छत के ट्रस

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छत की ट्रस

छत की कैंचियाँ या 'छत की ट्र्स' (roof truss) छत को आलम्ब (सहारा/सपोर्ट) देने के उद्देश्य से लगाया जाने वाली संरचना है। ये लकड़ी, लोहा, इस्पात आदि के बने होते हैं। लकड़ी से निर्मित छत की ट्र्स का विकास मध्ययुग में हुआ।

परिचय[संपादित करें]

एक ढाल की छत बनाने के लिये छत का एक सिरा ऊँचा करना पड़ता है और उधर की दीवार ऊँची करने से ही काम चल जाता है। किंतु यदि ऊँचाई सीमित ही रखनी हो तो दोनों और ढाल देना अनिवार्य हो जाता है। ऐसी छतों के लिये कैंचियाँ लगाई जाती हैं। छोटे पाटों की कैंचियाँ लकड़ी की और बड़े पाटों की लोहे की, या लकड़ी और लोहे की मिली जुली, हुआ करती हैं। लकड़ी दबाव के अवयवों के लिये (for compressive elements) और लोहा तनाव के अवयवों के लिये (for tensile elements) विशेष उपयुक्त होता है। लोहे की कैंचियों में एक या अधिक ऐंगिल, टी, चैनेल या आई सेक्शन दबाव के अवयवों के लिये प्रयुक्त होते हैं। तनाव के अवयवों में इनके अतिरिक्त पत्ती या छड़ें भी लगाई जा सकती हैं। इन अवयवों का विस्तार आवश्यकता से कुछ बड़ा रखा जाता है, ताकि उनमें रिवेटों के लिये छेद करने की गुंजाइश रहे।

सन् १८१३ के लन्दन के कुछ छतों के ट्र्स के चित्र
छत को आलम्ब देने हेतु दो नरथंभा या नर छड़ कैंचियाँ (किंग पोस्ट ट्रस) आपस में जोड़कर लगाये गये हैं।
संकेत : 1: ridge board, 2: purlins, 3: common rafters.
यह द्वि-छत का एक उदाहरण है जिसमें मुख्य राफ्टर तथा आम राफ्टर लगे हैं।
मादा थंभा या मादा छड़ कैंची (क्वीन पोस्ट ट्रस)
संकेत : 1: Queen posts, 2: tie beam, 3: straining beam, 4: principal rafters.

कैंचियों की बनावट पाट के अनुसार ही होती है। इनके मुख्य अंग तीन हैं:

  • मुख्य कड़ियाँ, जिनपर पर्लिनें रखकर ऊपर छत डाली जाती है। प्राय: ये दबाव में रहती हैं।
  • मुख्य तान या निचली तान, जो मुख्य कड़ियों के नीचे के सिरों को बाहर की ओर फैलने से रोकती है। यह तनाव में रहती है।
  • मध्यवर्ती अवयव जो बनावट के अनुसार तनाव या दबाव में रहते हैं। इनकी संख्या पाट के अनुसार कम ज्यादा होती है।

यथासंभव भार जोड़ों के ऊपर ही आने दिया जाता है, ताकि अवयवों में सीधा दबाव या तनाव ही पड़े, आड़ा नहीं। यदि जोड़ों के बीच में भी भार आता है, तो आड़े प्रतिबल के लिये वे अवयव काफी मोटे रखने पड़ते हैं। कैंची का सबसे सादा उदाहरण युग्मित कड़ियाँ हैं। यदि पाट कुछ अधिक हो, तो इन कड़ियों के नीचेवाले सिरों की बाहर की ओर फैलने की प्रवृत्ति अधिक होती है। इससे दीवारों पर ठेल पहुँचती है। अत: नीचे के सिरे एक तान द्वारा बाँधने पड़ते हैं। यदि यह तान बिल्कुल नीचे न लगाकर कुछ ऊँचाई पर, कड़ियों के लगभग आधे पर, लगाई जाए, तो कॉलर कहलाती है। कॉलरवाली कैंची के नीचे कमरे की ऊँचाई कुछ अधिक मिल जाती है और लकड़ी की भी बचत होती है, किंतु मुख्य कड़ियों में नमन और दीवारों पर ठेल होने से इसके प्रयोग में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है।

तानयुक्त युग्मित कड़ियों में तान को बीच में एक नर थंभा द्वारा कैंची के शीर्ष से बाँध देने से तान को सहारा मिलता है और दोनों ओर दो तिरछी थामें लगाने से मुख्य कड़ियों को टेक मिलती है। इसप्रकार की कैंची को नर थंमा कैंची कहते हैं। यदि एक के बजाय दो थंभ हों तो उन्हें 'मादा थंभा कैंची' कहेंगे।

अधिक पाट वाले छत की कैंचियों के कुछ उदाहरण

अधिक पाट की कैंचियों में आवश्यकतानुसार अनेक थामें और तानें होती हैं। इनकी अनेक आकृतियाँ हैं, जो 'फिंक' कैंची, 'होव' कैंची, 'प्राट' कैंची, 'वारेन' कैंची आदि के नाम से विख्यात हैं। यदि कैंची की दोनो मुख्य कड़ियाँ असमान हों, एक ओर की ढाल बिल्कुल खड़ी हो, तो उसे आरीदंत कैंची कहते हैं। ऐसी कैचियाँ प्राय: कारखानों में, या बड़े बड़े शेडों में, लगती हैं और खड़ी ढाल की ओर शीशा या प्लास्टिक लगाया जाता है, ताकि अंदर प्रकाश पहुँच सके। यह खड़ी ढाल प्राय: उत्तर की ओर रखी जाती हैं, ताकि प्रकाश तो अंदर पहुँचे किंतु धूप न पहुँच सके (उत्तरी गोलार्ध में जहाँ पृथ्वी का अधिकांश स्थल है, सूर्य प्राय: शिरोबिंदु से दक्षिण की ओर ही रहता है)। इन कैंचियों को इसीलिये उतरी प्रकाश कैंची भी कहते हैं।

कैंची का सिद्धांत यह है कि फ्रेम यथासंभव त्रिभुजों में विभक्त हो जाए, क्योंकि त्रिभुज की भुजाओं की लंबाई में परिवर्तन न हो तो उसकी आकृति नहीं बदलती, जबकि चतुर्भुज या अधिक भुजाओंवाली आकृति, भुजाओं की लंबाई अपरिवर्तित रहने पर भी प्रतिबल से प्रभावित होकर अपने कोण और फलत: आकृति, बदल देती है, जैसे आयत समांतर चतुर्भुज बन सकता है और वर्ग समचतुर्भुज। जिस मादा-थंभा-कैंची में एक चतुर्भुज होता है, वह अपूर्ण कैंची है। इसी प्रकार युग्मित कड़ियाँ तथा कॉलरवाली कैंची भी अपूर्ण हैं।