चांडाल

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चांडाल भारत में व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग है, जिसे सामान्यत: जाति से बाहर तथा अछूत माना जाता है। यह एक प्राचीन अन्त्यज, नीच और बर्बर जाति है। इसे श्मशान पाल, डोम, अंतवासी, थाप, श्मशान कर्मी, अंत्यज, चांडालनी, पुक्कश, गवाशन, चूडा, दीवाकीर्ति, मातंग, श्वपच आदि नामों से भी पुकारा जाता है।[1]

अभ्युदय[संपादित करें]

प्राचीन विधि संहिता "मनु स्मृति" के अनुसार, इस वर्ग का उदय एक ब्राह्मण महिला और एक शूद्र पुरुष के मिलाप से हुआ था। आधुनिक समय में बंगाल में कृषक, मछुआरे और नाविकों की जाति विशेष के लिए इस शब्द का उपयोग किया जाता है, वह अधिकतर नामशूद्र कहलाते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि नामशूद्र की उत्पत्ति बिहार की राजमहल पहाड़ियों में निवास करने वाली एक आदिम जनजाति से हुई है।[2]

साहित्य में चांडाल का प्रयोग[संपादित करें]

चांडाल शब्द का उपयोग प्रेमचंद ने अपनी कहानी नैराश्य में इस प्रकार किया है, ""चांडाल कहीं का! उसके कारण मेरे सैंकड़ों रुपये पर पानी फिर गया।" हिन्दी समाज की लोकोक्तियों तथा कहाबतों में "चांडाल चौकड़ी" का प्रयोग काफी होता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. रफ्तार ऑनलाइन शब्दकोश में चांडाल का अभिप्राय
  2. भारत ज्ञानकोश, खंड-2, प्रकाशक- पॉपुलर प्रकाशन मुंबई, पृष्ठ संख्या-150, आई एस बी एन 81-7154-993-4