चारसद्दा ज़िला

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ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा प्रांत में चारसद्दा ज़िला (लाल रंग में)
चारसद्दा का मशहूर चप्पल बाज़ार

चारसद्दा (उर्दू: چارسدہ, पश्तो: چارسدې, अंग्रेज़ी: Charsadda) पाकिस्तान के ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा प्रांत के मध्य भाग में स्थित एक ज़िला है। इस ज़िले की राजधानी चारसद्दा नाम का ही शहर है। यह ज़िला पहले पेशावर महानगर का हिस्सा हुआ करता था। माना जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन नगरी पुष्कलावती, जिसका रामायण में भी ज़िक्र आता है, इसी चारसद्दा ज़िले में स्थित थी।[1][2]

विवरण[संपादित करें]

कोहिस्तान ज़िले में सन् १९९८ में १०,२२,३६४ लोगों कि आबादी थी। इसका क्षेत्रफल क़रीब ९९६ वर्ग किमी है। यहाँ के ज़्यादातर लोग पश्तो बोलने वाले पश्तून हैं। इस ज़िले में दो तहसीलें हैं जिनमें ४६ संघीय काउन्सिलें आती हैं।

इतिहास[संपादित करें]

प्राचीनकाल में चारसद्दा गंधार राज्य का हिस्सा हुआ करता था। ५१६ ईसापूर्व में ईरान के हख़ामनी साम्राज्य ने उसपर क़ब्ज़ा कर लिया और उसे अपनी सातवी सात्रापी (प्रान्त) का हिस्सा बना लिया। इस से वह ईरान के सम्राट दरयुश प्रथम के अधीन हो गया और ३३६ ईसापूर्व में सिकंदर महान द्वारा हख़ामनी साम्राज्य को नष्ट करने तक उसका हिस्सा रहा। सिकंदर की मृत्यु के बाद ३२३ ईसापूर्व में मौर्य राजवंश के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने गंधार को अपने अधीन कर लिया। इसी वंश के सम्राट अशोक ने इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रचार किया और स्तूप बनवाए। इसी क्षेत्र में हिन्द-यवन राजाओं का भी कुछ भाग में ज़ोर रहा। ६३० ईसवी में यहाँ से गुजरने वाले चीनी तीर्थयात्री ह्वेन त्सांग ने अपने वर्णन में यहाँ के स्तूप को 'पो-लू-शा' का नाम दिया और कहा की उसकी परिधि (सर्कमफ़्रेन्स​) ४ किलोमीटर थी। वर्णनों से यह पता लगता है कि चारसद्दा के पूर्वी भाग में एक हिन्दू मंदिर था और उत्तर में एक बौद्ध मठ था। १०२६ ईसवी में महमूद ग़ज़नी ने इस इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर के यहाँ के जन-समुदाय का इस्लामीकरण कर दिया।

चारसद्दा के कुछ पुरातन स्थल इस प्रकार हैं -

  • शरकरगढ़ - यह एक क़िला है जो सिख साम्राज्य के काल में सिखों द्वारा चारसद्दा तहसील में पेशावर शहर से २७ किमी पश्चिमोत्तर में शबक़दर नामक छोटी सी बस्ती में बनवाया गया था। भारत में ब्रिटिश राज द्वारा क़ब्ज़ा होने के बाद इस शहर को सन् १८९७ में मोहमंद पश्तून क़बीले ने जला डाला। इसके बाद इसका नवनिर्माण करवाया गया था।
  • बीबी सय्यदा ढेरी - यह चारसद्दा तहसील के उमरज़​ई गाँव से आधा मील उत्तर में स्थित एक १८ मीटर (६० फ़ुट) ऊँचा टीला है। माना जाता है कि यह एक स्तूप का अवशेष है जो महात्मा बुद्ध द्वारा प्रवचन के बाद हरिति नामक स्त्री-दानवी के बौद्ध धर्म अपना लेने पर बनवाया गया था। बौद्ध बनने से पहले कहा जाता है कि यह दानवी बच्चे खा जाया करती थी। इस स्थल पर एक मुस्लिम महिला संत बीबी सय्यदा का एक स्मारक भी है। पुराने ज़माने में मान्यता थी कि यहाँ की एक चुटकी मिटटी से चेचक की बिमारी का इलाज किया जा सकता था।
  • शहर-ए-नापुरसाँ (شہرِ ناپرساں, Shahr-i-Napursan, अर्थ: 'न पूछे जाने वाला शहर', 'वह शहर जिसे कोई पूछता न हो', 'लावारिस शहर') - इस स्थल को मीर ज़ियारत ढेरी भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ एक छोटी सी ज़ियारत भी है। इतिहासकारों के अनुसार यह एक प्रसिद्ध बौद्ध स्थल था जिसे 'आँखों की भेंट' स्तूप कहा जाता था क्योंकि किसी पहले जन्म में महात्मा बुद्ध ने यहाँ किसी अच्छे कार्य के लिए अपनी आँखें बलिदान करी थीं। इस टीले से कनिष्क-काल और अन्य दौरों की वस्तुएँ बरामद हुई हैं।[3]
  • बाला हिसार (ऊँचा क़िला) - 'बाला' का मतलब फ़ारसी में 'ऊँचा' और 'हिसार' का अर्थ 'क़िला' होता है। ध्यान दें कि 'बाला' या 'बुलन्द' संस्कृत के 'बृहत्' शब्द का सजातीय शब्द है। यहाँ १९०२ और १९५८ में खुदाई की गई और इतिहासकारों का मानना है कि इसका निर्माण ईरान के हख़ामनी साम्राज्य ने छठी सदी ईसापूर्व में अपने भारतीय इलाक़े पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए करवाया था।[4]
  • पलातु ढेरी (پلاتو ډېرۍ, Palatu Dheri) - शहर-ए-नापुरसाँ से एक मील दूर यह टीला एक स्तूप का अवशेष है जिसे ह्वेन त्सांग के अनुसार एक देवेन नामक व्यक्ति ने बनवाया था। इसमें से पहली शताब्दी ईसवी काल के कुछ सिक्के और कालिका देवी की प्रतिमा मिली है। इसके अलावा तीन बासन मिले हैं जिन्हें आम नागरिकों ने 'चार चौथाइयों की सभा' (Community of the Four Quarters) नामक किसी संस्थान को भेंट किये था।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Prehistory And Harappan Civilization, Raj Kumar Pruthi, APH Publishing, 2004, ISBN 978-81-7648-581-4, ... City-sites like Charsadda (Pushkalavati) near Mardan, Bhita near Allahabad, Basarh (Vaisali) near Muzaffarpur, and Rajgirthe ancient capital of Magadha, were also touched but not persisted in ...
  2. Ancient India (The Cambridge history of India), Macmillan, 1922, ... The region in which the division of Hephaestion and Perdiccas was now encamped formed part of the realm of a raja, named by the Greeks Astes, whose capital was the town of Pushkalavati (Charsadda) to the north of the Kabul river ...
  3. A Burmese enchantment, Capt. Colin Metcalfe Enriquez, Thacker, Spink & Co, 1916, ... At Charsadda there were other big Budddhist monuments, notably the 'eye Gif Stupa,' so called because of a legend to the effect that the Buddha in a former life had given away his eyes in charity at that spot. The mound of debris at Mir Ziarat Dheri has been identified with this 'Eye Gift Stupa' ... the 'Eye Gift' of Shahr-i-Napursan (City of Not-Asking). Relic caskets were found in these and other big mounds ...
  4. Bradford University - The Bala Hisar of Charsadda, ... The Bala Hisar or "High Fort" is located on one of Asia's great thoroughfares ... Commanding the road from Delhi to Kabul, it is an imposing 20 metre high mound ... suggested that it was founded by the Persians in the sixth century BC as they consolidated the east of their empire ...