झाँसी

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झाँसी
—  नगर  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला झाँसी
जनसंख्या
घनत्व
17 लाख (2001 के अनुसार )
• 348 /किमी2 (901 /वर्ग मील)
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)
5,024 कि.मी²
• 285 मीटर (935 फी॰)
आधिकारिक जालस्थल: jhansi.nic.in

Erioll world.svgनिर्देशांक: 25°19′N 78°18′E / 25.32°N 78.30°E / 25.32; 78.30

झाँसी भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर है। यह शहर उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है और बुंदेलखंड क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। झाँसी एक प्रमुख रेल एवं सड़क केन्द्र है और झाँसी जिले का प्रशासनिक केन्द्र भी है। झाँसी शहर पत्थर निर्मित किले के चारों तरफ़ फ़ैला हुआ है, यह किला शहर के मध्य स्थित बँगरा नामक पहाड़ी पर निर्मित है।

उत्तर प्रदेश में 20.7 वर्ग कि मी. के क्षेत्र में फैला झाँसी पर प्रारंभ में चन्देल राजाओं का नियंत्रण था। उस समय इसे बलवंत नगर के नाम से जाना जाता था । झाँसी का महत्व सत्रहवीं शताब्दी में ओरछा के राजा बीर सिंह देव के शासनकाल में बढ़ा। इस दौरान राजा बीर सिंह और उनके उत्तराधिकारियों ने झाँसी में अनेक ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण करवाया।

परिचय[संपादित करें]

बुन्देलों हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी

सुभद्राकुमारी चौहान की ये पंक्तियों बुन्देलखंड का गढ़ माने वाले झांसी के संघर्षशील इतिहास को सटीक परिभाषित करती हैं। 1857 में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने के स्थान पर उनके विरूद्ध संघर्ष करना उचित समा। वे अंग्रेजों से वीरतापूर्वक लड़ी और अन्त में वीरगति को प्राप्त हुईं। झांसी नगर के घर-घर में रानी लक्ष्मीबाई की वीरता के किस्से सुनाए जाते हैं।

इतिहास[संपादित करें]

९ वी शताब्दी मै, झॉसी का राज्य खजुराहो के राजपूत चन्देल वंश के राजाओं के अन्तर्गत आया। कृत्रिम जलाशय एवं पहाडी क्षेत्र के वास्तुशिल्पिय खन्डहर शायद इसी काल के है। चन्देल वंश के बाद उन्के सेवक खन्गार ने इस क्षेत्र का कार्यभार्र सम्भाला। समीप स्थित "करार" का किला इसी वन्श के राजाओं ने बनवाया था।

१४ वी शताब्दि के निकट् बुन्देला विन्ध्याच्ल् छेत्र् से नीचे मैदानी छेत्र् मे आना प्रारम्भ् किया और धीरे - धीरे सारे मैदानी छेत्र् मै फ़ैल गये जिसे आज् बुन्देलखन्ड के नाम् से जाना जाता है। झॉसीकिले का निर्माण ओर्छा के राजा बीर सिह देव द्वारा कर्वाया गया था। किव्दन्ति है कि ओर्छा के राजा बीर सिह देव नेदूर् से पहाड़ि पर छाया देखी जिसे बुन्देली भाषा मे "झॉई सी" बोला गया, इसी शब्द् के अप्भ्रन्श् से शहर् का नाम् पडा।

१७ वी शताब्दि मै मुगल् कालीन् साम्राज्य के राजाऔ के बुन्देला छेत्र् मे लगातार् आक्र्मण् के कारण् बुन्देला राजा छ्त्रसाल् ने सन् १७३२ मे [[मराठा] साम्राज्य से मदद् मान्गी। मराठा मदद् के लिये आगे आये। सन् १७३४ मे राजा छ्त्रसाल् की म्रत्यु के बाद बुन्देला छेत्र् का एक तिहायी हिस्सा मराठो कोदे दिया गया। मराठो ने शहर् का विकास् किया और इस्के लिये ओरछा से लोगो को ला कर् बसाया गया।

सन् १८०६ मई मराठा शक्ति कमजोर् पड्ने के बाद ब्रितानी राज और मराठा के बीच् समझोता हुआ जिसमे मराठो ने ब्रितानी साम्राज्य का प्रभुत्व स्वीकार् कर् लिया। सन् १८१७ मे मराठो ने पूने मे बुन्देल्खन्ड् छेत्र् के सारे अधिकार् ब्रितानी ईस्ट् ईडिया कम्पनी को दे दिये। सन् १८५७ मे झॉसी के राजा गन्गाधर् राव् की म्रत्यु हो गयी। तत्कालीन् गवेर्नल जनरल् ने झॉसी को पूरी तरह् से अपने अधिकार मे ले लिया। राजा गन्गाधर राव कि विधवा रानी लक्ष्मीबाई ने इसका विरोध किया और कहा कि राजा गन्गाधर राव् के दत्तक पुत्र को राज्य का उत्राधिकारी माना जाये, परन्तु ब्रितानी राज् ने मानने से इन्कार कर दिया। ईन्ही परिस्थितियों के चलते झॉसी मे सन् १८५७ का संग्राम हुआ। जो कि भारतीय स्वतन्त्र्ता संग्राम के लिये नीव् का पत्थर साबित् हुआ। जून् १८५७ मे १२वी पैदल् सेना के सैनिको ने झॉसी के किले पर कब्ज़ा कर लिया और किले मे मौजूद ब्रितानी अफ़सरो को मार दिया गया। ब्रितानी राज् से लडायी के दोरान् रानी लक्ष्मीबाईने स्वयम् सेना का सन्चालान् किया। नवम्बर १८५८ मे झॉसी को फ़िर से ब्रितानी राज् मे मिला लिया गया और झॉसी के अधिकार ग्वालियर के राजा को दे दिये गये। सन् १८८६ मे झॉसी को यूनाइटिड प्रोविन्स मे जोडा गया जोस्वतन्त्र्ता प्राप्ति के बाद १९५६मै उत्तर प्रदेश बना।

शिक्षा[संपादित करें]

झॉसी शहर बुन्देलखन्ड् क्षेत्र मे अध्यन् का एक प्रमुख् केन्द्र है। विध्यालय् एवं अध्यन् केन्द्र सरकार तथा निजी क्षेत्र द्वारा चलाये जाते है। बुन्देलखन्ड् विश्वविध्यालय जिसकी स्थापना सन् १९७५ मे की गयी थी, विज्ञान, कला एवं व्यवसायिक् शिक्षा की उपाधि देता है। झॉसी शहर और आसपास् के अधिकतर विध्यालय बुन्देलखन्ड् विश्वविध्यालय से सम्बद्ध् है। बुन्देलखन्ड् अभियान्त्रिकी एवं तकनिकी सन्स्थान् उत्तर प्रदेश् सरकार द्वारा स्थापित् तकनिकी सन्स्थान् है जो उत्तर प्रदेश् तकनिकी विश्वविध्यालय से सम्बद्ध् है। रानी लक्ष्मीबाईचिकित्सा सन्स्थान् चिकित्सा विज्ञान मे उपाधि प्रदान् करता है। झॉसी मे आयुर्वेदिक अध्यन् सन्स्थान् भी है जो कि प्राचीन् भारतीय चिकित्सा विज्ञान "आयुर्वेद" की शिक्षा देता है। उच्च शिक्षा के अलावा झॉसी मे अनेक प्राथमिक विध्यालय भी है। ये विध्यालय सरकार तथा निजी क्षेत्र द्वारा चलाये जाते है। विध्यालयो मे शिक्षा का माध्यम हिन्दी एवं अन्ग्रेज़ी भाषा है। विध्यालय उत्तर प्रदेश् माध्यमिक शिक्षा परिषद, केन्द्रिय माध्यमिक शिक्षा परिषद एवं से सम्बद्ध है। झॉसी का पुरुष् साक्षरता अनुपात ८०% महिला साक्षरता अनुपात ५१% है, तथा कुल् साक्षरता अनुपात ६६% है।

प्रमुख शिक्षा संस्थान[संपादित करें]

  • Bhani Devi Goyal Saraswati Vidhya Mandir, Jhansi
  • पं.. दीनदयाल उपाध्याय विद्यापीठ बालाजी मार्ग, झांसी।
  • रघुराज सिन्ह पब्लिक स्कूल, पठोरिया, दतिया गेट
  • मारग्रेट लीस्क मेमोरिअल इन्ग्लिश स्कूल एन्ड कॉलेज
  • राजकीय इण्टर कॉलेज
  • बिपिन बिहारी इंटर कॉलेज
  • क्राइस्ट दि किंग कॉलेज
  • लक्ष्मी व्यायाम मंदिर
  • आर्य कन्या इंटर कॉलेज
  • सैंट फ्रांसिस कान्वेंट
  • कैथेड्रल स्कूल
  • रानी लक्ष्मीबाई पब्लिक स्कूल
  • ज्ञान स्थली पब्लिक स्कूल
  • हेलेन मेगडोनियल मेमोरियल कन्या इन्टर‍ कोलेज
  • लोक मान्य तिलक कन्या इन्टर कोलेज
  • राज्य विद्युत परिषद इंटर कॉलेज।

अभियांत्रिकी संस्थान[संपादित करें]

पयर्टन्[संपादित करें]

दर्शनिय स्थल्[संपादित करें]

केथोलिक चर्च

झांसी किला[संपादित करें]

झांसी का किला उत्तर प्रदेश ही नहीं भारत के सबसे बेहतरीन किलों में एक है। ओरछा के राजा बीर सिंह देव ने यह किला 1613 ई. में बनवाया था। किला बंगरा नामक पहाड़ी पर बना है। किले में प्रवेश के लिए दस दरवाजे हैं। इन दरवाजों को खन्देरो, दतिया, उन्नाव, झरना, लक्ष्मी, सागर, ओरछा, सैनवर और चांद दरवाजों के नाम से जाना जाता है। किले में रानी झांसी गार्डन, शिव मंदिर और गुलाम गौस खान, मोती बाई व खुदा बक्श की मजार देखी जा सकती है। यह किला प्राचीन वैभव और पराक्रम का जीता जागता दस्तावेज है।

रानी महल[संपादित करें]

रानी लक्ष्मीबाई के इस महल की दीवारों और छतों को अनेक रंगों और चित्रकारियों से सजाया गया है। वर्तमान में किले को संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। यहां नौवीं से बारहवीं शताब्दी की प्राचीन मूर्तियों का विस्तृत संग्रह देखा जा सकता है। महल की देखरख भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की जाती है।

झांसी संग्रहालय[संपादित करें]

झांसी किले में स्थित यह संग्रहालय इतिहास में रूचि रखने वाले पर्यटकों का मनपसंद स्थान है। यह संग्रहालय केवल झांसी की ऐतिहासिक धरोहर को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड की झलक प्रस्तुत करता है। यहां चन्देल शासकों के जीवन से संबंधित अनेक जानकारियां हासिल की जा सकती हैं। चन्देल काल के अनेक हथियारों, मूर्तियों, वस्त्रों और तस्वीरों को यहां देखा जा सकता है।

महालक्ष्मी मंदिर[संपादित करें]

झाँसी के राजपरिवार के सदस्य पहले श्री गणेश मंदिर जाते थे जहा पर रानी मणिकर्णिका और श्रीमंत गंगाधर राव नेवालकर की शादी हुई फिर इस महालक्ष्मी मंदिर जाते थे । 18 वीं शताब्दी में बना यह भव्य मंदिर देवी महालक्ष्मी को समर्पित है। यह मंदिर लक्ष्मी दरवाजे के निकट स्थित है।यह देवी आज भी झाँसी के लोगो की कुलदेवी है क्योंकि आदी अनादि काल से यह प्रथा रही है कि जो राज परिवार के कुलदेवी और कुलदैवत होते है वही उस नगरवासियों के कुलदैवत होते है तो झाँसी वालो के मुख्य अराध्य देव गणेशजी और आराध्य देवी महालक्ष्मी देवी है । झाँसी के राजपरिवार के ये कुल दैवत है । झाँसी में नवरात्रि में होने वाले विसर्जनो का आज भी यह मंदिर गवाह बनता है ।

गंगाधर राव की छतरी[संपादित करें]

लक्ष्मी ताल में महाराजा गंगाधर राव की समाधि स्थित है। 1853 में उनकी मृत्यु के बाद महारानी लक्ष्मीबाई ने यहां उनकी याद में यह स्मारक बनवाया।

गणेश मंदिर[संपादित करें]

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Ganesh temple .

भगवान गणेश को समर्पित इस मंदिर में महाराज गंगाधर राव और वीरांगना लक्ष्मीबाई का विवाह हुआ था। यह भगवान गणेश का प्राचीन मंदिर है।

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जहा हर बुधवार को सैकड़ो भक्त दर्शन का लाभ लेते है। यहाँ पर प्रत्येक माह की गणेश चतुर्थी को प्रातः काल और सायं काल अभिषेक होता है। साधारणतः यहाँ सायं काल के अभिषेक मे बहुत भीड़ होती है। ऐसी मान्यता है की इस गणेश मूर्ति के इक्कीस दिन इक्कीस परिक्रमा लगाने से अप्रत्यक्ष लाभ होता है और मनोकामनाये पूर्ण होती है।

झांसी के नजदीकी पर्यटन स्थलों में ओरछा, बरूआ सागर, शिवपुरी, दतिया, ग्वालियर, खजुराहो, महोबा, टोड़ी फतेहपुर, आदि भी दर्शनीय स्थल हैं।

निकटतम दर्शनीय स्थल[संपादित करें]

  • सुकमा-डुकमा बाँध : बेतवा नदी पर बना हुआ यह अत्यन्त सुन्दर बाँध है। इस् बाँध कि झॉसी शहर से दूरि करीब् ४५ कि मी है तथा यह बबीना शहर के पास है।
  • देवगढ् : झॉसी शहर से १२३ कि मी दूर यह शहर ललितपुर के पास् है। यहां गुप्ता वंश के समय् के विश्नु एवं जैन मन्दिर देखे जा सकते हैं।
  • ओरछा : झॉसी शहर से १८ कि मी दूर यह स्थान् अत्यन्त् सुन्दर मन्दिरो, महलों एवं किलो के लिये जाना जाता है।
  • खजुराहो : झॉसी शहर से १७८ कि मी दूर यह स्थान् १० वी एवं १२ वी शताब्दि में चन्देला वंश के राजाऔ द्वारा बनवाये गये अपने श्रृंगारात्मक मन्दिरो के लिये प्रसिद्ध है।
  • दतिया : झॉसी शहर से २८ कि मी दूर यह राजा बीर सिह द्वारा बनवाये गये सात मन्जिला महल एवं श्री पीतम्बरा देवी के मन्दिर के लिये प्रसिद्ध है।
  • शिवपुरी : झॉसी से १०१ कि मी दूर यह शहर ग्वालियर के सिन्धिया राजाऔ की ग्रीष्म्कालीन राजधानी हुआ करता था। यह शहर सिन्धिया द्वारा बनवाये गये संगमरमर के स्मारक के लिये भी प्रसिद्ध है। यहां का माधव राष्ट्रिय उध्यान वन्य जीवन से परिपूर्ण है।

आवागमन[संपादित करें]

वायु मार्ग

झांसी से 100 किमी. की दूरी पर स्थित ग्वालियर निकटतम एयरपोर्ट है। यह एयरपोर्ट दिल्ली, मुम्बई, वाराणसी, बैंगलोर आदि शहरों से नियमित फ्लाइटों के माध्यम से जुड़ा हुआ है।

रेल मार्ग

झांसी का रलवे स्टेशन भारत के तमाम प्रमुख शहरों अनेकों रेलगाड़ियों से जुड़ा है।

सड़क मार्ग

झांसी में राष्ट्रीय राजमार्ग 25 और 26 से अनेक शहरों से पहुंचा जा सकता है। उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम की बसें झांसी पहुंचने के लिए अपनी सुविधा मुहैया कराती हैं।

झॉसी से संबद्ध कुछ् प्रतिष्ठित व्यक्तित्व[संपादित करें]

बाहरी कड़ियां[संपादित करें]