जांगिड़
जांगिड समाज स्वयंमू ब्रह्मा
हमारा प्राचीन इतिहास स्वयंभू ब्रह्मा से प्रारम्भ होता है। वेद, शास्त्र तथा पुराणों के अनुसार ये ही प्रथम मानव थे जिन से समस्त मानव प्रजा का विस्तार हुआ। जिनका दूसरा नाम आपव प्रजापति भी था। सबसे पहिले इनके मुख से वेदवाणी निकली। स्वयंमू ब्रह्मा के मानस पुत्र
स्वयंभू ब्रह्मा अमैथुनी सृष्टि के प्रथम जीव थे। इनके पौत्र स्वयंभूव मनु से मनुऒं की परम्परा का प्रवतन हुआ। इसके अतिरिक्त स्वयंभू ब्रह्मा के सात मानस पुत्र हुये जिन्हें आदि युग के सप्तषि भी कहा जाता है। इनके नाम मरिचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क़तु तथा वशिष्ठ हैं। ये सभी वेदों के पूण थे। ये सातों प्रवृति माग प्रवतक वेदाचाय थे अथात् इन्होंने वेद धम का प्रचार करते हुये सृष्टि का विस्तार किया। वतमान हिन्दु जगत इन्ही सप्तषियों की सन्तान है इसलिये इन्हें सप्त ब्रह्मा भी कहा जाता है। इनकी स्मृति को सुरक्षित रखने के लिये ध्रव की निकटतम परिक्रमा करने वाले सात तारों का इन्हीं सप्त ऋषियों के नाम पर नामकरण किया गया। स्वयंभूव मनु
स्वयंभू बह्मा के पोत्र स्वयंभूव मनु हुये। ये ही प्रथम मन्वन्तर के प्रवतक हैं, इन्हैं वैराज प्रजापति भी कहा जाता है। इन्हीं की वंश परम्परा में आगे चलकर पांच ओर मनु हुये। छठे मनु (चाष मनु) के काल मे इतिहास प्रसिध्द जलप्रलय हुई। स्वयंभूव मनु की सन्तति
अधिकतम पुराणों के अनुसार स्वयंभूव मनु के शतरुपा से प्रियव्रत तथा उतानपाद दो पुत्र तथा आकृति एवं प्रसूती दो पुत्रियां हुई। प्रियव्रत समस्त पृथ्वी के प्रजापति थे, इनके सात पुत्र थे। उनमें पृथ्वी के सातों महाद्वीप बांट दिये। ज्येष्ठ पुत्र आग्नीध्र को जम्बुद्वीप (एशिया) का राज्य मिला। शेष पुत्रों को शेष महाद्वीपों के राज्य मिले। आग्नीध्र ने अपने पुत्रों में जम्बुद्वीप का राज्य विभक्त कर दिया। उसके अनुसार उन्होंने अपने पुत्र नाभि को हिमवष का राज्य दिया। नाभि के पुत्र ऋषभदेव तथा उनके पुत्र भरत हुये जिन के नाम पर हिमवष का नाम भारतवष पङा।
स्वयंभूव मनु के द्वितीय पुत्र उतानपाद की प्रथम पत्नी सुनीति से ध्रुव तथा द्वितीय पत्नी सुरिची से उतम हुये। सोतेली मां से तिरस्कृत ध्रुव ने घोर तपस्या कर अटल (ध्रुव) पद प्राप्त किया। उतरी दिशा के अटल निदेशक तारे को ध्रुव नाम दे उसकी तपस्या को चिरस्थायी कर दिया है। उतम य द्वारा मारा गया उसका पुत्र औतम मनु के नाम से तीसरा मनु हुआ।
...स्वयंभूव मनु की सन्तति...
स्वयंभूव मनु की पुत्री आकृति का विवाह रुचि प्रजापति से हुआ। इनके पुत्र य तथा पुत्री द णा संतान हुई। इनके पुत्र याम इस मन्वन्तर के देवता हुये।
द्वितीय पुत्री प्रसूती का विवाह प्रथम द प्रजापति से हुआ। उन से आठ पुत्रियां हुई जिनके विवाह स्वयंभूव ब्रह्मा के मानस पुत्रों से इस प्रकार हुये-
संभूती का विवाह महषि मरीचि से हुआ।
ख्याति का विवाह प्रथम भृगु ऋषि से हुआ।
प्रीति का विवाह पुल्स्य ऋषि से हुआ।
स्मृति का विवाह आदि अंगिरा से हुआ।
क्समा से पुलह ऋषि के कदम ऋषि हुये।
सन्नति से क्रतु का विवाह हुआ।
७वीं से वशिष्ठ का विवाह हुआ।
८वीं से अत्री का विवाह हुआ।
अंगिरा (जांगिड) की दिग्विजय
उल्मुक के कनिष्ठ भ्राता अभिमन्यु तथा पुत्र अंगिरा बहुत प्रतापी वीर थे। इन्होंने भारत से दूर सारी पृथ्वी को जीतने का निश्चय किया। अभिमन्यु ने ईरान को विजित कर मन्युपुरी बसाई जो जलप्रलय में नष्ट हुई पुनः उसी स्थान पर शुषा नगरी बसी। पुरातत्व विभाग ने इसे प्राचीनतम नगरी सिद्ध किया।
अंगिरा ने शाक द्विप, कौंच द्विप तथा कुरु द्विप अथात् युरोप एवं अफ्रीका महाद्विप को जीत कर अनेक नगर व त्र बसाये, टरकी का अंकारा, रुस का अंकारा प्रदेश, घाना का अंकारा तथा अंगोला प्रांत आदि पुरातन नाम उस अंगिरा की स्मृति को आज भी संजोये हुये हैं। इन प्रतापी वीर अंगिरा ने ही समस्त संसार को जीत कर राजराजेश्वर इन्द्र की पदवी धारण कर अत्याचारियों से प्रजा की रकसा की। अथर्ववेद काण्ड 19 सूक्त 34 व 35 में अनेक मन्त्रों में इस अंगिरा की खूब प्रशंसा की है।
इन्द्रस्य नाम गृह्न्त ऋषियो जांगिङं ददुः। देवा यं चक्रुभेषजमग्रे विष्कन्धदूषणम्।।
...अंगिरा (जांगिड) की दिग्विजय...
जब अंगिरा ने शाक द्विप, क्रौंच द्विप तथा कुश द्विप (अफ्रीका) जीत लिया था उसके पश्चात् इन्द्र की उपाधि स्वीकार करते हुये ऋषियों ने उस शत्रुनाशक जांगिङ को प्रजा के लिये दिया अथात् जांगिङ को इन्द्र के पद पर स्थापित किया जिसको आगे शत्रु की विविध सेनाओं का नाश करने वाला उपाय बताते हैं।
दुधष सेनानायक का कार्य करने के कारण ही इस प्रतापी वीर दिग्विजयी अंगरा ऋषि का नाम जांगिङ ऋषि पङा जांगिङ ऋषि की संतान ही जांगिङ ब्राह्मण कहलाये। अंगिराऽसि जांगिड़ इस का अर्थ है अंगिरा तू ही जांगिड़ है। वेद भी इसको प्रमाणित करता है। अथर्ववेद में स्पष्ट लिखा हैः- अंगिराअसि जांगिडः रक्षितासि जांगिड। द्वि पाच्चतुष्पादस्माकं सर्व रक्षतु जांगिडः इसका अर्थ है हे जांगिड़ तू ही अंगिरा है। तू जांगिड़ होकर ही प्राणिमात्र या प्रजा का रक्षक है। जांगिड़ ही हमारे दोपाये तथा चोपाये सब की रक्षा करे।
सृष्टि रचयिता विराट् विश्वकर्मा
अंगिरा वंश मे आदि शिल्पाचाय विश्वकमा हुये हैं। विश्वकमा नाम संस्कृत साहित्य में अनेक अथों में प्रयुक्त हुआ हैं। प्रथम अथ उस विराट् शक्ति का बोधक है जिसने सृष्टि की रचना की, द्वितीय अथ हैं अंगिरा वंश के भुवन का पुत्र विश्वकमा, जो शिल्प के प्रवतक हुये तथा तीसरा अथ है विश्वकमा उपाधि। विशिष्ट कायो में दक्स होने के कारण अनेक व्यक्तियों को विश्वकमा उपाधि प्रदान की गई। इसके अतिरिक्त आत्मा, वाणी, प्राण आदित्य, त्वष्टा तथा प्रजापति के अथ में भी विश्वकमा शब्द का प्रयोग हुआ है।