ज्योतिष और व्यवसाय

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प्रस्तुत लेख मे मैने व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को ज्योतिषीय सहायता से ज्योतिष के अनुएक नियमों से बताने का प्रयत्न किया है.इस प्रकरण में मैने ज्योतिष के विशेष नियम,जैसा कि धन का लग्नों से सम्बन्ध स्वक्षेत्रीय ग्रह और केतु के साथ मिलने से विशेष धन की आय,सुदर्शन पद्धति से आय के स्त्रोत,स्वामी द्र्ष्टि से धन आने के समय कारकाख्य योगों से धन का आने का समय,चन्द्रादि योगो से लाखो करोडो की आय,विपरीत राज योग से धन के महत्व पूर्ण स्त्रोत,पाराशरयीय पद्धति से धर्म और कर्म के मालिकों से दी जाने वाली समय पर आय,इन सब से जो भी ज्योतिष प्रेमी है,उनके लिये यह विषय बहुत ही जिज्ञासा युक्त समझा जायेगा,ऐसा मुझे विश्वास है.इसमे किस व्यवसाय से धन,धन कितना और कब,आदि विषयों को पढ कर आपको लगेगा कि यह कोई नई लाभदायक वस्तु आपको प्राप्त हुई है,इस लेख मे कोई कपोल कल्पित बात आपके सामने प्रस्तुत नही करने की कोशिश की गयी है,साथ ही धन मिलने की जगह,धन मिलने का समय,धन मिलने की मात्रा,व्यवसाय या काम धन्धों को चुनने का तरीका,सबसे अधिक महत्व पूर्ण विषय जो हमने लिखा है उसका विवरण आपको अपने ज्योतिषीय ज्ञान से यह पता करने मे मदद करेगा कि किस पद्धति आपको किस काम को जीवन के लिये चुनना चाहिये,जिससे वह हमारे लिये धन दायक सिद्ध हो,साथ ही यह पद्धति भी लिखने की कोशिश की गई है,कि कितना धन किस व्यवसाय से मिलेगा,इसका अनुमानित मूल्य भारतीय पधति से बाताने का हमने प्रयास किया है.

कुन्डली की वैज्ञानिक व्याख्या[संपादित करें]

जो कुन्डली हम किसी भी सोफ़्टवेयर से कम्प्यूटर पर देखते है,वह हमारे जन्म समय का आसमानी नक्शा होता है.जो ग्रह इस कुन्डली मे जिस स्थान पर विराजमान होता है,वही हाल पैदा होने वाले जातक का होता है.जब जातक जन्म लेता है,उस समय की प्रकृति किस प्रकार से अपने अन्दर गुण दोष आदि लेकर जन्म स्थान पर उपस्थित होती है,इसका पूरा विवेचन ग्रहों के अनुसार ही मिलता है.शरीर और ब्रहमाण्ड का एक रूप समझ कर ही कुन्डली की व्याख्या की जाती है,प्रकृति के गुण और दोष यद ब्रह्माण्डे तत्पिण्डे के अनुसार ही समझे जा सकते हैं.कुन्डली को कितने ही रूपों मे बनाया जाता है,उत्तरी भारत की बनाई जाने वाली कुन्डलियों मे लगन को ऊपर से तथा बायी तरफ़ के लिये गणना इसलिये की जाती है कि पृथ्वी की गति बायीं तरफ़ ही है,इसी लिये सूर्य हमे दाहिने तरफ़ को जाता हुआ महसूस होता है.दक्षिणी भारत की कुन्डली को दाहिनी तरफ़ गिना जाता है,इसका कारण वे लोग सूर्य को महत्वपूर्ण मानकर अपने को सूर्य के या चन्द्र के अथवा अन्य ग्रह के अनुसार ग्रह के साथ लेकर चलते है.पाश्चात्य कुन्डलियों मे भी उत्तरी भारत की तरह से पृथ्वी को ही रूप मानकर बायीं तरफ़ ही चलाया जाता है,मगर पहला घर उत्तरी भारत की कुन्डली के चौथे स्थान से और माता के पेट से ही गर्भ समय से गिना जाने के कारण,वह लगन को बायीं तरफ़ से ही मानते हैं.लगन का मतलब होता है जो राशि पूर्व मे उदय होती है,लगन कहा जाता है,सभी राशियां पूर्व दिशा से ही उदय होती है.प्रत्येक राशि का अलग नाम है,और जो बारह राशियां है,उनके नाम,मेष,वृष,मिथुन,कर्क,सिंह,कन्या,तुला,वृश्चिक,धनु,मकर,कुम्भ,मीन हैं,मगर इनके कुन्डली मे नाम न लिख कर केवल एक से लेकर बारह तक के नम्बर ही लिख देते हैं,जैसे मेष के लिये १,और वृष के लिये २,मिथुन के लिये ३,कर्क के लिये ४,सिंह के लिये ५ इसी प्रकार क्रम से सभी राशियों के नम्बर कुन्डली मे लिख देते है.जो राशी पूर्व मे जन्म के समय उदय होती है,उसी राशि का नम्बर लगन मे लिख देते है.इस प्रकार से मैने उत्तरभारतीय पद्धति से कुन्डली के प्रति समझाने के उद्देश्य से नम्बर को दाहिने से बायीं तरफ़ ले जाने का क्रम अंकित किया है.हमारे पूरवजों ने जो कुछ पहले से अनुसन्धान किया है,खोज की है,उसके अनुसार उनको ग्रहों के स्वरूप का ज्ञान था,सम्सार की कोई भी वस्तु हो,चाहे वह शरीर से अपना सम्बन्ध रखती हो,चाहे वह प्रकृति के पदार्थों से,मन से आत्मा से,बुद्धि से राज्य से,उसका कोई न कोई प्रतिनिधि कोई न कोई ग्रह जरूर होता है,जैसे सूर्य से विचार करने के लिये पिता,आत्मा,आंख,हड्डी,आत्मा,राज्य,दिल आदि का विचार किया जाता है,चन्द्र से माता,रक्त,मन,कामनायें,फ़ेफ़डे,आदि का विचार किया जाता है,मंगल से छोटा भाई,हिम्मत,रक्षा,चोरी,जुल्म,पाप,चोट,मांस आदि का विचार किया जाता है,खाल,सांस की नली,बुद्धि,अन्तडिया,लिखना,पढना प्राप्त की जाने वाली जानकारी से अपना वास्ता बुध ग्रह रखता है,इसी प्रकार से सभी ग्रहों का बोध और उनसे मिलने वाली आर्थिक सहायता का विचार किया जाता है.