चन्द्रसेनीय कायस्थ

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उत्तपत्ति[संपादित करें]

त्रेता युग में भगवान परशुराम नें सहत्रार्जुन को मारकर क्षत्रियों के वंश को मिटाया। उस समय कुछ क्षत्रियों व क्षत्राणियों नें जंगल व पहाड़ की और भागकर अपनी रक्षा की थी । उनमें से चन्द्रसेन राजा की रानी गर्भावस्था में थीं । वह भागकर बगदालिया मुनी की कुटी में पहुंची । मुनी नें स्त्री को दुखी व अनाथ देखकर शरण दी। जब परशुराम जी को इस बात की खबर लगी तो वह बगदालिया मुनी के पास पहुंचे, बगदालिया मुनी भगवान परशुराम जी को आया देख बडे ही आदरभाव से उनका सत्कार किया एवं पूरे विधी विधान से उनकी पूजा अर्चना कर उन्हे आसन दिया और प्रसाद तैयार करा कर भोजन ग्रहन करनें का निवेदन किया। बगदालिया मुनी का आदरभाव देख भगवान परशुराम जी ने भोजन ग्रहन किया और भोजनोपरांत भगवान परशुराम जी बोले आपकी कुटिया में चन्द्रसेन राजा की रानी गर्भ सहित आई है उसे मुझे सौप दिजीए जिससे मै उसे गर्भ सहित मिटा सकूं। बगदालिया मुनी नें उन्हे देना स्वीकार किया। तब भगवान परशुराम जी बगदालिया मुनी पर खुश होकर उनसे एक मनोरथ मागनें को कहा तब बगदालिया मुनी नें कहा कि आप उसी स्त्री का गर्भ हमें दे दीजिए। भगवान परशुराम जी यह सुनकर हंसे और स्त्री को वापस करनें को स्वीकार किया। बगदालिया मुनी नें तब उस स्त्री से भगवान परशुराम जी के चरण कमल को प्रणाम करवाया। परशुराम जी नें प्रसन्न होकर बगदालिया मुनी से कहा कि आप तो जानते है मैं क्षत्रियों का नाश करनें वाका तीनो लोको में विदित हूँ परंतु आपनें इस स्त्री के गर्भ को मांग लिया है इस कारण अब मैं इसे नहीं मारूंगा किंतु मेरे रहते कोइ क्षत्रिय बच नही सकता इस कारण जब इस स्त्री की गर्भावस्था समाप्त हो तब इस बालक को चित्रगुप्त के वंश संस्कार कराकर इसे कायस्थ धर्म दीजिएगा। भविश्य में इस वंश वाले बगदालिया गोत्र कायस्थ कहे जाएगें।