है
x यह दर्शाता है के कण कहाँ स्थित है और p उसका संवेग (मोमॅन्टम) है
\hbar प्लांक के नियतांक को 2\pi से बांटकर मिला हुआ नियन्तक है

यह अनिश्चितता सिद्धान्त जल्दी ही क्वाण्टम यान्त्रिकी की नीव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया और इसमें भी पदार्थों के तरंग-कण द्विरूप की पहचान निहित है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. प्रकाश: कण या तरंग? (अंग्रेज़ी में), नैथनिअल पेज स्टाईट्स, विज़नलर्निंग, भाग PHY-१ (३), सन् २००५
  2. "इलेक्ट्रोमैग्नेटिस्म, मैक्सवेल की समकरण और माइक्रोवेव (अंग्रेज़ी में)". IEEE Virtual Museum. २००८. http://www.ieee-virtual-museum.org/exhibit/exhibit.php?id=159265&lid=1&seq=3. अभिगमन तिथि: 2008-06-02. 
  3. मैक्स प्लांक: एक हिचकिचाता क्रांतिकारी (मैक्स प्लांक: द रिलक्टन्ट रॅवोल्युश्नरी, अंग्रेज़ी में), हॅल्गा क्राग, पत्रिका: फिज़िक्स वर्ल्ड, दिसंबर २०००
  4. विश्विद्यालय भौतिकी (यूनिवर्सिटी फिज़िक्स, अंग्रेज़ी में), फ्रैंसिस डब्ल्यू॰ सीअर्ज़, मार्क डब्ल्यू॰ ज़ॅमैन्स्की, ह्यू डी॰ यन्ग, छठा संस्करण, ऐड्डीसन वॅसली, १९८३, पृष्ठ ८४३-४, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ संख्यांक ०-२०१-०७१९५-९
  5. भौतिकी का नोबेल पुरस्कार १९२१