जे.सी. कुमारप्पा

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गांधीवादी अर्थशास्त्री जेसी कुमारप्पा

जे सी कुमारप्पा (४ जनवरी १८९२ - ३० जनवरी १९६०) भारत के एक अर्थशास्त्री थे। उनका मूल नाम 'जोसेफ चेल्लादुरई कॉर्नेलिअस' (Joseph Chelladurai Cornelius) था। वे महात्मा गांधी के निकट सहयोगी रहे। वे ग्राम-विकास सम्बन्धी आर्थिक सिद्धान्तों के अग्रदूत थे। उन्होने गांधीवाद पर आधारित आर्थिक सिद्धान्तों का विकास किया।

जे सी कुमारप्पा को भारत में गाँधीवादी अर्थशास्त्र का प्रथम गुरु माना जाता है। अपने जीवनकाल में कुमारप्पा ने गाँधीवादी अर्थशास्त्र से जुड़े विषयों पर न केवल विशद लेखन किया बल्कि एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में भारत के दूरस्थ स्थानों में अनेक आर्थिक सर्वेक्षण करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कायाकल्प के लिए सार्थक कार्यनीति का प्रतिपादन भी किया। कुमारप्पा का अर्थशास्त्र स्वतंत्र भारत के हर व्यक्ति के लिए आर्थिक स्वायत्तता एवं सर्वांगीण विकास के अवसर देने के उसूल पर आधारित था। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इसके प्राकृतिक स्वरूप को उन्नत करने के हिमायती कुमारप्पा ऐसे बिरले अर्थशास्त्री थे जो पर्यावरण संरक्षण को औद्योगिक-वाणिज्यिक उन्नति से कहीं अधिक लाभप्रद मानते थे। गाँधी के आर्थिक दर्शन से कांग्रेस पार्टी में उनके अपने सहयोगी भी पूर्णतः सहमत नहीं थे। इसीलिए स्वतंत्र भारत की आर्थिक नीतियों और गाँधीवादी आर्थिक नीतियों के बीच कोई समानता नहीं रही। परिणास्वरूप स्वतंत्र भारत ने पाश्चात्य अर्थव्यस्था के नमूने के अंधानुकरण की होड़ में कुमारप्पा को जल्दी ही विस्मृत कर दिया।

जीवन परिचय[संपादित करें]

कुमारप्पा का जन्म तमिलनाडु के तंजावुर शहर में 4 जनवरी 1892 में एक ईसाई परिवार में हुआ था। बचपन का नाम जोसफ़ चेल्लादुरै कॉर्नेलियस था। उनका उन्होंने मद्रास से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद लंदन जाकर लेखा-विधि (एकाउंटेंसी) में प्रशिक्षण प्राप्त किया और फिर वहीं लंदन में एकाउंटेंट के रूप में कुछ वर्षों तक काम भी किया। प्रथम विश्व-युद्ध की समाप्ति पर और अपनी माता के बुलाने पर वे भारत लौटे और बम्बई में कुछ समय तक एक ब्रिटिश कम्पनी में काम करने के बाद 1924 में अपना व्यवसाय शुरू किया। 1927 में वे उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका गये और सायराक्रुज़ विश्वविद्यालय से वाणिज्य एवं व्यापार प्रबंधन में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने कोलम्बिया विश्वविद्यालय में सार्वजनिक वित्त का अध्ययन करके अपने समय के प्रख्यात अर्थशास्त्री एडविन सेलिग्मन के मार्गदर्शन में ‘सार्वजनिकवित्त एवं भारत की निर्धनता’ पर शोध पत्र लिखा जिसमें भारत की आर्थिक दुर्दशा में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों से हुए नुकसान का अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन के दौरान ही कुमारप्पा ने पाया कि भारत की दयनीय आर्थिक स्थिति का मुख्य कारण ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की अनैतिक और शोषक नीतियाँ हैं। इसी बीच उन्होंने अपने मूल पारिवारिक नाम कुमारप्पा को अपने नाम के साथ जोड़ने का फ़ैसला किया।

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों में भी अंग्रेज़ों द्वारा भारत के आर्थिक शोषण को लेकर बैचेनी थी। इस बेचैनी के केंद्र में था ब्रिटिश साम्राज्य पर चढ़ा वह सार्वजनिक ऋण जिसे वह भारत में शासन चलाने के नाम पर औपनिवेशक भारतीयों के मत्थे मढ़ना चाहती थी। कांग्रेस के 1922 के गया अधिवेशन और इसके बाद 1929 के लाहौर अधिवेशन में इस विषय पर चर्चा भी हुई थी। इसी बीच 1929 में अमेरिका से भारत लौटने के बाद कुमारप्पा भारतीय आर्थिक शोषण पर लिखे अपने लेख को प्रकाशित करने के संदर्भ में गाँधी से मिलने साबरमती आश्रम गये। गाँधी ने अपने पत्र यंग इण्डिया में इस लेख को प्रकाशित करने में रुचि भी दिखायी और कुमारप्पा से गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सर्वेक्षण करने का आग्रह किया। गाँधी के कहने पर कुमारप्पा गुजरात के खेड़ा जिले के मातर ताल्लुका में सर्वेक्षण करने गये। गुजरात का यह इलाका पिछले कई सालों से कम वर्षा के कारण भीषण जल संकट से गुज़र रहा था लेकिन इसके बावजूद राजस्व वसूली के लिए सरकारी अमला बेहद सख्ती दिखा रहा था। कुमारप्पा ने मातर ताल्लुका के 45 गाँवों के निवासियों का आर्थिक सर्वेक्षण करके लगान वसूली की दर और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के बीच जटिल संबंध को पहली बार सांख्यिकीय आँकड़ों के माध्यम से प्रदर्शित किया। इसी दौरान यंग इण्डिया में कुमारप्पा के लेख ‘सार्वजनिक वित्त और हमारी निर्धनता’ का सिलसिलेवार प्रकाशन भी शुरू हो गया। साथ ही मातर ताल्लुका के आर्थिक सर्वेक्षण का प्रकाशन भी हो रहा था। इन प्रकाशनों के बीच गाँधी ने नमक सत्याग्रह के लिए दांडी यात्रा भी शुरू कर दी। नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण जब ब्रिटिश प्रशासन ने गाँधी को गिरफ्तार कर लिया तो यंग इण्डिया के संचालन की ज़िम्मेदारी कुमारप्पा पर आ गयी। इस पत्र में लेखन के कारण कुमारप्पा को भी गिरफ्तार करके डेढ़ साल के लिए ज़ेल भेज दिया गया। 1931 में गाँधी-इरविन समझौते के बाद कुमारप्पा रिहा हुए और उन्हें लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में ब्रिटिश सरकार और भारत के बीच के वित्तीय लेन देन की समुचित पड़ताल करने के लिए गठित समिति का अध्यक्ष बनाया गया। इस कांग्रेस अधिवेशन के बाद गाँधी गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंग्लैण्ड चले गये। गाँधी की अनुपस्थिति में कुमारप्पा ने यंग इण्डिया के सम्पादन की ज़िम्मेदारी फिर से उठायी और उनके आक्रामक लेखन के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पुनः गिरफ्तार करके ढाई साल के लिए ज़ेल भेज दिया।

1933 में ज़ेल से छूटने के बाद कुमारप्पा ने बिहार में विनाशकारी भूकम्प के राहत-कार्य के पैसे के लेन-देन का काम देखा। अत्यंत ईमानदार व समर्पित स्वयंसेवक की तरह कुमारप्पा ने इस राहत कार्य में हाथ बँटाने आये गाँधी को भी उनके आने-जाने का ख़र्चा देने से इनकार कर दिया। गाँधी ने 1934 में वर्धा आश्रम में कुमारप्पा के नेतृत्व में अखिल भारतीय ग्राम उद्योग संघ की स्थापना की जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अनुकूल उत्पादों के निर्माण, संरक्षण एवं प्रसार का अभियान चलाया गया। कुमारप्पा भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूती में ग्रामीण आर्थिक स्थिति के योगदान को अच्छी तरह पहचानते थे और इसलिए उन्होंने इस ग्राम उद्योग संघ को कारगर बनाने में पूरा समय लगाया। अखिल भारतीय ग्राम उद्योग संघ में अपने इस अनुभव के आधार पर सन् 1936 में कुमारप्पा ने 'ग्राम आंदोलन क्यों?' शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की जो गाँवों की आर्थिक उन्नति पर केंद्रित गाँधीवादी अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के घोषणा पत्र के समान है। 1939-40 के दौरान कुमारप्पा ने मध्य प्रदेश और उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश में व्यापक आर्थिक सर्वेक्षण किये। 1942 में जब ब्रिटिश सरकार द्वितीय विश्वयुद्ध का अधिकतर ख़र्च भारत पर डालना चाहती थी तो कुमारप्पा ने इसके विरोध में एक लेख ‘स्टोन फ़ॉर ब्रेड’ लिखा और जिसके प्रकाशन के बाद उन्हें एक बार फिर ज़ेल भेज दिया गया। कुमारप्पा ने अपने इस ज़ेल-प्रवास का सदुपयोग करते हुए 'प्रैक्टिस ऐंड परसेप्ट्स ऑफ़ जीसस' एवं 'इकॉनॉमी ऑफ़ परमानेंस' शीर्षक से दो पुस्तकें लिखीं। पहली पुस्तक ईसा मसीह का अनुशीलन व ज्ञानबोध में ईसाइयत के सच्चे आदर्शों के बारे में विवेचना थी। निरंतरता का अर्थशास्त्र में पर्यावरण संरक्षण के साथ मानव के आर्थिक विकास की परिकल्पना का प्रतिपादन किया गया है। इस पुस्तक को कुमारप्पा की सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है।

30 जनवरी 1960 को कुमारप्पा का निधन हुआ। उनकी स्मृति में कुमारप्पा इंस्टीट्यूट ऑफ़ ग्राम स्वराज की स्थापना की गयी।

संदर्भ[संपादित करें]

  • मार्क लिंडली (2007), जे.सी. कुमारप्पा : महात्मा गाँधीज़ इकॉनॉमिस्ट, पॉपुलर प्रकाशन, मुम्बई.
  • बी. ज़करिया (1999), ‘इंटरपे्रटिंग गाँधी : जे.सी. कुमारप्पा, मॉडर्निटी ऐंड द ईस्ट’, टी. गुहाठाकुरता (सम्पा.), कल्चर ऐंड डेमॉक्रैसी : पेपर्स फ़्रॉम द कल्चरल स्टडीज़ वर्कशॉप, सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़, कलकत्ता.
  • जे.सी. कुमारप्पा (1945/1997), इकॉनॉमी ऑफ़ परमानेंस, सर्वसेव संघ प्रकाशन, वाराणसी.
  • जे.सी. कुमारप्पा (1949/1960), व्हाई द विलेज मूवमेंट : अ प्ली फ़ॉर अ विलेज सेंटर्ड इकॉनॉमिक ऑर्डर फ़ॉर इण्डिया, सर्वसेवा संघ, वर्धा.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]