चांद बीबी

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चांद बीबी हुमायूं की पत्नी का भी नाम था.
चांद बीबी हॉकिंग, एक 18 वीं सदी के चित्र

चांद बीबी (1550-1599), जिन्हें चांद खातून या चांद सुल्ताना के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय मुस्लिम महिला योद्धा थी. उन्होंने बीजापुर (1596-1599) और अहमदनगर (1580-1590) की संरक्षक के रूप में काम किया था.[1] चांद बीबी को सबसे ज्यादा सम्राट अकबर की मुगल सेना से अहमदनगर की रक्षा के लिए जाना जाता है.

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

चांद बीबी अहमदनगर के हुसैन निजाम शाह प्रथम की बेटी[2] और अहमदनगर के सुल्तान बुरहान-उल-मुल्क की बहन थी. वह अरबी, फ़ारसी, तुर्की, मराठी और कन्नड़ सहित कई भाषाएं जानती थी. वह सितार बजाती थी और फूलों के चित्र बनाना उनका शौक था.[3]

बीजापुर सल्तनत[संपादित करें]

एक गठबंधन नीति का अनुसरण करते हुए चांद बीबी की शादी बीजापुर सल्तनत के अली आदिल शाह प्रथम से हुई थी.[4] उनके पति द्वारा बीजापुर की पूर्वी सीमा के पास एक कुएं (बावड़ी ) का निर्माण कराया गया और उनके नाम पर बावड़ी का नाम चांद बावड़ी रखा गया था.[5]

अली आदिल शाह के पिता, इब्राहिम आदिल शाह प्रथम ने सुन्नी रईसों, हब्शियों, और डेक्कन के बीच शक्ति का विभाजन कर दिया था. तथापि, अली आदिल शाह ने शिया का पक्ष लिया था.[6] 1580 में उनकी मृत्यु के बाद, शिया रईसों ने अपने नौ वर्षीय भतीजे इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय को शासक घोषित कर दिया.[7] डेक्कन सेनानायक कमाल ख़ान ने राज्य पर कब्ज़ा कर लिया और संरक्षक बन गए. कमाल ख़ान ने चांद बीबी का अनादर किया जिनको ऐसा लगता था कि कमाल ख़ान की सिंहासन हड़पने की महत्वाकांक्षा है. चांद बीबी ने अन्य सेनानायक हाजी किश्वर ख़ान की मदद से कमाल ख़ान के खिलाफ हमले की साजिश रची.[7] कमाल ख़ान उस समय पकड़े गए जब वो भाग रहे थे और उन्हें किले में मौत की सजा दी गयी.

किश्वर ख़ान इब्रहिम के दूसरे संरक्षक बन गए. धरासेओ में अहमदनगर सल्तनत के खिलाफ एक लड़ाई में उनके नेतृत्व में बीजापुर की सेना ने दुश्मन सेना के सब तोपखानों और हाथियों पर कब्जा कर लिया. जीत के बाद किश्वर ख़ान ने अन्य बीजापुरी सेनानायकों को आदेश दिया कि वे कब्जाए गए सभी हाथियों को छोड़ दें. हाथी बेहद महत्वपूर्ण थे और अन्य सेनानायकों ने इसे भयंकर अपराध के रूप में लिया. चांद बीबी के साथ, उन्होंने बांकापुर के सेनानायक मुस्तफा ख़ान की मदद से किश्वर ख़ान को खत्म करने की योजना रची. किश्वर ख़ान के जासूसों ने उन्हें साजिश के बारे में बताया. किश्वर ख़ान ने मुस्तफा ख़ान के खिलाफ अपने सैनिकों को भेजा जो लड़ाई में पकड़े गए और मार दिए गए.[7] चांद बीबी ने किश्वर ख़ान को चुनौती दी लेकिन उसने उन्हें सतारा किले में कैद कर लिया और अपने आप को राजा घोषित करने की कोशिश की. लेकिन, किश्वर ख़ान बाकी सेनानायकों के बीच बहुत अलोकप्रिय हो गया था. वह उस समय भागने के लिए मजबूर हो गया जब हब्शी सेनानायक इखलास ख़ान के नेतृत्व में एक संयुक्त सेना ने बीजापुर पर हमला कर दिया. सेना में तीन हब्शी रईसों, इखलास ख़ान, हामिद ख़ान और दिलावर ख़ान की सेना शामिल थी.[6] किश्वर ख़ान ने अहमदनगर में अपनी किस्मत आजमाने की असफल कोशिश की और फिर गोलकुंडा के लिए भाग गए. वह निर्वासन में मुस्तफा ख़ान के एक रिश्तेदार द्वारा मार दिए गए. इस के बाद, चांद बीबी ने थोड़े समय के लिए एक संरक्षक के रूप में काम किया.[7]

इसके बाद इखलास ख़ान संरक्षक बन गए लेकिन वह शीघ्र ही चांद बीबी द्वारा बर्खास्त कर दिए गए. बाद में उन्होंने फिर से अपनी तानाशाही शुरू कर दी जिसे जल्द ही अन्य हब्शी सेनानायकों द्वारा चुनौती दी गयी.[6] बीजापुर में स्थिति का लाभ उठाते हुए अहमदनगर के निजाम शाही सुल्तान ने गोलकुंडा के कुतुब शाही के साथ मिलकर बीजापुर पर हमला बोल दिया. बीजापुर में उपलब्ध सैनिक संयुक्त हमलें का सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं थे.[7] हब्शी सेनानायकों को एहसास हुआ कि वे अकेले शहर की रक्षा नहीं कर सकतें और उन्होंने चांद बीबी को अपना इस्तीफा दे दिया.[6] चांद बीबी द्वारा नियुक्त एक शिया सेनानायक अबू-उल-हसन, ने कर्नाटक में मराठा सेना को बुलाया. मराठों ने आक्रमणकारियों की आपूर्ति लाइनों[7] पर हमला कर दिया और मजबूर होकर अहमदनगर-गोलकुंडा की संयुक्त सेना वापस लौट गयी.

फिर इखलास ख़ान ने बीजापुर पर अधिकार पाने के लिए दिलावर ख़ान पर हमला कर दिया. हालांकि, वह हार गए थे और 1582 से 1591 तक के लिए दिलावर ख़ान संरक्षक बन गए.[6] जब बीजापुर राज्य में शांति बहाल हुई तो चांद बीबी अहमदनगर में लौट आई.

अहमदनगर सल्तनत[संपादित करें]

1591 में मुगल सम्राट अकबर ने चारों डेक्कन रियासतों को अपनी सर्वोच्चता को स्वीकार करने के लिए कहा. सभी रियासतों ने अनुपालन को टाल दिया और अकबर के राजदूत 1593 में लौट आए. 1595 में, बीजापुर के शासक इब्राहिम शाह, अहमदनगर से 40 मील दूर एक गंभीर कार्रवाई में मारे गए.[8] उनकी मृत्यु के बाद ज्यादातर उत्कृष्ट लोगों ने महसूस किया कि चांद बीबी (उनके पिता की चाची) के संरक्षण के तहत उनके शिशु पुत्र बहादुर शाह को राजा घोषित करना चाहिए.[9]

हालांकि, डेक्कन मंत्री मियां मंजू ने 6 अगस्त, 1594 को शाह ताहिर के बारह वर्षीय बेटे अहमद शाह द्वितीय को राजा घोषित कर दिया. इखलास ख़ान के नेतृत्व में अहमदनगर के हब्शी रईसों ने इस योजना का विरोध किया. रईसों के मध्य बढते असंतोष ने मियां मंजू को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे अकबर के बेटे शाह मुराद (जो गुजरात में था) को अहमदनगर में अपनी सेना लाने के लिए आमंत्रित करे. मुराद मालवा आये जहां वे अब्दुल रहीम खान-ए-खाना की नेतृत्व वाली मुग़ल सेना में शामिल हो गए. राजा अली ख़ान मांडू में उनके साथ हो गए और संयुक्त सेना अहमदनगर की ओर बढ गयी.[8]

हालांकि, जब मुराद अहमदनगर के लिए जा रहे थे उस समय कई कुलीन व्यक्तियों ने इखलास ख़ान को छोड़ दिया और मियां मंजू के साथ शामिल हो गए. मियां मंजू ने इखलास ख़ान और अन्य विरोधियों को हरा दिया. फिर उन्होंने मुगलों को आमंत्रित करने पर खेद व्यक्त किया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. उन्होंने चांद बीबी से अनुरोध किया कि वे संरक्षण स्वीकार कर ले और वे अहमद शाह द्वितीय के साथ अहमदनगर से बाहर चले गए. इखलास ख़ान भी पैठान भाग गए जहां मुगलों ने उन पर हमला किया ओर वे हार गए.[8]

चांद बीबी ने प्रतिनिधित्व स्वीकार कर लिया और बहादुर शाह को अहमदनगर का राजा घोषित कर दिया.[9]

अहमदनगर की रक्षा[संपादित करें]

नवम्बर 1595 में अहमदनगर पर मुगलों ने हमला कर दिया[8]. चांद बीबी ने अहमदनगर में नेतृत्व किया और अहमदनगर किले का सफलतापूर्वक बचाव किया[3]. बाद में, शाह मुराद ने चांद बीबी के पास एक दूत भेजा और बरार के समझौते के बदले में घेराबंदी हटाने की पेशकश की. चांद बीबी के सैनिक भुखमरी से बेहाल थे. 1596 में उन्होंने बरार मुराद, जिसने युद्ध से सेना हटा लेने का संकेत दे दिया था, को सौंपकर शांति स्थापित करने का फैसला किया.

चांद बीबी ने अपने भतीजे बीजापुर के इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय और गोलकुंडा के मुहम्मद कुली कुतुब शाह से अपील की कि वे मुगल सेना के खिलाफ युद्ध करने के लिए एकजुट हो जाएं[10]. इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय ने सोहिल ख़ान के नेतृत्व में 25,000 आदमियों का एक दल भेजा जिसके साथ नलदुर्ग में येख्लास ख़ान की बाकी बची सेना शामिल हो गयी. बाद में उनके साथ गोलकुंडा के 6,000 पुरुषों का एक दल शामिल हो गया[8].

चांद बीबी ने मुहम्मद ख़ान को मंत्री के रूप में नियुक्त कर दिया लेकिन वह विश्वासघाती साबित हुआ. ख़ान खनन से एक प्रस्ताव के तहत उसने मुगलों को पूरी सल्तनत सौपने की पेशकश की. इस बीच ख़ान खनन ने उन जिलों पर कब्जे करना शुरू कर दिया जो बरार के समझौते में शामिल नहीं थे[8]. सोहिल ख़ान जो बीजापुर से लौट रहा था उसे वापस आने और खनन ख़ान की मुगल सेना पर हमले का आदेश दिया गया. ख़ान खनन और मिर्जा शाहरुख के नेतृत्व में मुगल सेनाओं ने बरार के सहपुर में मुराद का शिविर छोड़ दिया और उन्हें गोदावरी नदी के किनारें सोन्पेत (या सुपा) के नजदीक बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुंडा के संयुक्त बलों का सामना करना पड़ा. 08-09 फ़रवरी 1597 की एक भीषण लड़ाई में मुगल जीते[8].

अपनी जीत के बावजूद मुगल सेना हमले को आगे बढ़ाने के हिसाब से कमजोर थी और सहपुर लौट गयी. उनका एक कमांडर, राजा अली ख़ान लड़ाई में मारा गया था और अन्य कमांडरों के बीच बहुत विवाद थे. इन विवादों के कारण, ख़ान खनन को अकबर ने 1597 में वापस बुला लिया था. उसके शीघ्र बाद ही राजकुमार मुराद की मृत्यु हो गई[8]. अकबर ने फिर अपने बेटे दनियाल और ख़ान खनन को नए सैनिकों के साथ भेजा. अकबर ने खुद उनका पीछा किया और बरहानपुर में शिविर लगाया[3].

अहमदनगर में, चांद बीबी के अधिकारों का नवनियुक्त मंत्री नेहंग ख़ान द्वारा विरोध किया जा रहा था. नेहंग ख़ान ने ख़ान खनन की अनुपस्थिति और बरसात के मौसम का फायदा उठाते हुए बीड के शहरों पर पुनः कब्जा कर लिया. 1599 में अकबर ने बीड के राज्यपाल को कार्य मुक्त करने के लिए दनियाल, मिर्जा यूसुफ ख़ान और ख़ान खनन को भेजा. नेहंग ख़ान भी जयपुर कोटली मार्ग को जब्त करने के लिए चल दिया, क्योंकि उसे उम्मीद थी कि वहां उसे मुग़ल मिलेंगे. हालांकि दनियाल ने पास को छोड़ दिया और वह अहमदनगर किले पर पहुंच गया. उसकी सेना ने किले को घेर लिया.

चांद बीबी का मकबरा, अहमदनगर

चांद बीबी ने फिर किले का बहादुरी से बचाव किया. हालांकि, वह प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सकी और उन्होंने दनियाल के साथ उनकी शर्तों पर बातचीत करने का फैसला किया[9]. हामिद ख़ान, एक रईस, अतिरंजित हो गया और यह खबर फैला दी कि चांद बीबी ने मुगलों के साथ संधि कर ली है[9]. एक दूसरे संस्करण के अनुसार, जीता ख़ान, जो चांद बीबी का एक हिजड़ा सेवक था, ने सोचा था कि मुगलों के साथ बातचीत करने का उनका निर्णय एक विश्वासघात था और उसने यह खबर फैला दी कि चांद बीबी एक देशद्रोही है[11]. चांद बीबी को फिर उनकी ही सेना की एक क्रुद्ध भीड़ ने मार डाला.

उनकी मृत्यु और चार महीने तथा चार दिन के घेराव के बाद, दनियाल और मिर्जा यूसुफ ख़ान की मुग़ल सेना द्वारा अहमदनगर पर कब्जा कर लिया गया.[8]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • प्राचीन काल के आधुनिक युद्ध में महिलाओं का इतिहास
  • निजाम शाही वंश (अहमदनगर सल्तनत)
  • आदिल शाही (बीजापुर सल्तनत)

संदर्भ[संपादित करें]

  1. "Women In Power: 1570-1600". Archived from the original on 2006-12-19. http://web.archive.org/web/20061219205920/http://www.guide2womenleaders.com/Womeninpower1570.htm. अभिगमन तिथि: 2006-12-24. 
  2. "The Adil Shahi Dynasty of Bijapur". http://sify.com/itihaas/fullstory.php?id=13366961. अभिगमन तिथि: 2006-12-24. 
  3. Jyotsna Kamat. "Education in Karnataka through the ages: Education Among Muslims". http://www.kamat.com/database/books/kareducation/islamic_education.htm. अभिगमन तिथि: 2006-12-24. 
  4. Sewell, Robert (2006). A Forgotten Empire: Vijayanagar; A Contribution to the History of India. http://www.gutenberg.org/etext/3310. 
  5. "Reviving an ancient tank". The Hindu. 2005-10-10. http://www.hindu.com/2005/10/10/stories/2005101002460400.htm. अभिगमन तिथि: 2006-12-24. 
  6. Dr. Richard Pankhurst. "Great Habshis in Ethiopian/Indian history: History of the Ethiopian Diaspora, in India - Part IV". http://www.cwo.com/~lucumi/ethiopia.html. अभिगमन तिथि: 2006-12-24. 
  7. Ravi Rikhye (2005-03-07). "The Wars & Campaigns of Ibrahim Adil Shahi II of Bijapur 1576-1626". http://orbat.com/site/cimh/kings_master/kings/ibrahimII_adil_shahi/ibrahimII_adil_shahi.html. अभिगमन तिथि: 2006-12-24. 
  8. "Medieval Period". The Gazetteers Department, Government of Maharashtra. http://www.maharashtra.gov.in/english/gazetteer/Beed/his_mediaeval_period.html. अभिगमन तिथि: 2006-12-24. 
  9. "The History of Ahmednagar". http://ahmednagar.gov.in/html_docs/..%5Chtml_docs%5Chistory_of_ahmedngar_district.htm. अभिगमन तिथि: 2006-12-24. 
  10. Michell, George; Mark Zebrowski. Architecture and Art of the Deccan Sultanates. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0521563216. ISBN 978-0-521-56321-5. http://www.cambridge.org/catalogue/catalogue.asp?isbn=0521563216. 
  11. Altaf Hussain Asad (2005-01-02). "A woman of substance". Dawn Magazine. http://www.dawn.com/weekly/dmag/archive/050102/dmag12.htm. अभिगमन तिथि: 2007-06-18. 

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