चमार

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चमडा पकानेवाले, खालें तैयार करनेवाले, चमडे की वस्तुएं बनानेवाले तथा जूते बनानेवाले, भारतीय समाज-व्यवस्था में एक सुपरिभाषित श्रेणी से संबंध रखते हैं। इनमें से अधिकांश कर्मकारों को आज उत्तरोत्तर भारत में साधारणतौर पर "चमार" के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है। पेशे के लिहाज से कल जिन्हें चर्मना अथवा चर्मला तथा चर्मकार कहा जाता था आज वे लोग "चमार" केहलाते हैं। इस नाम की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "चर्मकार" (चमड़े का काम करने वाला) से हुई है । इस जाति के लोग वहुतायत में हिन्दू धर्म के मानने वाले हैं , किन्तु बौद्ध धर्मावलम्बियों की भी काफी संख्या है। साथ ही इस जाति के लोग मुस्लिम,सिक्ख और ईसाई धर्म को भी मानते हैं ।

इसके अलावा यह विश्वास करने का आधार है कि इस जाति में उपर्युक्त उपजातियां शामिल हैं।इस जाति के सदस्यों के नाक-नक्शों मे भी काफी भिन्न्ताएं हैं। इसे बलिया और मेरठ जैसे पूरि तरह पृथक स्थानों से समझा जा सकता है। येह भी उल्लेख्नीय है की बहुत-सी चमार औरतें बहुत अच्छे रूप-रंग की होती हैं और कुछ चमार अपने समाज के अन्य लोगों के अन्य लोगों के सामन्य रूप-रंग के होते हैं। इसका कारण व्यापक रूप से प्रचलित कुछ सामाजिक और धार्मिक रीति हैं। इसी प्रकार चमार जातियों और गोत के लोग शामिल हो गए हैं। बहुत सारे लोग, यहां तक की सभी कबीले निम्न स्तर से उपर उठकर इस जाति में शामिल हुए हैं। और येह प्रक्रिया अभी भी चल रही है। हालांकि चमार हिन्दू होने की किसी भी अपेक्षा को पूरा नहीं करते हैं किन्तु फिर भी उनको हिन्दू माना जाता है। चमारों की सबसे ज्यादा संख्या संयुक्त प्रांत में, पूर्व में बिहार और उत्तर-पशिचम मे पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में है।

तालिकाओं से पता चलता है कि चमार लोग संयुक्त प्रांत में सर्वत्र समान रूप से बिखरे हुए हैं। संख्या के आधार पर गोरखपुर और बस्ती जिलों में वे सबसे ज्यादा मजबूत हैं, किन्तु शेष जन्संख्या के अनुपात में वे सहारनपुर तथा मेरठ मण्डल के शेष भाग में सवार्धिक संख्या में हैं। सहारनपुर जिले में हर पांचंवा व्यक्ति चमार है जबकी मेरठ मण्डल में १७ प्रतिशत जन्संख्या चमारों की है। समस्त प्रांतों में कुल मिलाकर देखें तो हर आठ्वां व्यक्ति चमार है। चमारों की उपजातियां भी काफी ज्यादा है। १८९१ में ये ११५६ थीं। इस संख्या में थोडा-बहुत अंतर हो सकता है। हालाकिं बहुत अंदर हो सकता है। हालाकिं बहुत से नामी का उच्चारण और वर्तनी दूसरे नामों से लगभग मिलती-जलती है किंतु तब भी चमारों की उपजातीयों की संख्या काफी ज्यादा है। दूसरी अन्य जातीयों की तरह चमारों को भी सात मुख्य उपजातीयों में विभक्त बताया जाता है। इन परम्परागत सात जातीयों के नाम स्थान-स्थान पर अलग-अलग हैं और उनकी मान-प्रतिष्ठा का क्रम भी अलग-अलग है। [1]



सामाजिक और आर्थिक जीवन[संपादित करें]

चमार लोगों में अपने इलाके में से ही, अपने ग्राम-समूह से बाहर किन्तु अपनी उपजाति में ही शादी-ब्याह करने का रिवाज है। हालाकिं उपजातियों अनीवार्य रूप से अपनी जाति के अन्दर ही विवाह संबंध जोडनेवाले समूह होतें है, किन्तु प्रायः अलग-अलग उपजातियों के सदस्यों के बीच भी विवाह हो जाता हैं। इसके अलावा जाति के अन्दर ही विवाह करनेवाले समूहों के बीच एक-दूसरे के साथ विवाह न करने की बात केवल ' लडकीयां ' देने के मामले में ही लागू होती है, उनसे लडकीयां लेने में नहीं। इसीलिए "कुरील" "दोहार" जाति की लडकीयों से विवाह कर लेंगे किन्तु "दोहारों" को अप्नी लडकीयां नहीं देंगे। इस तरह के मामलों में "कुरील" अपनी बिरादरी को भोज देते हैं और बिरादरी उनको माफ कर देती है। वास्तव में विवाह संबंधी नियमों का उल्लंघन कर्ने के लगभग सभी मामलों प्रायः पंचायत द्वारा लगाए गए दंड का भुगतान कर देने पर या भोज दे देने पर पंचायत उनको माफ कर देती है और वे अप्नी जाति में बने रेह्ते हैं। उपजातियों के बीच बहुत छोटे-छोटे ऐसे बर्हिजात समूह या परिवार होते हैं जिन्का संबंध किसी काल्पनिक संत, वीर पुरूष या अन्य व्यक्ति के नाम के साथ, किसी गांव या मौहल्ले के नाम पर, या किसी टोटम से संबंधित नाम के साथ होता है। बर्हिजात समूह के सदस्यों के बीच विवाह निषिध्द है। हालाकिं चचेरे, ममेरे, फुफेरे लोगों के बीच आपस में विवाह का रिवाज नहीं है किन्तु इसके उदाहरण भी मिलते हैं। विवाह संबंध हमेशा दोनों पक्षों के माता-पिता अथ्वा रिश्तेदारों द्वारा तय किए जाते हैं। और्तें विवाह तय नहीं कर्ती हैं। लेकिन विवाह संबंधि निर्णयों में महिलाओं की सलाह अवश्य ली जाती है और उनकी राय को महत्व दिया जाता है। विवाह को एक धार्मिक संस्कार समझा जाता है न कि एक समझौता। उपपत्नि अथ्वा रखैल रखने तथा बहुपत्नि प्रथा के सिध्दान्तों के तहत एक से अधिक पत्नियं रखने की प्रथा आम बात है।

रखैल रखने की प्रथा काफी ज्यादा है, विशेष रूप से उन लोगों में जो आर्थिक रूप से काफी सम्पन्न होते हैं। इस प्रथा को गलत नहीं समझा जाता है। दो या तीन रखैल रखना एक सामान्य सी बात है, इनसे ज्यादा भी रखी जाती हैं। यह रखैल खरीदी हुई होती हैं। चमारों में बाल-विवाह की प्रथा भी सब जगह और समस्त उपजातियों में पायी जाती है। सगाई बहुत जल्दी, प्रायः शैशवावस्था में ही हो जाती है और आठ वर्ष की आयु होते-होते विवाह कर दिया जाता है।

विवाह संबंधों के कई विशेष रूप हैं जिनका उल्लेख यहां किया जा सकता है। एक विवाह "अदला-बदली" से होता है, जिसमें प्रत्येक परिवार विवाह में दूसरे परिवार के लडके को अपनी लडकी देता है। ऐसा विवाह खर्च से बचने के लिए किया जाता है और यह प्रथा निर्धन परिवारों में प्रचलित है। चमारों में जबरदस्ती या कब्जा पध्द्ति के विवाह-संस्कार भी बहुत से रोचक प्रसंग में देखे जाते हैं। इनमें ये हैं-- दूल्हा, यदि इत्ना खर्च वहन कर सके तो घोडे या इक्के पर चढकर या डोली में बैठकर आता है। वधू को एक प्रकार की सवारी में लाया जाता है। विवाह मंडप के एक खम्बे को गिरा दिया जाने अथ्वा वर के पिता और वर द्वारा इसे हिलाने पर वधू रोती है। वर-वधू कि ओर से हिंसा का प्रदर्शन होता है। जो दोनों पक्षों के बीच खूनी संघर्ष का घोतक है। सभी विवाह संस्कार संपन्न होने तक वधू पक्ष की औरतें वर के रिश्तेदारों तथा मित्रों को अपने गीतों में गालियां देती हैं।

चमार जो-जो काम करते हैं ऊणाशॅ स्पषट होता है कि वे अकुशल श्रमिक होते हैं। चमडा परिशोधन करने या चमडे का काम करने के कारण ही उन्हें चमार कहा जाता है। घरों में काम आने वाली टोकरियों, चमडे की रस्सियां के अतिरिक्त वह जूते बनाता और उनकी मरम्म्त भी करता है। वह न केवल देशी जूते बनाता है बल्कि अंग्रेजी माडल के बूट और जूते भी बडी मात्रा में बनाता है। वह खालों का व्यापार भी करता है। केन्द्रीय प्रांत में कहीं-कहीं वह जानवर खरीदता और बेचता है।

आर्थिक रूप से चमारों का जनसंख्या में अत्यधिक महत्व है और उनका कार्य समाज में मेहनत मजदूरी करन है। उसके पास सामान्य्तः गरीब आदमी के रूप में बहुत सारा काम रहता है। चमार लोगों को न केवल जमींदारों का, जो उन्हें भूमी जोतने के अधिकारों और घरों से वंचित कर रहे हैं, डर है बल्कि उन पर बनियों का प्रभाव भी रह्ता है।


घरेलू रिति- रिवाज[संपादित करें]

जन्म[संपादित करें]

चमार औरतें बांझपन को बहुत बडा दुर्भाग्य मानति हैं और बांझपन से मुक्त होने के लिए वे प्रसिध्द तीर्थ-मंदिरों और पीर आदी पर जाती हैं तथा चढावा चढाती हैं जिसमें नारियल, गुड कि भेली या ढइया, अनाज और चादर आदि होते हैं। चमार सामान्यत्ः इस बात में विश्वास करते हैं कि लडका या लडकी होना परमात्मा के लिए कि वह लडका है या लडकी। वे ब्राह्मण के पास जाते हैं। वे ज्योतिषी की संयोग पध्दति का प्रयोग करते हैं। गर्भवती स्त्री की इच्छा को गर्भ्सस्थ बच्चे की इच्छा माना जाता है, जिसके बारे में उनका विश्वास है कि औरत की इच्छा स्ंअभोग के तुरंत बाद आथवा पांचवें महिने से शुरु हो सकती कहै। यह भी विश्वास है की उसकी इच्छा हर हालत में पुरी की जानी चाहिए अन्यथा या तो बच्चा मर जाएगा या ऊपरी असेब का शिकार हो जाएगा। गर्भावस्था के दौरान रेचक पदार्थों को खाने की मनाही होती है।

बच्चे के जन्म की घोषणा दाई या नाइन या किसी रिश्तेदार औरत द्वारा की जाती है। वह ऐसी घोषणा गांव के मुखिया तथा उस परिवार के सगे-संबंधियों के घर जाकर और गाय के गोबर से उनके दरवाज़ो पर एक चिह्न बनाकर करती है।उसे इसकी फीस मिलती है।वह शीतला मंदिर में भी स्वस्तिक का निशान बनाती है। यदी बच्चा किसी अशुभ दिन पैदा होता है तो पण्डित को बुलाकर हवन कराया जाता है। इसके लिए ३६ विभिन्न तरह के पेडों की लकड़ीयाँ लायी जाती है। हवन के दौरान बच्चे का पिता अग्नि के सामने बैठता है। उसके सामने सरसों के तेल का भरा एक कटोरा रखा जाता है और बच्चा उसके कन्धे पर होता है ताकि पेता बच्चे का प्रतिबिम्ब उस तेल में देख सके। इसके बाद पिता बच्चे के चेहरे को देखता है। यदी जन्म के समय कोई प्रतिकूल परिस्थितियां नहीं होती हैं तो वह बच्चे को होते ही देख भी सकता है।

बच्चे के जन्म के समय और उसके बाद होने वाली कुछ विषमताओं के बारे में कुछ विशिष्ट अंधविश्वास प्रचलित हैं। यदि बच्चा उल्टा पैदा होता है तो यह विश्वास किया जाता है कि उसके माता-पिता में से किसी एक की जल्दी ही मृत्यु हो जाएगी या फिर बच्चा बहुत जल्द ही मर जाएगा। किन्तु दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति की कमर में नचका है और वह इससे परेशान है तो उल्ते पैदा हुए बच्चे का पैर अपनी कमर में छुआने से वह ठीक हो जाता है। यदि किसी बच्चे के जन्म के समय दांत होते हैं तो उसे बहुत अशुभ माना जाता है। यह विश्वास किया जाता है कि या तो परिवार पर कोई बडा संकट आएगा या किसी की मृत्यु होगा। तरुण अवस्था के समय कोई विशेष रीति-कर्म नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं कि शुध्दि संबंधी रीति-कर्म होने तथा बाल कट जाने पर लडके को बिरादरि का सदस्य माना जा सकता है। जब लडके को जाति के सदस्य के रूप में मान्यता मिल जाती है या जब लडके को बिरादरी का सदस्य मान लिया जाता है तो उसे अपनी बिरादरी के सामाजिक व्यवहार ही करने होते हैं।

विवाह[संपादित करें]

विवाह संबंधी इंतजाम करते समय चमार लोग कुछ अपवादों को छोडकर, यदि अपनी जाती के नहीं हैं तो नाई नहीं लगाते हैं। माता-पिता द्वारा एस बात को निश्चय कर मेने के बाद कि पुत्र अथ्वा पुत्री को विवाह कर देना चाहिए, परिवार के पुरुषों द्वारा इस पर सलाह-मशविरा किया जाता है। उसके बाद बच्चे के मिए उपयुक्त जीवन-साथी की तलाश की जाती है। योग्य वर या वधू मिल जाने पर दोनों परिवारों के बीच बातचीत के आदान-प्रदान पर दोनों बच्चों की तन्दुरुस्ती के बारे में पुछताछ के लिए एक बिचौलिया नियुक्त किया जाता है। बिचौलिया दोनों परिवारों को एक-दूसरे के विषय में जानकारी देता है। बिचौलिया प्रायः वर-वधू में से किसी एक पक्ष का रिश्तेदार होता है।

सगाई की रस्म की लगन निकलवाने के लिए किसी पण्डित की सलाह ली जाती है। उसके पश्चात लडकी के पिता को रोक के रूप में एक रूपया या उसके लगभग धनराशि देता है। कभी-कभी गुड बांटा जाता है और दावत दी जाती है। इसके बाद सगाई होता है। लडकी का पिता अपने पुरुष संबंधियों और मित्रों के साथ सगाई करने लडके के घर जाता है।वह एक रुपया देकर लडके के माथे पर चावल और दही या हल्दी का टीका लगाकर कहता है,"मैंने अपनी पुत्री तुमको दी।" यह रुपया इस बात की निशानी होता है कि सगाई हो गई है।

विधवा का विवाह कुंवारे व्यक्ति के साथ होने की स्थिति में, फेरे की रस्म वर के घर पर की जाती है। किन्तु दूल्हा वधू के साथ फेरे नहीं लेता है। उसकी बजाय कपास के पौधे की एक तहनी मण्डप में मंढे के साथ बांध दी जाती है। लदके के लिए शादी के अनेक संस्कार किए जाते है,लडकि के लिया नहीं। ये सब कार्य वह आपने पहले विवाह मे कर चुकी होती है। वास्तव में, अन्य विधवा विवाहों में भी शादी के संस्कार नहीं होते है। उपयुक्त संस्कार में झुठ-मुठ के विवाह कराने के उदाहरण भी मिलते हैं। अर्थात लडका कपारा के पौधे के साथ संयुक्त होता है। उसके बाद यह सगाई संस्कार के द्वारा विधवा औरत के साथ विवाह करके उसे अपनी पत्नी बनाता है।

मृत्यु : विविध[संपादित करें]

जब यह स्पष्ट हो जाता है कि अब व्यक्ति की मृत्यु होने वाला है तो उसके नातेरिश्तेदार उससे सम्पत्ति-जायदाद के बारे में पुछने लगते हैं। जैसे ही उसके मरने की घडि निकट आती है उसे धरती पर लिटा दिया जाता है। एक बताशा अथवा एक पेडा पानी में भिगो कर मरने वाले व्यक्ति के मुंह में रखते हैं अथवा उसे ऐसा ही गंगाजल अथव पानी पिलाया जाता है जिसमें कोई धातु घुली हो। शव को दक्षिण दिशा में उसकी आत्मा चमेगी। मृत्यु के पश्चात दाह-संस्कार की तैयारी की जाती है। इसकी खबर नातेरिश्तेदार एवं मित्रगणों को भेजी जाती है, और रंगीन धागा, पान के पत्ते, चन्दन की लकडी, घी और बांस मंगाए जाते हैं। तब बांस की अर्थी बनाई जाती है। मृतक के शरीर को चने के आटे से मलने के बाद रिश्तेदारों अथवा दाह-संस्कार में आए बंधु-बांधवों द्वारा ठण्डे पानी से नहलाया जाता है। शव को तख्ते पर दीवार के सहारे रख कर उसके ऊपर पानी डाला जाता है और वह पानी अर्थी के नीचे बने गडढे में जमा हो जाता है। यदि मृतक पुरुष है तो यह कार्य पुरुषों द्वारा सम्पन्न किया जाता है और महिला है तो महिलाओं द्वारा।

अगर शादी-शुदा आदमी मरता है तो उसके विधवा पत्नी अपनी कलाई एवं पैरों में से गहने उतारती है। यदि ये गहने कांच के बने कोते हैं, तो इन्हें तोड दिया जाता है, धातु के बने गहनों को घर में रख लिया जाता है। अगर आदमी दोपहर बाद अथवा रात को मर जाता है और उसका दाह-संस्कार करना मुश्किल हो तो ऐसी सूरत में शव के पैरों को आपस में बांध दिया जाता है। अन्य लोगों का कहना है कि शव पर निगरानी रखी जानी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि शव पर पिशाच कब्जा कर उसे उठा न दे और निगरानी रखने वाले व्यक्ति को अकेला नहीं छोडना चाहिए नहीं तो उस पर हमला हो सकता है। वे कहते हैं कि पुराने जमाने में ऐसा हुआ है।

जब शव यात्रा चलने को तैयार होता है तब पति मृतक के माथे पर सात बार सिंदूर लगाता है। पति अपनी अंगुलियों से सिंदूर लगाता है और विधवा पत्नी मृतक पति की अंगुलियों से। यह शादी के रिश्ते के अंत का संकेत होता है जो सात बार लिए गए फेरों के समान है। सबसे पहले अर्थी को परिवार के पुरुष एंव महिलाएं दोनों उठाते हैं उसके बाद अन्य रिश्तेदार एंव मित्रगण अर्थी को लेकर चलते हैं। अर्थी को इस प्रकार ले जाते हैं कि शव का पैर श्मशान की ओर हो ताकि प्रेतात्मा वापस न आ सके। अर्थी के साथ घर से मिटटी के बर्तन अथवा उपले में आग ले जाते हैं। एसा प्रेतात्मा से बचने तथा हुक्का जलाने के लिए किया जाता है। शव-यात्रा को छोडकर आने वाले अन्य व्यक्तियों को भी ऐसा ही करना होता है। जैसे-जैसे शव-यात्रा आगे बढती है वे चिल्लाते हैं-"राम नाम सत है, सत बोलो गत है।" और वे अपनी मजबूरी इन शब्दों में व्यक्त करते हैं: "तू ही है, तैंने पैदा किया, तैंने मार दिया।" घर से अर्थी ले जाने के बाद घर के पानी से भरे सभी बर्तनों का पानी फेंक दिया जाता है। मृत्यु के ठीक पहले मृतक द्वारा प्रयोग में लाए गए मिटटी के बर्तनों को तोडा दिया जाता है।

अंतिम संस्कार पूरा हो जाने पर साथ के लोग स्नान करने हैं और अपने-अपने घर चले जाते हैं। वहां से जाते समय वे अपने बाएं हाथों से अपने पीछे की ओर मुट्ठी भर मिट्टी फेंकते जाते हैं। वे मुडकर पीछे नहीं देखते हैं। घर लौटते समय एक-आध गुड की डली और खील बाटें जाते हैं। कुछ लोग किसी तालाब के समीप घास के कुछ तिनके गाड देते हैं जो कि उस दिवंगत आत्मा के निवास स्थान का प्रतीक होते हैं जो अंत्येष्टि क्द्रिया के पुरा होने तक रहती है। उस स्थान पर दस दिनों तक जल चढाया जाता है।

जनसांख्यिकी[संपादित करें]

2001 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश में चमारों की लगभग 14 प्रतिशत आबादी शामिल है [2]और 12 प्रतिशत पंजाब में । [3]

2001 तक भारत में राज्यवार चमारों की आबादी का विवरण
राज्य जनसंख्या राज्यवर जनसंख्या का औसत अन्य विवरण
पश्चिम बंगाल [4] 999,756 1.25%
बिहार [5] 4,090,070 5%
दिल्ली [6] 893,384 6.45%
चंडीगढ़ [7] 48,159 5.3%
चंडीगढ़ [8] 1,659,303 8%
गुजरात [9] 1,041,886 2%
हरियाणा [10] 2,079,132 9.84%

हरियाणा के जींद, पानीपत, करनाल, सोनीपत, रोहतक, कैथल, हिसार जिले में सबसे ज्यादा चमार और काफी हद तक गुड़गांव, फरीदाबाद में भी, इनमें से ज़्यादातर रविदासिया संप्रदाय का पालन करने वाले जाटव चमार हैं।

हिमाचल प्रदेश [11] 414,669 6.8% चमार कोरी के बाद राज्य में दूसरा सबसे बड़ा अनुसूचित जाति हैं। चमार मुख्य रूप से निम्नलिखित जिलों में पाए जाते हैं: कांगड़ा, मंडी और ऊना.
जम्मू और कश्मीर [12] 488,257 4.82%
झारखंड [13] 837,333 3.1%
मध्यप्रदेश [14] 4,498,165 7.5%
महाराष्ट्र [15] 1,234,874 1.28%
पंजाब [16] 2,800,000 11.9% पंजाब में यह इस जाती के लोग राजनीतिक और सामाजिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली हैं । इनकी जनसंख्या लगभग 2.8 करोड़ है जो मुख्य आवादी का 12 प्रतिशत है । यदि दलितों की कुल संख्या को मिला दिया जाये तो यह 27 प्रतिशत के आसपास है । पंजाब में यह जाती कई समूहों में बंटा है, जैसे अधर्म,रविदासी, रामदासिया और चमार ।
राजस्थान [17] 5,457,047 9.7% राजस्थान में चमार ही पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों के आसपास के जिलों में पहचाना जा सकता है। बीकानेर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, चूरु, झुंझुनू, अलवर, भरतपुर और धौलपुर में बसे हुए "चमार" "बैरवा के रूप में जाने जाते हैं तथा भरतपुर, धौलपुर और अलवर के कुछ हिस्सों में' जाटव ,"मेघवाल ","रायगर" और "मोची"[18] [19] के रूप में ।
उत्तर प्रदेश [20] 19,803,106 14% ज़्यादातर चमार पश्चिमी उत्तरप्रदेश में जाटव के रूप में जाने जाते हैं । इस राज्य में चमारों की एक राजनीतिक पार्टी है जिसे बहुजन समाज पार्टी कहते हैं । इस पार्टी से 1990 के बाद मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री निर्वाचित हुई है ।
उत्तराखंड [21] 444,535 5%

आत्मा जगत[संपादित करें]

भूत-प्रेत या आत्माओं में विश्वास की भावना चमारों में कूट-कूट कर भरी है। उनके लिए निर्जीव वस्तुएं,पेड़-पौधे, जानवर और मरे हुए लोगों की अत्माएं भी पूजा के योग्य हैं जो उनके दिलो-दिमाग पर छाई हुई हैं। कुछ लोग कहते है कि आत्मा बारह महीने तक इधर-उधर भटकती रहती है। यदि एक वर्ष तक प्रेत अपने आपको स्थायित्व नही दे पाते है तो वे भूत अथवा चुरैल बन जाते हैं। प्रकृति मे घटने वाली घटनाओं को भी रहस्यमय माना जाता है और जीवन के हर मोड़ पर होने वाले अनुभव को भी किसी अदृश्य शक्ति के चमतकार के रूप में बताया जाता है। पत्थर की पूजा सार्वभौमिक है। प्रायः यह देखा गया है कि वे पत्थर, जिन्हें गांव की देवी/देवताओं के रूप में पूजा जाता है, सिन्दूर से पुते होते हैं। ये प्राचीन काल के बलिदान का प्रतीक है जो उन्हें विरासत के रूप में मिला है।वे काली माता,गणेश, हनुमान , भुमिया रानी, भैरों बाबा की पूजा करते है। चमारों का यह विशवास है कि आत्माएं पेड़ो पर निवास करती है।सूर्यास्त के बाद पेड़ो को छेड़ना नहीं चाहिए। पीपल और बरगद जैसे पेड़ो को पवित्र माना जाता है। कई जानवरों की पूजा की जाती है।"राक्षस" मनुश्यभक्षी या दैत्य होते है जो पेड़ो पर एक विशेष रूप में पक्षी में या पानी के हौज में पाये जाते हैं। वे कभी-कभी मृत शरीर को भी पुनर्जीवित कर देते हैं। यें मनुष्यों का मासं या सड़ा हुया मासं खाते हैं।

रहस्य[संपादित करें]

संसार की अन्य जनजातियों की तरह ही चमारों के भी शुभ और अशुभ दिन होते हैं। बुधवार को नए कपड़े नही पहनते, शनीवार,रविवार या मंगलवार को उधार लेना या देना अशुभ मानते है। शनिवार या रविवार को घोड़े या अन्य पशु से संबंधित कोई चीज जैसे चमड़ा, घी या गोबर न खरीदना और न बेचना चाहिए। फसल की कटाई गुरुवार को शुरु तथा बुधवार को समाप्त करनी चाहिए। दक्षिण दिशा अशुभ होती है और रसोईघर का दरवाजा दक्षिण की ओर नहीं होना चाहिए और न ही किसी अदमी को द्क्षिण की ओर पैर करके सोना चाहिए। तीन और तेरह अशुभ संख्याएं हैं।पांच तथा पांच के गुणक और संयुक्त संख्याएं जैसे सवा चार, ढाई और साढे सात शुभ माने गए हैं। अगर रास्ते में कोई ब्राह्मण दीया लिए,मैले से भरी टोकरी लिए भंगी, भरी बाल्टी लिए कोई व्यक्ति या गोद में बच्चा लिए कोई महिला मिलती है तो उसे शुभ माना जाता है। ईसी तरह रात में सियार को बोलते सुनना, उल्लु की आवाज सुनना, सुबह को कोएल की कूक सुनाई पड़ने को शुभ शकुन माना जाता है। उल्लु, चील और बिल्ली भयावह प्राणी है और ईनमें पहली दोंनों चिड़ियां दुष्टात्माएं हैं जो बच्चे के लिए और कमरे में लेटे व्यक्ति के लिए अशुभ हैं।


दृष्टिकोण[संपादित करें]

चमारों की एक कड़वी सच्चाई उनकी दयनीयता और गरीबी है। आर्थिक रूप से विपन्न और सर्दी में ठिठुरते हुए, रहने को ठीक घर नहीं, सूखे हुए शरीर यानी धरती पर वे सबसे गव्य्रीब हैं। चमार हमेशा भारी कर्ज में दबा रहता है जिसे वह अपना परम्परागत काम करते रहने के लिए या अपने खेती के काम के लिए, बीज के लिए तो कभी मवेशियों के लिए लेता है। उनकी गरीबी का एक महत्वपूर्ण कारण बेगार की व्यवस्था है। चमार दूसरों के इशारों पर जीते है और बेहिसाब काम करने को विवश होते है, जिसके लिए उन्हें कोई मेहनताना नही दिया जाता। उनकी गरीबी का एक अन्य कारण उनकी उपेक्षा है। जब तक उनकी सोच में उस बिन्दु तक परिवर्तन नहीं होगा कि वे स्वतंत्रता की भावना और अपने बेहतर जीवन की इच्छा को महसूस करना शूरु न करे दें, तब तक वे गरींबों का शोषण करने वालों के गुलाम बनाकर ही रखे जाएंगें।


महत्वपूर्ण व्यक्ति[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. चमार(२०१०) -अनु जयप्रकाश कर्दम
  2. "Uttar Pradesh data highlights: the Scheduled Castes, Census of India 2001". http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_up.pdf. 
  3. "Uttar Pradesh data highlights: the Scheduled Castes". http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_punjab.pdf. 
  4. "West Bengal — DATA HIGHLIGHTS: THE SCHEDULED CASTES — Census of India 2001". http://censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_westbengal.pdf. अभिगमन तिथि: 5 जुलाई 2013. 
  5. http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_bihar.pdf
  6. http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_delhi.pdf
  7. http://censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_chandigarh.pdf
  8. http://censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_chhattisgarh.pdf
  9. [1]
  10. http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_haryana.pdf
  11. http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_himachal.pdf
  12. http://censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_jk.pdf
  13. http://censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_jharkhand.pdf
  14. http://censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_madhya_pradesh.pdf
  15. http://censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_maha.pdf
  16. http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_punjab.pdf
  17. http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_rajasthan.pdf
  18. Singh (1998). "India's Communities A-Z (People of India Series, Volumes 4,5,6)". Oxford University Press. 
  19. Rawat, Shyam (2010). Studies in Social Protest. VEDAMS. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 8131603318. 
  20. http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_up.pdf
  21. http://www.censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_sc_uttaranchal.pdf
  22. "I will be the best PM and Mayawati is my chosen heir". Indian Express. 2 May 2003. http://www.indianexpress.com/storyOld.php?storyId=23080. "...I am a chamar from Punjab..." 
  23. "I will be the best PM and Mayawati is my chosen heir". Indian Express. 2 May 2003. http://www.indianexpress.com/storyOld.php?storyId=23080. "...Jagjivan Ram, a chamar leader..." 
  24. "A Chamar will be my successor: Mayawati". The Hindu. http://www.hindu.com/2006/08/29/stories/2006082915880400.htm. 
  25. "Amar Singh Chamkila". http://www.chamkila.org/home/history. अभिगमन तिथि: 05 जुलाई 2013. 
  26. "Amarinder disregarded events organised by state unit, says Kaypee". http://www.indianexpress.com/news/amarinder-disregarded-events-organised-by-state-unit-says-kaypee/523553. अभिगमन तिथि: 05 जुलाई 2013. 
  27. "Congress's dalit card turning against established dalit leaders of Doaba region". http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-10-21/chandigarh/34626817_1_dalit-leaders-dalit-card-chaudhary-jagjit-singh. अभिगमन तिथि: 05 जुलाई 2013. 
  28. "Tytler's party list calls India's Speaker a Chamar". http://worldsikhnews.com/13%20January%202010/Tytler%20s%20party%20list%20calls%20India%20s%20Speaker%20a%20Chamar.htm. अभिगमन तिथि: 05 जुलाई 2013. 
  29. "Cong's doublespeak on caste". http://www.ndtv.com/article/india/cong-s-doublespeak-on-caste-14697. अभिगमन तिथि: 05 जुलाई 2013. 

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